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Home » दलित स्त्री आत्मकथाएं: गरिमा श्रीवास्तव » Page 14

दलित स्त्री आत्मकथाएं: गरिमा श्रीवास्तव

धर्म, जाति, समाज, परिवार और लैंगिगता के कारण पीड़ित दलित स्त्रियों की इन आत्मकथाओं से संभव है आप परिचित हों- हर आत्मकथा दर्द की जैसे कोई नदी हो- लाइफ़ ऑफ़ एन अनटचेबल (वीरम्मा), करक्कू (बामा फ्युस्टीना मेरी), आलो आंधारि (बेबी हालदार), आमि केनो चांडाल लिखी (कल्याणी ठाकुर), रात्रादिन आम्हा (शांताबाई धानाजी दानी), मिटलेली कवाडे (मुक्ता सर्वगोंड), माझ्या जल्मांची चित्तरकथा (शांताबाई कृष्णाजी काम्बले ), जिण आमुच्या (बेबी कोंडिबा काम्बले), अन्तःस्फोट (कुमुद पावड़े), आयदान (उर्मिला पवार), मलाउद्ध्वस्त व्यायंचय (मल्लिका अमर शेख), दोहरा अभिशाप (कौशल्या बैसंत्री), शिकंजे का दर्द (सुशीला टाकभौरे), एक अनपढ़ कहानी (सुशीला राय), अपनी ज़मीं, अपना आसमां (रजनी तिलक), छूटे पन्नों की उड़ान (अनिता भारती), टुकड़ा–टुकड़ा जीवन (कावेरी), बवंडरों के बीच (कौशल पंवार) टूटे पंखों से परवाज़ तक (सुमित्रा महरोल). आलोचक गरिमा श्रीवास्तव ने अपने इस विशद आलेख में इन सभी आत्मकथाओं की अंतर-कथाओं का समावेश किया है. ये आत्मकथाएं अखिल भारतीय हैं. इस आलेख को पढ़ते हुए उस प्रतिनिधि दलित स्त्री का चेहरा सामने आता है जिसकी पीड़ा क्षेत्रीयता की सीमा लांघकर लगभग हर जगह एक जैसी है. गरिमा श्रीवास्तव ने बड़े श्रम, शोध और स्त्री-दृष्टि से इसे लिखा है. ज़ाहिर है यह विचार के साथ-साथ हस्तक्षेप भी है. इसकी प्रस्तुति भी समालोचन के लिए चुनौती थी, प्रत्येक आत्मकथा को अलग पृष्ठ दिया गया है, जिससे कि पढ़ने में सुविधा हो.

by arun dev
November 7, 2021
in आलेख, विशेष
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मलाउद्ध्वस्त व्यायंचय

मल्लिका अमर शेख (1957) की आत्मकथा ‘मलाउद्ध्वस्त व्यायंचय (मुझे उध्वस्त होना है )’ मराठी में 1994 में आई जिसके अंग्रेज़ी अनुवाद ने प्रकाशित होते ही तहलका  मचा दिया. मराठी के कवि और दलित पैंथर के  अग्रणी नेता नामदेव ढसाल की प्रेमिका और बाद में पत्नी बनी मल्लिका ने आत्मानुभवों को सबके सामने लाकर न सिर्फ निजी जीवन को सबके सामने व्यक्त करने का साहस किया बल्कि दलित राजनीति,उसके अंतर्विरोधों  और उसके नेतृत्व से जुड़े व्यक्तित्व के दोहरे-तिहरे चरित्र के बारे में बेबाकी से लिखा. मल्लिका अमरशेख की बेबाकी ने दलित आंदोलन से जुड़े लोगों को उनका शत्रु भी बना दिया. मल्लिका के पिता शाहिर अमरशेख कम्युनिस्ट कार्यकर्ता,ट्रेड यूनियन और लोक गायकी से सम्बद्ध थे, वे 1960 के दशक में  महाराष्ट्र की राजनीति  में सक्रिय भी थे.

