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अब्बू की नज़र में जेल
लॉकअप से वापस गाड़ी में बैठने के लिए वैसे ही लाइन में खड़े होना पड़ता है. जिन्होंने सीट खरीदी होती है, उन्हें पहले ही सीट पर बिठा दिया जाता है. उसके बाद शुरू होती है धक्का मुक्की. इस धक्का मुक्की से बचने के लिए हम जैसे लोग और बुजुर्ग और बीमार लोग लाइन के अंत में ही नज़र आते हैं. गाड़ी भरती जाती है या सटीक रूप से कहें तो ठूंसती जाती है, और निकलती जाती है. इसलिए हम जैसे लोगों को अक्सर अंतिम गाड़ी ही मिलती है. अब्बू और मैं दोनो ही बुरी तरह थक चुके थे. खैर किसी तरह हम गाड़ी में घुसे. अंधेरा हो चुका था. गाड़ी में भी अंधेरा था. गाड़ी पर जब बाहर की लाइट पड़ती तभी हम एक दूसरे को देख पा रहे थे. सभी बूढ़े-बीमार लोग किसी तरह गाड़ी के फर्श पर ही बैठ गये थे.
इन्हें देखकर मुझे बार-बार ‘कोयन ब्रदर्स’ की फ़िल्म ‘देयर इज नो कन्ट्री फार ओल्ड मैं न’ का नाम याद आ रहा था. हालांकि फ़िल्म का कथानक एकदम अलग है. खैर सीट पर बैठे एक परिचित क़ैदी की गोद में अब्बू को बिठाकर मैं गाड़ी के पिछले दरवाजेनुमा चैनल पर टेक लेकर खड़ा हो गया. सुबह की तरह ही इस बार भी गाड़ी के हिचकोले लेते ही गांजा चरस का दौर शुरू हो गया और पूरी गाड़ी पुनः धुंए से भर गयी. मज़ेदार बात यह है कि गाड़ी में एक कैमरा भी लगा है. लेकिन इसे पूरा सम्मान देते हुए क़ैदी टोपी पहना देते हैं और कानून की तरह कैमरा भी आंख बन्द कर लेता है.
अब शुरू हुआ फ़ोन का दौर. बन्द चैनल के बाहर की ओर बैठे दोनों सिपाही 50-50 रुपये लेकर क़ैदियों को बात करा रहे थे. मेरी बगल में सीट पर बैठा एक क़ैदी लगातार फ़ोन लेकर अपने साथी क़ैदियों को दे रहा था और खुद भी बात कर रहा था. अंधेरा होने के कारण मैं उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था. फ़ोन के इसी लेन देन के चक्कर में वह लगातार मुझे डिस्टर्ब कर रहा था. अन्ततः मैंने उसे डांटा कि क्यों मुझे बार-बार धक्का दे रहे हो. यह सुनते ही उसने मुझे ज़ोर का धक्का दे दिया, जिसके लिए मैं एकदम तैयार नहीं था. मैं गिरते-गिरते बचा. मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया और मैंने उसका गला पकड़ लिया. उसने फिर मुझे ज़ोर का धक्का मारा और मैंने उसी प्रतिक्रिया में उसे एक चांटा जड़ दिया. उसके बाद वह खड़ा हो गया और उसने मुझे धड़ाधड तीन चार मुक्के जड़ दिये. मेरा चश्मा नीचे गिर गया और टूट गया.
साथी क़ैदी की गोद में बैठा अब्बू, जो रास्ते में ही सो गया था, इस लड़ाई झगड़े में उसकी नींद खुल गयी और शायद माहौल को समझते हुए वह ज़ोर-ज़ोर से मौसा-मौसा चिल्लाने लगा. इस बीच कुछ लोगों ने उसे और कुछ ने मुझे पकड़ लिया. मैं चिल्ला रहा था कि अपना नाम बता, जानता नहीं कि मैं कौन हूं. गाली ना दे पाने की आदत के कारण मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं, लेकिन मैं गुस्से में हांफ रहा था. शायद उसे अहसास हुआ कि उसने ‘गलत’ जगह हाथ छोड़ दिया था. लिहाजा वह कुछ बोल नहीं रहा था और चुपचाप कोने में बैठ गया था. तभी अचानक बाहर की स्ट्रीट लाइट गाड़ी के अन्दर झाड़ू मारते हुए गुजर गयी. इसी क्षणिक लाइट में मैंने उस क़ैदी को पहचाना जिससे अभी मेरा झगड़ा हुआ था. वह 24-25 साल का हट्टा कट्टा नौजवान था. झगड़े में मेरा उससे कोई जोड़ नहीं था.
