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अब्बू की नज़र में जेल
जेल में शनिवार का दिन हमारे लिए बहुत खास होता है. इस दिन अब्बू की मुलाक़ात अपनी मौसी से और मेरी मुलाक़ात अपनी पत्नी/प्रेमिका/फाइली (co-accused) अमिता से होती है. हालांकि यह मुलाक़ात महज आधे घंटे की होती है मगर फिर भी हमें इस मुलाक़ात का बेसब्री से इंतज़ार रहता है. अब्बू तो लगभग हर दिन एक दो बार पूछ ही लेता है- मौसा शनिवार कब आयेगा, या शनिवार आने में अभी कितना दिन बाकी है. शनिवार के दिन सुबह-सुबह तैयार होकर अब्बू माइक की तरफ़ ही कान लगाये रहता था. हालांकि हमारा नाम 12 बजे के आसपास ही पुकारा जाता था. नाम सुनते ही अब्बू बिना मेरा हाथ पकड़े ही आगे-आगे गेट तक भाग जाता था, लेकिन यहां पहुंच कर वह ठिठक जाता और मेरा इंतज़ार करता क्योंकि उसे पता था कि अब आगे का रास्ता अपमानजनक तलाशियों से होकर जाता है. सभी बैरकों से मुलाकाती क़ैदी जब गेट पर इकट्ठा हो जाते तो हमें जोड़े में खड़े होने का आदेश दिया जाता. फिर हमारी गिनती होती- 2 4 6 8 10. सुबह की गिनती और फिर बैरक की अन्य दो गिनती (दोपहर और फिर रात की) भी इसी तरह जोड़े में होती. जोड़ा बनाने में पीछे रहने वाले क़ैदी को अपमानजनक गालियों से नवाजा जाता. अब्बू ने एक बार पूछ ही दिया- मौसा यहां गिनती 1 2 3 4 5 6 क्यों नहीं होती. 2 4 6 8 क्यों होती है. मुझे भी कोई जवाब नहीं सूझा तो मैंने कह दिया कि यहां की गिनती यही है. लेकिन अब्बू संतुष्ट नहीं हुआ. फिर मैंने मन ही मन सोचा कि चूंकि यहां ज़िन्दगी ही आधी है, इसलिए शायद गिनती भी आधी है. या शायद यहां सिर्फ़ पुरुष पुरुष हैं इसलिए विषम नम्बर को निकाल दिया गया है. बाद में मैंने सोचा था कि इसके बारे में पता करूंगा कि आखिर ऐसा क्यों है. लेकिन बाद में मैं भूल गया.
यहां जब लोग महिला मुलाक़ात के लिए जाते है तो अपने प्यार व सरोकार का इज़हार करने के लिए कुछ सामान भी ले जाते है. जैसे बिस्किट नमकीन का पैकेट आदि. जो ज़्यादातर यहां की कैन्टीन से खरीदे हुए होते हैं. लेकिन उधर से यानी महिलाओं की तरफ़ से हाथ से बनाया सामान ज़्यादा आता है, जैसे दही, चटनी, पराठा आदि, जो कुछ महिलाएं अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए या पैसे के बल पर किचेन में घुस कर बना लेती थी. गरीब पुरुष व महिलाएं अक्सर खाली हाथ ही आते. असमानता जेल में भी पीछा नहीं छोड़ती. मेरे दोस्त बन चुके क़ैदियों के घर से यदि कोई अच्छा खाने का सामान आता तो मेरे ये दोस्त क़ैदी उसका कुछ हिस्सा ‘भाभी जी’ के लिए ले जाने को कहते.
मेरे न कहने पर वो अक्सर इसरार करते तो मैं रख लेता, नहीं तो हम अक्सर सिर्फ़ पारले जी लेकर जाते थे. अब्बू अब तक यहां का रंग ढंग काफ़ी कुछ समझ चुका था. मैं अक्सर मज़े में उससे पूछता- ‘अब्बू जेल में वो कौन से टू ‘जी’ हैं जिनका बोलबाला है?’ अब्बू को भी इसका जवाब देने में बड़ा मज़ा आता- ‘मौसा, पारले जी और गांधी जी.’
आसपास के लोग अब्बू को छेड़ने के लिए यह सवाल अक्सर पूछते और अब्बू बड़े मज़े से इसका जवाब देता. वह जान चुका था कि यहां कई सुविधाएं सिपाही या नम्बरदार को पैसा देने से मिल जाती हैं.