मल्लिका के पिता का घर साहित्यिकों और बौद्धिकों की शरणस्थली था,नित नए संगीत और साहित्य के कार्यक्रम उनके घर में हुआ करते.  पिता की राजनैतिक सक्रियता ने मल्लिका को राजनीतिक दृष्टि से सचेतन बनाया,वे बचपन से ही कुछ विशिष्ट करना चाहती थीं. आसपास के माहौल और कानों में पड़ते शब्द उनकी चेतना का निर्माण कर रहे थे. उम्र के सातवें वर्ष में मल्लिका ने पहली कविता लिखी. वह नृत्य किया करती, उसके लिखे भाषण इतने अच्छे होते कि कक्षा में अन्य बच्चों के सामने उसे सुनाया जाता. . मां कुसुम जयकर और पिता शाहिर अमरशेख ने जाति भेद  से ऊपर उठकर विवाह किया था, साहित्य,संगीत के  समृद्ध संस्कार उन्हें  अभिभावकों से ही मिले. प्रह्लाद केशव अत्रे जैसे लोग उनके पारिवारिक मित्र थे,ऐसे माहौल में वे एक मुक्त और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जीवन संस्कार अर्जित कर सकीं.

वे आत्मकथा में बताती हैं कि उम्र के सत्रहवें वर्ष में ही नामदेव ढसाल की कविताई और जुझारू व्यक्तित्व के सम्मोहन में,  उन्होंने 1974 में विवाह का निर्णय ले लिया. नामदेव ढसाल लोकप्रिय राजनीतिक कार्यकर्त्ता,दलित मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाने और सुकविता के लिए पर्याप्त ख्याति अर्जित कर रहे थे. लेकिन जीवन का यथार्थ कविता से नहीं चलता. यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि प्रारम्भिक रोमानी आकर्षण के बाद मल्लिका  ने जिसे नए सिरे से पहचाना  वह नामदेव ढसाल अपने निजी जीवन में,सार्वजनिक चेहरे से बिलकुल अलग निकले  –उनमें  सभी  कमज़ोरियाँ थीं. दलित नेतृत्व की ज़िम्मेदारी उठाते-उठाते नामदेव कब अपनी पत्नी के प्रति इतने क्रूर बन गए कि  वह उसी घर के दूसरे हिस्से मे अलग रहने लगी और एक संतान के बाद दूसरी संतान को जन्म देने को तैयार नहीं हुई. मल्लिका पति के सार्वजनिक जीवन मे आए व्यतिक्रम के बारे में लिखती हैं –

“कम्युनिस्ट  के रूप में उसी के समाज द्वारा गतिरोध पैदा हुआ. जल्दी मिली सफलता की आँधी  और असफलता के कारण  अपने  को फ़्रस्ट्रेशन से बचा पाना नामदेव के लिए संभव नहीं हुआ, इन स्थितियों ने उसे बिलकुल बदल डाला”…

आगे दलित कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए वह लिखती हैं –

”देखो तुम्हारा नेता शराबी है,रंडीबाज़ है,वह व्यवहार नहीं जानता लेकिन क्रांति करने निकला है. ऐसे कार्यकर्ता से तुम प्रेम करते हो, वह गुंडा है, गुप्तरोग का शिकार है, उसके मित्र भी उसके जैसे हैं. वे काहे के पैंथर.”

मल्लिका को कभी अपनी कल्पना के राजकुमार की छवि  नामदेव में दिखाई पड़ी थी. वे ढसाल की कविता,उनकी राजनीतिक छवि और साहसिकता की तारीफ भी करती हैं,उन्हें समान वैचारिक स्तर पर बात करने वाला,कविहृदय,कलापारखी प्रेमी -पति मिला  जिसका कहना था मेरी कविता ही राजनीति है. शुरुआत के रोमानी  दिनों के बाद ढसाल अपने सामाजिक -राजनीतिक कार्यों मे उलझ जाते हैं. मल्लिका कवयित्री हैं  लेकिन वे मात्र ‘पत्नी ‘होकर जीना नहीं चाहतीं. उन्हें अपनी पहचान भी चाहिए लेकिन घर मे पैसों की तंगी है,और मल्लिका के भीतर सुखी समृद्ध जीवन जीने की  लालसा “हमेशा की बीमारी के कारण,कमजोरी के कारण,लालन -पालन और विपुल वाचन के कारण मैं एकाकीपन और मनस्वीपन के भावुक आवरण में उलझ गयी,आज तक अपने आप को उससे अलग नहीं कर पायी. अपनी कैशोर्य कल्पना के विषय में वह लिखती हैं –

