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हस्तक्षेप : विवेक के हक़ में

विवेक के हक़ में (IN DEFENCE OF RATIONALITY)         प्रो. एम एम कल्बुर्गी को याद करते हुए (5, सितम्बर 2015, जंतर-मंतर.3 से ७ बजे शाम तक)ताकि लोकतन्त्र बचा...

मति का धीर : अवधनारायण मुदगल

अवधनारायण मुदगल केवल सारिका के संपादक ही नहीं, एक उम्दा लेखक और बेहतरीन इंसान भी थे. खट्टे-मीठे अनुभवों को समेटे राजकुमार गौतम का स्मृति-लेख. की गल है? .... मुदगल है!...

सहजि सहजि गुन रमैं : विपिन चौधरी

विपिन चौधरी की कुछ कविताएँ                                 _____________________________ अभिसारिकाढेरों सात्विक अंलकारों को थामें हवा रोशनी ध्वनि की गति...

सबद – भेद : मुक्तिबोध की नई प्रवृत्तियाँ : नंद भारद्वाज

कवि –आलोचक नंद भारद्वाज सघन उपचार के बाद घर लौटे हैं, मुक्तिबोध पर लिखी दूधनाथ की आलोचना पुस्तक –‘साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ\' पर आलेख  पूरा किया है. यह आलेख संवाद है...

रंग राग : सत्यजित राय का इतिहास बोध : पुरुषोत्तम अग्रवाल

वरिष्ठ लेखक-आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल२५ अगस्त २०१५ को अपने सक्रिय जीवन के साठ साल पूरे कर रहे हैं. इस अवसर पर उनकी तीन किताबें लोकार्पित हो रही हैं - किया...

मैं कहता आँखिन देखी : सच्चिदानंद सिन्हा

मुजफ्फरपुर (बिहार) के एक छोटे-से गांव मणिका (मुसहरी प्रखंड) के सवेराकुटी में वर्षों से रहते हुए  ८५ वर्षीय प्रख्यात समाजवादी चिंतक और विचारक सच्चिदानंद सिन्हा आज भी सक्रिय हैं, भारत...

परख : अपनों में नहीं रह पाने का गीत (प्रभात) : प्रमोद कुमार तिवारी

समकालीन हिंदी आलोचना में प्रभात की कविताओं को लेकर उत्साह है, हालाँकि अभी उनका एक ही काव्य-संग्रह ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ प्रकाशित है. कविताओं के अतरिक्त आदिवासी...

सहजि सहजि गुन रमैं : मोनिका कुमार

मोनिका कुमार की कविताएँ आप \'समालोचन\' पर इससे पहले भी पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है उनकी छह नयी कविताएँ. टिप्पणी दे रहे हैं अविनाश मिश्र   मोनिका कुमार की कविताएँ  ...

सबद भेद : तसलीमा नसरीन : आधी दुनिया का पूरा सच (रोहिणी अग्रवाल)

तसलीमा नसरीन बौद्धिक-सामाजिक क्षेत्र में एक ऐसी उपस्थिति हैं, जिसने सत्ताओं (धर्म, राज्य, पुरुष-वर्चस्व) को अनथक चुनौती दी है. भारतीय महाद्वीप में शायद वह ऐसी पहली लेखिका हैं जिन्होंने अपने...

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