5
अब्बू की नज़र में जेल
पूछताछ के दौरान ही मुझसे राजनीतिक चर्चा भी होती रहती थी, जिसे मैं जानबूझकर लम्बा खींचने का प्रयास करता था, ताकि पूछताछ का उनका समय कम पड़ जाये. ज़्यादातर पूछताछ के ही किसी बिन्दु से राजनीतिक चर्चा शुरू हो जाती थी. हालांकि राजनीतिक चर्चा के पीछे भी उनका एक ‘हिडेन एजेण्डा’ होता था- मेरे ‘स्तर’ का अंदाजा लगाना.
उन्होंने मेरे कमरे से जो साहित्य जब्त किया था उसमें ‘वैकल्पिक शिक्षा’ से सम्बन्धित कुछ साहित्य था, जिस पर अमिता काम कर रही थी. इसके अलावा कुछ साहित्य ‘पारधी’ जैसी ‘विमुक्त जन जातियों’ (Denotified Tribes) की सामाजिक आर्थिक स्थितियों पर था. इन्हीं साहित्य पर पूछताछ ने राजनीतिक चर्चा का रूप ले लिया. उसने पूछा, यह ‘वैकल्पिक शिक्षा’ क्या है. वैकल्पिक शिक्षा के बारे में बताते हुए मैंने ‘मुख्यधारा’ की शिक्षा की आलोचना की और उदाहरण के रूप में मैंने बताया कि आज भी बच्चों को ‘क्ष’ से क्षत्रिय और ‘ठ’ से ठठेरा ही पढ़ाया जाता है. उसने तुरन्त पूछा कि ‘क्ष’ से क्षत्रिय न पढ़ाया जाये तो क्या पढ़ाया जाये. मैंने तुरन्त कहा- बहुत से शब्द है. उसने भी तुरन्त कहा- ‘कोई एक बताइये.’ मैं चकरा गया, क्योंकि मुझे सच में उस समय ‘क्ष’ से कोई अन्य शब्द ध्यान में नहीं आया. अपनी इस ‘जीत’ से पूछताछ करने वाला मदमस्त हो गया और मुस्कराते हुए बोला- ‘आप लोग बस आलोचना करना जानते हैं, कोई विकल्प तो होता नहीं आप लोगों के पास.’
मैं उसके जाल में फंस गया था. उसके जाल से निकलने का प्रयास करते हुए मैंने कहा- ‘पढ़ाने का यह तरीका ही गलत है.’ कविता कहानी और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के माध्यम से बच्चे अक्षर खुद ब खुद पहचान लेते है.’ लेकिन वह इस विजयी पल को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था और बार-बार मुझसे यही पूछे जा रहा था कि बताइये बताइये ‘क्ष’ से और क्या शब्द है. मेरी इस ‘हार’ ने अब्बू का ध्यान भी आकर्षित कर दिया जो वहीं पर एक कोने में बैठकर ड्राइंग पेपर पर कुछ बना रहा था. वह मेरे बिल्कुल पास आकर कान में धीमे से बोला-
‘मौसा सचमुच तुम्हें नहीं पता.’
मैंने प्यार से पूछा-‘क्या.’ वही जो ये पूछ रहे हैं. मैंने कहा, नहीं याद आ रहा, अब्बू. अब्बू हल्के गुस्से में बोला-
‘फिर इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ने का क्या फायदा.’ यह कहते हुए वह वापस अपनी ड्राइंग बुक की तरफ़ चला गया. उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि उसके मौसा किसी से हार जाये.
