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Home » मेरी जेल डायरी: मनीष आज़ाद » Page 4

मेरी जेल डायरी: मनीष आज़ाद

जेल की यातनाओं और अनुभवों पर प्रचुर मात्रा में देशी विदेशी भाषाओं में साहित्य मिलता है. नेताओं, क्रांतिकारियों, कार्यकर्ताओं और साहित्यकारों आदि को जब-जब जेल में डाला गया उन्होंने अपने कारा-वास को रचनात्मक बना डाला, कभी कार्यों से तो कभी अपनी लेखनी से. मनीष आज़ाद ने अपने जेल-अनुभवों में अब्बू यानी अबीर नामक बच्चे को शामिल कर इसे लिखा है. आपबीती अगर ढंग से कही जाए तो वह अपने समय की जगबीती बन जाती है. यह संस्मरण आकार में बड़ा है पर आप इसे शुरू करेंगे तो बीच में छोड़ नहीं पायेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है.

by arun dev
December 13, 2021
in संस्मरण
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4
अब्बू की नज़र में जेल

ट्रांजिट रिमान्ड के बाद एटीएस कार्यालय में रिमांड का पहला दिन. कमरे में दाखिल होते ही मुझे आदेश मिला कि मैं कमरे के एक कोने में बिछे मोटे गद्दे पर बैठ जाऊं. इस गद्दे के अलावा कमरे में महज कुछ कुर्सियां व एक बड़ी मेज थी. पूरी बिल्डिंग नयी थी और नयेपन की खुशबू लिये थी. अज्ञात का भय अब्बू के चेहरे पर साफ़ दिख रहा था. वो पूरी तरह मुझसे सट कर चल रहा था और मेरी उंगली कस कर पकड़े था. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि वो अब्बू नहीं बल्कि मेरा ही विस्तार है. हम दोनों के गद्दे पर बैठते ही 23-25 साल का एक हष्ट पुष्ट नौजवान अपनी काली वर्दी में एके-47 लिये कमरे में दाखिल हुआ. उसके हाथ में हथकड़ी थी. वो तुरन्त मेरे सामने बैठते हुए मुझे हथकड़ी लगाने लगा. अब्बू डर गया और अपने दोनों नन्हें हाथों को मेरे गले में डाल मेरे उपर लगभग झूल गया. मैंने इंस्पेक्टर की तरफ़  देखते हुए कहा-

‘इसकी क्या ज़रुरत है.’

उसने बड़े सौम्य भाव से कहा-

‘चिन्ता मत कीजिए, यह महज एक औपचारिकता है.’ मैं

ने मन ही मन कहा कि यह कैसी औपचारिकता है. जिन्दगी में पहली बार ऐसी औपचारिकता से दो चार हो रहा था. हथकड़ी लगाने के बाद सभी लोग कमरे से निकल गये. मुझे अब्बू को समझाने का मौका मिल गया. मैंने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा- ‘अब्बू, मैंने तुझे भगत सिंह की कहानी सुनाई थी ना!’ अब्बू ने तुरन्त कहा- ‘हां-हां याद है, जिन्होंने अंग्रेजों को मार भगाया था और उनको फांसी हो गयी थी.’ मैंने कहा– ‘हां, उनको भी तो हथकड़ी लगा कर रखा गया था.‘

अब तक अब्बू थोड़ा सामान्य हो गया था. अचानक उसने पूछा-‘मौसा तुम्हें हथकड़ी से दर्द तो नहीं हो रहा है.’ मैंने कहा-‘नहीं.’ अब्बू ने तुरन्त लाड़ में मेरी कलाई चूम ली. यह देख मेरी आंखें भर आयी. लेकिन तभी मेरी नज़र हथकड़ी पर लिखे शब्द पर ठहर गयी. आंसुओं के कारण धुंधला-धुंधला दिख रहे शब्द अब स्पष्ट होने लगे, जैसे कोई गोताखोर धीरे-धीरे पानी से ऊपर आता है. हथकड़ी पर लिखा था- ‘मेड इन इंग्लैण्ड.’

मेरी आंखें ‘मेड इन चाइना’ पढ़ने की अभ्यस्त थी, इसलिए ‘मेड इन इंग्लैण्ड‘ पढ़ कर अजीब सा लगा. लेकिन अगले ही पल मुझे महसूस हुआ कि समय पिघल रहा है और मैं 1930-31 में पहुंच गया हूं. भगतसिंह को जो हथकड़ी पहनाई गयी होगी, उस पर भी तो यही लिखा होगा- ‘मेड इन इंग्लैण्ड.’ इस भावपूर्ण अनुभव ने मुझे गर्व से भर दिया.