इसी लाइट में किसी क़ैदी ने मेरा चश्मा ढूढकर मुझे दिया. मुझे संतोष हुआ कि कांच नहीं टूटा है, महज फ्रेम टूटा है. कांच टूट जाता तो बहुत दिक्कत होती क्योंकि मुझे उसका नम्बर याद नहीं. खैर इसी क्षणिक लाइट में मैंने जल्दी से अब्बू को गोद में उठा लिया. वह घबड़ाया हुआ था, लेकिन मैंने उसे आश्वस्त किया कि कुछ नहीं हुआ है. लेकिन किसी अनहोनी की आशंका में वह चौकन्ना हो गया था और मुझसे कसकर लिपट गया. अब मैं मन ही मन सोच रहा था कि मुझे क्या करना है. कल जब सीमा विश्वविजय आयेंगे तो पूंछूगा कि क्या करना चाहिए.
सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि मैं उस क़ैदी का नाम नहीं जानता था और मेरे बार-बार नाम पूछने पर कोई भी उसका नाम बताने को तैयार नहीं था. खैर एक बार फिर गाड़ी में शांति छा गयी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मज़ेदार बात यह थी कि गाड़ी के पीछे बैठे दोनों सिपाही इस दौरान एकदम चुप थे, जैसे यह रोज़ाना की बात हो.
गाड़ी से उतरकर जेल में दाखिल होने पर नाम लेकर हाजिरी होती है. इसी हाजिरी में मैंने उसका नाम जान लिया और उसे ठीक से पहचान भी लिया. अब्बू पुनः मेरी गोद में सो चुका था. मैं भी अब पूरी तरह शान्त था और जल्दी से बैरक में अपनों के बीच पहुंचना चाहता था. लेकिन इसी बीच मेरी उस डिप्टी जेलर से भेंट हो गयी जो मुझसे बहुत अच्छे से पेश आता था और कुछ मुद्दों पर मुझसे राजनीतिक चर्चा भी कर लेता था. उसको देखकर मैं थोड़ा भावुक हो गया और न चाहते हुए भी उसे पूरी घटना बयां कर दी. वह थोड़ा जल्दी में था और उसने मुझसे इतना भर कहा कि आप यह सब अपने सर्किल के डिप्टी जेलर को रिपोर्ट कर दीजिए.
सर्किल में प्रवेश करते ही मैं सीधे सर्किल डिप्टी जेलर के पास गया और कुछ बोलने को हुआ ही था कि उसने तेज़ आवाज़ में कहा कि दूर खड़े होकर बात करो. यह सुनकर मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं खून का घूंट पी कर रह गया. इस सिस्टम के भ्रष्ट अनैतिक और घामड़ लोग मुझसे दूर खड़े होने के लिए कह रहे है. बहरहाल मैंने जल्दी-जल्दी संक्षेप में पूरी घटना रिपोर्ट कर दी. उसने मेरी बात पर ज़्यादा तवज्जोह ना देते हुए नम्बरदार को कहा कि इनकी पेशी नोट कर लो, कल बात करेंगे. यह कहकर वह चला गया. उसके जाने के बाद नम्बरदार ने मुझसे कहा कि अब दोनों को सज़ा मिलेगी, शायद दोनों का दौड़ा खुल जाये (जेल में दौड़ा खुलने का मतलब है कि आपको हर रात अपना बोरिया बिस्तर लेकर अलग-अलग सर्किल के अलग-अलग बैरक में रात गुजारनी होगी, इसे यहां बड़ी सज़ा मानी जाती है).
