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अब्बू की नज़र में जेल
विशालकाय बड़े काले गेट से जैसे ही अबीर मेरे साथ जेल में दाखिल हुआ, मेरी उंगलियों पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गयी मानो उसे डर हो कि कहीं कोई उसे मुझसे अलग न कर दे. दाखिल होते ही सबसे पहले हमारी तलाशी शुरू हुई. यह तलाशी से ज़्यादा अपमानित करने की प्रक्रिया है जिसमें आपके निजी अंगों को भी छुआ जाता है और आत्मा को सरेआम नंगा कर दिया जाता है. इस तलाशी के बाद मैंने अबीर से पूछा- ‘कैसा लगा?’ उसने कहा- ‘मौसा, मुझे गुदगुदी लग रही थी!’
तलाशी के बाद जेल के अंदर आते ही उसने 360 डिग्री घूमकर पूरे जेल का मुआयना किया. घूमते हुए उसने मेरी उंगली दूसरे हाथ से पकड़ ली मानो उंगली छूटते ही मैं गायब हो जाऊंगा. अब उसका पहला सवाल था- ‘जेल की दीवारें इतनी ऊंची क्यों हैं?’ फिर बिना रुके खुद ही जवाब दे दिया- ‘हवा को रोकने के लिए.’ वह जुलाई का महीना था और हमें हवा की सख्त ज़रूरत थी.
बैरक में बंदी भाइयों के बीच पहुंच कर थोड़ी ही देर में वह सामान्य हो गया और उसने मेरी उंगली छोड़ दी. फिर मज़े से पूरे अहाते का चक्कर लगाने लगा. जैसे ही उसे कोई सिपाही या पीली वर्दी वाला दिखता था, वह दौड़ कर मेरे पास आता और कस कर मेरी उंगली पकड़ लेता. यह डर उसके भीतर कहां से आया, पता नहीं.
बहन मेरे लिए किताबें लेकर आयी थी, जिन्हें जेलर की नज़रों से गुज़र कर मुझ तक पहुंचना था. इसके लिए मुझे जेलर के सामने ‘पेश’ होना था. जेलर के कमरे के बाहर इंतज़ार करते हुए मेरे साथ अब्बू थक गया था. अचानक वह मेरा हाथ छोड़कर बायीं तरफ़ बने बाथरूम में सूसू करने लगा. तभी पीछे से एक नंबरदार ने उसे ज़ोर से डांटा. वह सूसू आधे में ही रोक कर डरा हुआ मेरी तरफ़ भाग आया, जैसे फ़िल्म ‘बाइसिकल थीफ’ में ऐसी ही एक घटना में एक बच्चा सूसू बीच में रोक कर वापस भाग आता है. लगभग रोते हुए उसने मुझसे पूछा-
‘उसने मुझे क्यों डांटा?’ मैंने कहा कि ‘तूने जेलर के बाथरूम में सूसू कर दिया था, बंदियों का बाथरूम अलग होता है.’
वह चुप हो गया, फिर बाथरूम की ओर देखते हुए बोला- ‘जेलर की सूसू अलग तरह की होती है?’ मैंने कहा- ‘हां’!
अचानक नंबरदारों में हलचल शुरू हो गयी. वे सभी बंदियों को सड़क के दोनों किनारों पर धकेलते हुए सड़क खाली कराने लगे- ‘हटो हटो, जेलर साहब आ रहे हैं!’ कुछ देर में जेलर साहब एक दो सिपाहियों के साथ खाली सड़क पर चहलकदमी करते हुए दिखाई दिये. अब्बू की निगाहें लगातार जेलर साब पर टिकी हुई थीं. उनके ऑफिस में घुसने के बाद उसने मुझसे कहा- ’मौसा, ये तो बिल्कुल दुबला पतला है, फिर पूरी सड़क क्यों खाली करायी गयी.’ मैंने उसके सवाल को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा- ‘पता नहीं’.
कुछ देर चुप रहने के बाद उसने खुद ही जवाबनुमा सवाल किया- ‘जेलर जेल का राजा होता है क्या?’ मैंने कहा- ‘हां.’
बहरहाल, जेलर के सामने मेरी ‘पेशी’ हुई. मैं उसकी मेज़ के सामने खड़ा हो गया. उसने कड़क आवाज़ में कहा- ‘थोड़ा दूर हट कर खड़े हो.’ मेरे साथ अब्बू भी एक कदम पीछे हट गया. उसके बाद मेरी उससे क्या बात हुई, मुझे याद नहीं क्योंकि मैं बहुत गुस्से में था. ‘अछूत’ होने का अपमान कैसा होता होगा, यह मुझे पहली बार महसूस हुआ. बहरहाल, किताब मुझे मिल गयी और हम लौट चले.