“मैंने अपने मन में राजकुमार का चित्र उकेरा था. मनमौजी. . . कवि, दीखने मे स्मार्ट. . . सांवला. . . उसकी चेष्टाओं में पौरुष हो. . . मर्दानगी हो”

युवा कल्पना के अनुसार मल्लिका के स्वप्नों का घर यों होता –

“सौंदर्य -प्रसाधन,साड़ियाँ,बंगला,पियानो किस तरफ हो,काँच के दरवाजे -विशाल,विपुल रोशनी -खुली प्रसन्न हवा,लाइब्रेरी. . . सामने छोटा -सा तालाब. . . मछलियाँ. . . लाल -पीली दौड़ती हुई. . . खिड़की से दीखनेवाला मौलसिरी का पेड़. . . गुलमोहर,रजनीगंधा के पौधे. . . पीछे घना जंगल,लाल पगडंडी.    मल्लिका का मिज़ाज रोमेंटिक है वह जीवन को उसके पूरेपन मे जीना चाहती है उसका सपना है –“

उबलती गरम चाय. . . ठंडी बरसाती हवा. . . बरसात का झोंका. . . और हाथों मे कॉमिक्स. . .  ओ  हो फिर क्या ?मानों ब्रहमस्वरूप के साक्षात्कार के आनंद मे खो जाती. मेरी वह चरम आनंद के सुख की कल्पना होती है.

ऐसा कवि मन लेकर मल्लिका प्रेम और गृहस्थी मे प्रवृत्त हुईं लेकिन जल्दी ही पता चल गया  कि नामदेव और मल्लिका दोनों विपरीत ध्रुवान्तों पर स्थित हैं,जो आपस में  टकराते हैं,जूझते हैं और फिर अलग हो जाते हैं. उधर नामदेव ढसाल  का सार्वजनिक -राजनैतिक जीवन बिखरता है और मल्लिका के स्वप्न यथार्थ से टकराते हैं. मल्लिका आत्मानुभवों को लिखती रहीं  कभी कविता में कभी किसी अन्य विधा में.  मल्लिका ने व्यवस्थित रूप से आत्मकथा अपने विवाह  के कई वर्षों  बाद लिखी,तब तक उनका वैवाहिक जीवन कठिनाई और तिक्तता से भर चुका था.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मल्लिका के आख्यान से दलित पैन्थर समूह और उसके  सहयोगी वामपंथी दलों को जानने का एक दूसरा नजरिया मिलता है. पति के रूप में नामदेव अलग थे,पत्नी के माध्यम से नामदेव को जानना अप्रिय था. इससे नामदेव की छवि को धक्का लगा. विवाह के बाद जब राजा ढले और जे. वी.  पवार के साथ कांग्रेस से आर्थिक अनुदान लेने के मसले पर नामदेव की टकराहटों के सन्दर्भ में मल्लिका ने स्पष्ट कहा कि दलित पैंथर  समूह की अपनी कोई विचारधारा नहीं थी क्योंकि उसे हमेशा कम्युनिस्ट पार्टी का सहयोग मिला. पैंथर्स  को धन चाहिए था चाहे वह कांग्रेस दे या वामपंथी दल. मल्लिका का कहना है पैंथर्स और नामदेव, पार्टी को मिले फंड का सुनियोजन करने में असमर्थ रहे इसलिए दलित पैंथर्स पार्टी कमजोर हो गयी. मल्लिका के आत्माख्यान की दूसरी विशेषता है कि वे दलित संगठनों में स्त्री की दोयम स्थिति और उपेक्षा के बारे में बेबाक टिप्पणी करती हैं.  शर्मिला रेगे ने पुणे के अपने भाषण में 1998 में ही  कहा था कि दलित  पैंथर्स पार्टी ने यद्यपि दलित प्रश्न के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी लेकिन दलित स्त्रियों की आवाजों का आन्दोलन में नेतृत्वकारी स्थान नहीं था. स्त्रियों को सिर्फ़ मां और पत्नियों की भूमिका में देखा गया .