मैंने सोचा कि मैंने बेवजह ही बात खोल दी, पहले कल मुलाक़ात में सीमा विश्वविजय से सलाह लेनी चाहिए थी. खैर अब क्या हो सकता है. अब तो सुबह की पेशी का इंतज़ार करना था.
थका हारा मैं अपनी बैरक पहुंचा और धीरे से फट्टे यानी बिस्तर पर अब्बू को लिटा दिया. मेरे साथी क़ैदियों ने तुरन्त पूछा कि चश्मा कहां है. उनके इस तरह प्यार से पूछने पर मैं फिर भावुक हो गया और यहां भी ना चाहते हुए मुझे पूरी बात बतानी पड़ी. मेरे बैरक के सभी 40 लोगों में से करीब 25-30 मेरे फट्टे के नज़दीक आकर लगभग मुझे घेर लिया. और मुझसे सहानुभूति व्यक्त करते हुए यह बताने लगे कि किसके-किसके पास शिकायत की जानी चाहिए. अचानक एक क़ैदी ने कहा कि कल गिनती के वक्त सभी लोग डिप्टी जेलर के सामने खड़े हो जाते हैं और बोलते हैं कि हमारे बैरक के आदमी के साथ ऐसा क्यों हुआ. हम उन्हें बताएंगे कि मनीष भाई कैसे हैं. हम उसका दौड़ा खोलने के लिए बोलेंगे, जिसने मनीष भाई को मारा है और उनका चश्मा तोड़ा है. मेरे लिए क़ैदी भाइयों का यह भाव देखकर मेरी आंख में आंसू आ गये. इसी बीच अब्बू जाग गया था और ध्यान से सबकी बातें सुन रहा था और बीच-बीच में मेरे चेहरे की तरफ़ देखे जा रहा था. उस वक्त अब्बू मुझे मशहूर इटैलियन फ़िल्म ‘बायसिकल थीफ’ के उस बच्चे की तरह लग रहा था जो फिल्म के अंतिम दृश्य में अपने रोते हुए पिता को देखता है और समझ नहीं पाता कि मैं अपने पिता के लिए क्या करूं.
रात में एक साथी क़ैदी ने बहुत इसरार करके मुझे सीने पर मालिश करवाने के लिए बाध्य कर दिया. हालांकि मुझे इसकी ज़रूरत नहीं थी. क़ैदियों का यह प्यार और सरोकार देख कर मैं मन ही मन सोच रहा था कि जेल इतनी बुरी जगह भी नहीं है. रात में सोते वक्त अचानक अब्बू ने कहा- ‘मौसा तुम्हें चोट भी लगी है.’ मैंने कहा – ‘नहीं तो’. फिर वह मुझसे लिपट कर सो गया. शारीरिक-मानसिक रूप से थके होने के कारण मुझे भी नींद आ गयी.
सुबह गिनती के समय वास्तव में साथी क़ैदी डिप्टी जेलर के सामने सामूहिक रूप से खड़े होने का मन बना चुके थे. मैंने तो समझा था कि भावावेश में उन्होंने कह दिया होगा. क्योंकि सामूहिक रूप से डिप्टी जेलर के सामने खड़े होना विरोध प्रदर्शन का एक तरीका माना जाता है और जेल प्रशासन इसे अपना अपमान समझता है. जब क़ैदियों ने आकर मुझे अपने इस निर्णय के बारे में बताया तो मैं असमंजस में पड़ गया. अभी मैं इस स्तर तक नहीं जाना चाहता था. और फिर यदि जेल प्रशासन ने इसका बदला लिया तो मेरे अलावा और क़ैदी भी फंस सकते हैं. अन्ततः मैंने उन्हें सामूहिक रूप से खड़े होने से मना कर दिया. मैंने उन्हें समझाया कि आज मेरी पेशी है. यदि पेशी में मेरे मनोनुकूल फैसला नहीं होता है तब कल सुबह सब खड़े होना. वे लोग मान गये.
