रंग – राग : तमाशा : सारंग उपाध्याय
सिनेमा आधुनिक कला माध्यम है. इस माध्यम में तरह-तरह के प्रयोग होते रहे हैं. तकनीकी मदद से कल्पनाशीलता को मूर्त करने में ‘चल-चित्र’ दीगर कला माध्यमों से बहुत आगे निकल...
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सिनेमा आधुनिक कला माध्यम है. इस माध्यम में तरह-तरह के प्रयोग होते रहे हैं. तकनीकी मदद से कल्पनाशीलता को मूर्त करने में ‘चल-चित्र’ दीगर कला माध्यमों से बहुत आगे निकल...
जब पूरा वातावरण कट्टरता, हिंसा और असहिष्णुता से भयाक्रांत हो और सत्ता के पहियों के नीचे मासूम, निर्दोष और खरे जन पिस रहे हों तब कविता क्या कर सकती है...
पल्लवी शर्मा प्रक्टिसिंग आर्टिस्ट हैं और कैलिफ़ोर्निया में विगत १८ वर्षों से रह रहीं हैं. उनकी कृतियां राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित हुई हैं और पसंद की गयी हैं.संत्रास, व्यर्थता बोध,...
हिंदी साहित्य में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी नाम से एक युग है, ज़ाहिर सी बात है द्विवेदी जी का योगदान युगांतकारी है. उनके सम्मान में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने १९३३...
‘लाख के घर बनाकर लेखक को बुलावा भेजते हैं.’हिंदी के सह्रदय पाठक दूसरी भाषाओँ के कच्चे-पक्के अनुवादों से भारतीय कविता के परिदृश्य को देखते –समझते रहते हैं. मराठी साहित्य प्रारम्भ...
छोटू उस्ताद (कहानी संग्रह)स्वयं प्रकाशकिताबघर प्रकाशन, दिल्लीमूल्य- 200/- कहानीमें अपने समय की विडम्बनाएं पल्लवस्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं जो कहानी में कथ्य की सम्प्रेषणीयता के लिए लगातार प्रयोगशील रहे. प्रगतिशील-जनवादी कथाकारों में...
भारत में हिंसक-साम्प्रदायिक शक्तियों के बेखौफ होने का यह (कु) समय है. विचारकों – साहित्यकारों की हत्याएं हो रहीं हैं. संस्थाओं पर जाहिल-कुंदजहन सरदारों की ताजपोशी हो गयी है. प्रगतिशील पत्रकारों...
आओ, हिन्दी-हिन्दी खेलें राजीव रंजन गिरिसितम्बर में...
सोशल मीडिया से आज आप इंकार नहीं कर सकते, फेसबुक-वाट्सअप आदि से मध्यवर्ग का अब लगभग रोज का सम्बन्ध है. इस पर बनती-बिगडती मित्रताओं से भी सभी परिचित हैं. साहित्य...
साठ के पुरुषोत्तम अग्रवाल- एक पड़ाव... पिक्चर अभी बाकी है... तृप्ति वामा समय और समाज की वर्तमान स्थिति और हृदय हीनता के कारण आज का आदमी प्रसन्नता के अवबोध से...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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