नूह का कबूतर : विपिन शर्मा
आमिर हमज़ा अच्छे कवि तो हैं ही, संकलन और संपादन में भी कल्पनाशील हैं. हिंदी, उर्दू और फ़ारसी के 25 लेखकों से उन्होंने उनके प्रिय पात्रों पर ख़त लिखवाए हैं....
आमिर हमज़ा अच्छे कवि तो हैं ही, संकलन और संपादन में भी कल्पनाशील हैं. हिंदी, उर्दू और फ़ारसी के 25 लेखकों से उन्होंने उनके प्रिय पात्रों पर ख़त लिखवाए हैं....
हारुकी मुराकामी का उपन्यास ‘नॉरवेजियन वुड’ मूल जापानी भाषा में 1987 में प्रकाशित हुआ था. इसका अंग्रेज़ी अनुवाद जे. रूबीन ने 2000 में किया. अब यह वरिष्ठ लेखक-अनुवादक मदन सोनी...
युवा आलोचक आनन्द पाण्डेय को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव’ के लिए वर्ष 2025 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान देने का निर्णय लिया गया है. यह सम्मान हर वर्ष...
वरिष्ठ आलोचक माधव हाड़ा इधर वर्षों से मध्यकालीन-साहित्य पर कार्य कर रहे हैं. ‘भक्ति अगाध अनंत ‘ उनकी एक महत्वाकांक्षी पुस्तक है, जिसमें भक्ति आंदोलन के अखिल भारतीय परिदृश्य को...
भक्ति काल की साझी स्मृति, स्वाधीनता संघर्ष और नवजागरण की खुली समझ से निर्मित भारतीयता पर जैसे-जैसे संगठित हमले बढ़ रहे हैं, उसी अनुपात में उसे फिर से सहेजने और...
मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मला उद्ध्वस्त व्हायचंय’ का हिंदी अनुवाद राजकमल ने प्रकाशित किया है, जिसमें उनके वैवाहिक जीवन की यातनाएँ और कवि-राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नामदेव ढसाल...
प्रो. मैनेजर पाण्डेय की ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ हिंदी में साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की अब भी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है. इसमें ‘लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र’ पर एक अध्याय...
लगभग पाँच वर्ष पूर्व काँवड़-यात्रा पर नरेश गोस्वामी का एक शोध आलेख यहीं छपा था. और अब यह पूरी पुस्तक सेतु से प्रकाशित हो कर आ गई है. हिंदी में...
अनुराग अनंत के कहानी-संग्रह ‘मुहावरे की मौत’ की चर्चा कवि-लेखक पवन करण कर रहे हैं. यह संग्रह लोकभारती से प्रकाशित हुआ है.
सबऑल्टर्न अध्ययन समूह के संस्थापक सदस्य, राजनीतिक सिद्धांतकार, मानवशास्त्री और इतिहासकार पार्थ चटर्जी ने अंग्रेज़ी और बांग्ला में तीस से अधिक पुस्तकों का लेखन-संपादन किया है. ‘नेशनलिस्ट थॉट एंड द...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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