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अब्बू की नज़र में जेल
इंटेरोगेशन चैंबर में अचानक एक लंबे स्मार्ट से बंदे ने प्रवेश किया. सब उठ कर खड़े हो गये, इससे मुझे उसके स्टेटस का पता चल गया. उसने अपने को कुर्सी में धंसाते हुए बिना किसी सन्दर्भ के कहा-
‘छत्तीसगढ़ में इस तरह से पूछताछ नहीं होती, वहां उलटा लटका के पूछताछ होती है, आदमी सब उगल देता है.’
मेरे भीतर सुरसुरी सी दौड़ गयी, लेकिन अगले ही पल यह भय क्रोध में बदल गया. मैंने मन ही मन कहा- ‘यह भी करके देख लो.’ अचानक दिमाग में वह शेर कौंध गया, जो भगत सिंह ने अपने भाई कुलतार सिंह को जेल से फांसी से ठीक पहले लिखे आखिरी ख़त में लिखा थाः
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्जे ज़फ़ा क्या है
हमें ये शौक है देखें सितम की इंतेहा क्या है
यहां भी मेरे प्यारे अब्बू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. पहले तो वह मेरे साथ सटकर ही बैठा रहा और पूछताछ करने वाले लोगों को बारीकी से निहारता रहा और बिस्तर पर अपनी नन्ही-नन्ही उंगलियों से कोई आकृति बनाता रहा. जब उसे लगता कि माहौल नॉर्मल है, तो वह बगल में रखी अपनी चेस में उलझ जाता. वो एक तरफ़ से मौसा यानी मेरी तरफ़ से खेलता और दूसरी तरफ़ से अपनी ओर से. कुछ देर बाद आकर मेरे कान में धीरे से बोलता, ‘मौसा तुम हार गए’ या ‘मौसा तुम जीत गए.’ दोनों ही परिस्थितियों में मैं बोलता ‘वाह.’ लेकिन जैसे ही अब्बू के कान में पड़ा- ‘उल्टा लटका के’, वह तुरंत मुझसे सट गया और कस कर मेरी उंगली पकड़ ली. मैंने उसके कान में धीरे से कहा- ‘अब्बू कुछ नहीं होगा’, लेकिन वह माना नहीं. मेरी उंगली पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गयी.
पूछताछ करने वाला यह नया शख्स अचानक मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ और सवालों की बौछार शुरू कर दी. मैं भी उसी रफ्तार से उसे जवाब देता रहा. जब वह पूरी तरह छीज गया तो अचानक बगल के कमरे में रखी मेरी किताबें व नोट्स उठा लाया और जहां-तहां से सवाल पूछने लगा-
‘आपने यह क्यों लिखा’, ‘वह क्यों पढ़ा?’ मेरा गुस्सा बढ़ गया. मैंने अपने आप पर पूरी तरह नियंत्रण रखते हुए कहा- ‘सॉरी, आप पूछताछ के लिए होमवर्क कर के नहीं आए हैं. तैयारी कर के आइए, फिर पूछताछ कीजिए.’
अचानक कमरे में सन्नाटा छा गया. अब्बू ने भी माहौल भांप लिया और वह मुझसे और ज़्यादा सट गया. मैं भी अगले पल के लिए खुद को तैयार करने लगा. अचानक पूछताछ करने वाले का फ़ोन बज गया और वह कमरे से बाहर निकल गया. उसके साथ ही कमरे का भारीपन भी बाहर चला गया. अचानक एटीएस का एक व्यक्ति उठा और दरवाजे के बाहर दोनों तरफ़ झांकने के बाद पीछे मुड़कर बोला-
‘यहां पहला ऐसा आदमी आया है जिसने पूछताछ करने वाले को ही रिजेक्ट कर दिया.’ यह सुनकर सभी लोग मुसकुरा दिये. मेरी भी जान में जान आयी. निशाना सही जगह लगा था. अब्बू भी धीरे से खिसक कर अपनी चेस में लग गया.
करीब 10-15 मिनट बाद वह फिर लौटा. आश्चर्यजनक रूप से इस बार उसका व्यवहार बदला हुआ था. कुर्सी पर धंसते ही उसने सौम्य भाव से कहा- ‘आपको तो शेरो-शायरी का काफ़ी शौक है? लेकिन अब लंबे समय तक आप इससे वंचित रहने वाले हैं.’ फिर व्यंग्य मिश्रित मुस्कान के साथ बोला-
‘ये भी हो सकता है कि अब आपको कभी आबिदा जैसों की आवाज़ न सुनायी दे.’
मैंने कोई जवाब नहीं दिया. अचानक वह उठा और अपनी कुर्सी को मेरे करीब लाते हुए जेब से अपना स्मार्टफ़ोन निकाला और कहा, ‘चलिए आपकी पसंद का कुछ आपको सुनाते हैं, बताइए क्या सुनिएगा?’ मैंने ये मौका तत्काल लपक लिया और कुछ देर सोच कर बोला, ‘फ़ैज़ का ‘इंतिसाब’ सुना दीजिए!’ लगता है वह भी शेरो-शायरी का शौकीन था क्योंकि उसने बिना कोई और जानकारी लिए कुछ ही देर में ‘इंतिसाब’ लगा दिया और फ़ोन का स्पीकर ऑन कर दिया.
उन दुखी मांओं के नाम
रात में जिनके बच्चे बिलखते हैं
और नींद की मार खाये हुए
बाजुओं में संभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों जरियों से संभलते नहीं.
मैं आंखें बंद कर के झूमने लगा. कुछ तो नज़्म का नशा था और कुछ उस माहौल से निकलने की कोशिश. तभी अब्बू ने आकर मेरे कान में धीमे से कहा, ‘मौसा, तुम जीत गए!’
मैंने कहा, ‘वाह!’
अचानक ही फ़ैज़ की दूसरी नज़्म मेरे ज़ेहन में कौंध गयीः
जिस धज से कोई मक़तल में गया
वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है
इस जान का यारों क्या कहना !

पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।
मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ
अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।
बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।
बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !
मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और हदय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।
एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।
बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।
गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।
इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।
पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।
मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।
पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏
एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल
मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।
मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।
मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।
वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य
बेहद संजीदा जेल डायरी.
मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.