जेल में किसी भी तरह के मीठे आइटम पर पाबंदी है. मीठे के नाम पर सिर्फ़ पारले जी ही मिलता है. इसलिए कभी कभी अब्बू मीठे के लिए मचल जाता. हम दोनों को ही मीठा बहुत पसंद है. ऐसे समय पर अब्बू बोल ही देता कि मौसा सिपाही को पैसे देकर मेरे लिए बाहर से चाकलेट मंगवा दो ना. लेकिन मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह अपना कदम वापस ले लेता- नहीं मौसा रहने दो, ये बुरी बात है. मैं पारले जी ही खा लूंगा. इतने छोटे बच्चे को अपने आप पर नियंत्रण करते देख कर मेरा मन भारी हो जाता. एक बार अब्बू ने पूछ ही लिया कि मौसा यहां मीठा खाने पर मनाही क्यों है? मैं क्या जवाब देता. मैंने वही घिसा पिटा जवाब दोहराया- ‘क्योंकि यह जेल है.’ अब्बू संतुष्ठ नहीं हुआ और आगे पूछा- क्या जेलर को मीठा पसन्द नहीं. मैंने कहा, नहीं उसे तो मीठा बहुत पसन्द है, तभी तो वह इतना मोटा हो गया है. अब्बू ने फिर आगे पूछा और प्रधानमन्त्री को? मैंने अब गम्भीर होकर कहा- सुन अब्बू! इन सब को मीठा पसन्द है. लेकिन क़ैदी लोग मीठा खाये, ये इनको पसन्द नहीं. अब्बू ने तुरन्त कहा-क्यों? मैंने कहा-‘क्योंकि मीठा खाकर हम खुश हो जायेंगे.’ आगे की बात अब्बू ने ही पूरी कर दी- और हम खुश रहें ये उन लोग को पसन्द नहीं. यह कहकर वह भाग गया और हाते में चारों तरफ़ दौड़ने लगा.
खैर, हमने अपनी तलाशी दी, अपना सामान चेक करवाया. अब्बू अपनी तलाशी का नम्बर आने से पहले ही अपने जेब के भीतरी अस्तर उलटने लगता. यह देख मुझे हरिश्चंद्र पाण्डेय की एक कविता याद आ जाती थी-
‘बच्चे अपने खिलाफ़ जांच में जेबों के अस्तर तक उलट कर रख देते हैं, इसलिए बच्चों के बारे में जब भी सोचो गम्भीरता से सोचो.’
खैर, तलाशियों का दौर खत्म होने के बाद हम एक बड़े हाल की ओर चल दिये, जहां अपनी-अपनी महिला सम्बन्धियों से हमारी मुलाक़ात होनी थी. अब्बू मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचे जा रहा था, तभी पीली वर्दी पहने नम्बरदार ने तेज़ आवाज़ में हमें रुकने को कहा. हम जहां थे वहीं ठिठककर खड़े हो गये. उतनी ही तेज़ आवाज़ में दूसरा आदेश हुआ कि हम तुरन्त जोड़े में बैठ जाये. थोड़ी अफरातफरी के बाद सब जोड़े में बैठ गये. अब्बू का चेहरा थोड़ा मायूस हो गया कि अब यह कौन सी मुसीबत आ गयी. तभी हमने देखा कि हमारे पीछे से जेल का एक बड़ा अधिकारी अपने लाव लसकर के साथ अवतरित हो गया. तो हमें रोकने का यह कारण था. उस जेल अधिकारी ने आदेशात्मक स्वर में पूछा- ‘इनके सामान की तलाशी ली गयी?’
आदेश देने के साथ ही वह आगे बढ़कर एक क़ैदी का झोला खुद ही चेक करने लगा. उसके झोले में भेलपूरी थी. उस जेल अधिकारी ने उसे डांटते हुए कहा- ‘मुलाक़ात के लिए जाते हो या पिकनिक मनाने.’ यह कहते हुए वह अपने लाव लश्कर के साथ आगे बढ़ गया. हम सबने चैन की सांस ली. अब्बू थोड़ा खीझ कर बोला- ‘यह बिना हम लोगों को डिस्टर्ब किये भी तो जा सकता था.’
यह बात बोल कर वह मुलाक़ात कक्ष की ओर भाग गया. लेकिन अब्बू की इस बात ने मेरी विचार प्रक्रिया को तेज़ कर दिया. भारत में ‘पावर’ के प्रति एक अजीब सी सनक है. उस जेल अधिकारी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि वह बिना कुछ बोले यहां से निकल जाये. उसके पास पावर है तो इसे बिना दिखाये वो कैसे गुजर जाये. दिखावा सिर्फ़ पैसे का ही नहीं पावर का भी होता है. सड़क पर ड्यूटी करते एक आम सिपाही और किसी भी आफिस के चपरासी तक में आप इस सनक/दिखावे के दर्शन कर सकते हैं.
