संस्मरण

स्मृति : भीमसेन त्यागी : मोहन गुप्त

कथाकार भीमसेन त्यागी पर यह स्मृति आलेख मोहन गुप्त ने लिखा है. इस आलेख में साहित्य, प्रकाशन और संघर्ष का पूरा एक युग समाया हुआ है. भीमसेन त्यागी को समझने...

विष्णु खरे स्मृति: हरि मृदुल

विष्णु खरे स्मृति: हरि मृदुल

विष्णु जी का प्रस्थान स्तब्ध करने वाला था. जो व्यक्ति अपने लेखन और अपने होने से साहित्य और विचारों की दुनिया को गहरे प्रभावित कर रहा था, देखते देखते उसकी...

बीजो की यात्रा : सत्यदेव त्रिपाठी

मनुष्य भी जानवर है, पर विकसित होकर उसने सबसे बुरा व्यवहार जानवरों से ही किया, जो उपयोगी थे उन्हें पालतू बना लिया. कहते हैं कुत्ते मनुष्य के सबसे पुराने साथी...

बटरोही : हम तीन थोकदार (दो)

वरिष्ठ कथाकार बटरोही के आख्यान ‘हम तीन थोकदार’ की यह दूसरी किश्त है. इतिहास, संस्कृति, और मिथक कैसे बनते और बदलते रहते हैं इसे यहाँ देखा जा सकता है. कथारस...

नंदकिशोर नवल : आलोचक का दायित्व-बोध : विमल कुमार

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नंदकिशोर नवल (२ सितंबर,१९३७ - १२ मई,२०२०) संपादक भी थे उन्होंने ‘धरातल,’ ‘उत्तरशती,’ ‘आलोचना’ और ‘कसौटी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया. अकादमिक महत्व के कार्यों...

शशिभूषण द्विवेदी : मैं उसके फोन का इंतज़ार कर रहा हूँ : हरे प्रकाश उपाध्याय

कथाकार शशिभूषण द्विवेदी के कुसमय चले जाने से हिंदी साहित्यिक समाज अवसाद में है. शशिभूषण द्विवेदी अपनी तीखी बेलौस कहानियों के कारण जाने जाते थे. दिल्ली जैसे महानगर में कलम...

केदारनाथ सिंह : क्या आप विश्वास करेंगे ! : पंकज चतुर्वेदी

केदारनाथ सिंह : क्या आप विश्वास करेंगे ! : पंकज चतुर्वेदी

केदारनाथ सिंह (१९ नवम्बर १९३४ - १९ मार्च २०१८) की आज दूसरी पुण्यतिथि है. इस बीच उन्हें अलग अलग ढंग से याद किया गया है. समालोचन ने भी उनपर स्मृति...

नामवर सिंह : हिन्दी के हित का अभिमान: पंकज चतुर्वेदी

नामवर सिंह : हिन्दी के हित का अभिमान: पंकज चतुर्वेदी

नामवर सिंह अप्रतिम वक्ता थे, रुचिकर और बौद्धिक चुनौती से भरपूर. शायद पहली बार आलोचना को सुनना इतना प्रीतिकर बना. कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने नामवर सिंह की इन्हीं विशेषताओं को...

एक दिन का समंदर: हरजीत: प्रेम साहिल

एक दिन का समंदर: हरजीत: प्रेम साहिल

एक दिन का समंदर : हरजीत प्रेम साहिल हरजीत ने ख़ुद को इतना फैला लिया था कि आज उसे लफ़्ज़ों में पकड़ने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. ग़ज़ल...

मेरे बडके बाबू – सबके पुजारी बाबा : सत्यदेव त्रिपाठी

उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज को समझने के लिए राजनीतिक और सामजिक अध्ययन की कुछ कोशिशें हुईं हैं. साहित्य की आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण आदि विधाएं इस सन्दर्भ में उपयोगी हैं. रंग-आलोचक...

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