संजीव: मुझे पहचानो: अमरदीप कुमार
वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘मुझे पहचानो’ तद्भव (नवम्वर-२०१९) में प्रकाशित हुआ था और तभी से इसकी चर्चा शुरू हो गयी थी. कथा की नयी जमीन और भाषा की तुर्शी...
वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘मुझे पहचानो’ तद्भव (नवम्वर-२०१९) में प्रकाशित हुआ था और तभी से इसकी चर्चा शुरू हो गयी थी. कथा की नयी जमीन और भाषा की तुर्शी...
विश्व के लगभग सभी हिस्सों से स्त्रियों द्वारा लिखी कहानियों के हिंदी अनुवाद का यह संचयन सिद्ध करता है कि इस धरती पर स्त्री की स्थिति हरजगह कमोबेश एक जैसी...
मानदा देवी द्वारा लिखित और १९२९ में बांग्ला भाषा में प्रकाशित ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ संभवतः भारत में प्रकाशित किसी वेश्या की पहली आत्मकथा है. जिसका अनुवाद नब्बे साल...
आवरण : तेजी ग्रोवर सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर संस्करण : २०२० मूल्य : २०० रुपये रुस्तम कवि हैं, कवि जो कविता लिखने के साथ-साथ कविता जीने भी...
(किताब)चर्चित कथाकार प्रवीण कुमार का दूसरा कहानी संग्रह ‘वास्को डी गामा की साइकिल’ अभी-अभी ही राजपाल से प्रकाशित हुआ है. इसमें सात कहानियाँ शामिल हैं. इनमें से एक ‘सिद्ध पुरुष’...
ज्ञान चंद्र बागड़ी समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े हैं. उनके पहले उपन्यास \'आख़िरी गाँव\' का प्रकाशन वाणी ने किया है. इसकी चर्चा कर रहें हैं - रामानंद राठीआख़िरी...
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नेताओं का वकालत और लेखन से गहरा सम्बन्ध था, इनमें से बहुत तो पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रहें हैं. स्त्रियाँ भी इसमें पीछे नहीं थीं. राजनेता,...
प्रचण्ड प्रवीर के ‘उत्तरायण’ में मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन तथा ‘दक्षिणायन’ में कर्क, सिंह,कन्या, वृश्चिक संक्रांति तथा धनु शीर्षक से कहानियां संकलित है. इधर प्रवीर ने उपनिषदों को...
अस्सीवें में पहुंच रहे मैनेजर पाण्डेय अपने लेखन में नियमित हैं. इधर पांच वर्षों में मेरे देखने में उनकी पांच किताबें प्रकाशित हुईं हैं- ‘लोकगीतों और गीतों में १८५७’, ‘मुग़ल...
कथाकार तरुण भटनागर का उपन्यास, ‘राजा,जंगल,और काला चाँद’ आधार प्रकाशन से २०१९ में प्रकाशित हुआ था, जो ४१ अध्यायों में विभक्त है. इनके नाम दिलचस्प और मानीख़ेज़ हैं जैसे- राजा...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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