समीक्षा

मैं बरबाद होना चाहती हूँ : रीना सिंह

मैं बरबाद होना चाहती हूँ : रीना सिंह

मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मला उद्ध्वस्त व्हायचंय’ का हिंदी अनुवाद राजकमल ने प्रकाशित किया है, जिसमें उनके वैवाहिक जीवन की यातनाएँ और कवि-राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नामदेव ढसाल...

लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र : तबस्सुम बेगम

लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र : तबस्सुम बेगम

प्रो. मैनेजर पाण्डेय की ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ हिंदी में साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की अब भी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है. इसमें ‘लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र’ पर एक अध्याय...

काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य : राजाराम भादू

काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य : राजाराम भादू

लगभग पाँच वर्ष पूर्व काँवड़-यात्रा पर नरेश गोस्वामी का एक शोध आलेख यहीं छपा था. और अब यह पूरी पुस्तक सेतु से प्रकाशित हो कर आ गई है. हिंदी में...

मुहावरे की मौत : पवन करण

मुहावरे की मौत : पवन करण

अनुराग अनंत के कहानी-संग्रह ‘मुहावरे की मौत’ की चर्चा कवि-लेखक पवन करण कर रहे हैं. यह संग्रह लोकभारती से प्रकाशित हुआ है.

फॉर द जस्ट रिपब्लिक : कुँवर प्रांजल सिंह

फॉर द जस्ट रिपब्लिक : कुँवर प्रांजल सिंह

सबऑल्टर्न अध्ययन समूह के संस्थापक सदस्य, राजनीतिक सिद्धांतकार, मानवशास्त्री और इतिहासकार पार्थ चटर्जी ने अंग्रेज़ी और बांग्ला में तीस से अधिक पुस्तकों का लेखन-संपादन किया है. ‘नेशनलिस्ट थॉट एंड द...

मैं बेहोशी का एक पत्थर था : संतोष अर्श

मैं बेहोशी का एक पत्थर था : संतोष अर्श

‘मैं बेहोशी का एक पत्थर था’ वीरू सोनकर का दूसरा कविता-संग्रह है, जिसे ‘अनबाउंड स्क्रिप्ट’ ने प्रकाशित किया है. इसकी चर्चा कर रहे हैं, युवा आलोचक संतोष अर्श.

दुःख की दुनिया भीतर है : नीरज कुमार

दुःख की दुनिया भीतर है : नीरज कुमार

‘जेएनयू अनंत : जेएनयू कथा अनंता’ और ‘हाउस हसबैंड की डायरी’ जैसे चर्चित किताबों के लेखक जे. सुशील की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘दुःख की दुनिया भीतर है’ की समीक्षा नीरज कुमार...

शिया बटर : पवन करण

शिया बटर : पवन करण

‘शिया बटर’, ‘कैफ़े कॉफ़ी डे’, ‘बंकर’ जैसी कहानियों के लेखक कैफ़ी हाशमी का कहानी संग्रह, ‘शिया बटर’ इसी वर्ष लोकभारती प्रकाशन से आया है. इस संग्रह की चर्चा कर रहे...

उद्भ्रांत की आत्मकथा :  धीरंजन मालवे

उद्भ्रांत की आत्मकथा : धीरंजन मालवे

रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ (4 सितम्बर, 1948) की आत्मकथा ‘मैंने जो जिया’ के तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं. कवि की कथा के साथ-साथ यह अपने समय की भी कथा है....

रामचंद्र बाबाजी मोरे : प्रणव प्रियदर्शी

रामचंद्र बाबाजी मोरे : प्रणव प्रियदर्शी

वाम प्रकाशन ने हाल में कई विचारोत्तेजक पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित किए हैं. इन्हीं में कॉमरेड आर. बी. मोरे की आत्मकथा और जीवनी को संयोजित रूप में प्रस्तुत करने वाली...

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