शर्मिला रेगे की इस धारणा को मल्लिका की आत्मकथा पुष्ट करती है. मल्लिका ने नामदेव की माँ यानी अपनी सास को आन्दोलन के मज़बूत खम्भे के रूप में आत्मकथा में चित्रित किया है. क्योंकि वे समय का ख्याल न करते हुए आन्दोलन में भाग लेने वालों के लिए हर समय भोजन बनाने को तैयार रहती थीं. मल्लिका का कहना है कि संतान होने के बाद नामदेव का नजरिया पत्नी के प्रति परिवर्तित हो गया वे अपनी और पार्टी की बातों से मल्लिका को दूर रखने लगे,वे अक्सर बिना बताए घर से बाहर रहते,रेड लाईट एरिया में जाने की सूचनाएं मल्लिका के पास भी पहुंचतीं. उन्होंने बच्चे के लालन–पालन की सारी ज़िम्मेदारी मल्लिका को अकेले सौंप दी  और स्वयं घरेलू जिम्मेदारियों से मुक्त हो गये. धीरे–धीरे मल्लिका हाशिये पर चली गयी,पार्टी कार्यकर्त्ता भी उसे ऊटपटांग बोल कर चले जाते.

नामदेव के घर लौटने पर मल्लिका ने पति के निजी और राजनैतिक जीवन पर सवाल करने शुरू किये जिसके उत्तर में मल्लिका को हिंसा का शिकार बनना पड़ा. वे आत्मकथा में घर में होने वाली अपनी पिटाई का जिक्र  करती हैं. तकलीफदेह विवाह –सम्बन्ध के कई  वर्ष बाद,आत्मकथा के अंतिम भाग में मल्लिका  आश्चर्य करती हैं कि कैसे पार्टी के लोग,सिर्फ़ जाति के नाम पर नामदेव के मित्र बने रहते थे जबकि नामदेव साधारण बातचीत में भी बहुत हिंसक हो जाते थे.

मल्लिका नामदेव की  पितृसत्ताक सोच को भी इस संदर्भ में सामने लाती हैं. मल्लिका जाति का प्रश्न अलग से नहीं उठातीं. दलित नेता से प्रेम और फिर विवाह करना उनके जीवन को उध्वस्त करने के लिए काफी था. वे अपनी बात को कह देने,पाठकों तक लिख कर पहुंचा देने से अच्छा अनुभव करती हैं इसलिए सवाल भी करती हैं– “मैंने तो लिख कर अपने मन की बात कह दी,लेकिन उनका क्या  होता होगा जो मेरी तरह लिख नहीं सकतीं. ”

यह कहकर मल्लिका स्वयं को समाज की परिधि पर खड़ी स्त्री से जोड़ लेती हैं. वे जाति समानता का झंडा उठाने वाले आन्दोलन के भीतर पैबस्त पितृसत्तात्मक मानसिकता  को उभारती हैं और इस सन्दर्भ में अपनी सास का उदाहरण देती हैं, जिनकी भूमिका घर के भीतर मेहमानों की आवभगत, भोजन बनाने और परिवार के लोगों की सुख–सुविधा का ध्यान रखने तक सीमित थी. मल्लिका एक दलित कार्यकर्त्ता से विवाह करके कष्टायित हुईं ऐसा आत्मकथा में चित्रित है. लेकिन दलित आन्दोलन को मध्यवर्गीय दृष्टि से देखने का नजरिया मल्लिका के पूरे आत्मकथ्य में व्याप्त है. उन्हें विवाह से पहले नामदेव की पारिवारिक पृष्ठभूमि के विषय में जानकारी थी,पार्टी के भीतर उनके आक्रामक व्यवहार के बारे में भी  उन्होंने सुन रखा था. चुनाव गलत हो जाने पर जीवन कितना तकलीफदेह हो जाता है मल्लिका अमरशेख का आत्मकथ्य इसका ज्वलंत उदाहरण है.