अन्ततः डिप्टी जेलर के सामने मेरी पेशी हुई. जिस लड़के ने मुझे मारा था, वह भी वहां था. मैंने मन ही मन कुछ तय कर लिया और भिड़ने को तैयार हो गया. साथी क़ैदियों ने जो भाव मेरे प्रति दिखाया था, उससे मेरी स्प्रिट हाई थी. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से डिप्टी जेलर का रुख़ मेरे प्रति बदला हुआ था. उसने मुझसे बहुत सम्मान से कहा- ‘मनीष जी मुझे कल रात आपके बारे में पता चला. चलो अब आप ही बताओ कि इसे क्या सज़ा देनी है. आपको इसे मारना हो तो मार लीजिए.’
फिर उसने उस लड़के की तरफ़ मुखातिब होकर उसे डांटा-
‘चल माफ़ी मांग.’
उसने तुरन्त मेरा घुटना छूते हुए मुझसे माफ़ी मांगी. रात में जिस तरह से उसके घूंसे ने मुझे हतप्रभ कर दिया था, ठीक उसी तरह इस समय उसके माफ़ीनामे ने मुझे हतप्रभ कर दिया. मैंने जल्दी ही अपने आप को संयत किया और बोला कि जो सज़ा देनी हो आप दीजिये, मैं कौन होता हूं सज़ा देने वाला. डिप्टी जेलर को जैसे कुछ याद आ गया और वह उठ गया. बोला कि मैं 10 मिनट में वापस आता हूं. अब कमरे में सिर्फ़ मैं और वह लड़का व डिप्टी जेलर का एक नम्बरदार था. डिप्टी जेलर के जाते ही वह मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मुझे माफ़ कर दीजिये. उसने आगे कहा कि कल मेरी बेल रिजेक्ट हो गयी थी और मैं बार-बार घर वालों को फ़ोन मिला रहा था और फ़ोन लग नहीं रहा था. बेल रिजेक्ट होने और फ़ोन ना मिलने से मैं तनाव में था. इसलिए ऐसा हो गया, वरना मैं किसी से उलझता नहीं हूं. फिर उसने कहा कि लाइये चश्मा मुझे दे दीजिए, मैं बनवा दूंगा. मैं सोच ही रहा था कि क्या किया जाये, तभी डिप्टी जेलर वापस आ गया. अब मैं भी उसे माफ़ करने का मन बना चुका था. मैंने डिप्टी जेलर के सामने कहा- ‘ठीक है, मैंने उसे माफ़ किया.’
यह सुनकर डिप्टी जेलर खुश हो गया. उसके इस भाव से मुझे यह समझते देर ना लगी कि डिप्टी जेलर इस लड़के को बचाना चाहता था. बाद में मुझे पता चला कि यह लड़का राइटर (एक जिम्मेदारी का पद जिसे थोड़ा पढ़े लिखे क़ैदियों को दिया जाता था) था और यह डिप्टी जेलर इस लड़के के माध्यम से बहुत से भ्रष्टाचार के काम भी करता था. डिप्टी जेलर ने फिर उससे दोबारा से माफ़ी मांगने को कहा और मेरी तरफ़ देखकर बोला-
‘आप अपना चश्मा इसे दे दीजिये. यही बनवायेगा.’
मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि नहीं, आज मेरी बहन मिलने आयेगी, मैं उसे ही दूंगा बनवाने के लिए. अब वह थोड़ा चौकन्ना हो गया. उसने कहा कि आपकी बहन पूछेंगी तो आपको बताना पड़ेगा कि चश्मा कैसे टूटा. मैंने कहां – ‘हां बता दूंगा.‘ फिर उसने तुरन्त कहा-‘लाइये चश्मा मैं बनवा दूंगा, सरकारी खर्च पर.’ फिर उसने असल बात बतायी. उसने कहा कि अगर आप अपनी बहन को यह सब बताएंगे तो बात बाहर तक चली जाएगी. उसे पता चल चुका था कि सीमा न सिर्फ मानव अधिकार कार्यकर्ता है बल्कि वकील भी है. तब हो सकता है कि लड़के का दौड़ा खुल जायेगा. उसकी रायटरी भी चली जायेगी. उसने आगे जोड़ा कि आप लोग तो बुद्धिजीवी लोग हैं, क्यों इस बेचारे का दौड़ा खुलवायेंगे.