भारत में यह एक विकराल समस्या है. विशाल ‘लोकतान्त्रिक’ छाते के नीचे लगभग सभी संस्थाएं राजशाही युग के पदसोपान क्रम में काम करती हैं. यही सब सोचते हुए मैं हाल के पास पहुंच गया. अब्बू पहले ही भाग कर वहां पहुंच चुका था.
यहां पहुंचकर सबसे पहले अच्छी जगह पर कब्जा करने के लिए होड़ लग जाती. पैसे वालों के लिए सिपाही पहले से ही स्थान बुक किये रखते है. बहरहाल फर्श पर अपना-अपना चद्दर या अखबार बिछाकर हम सब बैठ जाते और महिलाओं का इंतज़ार करने लगते. अब्बू बेसब्र होकर हाल में घूमने लगा. अब्बू की बेसब्री का कारण महज उसकी मौसी ही नहीं थी, बल्कि वे बच्चें भी थे जो महिलाओं के साथ आते थे. यहां 6 साल तक के बच्चों को मां के साथ रहने का अधिकार है. हर शनिवार की मुलाक़ात के कारण अब्बू की यहां आने वाले कुछ बच्चों से दोस्ती हो गयी है. आधे घण्टे ये बच्चें आपस में खेलते, और धमाचैकड़ी करते थे. इन बच्चों को देखकर हम कुछ समय के लिए ही सही यह भूल जाते कि हम जेल में हैं. बीच-बीच में अब्बू हमारे पास आ जाता और पूछता-मौसी तुम कैसी हो! फिर पूछता, मौसा अभी कितना समय बचा है. जब मैं बोलता कि जा अभी खेल ले. अभी समय है, तो वह खुश हो जाता. लेकिन आधे घण्टे कपूर की तरह उड़ जाते. और सिपाही आकर हमें उठाने लगता. यह देख अब्बू धीमी चाल और दुःखी मन से हमारी तरफ़ आता. कभी-कभी पूछता-
‘मौसा तुमने मौसी से सारी बातें कर ली?’ मेरा जवाब सुने बिना कहता- ‘काश मौसी भी हमारे साथ चलती.’
एक दिन उसने गम्भीरता से पूछा- ‘मौसा, हम मौसी के साथ ही क्यों नहीं रह सकते.’ फिर उसने खुद ही जवाब दे दिया, क्योंकि इससे हम खुश रहेंगे.
एक शनिवार की मुलाक़ात में अब्बू को उसका प्यारा दोस्त सूरज नहीं दिखायी दिया. अब्बू और सूरज दोनों लगभग 6 साल के है. इसलिए दोनो में अच्छी दोस्ती हो गयी थी. अब्बू ने तुरन्त मौसी से पूछा- ‘मौसी आज सूरज क्यों नहीं आया.’ मौसी उसके इस सवाल से थोड़ा असहज हो गयी. खुद को संयत करते हुए उसने अब्बू से कहा कि अब्बू उसकी तबीयत खराब हो गयी थी, इसलिए उसे घर भेज दिया गया. अब्बू बुझे मन से दूसरे बच्चों के साथ खेलने चला गया. अब्बू के जाने के बाद अमिता ने सूरज के बारे में जो वास्तविक घटना बयां की वह हदयविदारक थी. जेल प्रशासन को जैसे ही पता चला कि सूरज 6 साल का पूरा हो गया है, उसने उसे घर भेजने का आदेश दे दिया. लेकिन झारखण्ड के किसी गांव में रहने वाले इन लोगों के घर में कोई नहीं था जो सूरज की देखभाल कर सके. लिहाजा जबरदस्ती सूरज को उसकी मां से छीन कर उसे अनाथालय में डाल दिया गया. किस तरह से जेल प्रशासन ने मां से उसके कलेजे के टुकड़े को अलग किया, यह बताते बताते अमिता खुद रोने लगी. यह दारुण दृश्य अमिता की आंख के सामने ही घटित हुआ था. मेरा मन भी भारी हो गया.
मैंने सोचा कि ऐसे ना जाने कितने नियम कानून की गिरफ्त में यहां ज़िन्दगी दम तोड़ रही है. इसी बीच मैंने देखा कि अब्बू व अन्य बच्चे खेलते-खेलते हाल के बाहर निकल गये. सिपाही उन्हें रोकने के लिए उनके पीछे दौड़ा. उन्होंने हाल के बाहर ना जाने का नियम जो तोड़ दिया था. मुझे अच्छा लगा कि कहीं तो ज़िन्दगी भी नियमों कानूनों की धज्जियां उड़ा रही है.

पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।
मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ
अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।
बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।
बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !
मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और हदय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।
एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।
बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।
गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।
इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।
पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।
मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।
पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏
एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल
मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।
मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।
मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।
वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य
बेहद संजीदा जेल डायरी.
मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.