उनके ये अनुभव पढ़े जाने ज़रूरी हैं जो बताते हैं कि  सार्वजनिक जीवन के चेहरों का वैयक्तिक स्वरूप कैसे अलग होता है या हो सकता है साथ ही किसी भी आंदोलनकर्ता के अपने निजी अंतरविरोध हो सकते हैं जिससे व्यक्तिगत जीवन अस्त -व्यस्त हो सकता है,इसका  लेखा -जोखा पाठक को मिलता है.  मल्लिका बार -बार जीवन को मुड़ कर देखती हैं . स्त्री के लिखते ही  ‘निज ‘राजनैतिक ‘कैसे हो सकता है यह देखने के लिए इस आत्मकथा को पढ़ा जाना ज़रूरी है. जो स्त्री कभी कविता,प्रेम और पुरुष को एक करके देखती थी वही नामदेव के पीने -पिलाने की आदत से आजिज़ आ चुकी थीं,अस्मिता और सांस्कृतिक  एकता की राजनीति करने वाला व्यक्ति जब अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में  असफल हो जाता है तो घर के भीतर के ‘स्पेस’ मे वह स्त्री के लिए पीड़क साबित हो जाता है,फिर सबकुछ चाहे बच जाए प्रेम नहीं रहता. वह लिखती है कि कैसे बहुत सारा साम्यवादी साहित्य,सोवियतलैंड मैगजीन के गट्ठर के गट्ठर वह बेच दिया करती थी कि घर का खर्च चल सके.

“शुरुआत के दिनों मे हम निर्धन इसलिए थे कि जो भी धन था उसे हम दलित कार्यकर्ताओं पर खर्च कर दिया करते थे,नामदेव की महंगी आदतों पर भी, पर बाद के वर्षों में उसकी बीमारी और इलाज़ पर सारा पैसा खर्च होने लगा”

मल्लिका ने नामदेव के इलाज़ का खर्च साधने के लिए अपनी माँ का घर भी बेच दिया,आत्मकथा के अंग्रेज़ी अनुवाद से जो धन मिला वह भी नामदेव के इलाज़ में चला गया,लेकिन नामदेव को बचाया नहीं जा सका. मुस्लिम पिता, ब्राह्मण माता की बेटी मल्लिका की जीवन- यात्रा में अंतत: उसके हाथ कुछ नहीं लगता. स्त्री की स्पष्टवादिता और उस स्पष्टवादिता के खतरे, स्व की सीमा का अतिक्रमण करके ‘निज, का ‘पर’ में परिविस्तार और फिर समाज, इतिहास, वर्ग,जाति और जेंडर के संघातों से गुजरती हुई स्त्री जो एक ‘स्त्री’ मात्र नहीं रह जाती बल्कि लाखों-करोड़ों की आवाज बन जाती है.  भिन्न समाज और भिन्न संस्कृति की रचनाकार देखे-अनदेखे सभ्य-असभ्य सामाजिकों की चेतना को अपने अनुभव के दायरे में कितनी सहजता घेर लेती है-इसे देखने के लिए इस आत्मकथ्य को पढ़ा जाना ज़रूरी है.

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Comments 8

  1. दया शंकर शरण says:
    4 years ago

    बहुत ही विस्तृत आलेख। दलित जीवन का खण्ड-खण्ड सच-एक आत्मकथात्मक साक्ष्य । तीन तरफा मार झेलती स्त्री- एक तो स्त्री, वह भी दलित और उस पर से पितृसत्ता के अधीन।अभी समयाभाव से इसे आद्योपांत नहीं पढ़ पाया। लेकिन अत्यंत पठनीय एक जरूरी आलेख।