अब बात विमुक्त जातियों पर आकर टिक गयी. वह अपने अनेक आपरेशनों का हवाला देते हुए कहने लगा कि ये सभी जातियां अपराधी जातियां हैं. अपराध इनके खून में होता है, इन्हें कभी सुधारा नहीं जा सकता. जवाब में मैं उतने ही पुरज़ोर तरीके से इन जातियों के इतिहास, सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों और सबसे बढ़कर पुलिस व समाज का उनके प्रति रुख़ को स्थापित करते हुए यह बताने का प्रयास करता रहा कि ये जातियां किस कदर दबायी और बदनाम की गयी हैं. अचानक से मेरे बगल में बैठा गठीले बदन का, टीका लगाये हुए एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति जो अभी तक कम बोल रहा था और बहुत विनम्र व्यवहार कर रहा था, भड़क उठा और विमुक्त जातियों से शुरू करके पूरी जनता को ही गालियां देने लगा-
‘किस जनता की बात आप लोग करते हैं, वही जो दारू पीकर सूअरों की तरह पड़ी रहती है, एक नम्बर की कामचोर होती है, दो पैसे के लिए अपना ईमान बेच देती है.’
इसी प्रक्रिया में वह कूद कर बेवजह मुसलमानों पर भी आ गया और अपना दिमागी कचरा उड़ेलने लगा. उसके अचानक इस हमले से मैं सकते में आ गया. अगले पांच दस मिनट तक वह ऊंची आवाज़ में लगातार बोलता रहा और जनता को गालियां देता रहा.
रात में 2 बजे उसकी आवाज़ और भी तेज़ व तीखी सुनाई दे रही थी. बाहर खड़े दोनों पहरेदार भी एके 47 पर अपनी पकड़ मजबूत बनाते हुए कमरे के दरवाज़े पर आ गये. मानो उसके कुतर्को को कभी भी हथियारों की ज़रूरत पड़ सकती है. यह देख कर मेरे दिमाग में अचानक कौधा- ‘क्या मेरे तर्को के लिए भी हथियारों की ज़रूरत है.’
गिरफ्तारी के चंद रोज़ पहले ही मैंने ‘न्यूगी वा थांगो’ का उपन्यास ‘मातीगारी’ पढ़ा था. उसकी पंक्तियां कौध गयी-
‘सिर्फ़ खूबसूरत तर्क ही काफ़ी नहीं होते, उनका समर्थन करने के लिए हथियारों की ताकत भी ज़रूरी होती है.’
बहरहाल किसी अनहोनी की आशंका में अब्बू अपनी ड्राइंग छोड़ कर मेरे पास आकर कुर्सी से सट कर खड़ा हो गया. पता नहीं क्या हुआ कि अब्बू का स्पर्श मिलते ही मैं भावुक हो गया और मेरी आंख भरने लगी. चश्मे के भीतर से ही मैंने दोनों किनारों को साफ़ किया. पूछताछ करने वाला भी मेरी स्थिति भांप गया और अपना जहरीला भाषण बीच में ही रोक कर बोला- क्या हुआ. मैंने बहुत मुश्किल से आवाज़ निकाली-
‘जनता को इतनी गाली मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुनी है.’
मेरी मनःस्थिति देख कर वह आगे कुछ नहीं बोला. मैं अब्बू की तरफ़ मुखातिब हुआ और अब्बू को रिलैक्स करने के लिए पूछा-
‘अब्बू तू ड्राइंग बुक पर क्या बना रहा है?’
अब्बू ने गम्भीरता से जवाब दिया-
‘माल्यांग की कूची.’
(नोट-‘माल्यांग की कूची’ एक चीनी लोककथा है, जिसमें माल्यांग नामक बच्चे को एक जादुई कूची यानी ब्रश मिल जाता है, जिससे वह जो भी बनाता है, वह वास्तविक हो जाता है. माल्यांग अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करते हुए एक नदी बनाता है और उसमें बाढ़ ला देता है. इस बाढ़ में वहां का अत्याचारी राजा डूब जाता है और जनता को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिल जाती है.)

पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।
मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ
अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।
बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।
बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !
मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और हदय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।
एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।
बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।
गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।
इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।
पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।
मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।
पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏
एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल
मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।
मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।
मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।
वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य
बेहद संजीदा जेल डायरी.
मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.