यह सुनकर वह लड़का भी थोड़ा डर गया. मैंने डिप्टी जेलर को अपना टूटा चश्मा दिया और उससे कहा कि ठीक है नहीं बताऊंगा. फिर मैंने उस लड़के से हाथ मिलाया. उसके चेहरे पर अब खुशी और कृतज्ञता का भाव था. लेकिन मेरा मन बेचैन था. इसलिए नहीं कि मैंने उसे माफ़ कर दिया था, इससे तो मुझे खुशी ही हो रही थी, बल्कि इसलिए कि इतनी बड़ी चीज़ मैं अपनी प्यारी बहन से छिपाऊंगा कैसे. फिर मैंने सोचा कि उसे बता दूंगा और कहूँगा कि मामला मेरे पक्ष में ही हल हो गया है. इसलिए कुछ करने की जरूरत नहीं है. लेकिन मैं जानता था कि मेरी तरह वह भी बहुत इमोशनल है और फिर मुलाक़ात में इतना समय नहीं मिलता कि मैं चीज़ों को कायदे से व्याख्यायित कर पाउं और उसे आश्वस्त कर पाउं कि अब सब ठीक है. लिहाजा मैंने फैसला कर लिया कि उसे कुछ नहीं बताऊंगा. अब दूसरी दिक्कत अमिता की थी, जिससे 2 दिन बाद ही मुलाक़ात होनी थी. यदि मैं उसे बताता हूं तो वह बेहद परेशान हो जायेगी और उसका शुगर लेवल बढ़ जायेगा.
उसके साथ भी 15-20 मिनट की मुलाक़ात में कैसे आश्वस्त करूंगा कि अब सब ठीक है. वह वहां हमेशा इसी चिन्ता में रहती थी कि मेरा किसी से झगड़ा ना हो. मैंने फैसला किया कि उसे भी नहीं बताना है. अब तीसरी दिक्कत अब्बू था, जो अब धीरे-धीरे कड़ियों को जोड़ कर पूरी घटना समझ चुका था. उसे भी मैंने समझा दिया कि सीमा आज़ाद और मौसी को नहीं बताना है. प्यारा अब्बू मेरा कहना कैसे टाल सकता था. लेकिन फिर भी तुरन्त बोला-‘क्यों?’ मैंने कहा-‘इसलिए.’ उसने फिर जवाब दिया-‘ठीक है मौसा, जैसा तुम कहो.’
और वह घड़ी आ गयी जब जाली के उस तरफ़ सीमा विश्वविजय खड़े थे. विश्वविजय दूसरी तरफ़ अमिता से बात कर रहे थे और सीमा मेरे सामने खड़ी थी. मिलते ही सीमा ने पूछा कि चश्मा कहां है. यह सुनते ही मुझे रोना आ गया, लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को पीछे ढकेला. जब आप जेल में होते है तो आपको यह काम अक्सर करना होता है. तभी तो ‘वरवर राव’ ने भी अपनी जेल डायरी में लिखा है- ‘पलको में आंसुओं को छुपाकर मुसकुराने की जगह है जेल.’
बहरहाल तभी वह लड़का मेरा चश्मा लेकर वहां आ गया. मैंने चश्मा पहनते हुए सीमा से कहा कि ऐसे ही गाड़ी में गिरने से टूट गया था. यहीं जेल में ही बन गया. सीमा ने नये फ्रेम की तारीफ की और हम दूसरी बातों में मशगूल हो गये.

पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।
मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ
अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।
बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।
बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !
मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और हदय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।
एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।
बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।
गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।
इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।
पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।
मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।
पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏
एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल
मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।
मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।
मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।
वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य
बेहद संजीदा जेल डायरी.
मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.