    Reply
  2. अशोक अग्रवाल says:
    4 years ago

    साहित्य का भूगोल हो या इतिहास इन दलित महिला कथाकारों की आत्मकथाओं की उपस्थिति को दर्ज किए बिना कभी मुक्कमल आकार ग्रहण नहीं कर सकता। बेबी हालदार की आत्मकथा पढ़ते हुए अविस्मरणीय कहानी आखेट के कथाकार प्रबोध कुमार और विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व के धनी स्वर्गीय अशोक सेकसरिया का स्मरण न आना असंभव है। हमेशा की तरह इस बार भी अपने गंभीर और सुचिंतित आलेख को पढ़वाने के लिए गरिमा श्रीवास्तव जी का और अरुण देव जी का अभिवादन।

    Reply
  3. पंकज चौधरी says:
    4 years ago

    गरिमा श्रीवास्तव का यह भी एक सुचिंतित आलेख है। भारत में दो तरह के स्त्री लेखन होते रहे हैं। एक खाए-अघाए या सवर्ण स्त्रियों का लेखन, और दूसरा दलित-बहुजन स्त्रियों का लेखन। सवर्ण स्त्रियों के यहां दलित-बहुजन स्त्रियां उसी तरह से गायब हैं जिस तरह से सवर्ण पुरुषों के लेखन से जाति समस्या या दलित-बहुजन समाज। इतना ही नहीं सवर्ण लेखिकाएं दलित-बहुजन स्त्रियों से अकूत घृणा भी करती हैं। लेकिन दलित स्त्री लेखन की यह खासियत है कि एक तरफ यदि वह द्विजवाद से लड़ता है तो वहीं दूसरी तरफ अपने ही समाज की मर्दवादी सोच और विचार से। दलित-बहुजन स्त्रियों के लेखन में हम कई-कई मोर्चों पर संघर्ष और अभिशापों को पाते हैं। इसीलिए उसे भारत के प्रमुख स्वर के रूप में पहचान मिल रही है। ईमानदारी, प्रामाणिकता, विश्वसनीयता और स्वाभाविकता उसकी विशेषता है। तभी मल्लिका अमरशेख जैसी महान दलित लेखिका अपने पति नामदेव ढसाल की कलई को खोलकर रख पाती हैं। तहमीना दुर्रानी और तसलीमा जैसी लेखिकाओं ने भी ऐसा साहस दिखाया है। लेकिन हिंदी की सवर्ण लेखिकाओं के पास ऐसा साहस कहां? वह तो फैशन में लिखते चलती हैं। वे भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले का नाम नहीं लेंगी लेकिन वर्जीनिया वुल्फ और जर्मन ग्रीयर का नाम लेते नहीं अघाएंगी।

    Reply
  4. कुमार अम्बुज says:
    4 years ago

    अच्छा आलेख है। कई महत्वपूर्ण संदर्भों से संपन्न।

    Reply
  5. अनिल जनविजय says:
    4 years ago

    ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी घटिया-सी आत्मकथा लिख दी थी। वहीं दूसरी ओर तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा में दलित जीवन की पीड़ाएँ और कष्ट तो वयक्त किए, लेकिन अपनी पत्नी के बारे में बिल्कुल भूल ही गए। स्त्री दलितों में भी सबसे दलित है। पितृसत्तात्मक समाज की बन्दिशें दलित स्त्रियों को भी झेलनी पड़ती हैं। उनका दोहरा शोषण होता है। ऊँची जातियों के द्वारा और ख़ुद अपने ही समाज के मर्दों के द्वारा।

    Reply
    • Anonymous says:
      4 years ago

      सही है

      Reply
  6. शुभा माहेश्वरी says:
    4 years ago

    सशक्त भाषा के साथ गंम्भीर विश्लेषण करते हुए गरिमा जी ने दलित स्त्रियों के आत्मकथ्यों से दिखाई देने वाले गहरे दंश को साहित्य जगत के सामने लाकर अन्याय के खिलाफ दस्तावेज प्रस्तुत करने का श्लाघनीय कार्य किया है। उन्हें और अरुण देव को अभिवादन।

    Reply
    • Anonymous says:
      4 years ago

      शुक्रिया शुभा जी

      Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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