अचानक अब्बू ने मेरी तन्द्रा तोड़ी-‘मौसा क्या सोच रहे हो, देखो वो सामने.’ मेरे सामने एटीएस का एक इंस्पेक्टर खड़ा था. उसने शान्त भाव से पुनः अपनी बात दोहराई- यात्रा से काफ़ी  थके होगे और रात भी ज़्यादा हो गयी है, अब सो जाइये. कल सुबह से काम (पूछताछ) शुरू होगा. उसके जाते ही दो लोगों ने कमरे में प्रवेश किया और अपना कम्प्यूटर निकाल कर मेज पर रख दिया. मैं समझ गया कि इन दोनों की रात की ड्यूटी है, मुझ पर नज़र रखने की.

आज अब्बू बिना प्रयास के ही सो गया. यात्रा की थकान का असर था शायद. लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी. कमरे में पूरा अंधेरा था, लेकिन कम्प्यूटर स्क्रीन की रोशनी के कारण एक खास तरह के तिलिस्म का अहसास हो रहा था. यह तिलिस्म किसका है?

यात्रा की थकान मुझे भी थी, लेकिन मेरे लिए यह कोई सामान्य रात नहीं थी. मेरी ज़िदगी रूपी नदी अब एक नया मोड़ लेने को व्याकुल हो रही थी. रह-रह कर उछाल मार रही थी. इसी प्रक्रिया में मैं लगातार करवटें बदल रहा था. मेरी हर करवट पर हाथ में बंधी हथकड़ी खनक उठती और अपने-अपने कम्प्यूटर पर बैठे एटीएस के दोनों बन्दे चौक कर मेरी ओर देखने लगते. हथकड़ी खनकने और उनके चौक कर मेरी ओर देखने के इस दृश्य ने मेरे दिमाग में अंकित पुराने एक दृश्य को जगा दिया. थोड़ी देर दिमाग पर ज़ोर डालने पर मुझे देहरादून में वरवर राव से मेरी पहली मुलाक़ात याद आ गयी. प्रारम्भिक औपचारिकता के बाद वरवर राव ने मुझसे पूछा-

‘हिन्दी कविता में क्या चल रहा है.’ मैंने कहा-‘कुछ खास नहीं.

लेकिन अभी किसी पत्रिका में मैंने एक अनूदित कविता पढ़ी. बहुत शानदार कविता थी. कविता कुछ इस तरह थी-

‘उसने मुझे हथकड़ियां पहनायी,
लेकिन मेरी हथकड़ियों की झंकार से वह डर गया.’

वरवर राव मुसकुराये और धीमे से बोले- ‘यह मेरी ही कविता है.’

जब आप दुश्मन के चंगुल में होते हैं तो वरवर राव जैसे न जाने कितने लोग आपके साथ आकर खड़े हो जाते हैं. इस काव्य सत्य का यथार्थ अनुभव मुझे इसी रात हुआ.

दूसरे दिन 11-12 बजे अचानक से हड़बड़ी में मेरी हथकड़ी खोल दी गयी और इससे भी ज़्यादा आश्चर्य की बात मुझे यह लगी कि हथकड़ी को छिपाने के अंदाज में वहां मौजूद अलमारी के पीछे डाल दिया गया. मैंने दिमाग पर ज़ोर डाला तो अचानक मेरी समझ में आ गया- मुझसे मिलने के लिए सीमा विश्वविजय आने वाले हैं. करीब 15-20 मिनट बाद सीमा विश्वविजय और मेरे वकील कमरे में दाखिल हुए. मैं पहले से ही मानसिक रूप से तैयार हो चुका था कि क्या सन्देश देना है. मैंने सबके सामने ही जल्दी-जल्दी सीमा को संकेतों में कुछ ज़रूरी जानकारी दी. संयोग से सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और किसी ने नोटिस नहीं लिया.

सीमा विश्वविजय के जाते ही एटीएस के एक अधिकारी ने आश्चर्य से पूछा-

‘ये आपकी सगी बहन थी.’ मैंने कहा- ‘हां.’ उसने पुनः आश्चर्य जताते हुए कहा- ‘कोई रोना धोना नहीं, कोई इमोशनल सीन क्रियेट नहीं हुआ. ऐसा लग रहा था, जैसे आप लोग किसी काफ़ी  हाउस में बैठे हों.’

फिर उसने व्यंग्य से कहा-

‘माओवादियों में इमोशन नहीं होता क्या.’

मैंने शान्त भाव से कहा-

‘होता है, बिल्कुल होता है. लेकिन आप जैसे लोगों के सामने इसका इज़हार करना हम अपमानजनक समझते हैं.’ उसने पुनः व्यंग्य से कहा-

‘अच्छा तो इसमें भी राजनीति है.’

इस बार मैं कुछ नहीं बोला. अचानक से हथकड़ी खोलने वाला सिपाही वापस आया और आलमारी के पीछे से हथकड़ी निकाल कर मुझे पुनः पहनाने लगा. मेरे हथकड़ी लगते ही एक बार फिर सब एक-एक कर कमरे से बाहर निकल गये. एक बार फिर कमरे में मैं और अब्बू बचे.

यह समय मेरे लिए लिबरेटिंग समय (liberating time) होता था, जब सिर्फ़  मैं और अब्बू होते थे, हालांकि ऐसा समय बहुत कम आता था.

अब्बू तुरन्त मेरे पास आया और बोला- ‘तुम्हारी बहन के आने पर उन्होंने तुम्हारी हथकड़ी क्यों हटा दी.’ मुझे पता था कि वह यह सवाल ज़रूर करेगा. मैंने कहा- ‘ताकि मेरी बहन को गुस्सा ना आ जाय.’

अब उसका अगला सवाल था- ‘उसे गुस्सा आता तो वह क्या करती.’ मैंने कहा- ‘अब्बू मेरी बहन में एक जादुई ताकत है, जिससे वह सब कुछ उलट पुलट कर सकती है. और सच बताऊं तो सबकी बहनों में एक जादुई ताकत होती है.’

अब्बू ने तुरन्त आंख फैलाकर कहा-

‘मेरी बहन झिनुक मे भी है.’

हां बिल्कुल- मैंने कहा. लेकिन एक दिक्कत है. अब्बू को जैसे किसी कहानी के क्लाईमेक्स का इंतज़ार  था. उसी बेसब्र भाव से उसने पूछा-‘क्या दिक्कत है?’ मैंने कहा- ‘सभी बहनों को एक दूसरे से मिलना होगा. देख, मेरी बहन तेरी बहन को जानती ही नहीं, उससे मिली ही नहीं. इसलिए यह जादू काम नहीं कर रहा.’

उसने खुश होते हुए कहा- ‘मौसा अगली बार अपनी बहन से बोलना कि वो मेरी बहन से ज़रूर मिल ले और सबकी बहन से मिल ले और अपना जादू चलाए और सब कुछ उलट पुलट कर दे.’

बड़ा मज़ा आयेगा. अब्बू के चेहरे पर यह खुशी देख मेरा दिल भर आया और मैंने उसे चूम लिया. मेरे भीतर एक कविता कौधीं-

दुःख तुम्हें क्या तोड़ेगा, तुम दुःख को तोड़ दो.

केवल अपने सपनों को औरों के सपनों से जोड़ दो..

(इसके लिखे जाने के बाद एक मुलाक़ात  में सीमा ने बताया कि जामिया व रोशनबाग की बहनों महिलाओं ने सचमुच सब कुछ उलट पुलट दिया.)

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Tags: जेल
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Comments 14

  1. रमेश अनुपम says:
    4 years ago

    पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।

    Reply
  2. M P Haridev says:
    4 years ago

    मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
    ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
    मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ

    अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
    की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
    मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
    पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
    अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
    प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।

    Reply
  3. हिमांशु बी जोशी says:
    4 years ago

    बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।

    Reply
  4. दयाशंकर शरण says:
    4 years ago

    बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !

    Reply
  5. अशोक अग्रवाल says:
    4 years ago

    मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और ह‌दय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।

    Reply
  6. कुमार अम्बुज says:
    4 years ago

    एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
    अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।

    Reply
  7. राकेश says:
    4 years ago

    बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।

    Reply
  8. प्रभात+मिलिंद says:
    4 years ago

    गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।

    इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।

    पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।

    Reply
  9. हीरालाल नगर says:
    4 years ago

    मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
    मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।

    Reply
  10. पूनम वासम says:
    4 years ago

    पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏

    Reply
  11. Anonymous says:
    4 years ago

    एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल

    Reply
  12. जीतेश्वरी says:
    4 years ago

    मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।

    ‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।

    मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।

    ‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
    नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।

    मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।

    Reply
  13. Anonymous says:
    4 years ago

    वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य

    Reply
  14. Devpriya Awasthi says:
    3 years ago

    बेहद संजीदा जेल डायरी.
    मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.

    Reply

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