‘दूर हट कर खड़े हो’- यह मेरे दिमाग़ में लगातार गूंज रहा था, तभी अब्बू ने पूछा- ‘वो तुमको दूर हट कर खड़े होने को क्यों कह रहा था?’ मैंने कहा- ‘यहां जेलर से दूर हटकर खड़े होने का नियम है.’ उसने फिर सवाल किया- ‘क्यों?’ मैंने खीझ कर उत्तर दिया- ‘पता नहीं’. उसने मेरा मूड भांप लिया और मेरी उंगली छुड़ा कर भागते हुए अपनी बैरक में पहुंच गया.
मेरे लिए सबसे मुश्किल घड़ी होती है अब्बू को खाना खिलाना. घर पर जब वह होता था, तब उसकी मौसी वही बनाती थी जो वह कहता था. यहां अधपकी रोटी और मांड़ वाली सब्ज़ी (जिसमें आलू खोजने से ही मिलता है) और पानी वाली दाल के अलावा कुछ संभव नहीं. फिर भी मैं कोशिश करता हूं कि रोटी का अधपका हिस्सा तोड़ कर उस पर घर से आया घी नमक लगाकर उसे खिला दूं ताकि उसके पोषण में कमी न आए. अकसर वह बिना ना-नुकुर किए खा भी लेता था. खाने का उसका तरीका ये था कि पुपली रोटी का एक टुकड़ा मुंह में डालकर वह बैरक के बंदियों की गिनती करने लगता था और तब दूसरा टुकड़ा खाता था. पता नहीं बंदियों की गिनती बार-बार करने में उसे इतना मज़ा क्यों आता था, लेकिन आज उसने खाने से साफ़ इनकार कर दिया. बोला- ‘मन नहीं है.’ मैंने कहा कि ‘एक बार फिर बंदियों की गिनती कर ले, फिर खा ले.’ अचानक उसने कहा- ‘मौसा तुम वो कविता कहते थे न कि बिना सपना देखे सोने से अच्छा है जागते रहना?’
मैंने कविता दोहरायीः
‘बेख़्वाब सोने से बेहतर है जागते रहना’
अब्बू ने तुरंत कहा- ‘मौसा, मैंने भी इसमें एक लाइन जोड़ी है- बिना स्वाद के खाने से
अच्छा है भूखे रहना!’
यह सुनकर अचानक दिल में एक हूक सी उठी और मैंने उसे सीने से चिपटा लिया.

पूरा पढ़ गया। इस तरह के गद्य विचलित करते हैं। बहुत कुछ द्रवित भी। मनीष आजाद को पढ़ते हुए देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है जिसे अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है उसे देखकर तकलीफ ही हो सकती है। हम जिस दौर में जी रहे हैं वह बेहद क्रूर और भयावह है। इस तरह के गद्य की उम्मीद केवल ’समालोचन’ से ही की जा सकती है।
मनीष आनन्द की डायरी पढ़कर मज़ा आ गया । मेरी दृष्टि में यह सबसे आनन्ददायक पोस्ट है । मनीष, अब्बू और अमिता का संसार सुहावना है । समाज को बदलने का जुनून है । अकसर मेरे मन में यही सवाल रह-रह कर उठता है कि मैं गिलहरी की तरह अपनी आहुति डाल सकूँ । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि क्रांति या परिवर्तन अहिंसक हो । हम अपने वांग्मयों से वे व्यक्ति ढूँढें जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अपना बहुत कुछ होम कर दिया हो । मनीष जी आज़ाद ने अरुण कमल की पंक्ति ‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है’ को उद्धृत किया है । इस पंक्ति में अहिंसा (जिसका सकारात्मक अर्थ प्रेम है; विश्व व्यापी प्रेम) प्रकट हो रहा है । आज़ाद साहब की कुछ पंक्तियों को मैंने काग़ज़ पर लिख लिया था । मसलन ‘History of Three International’ किताब ख़त्म करनी थी’ । क्योंकि कल एक ज़रूरी अनुवाद से भिड़ना है । एक शायर का कलाम याद आ गया ।
ठनी रहती है मेरी सिरफिरी पागल हवाओं से
मैं फिर भी रेत के टीले पे अपना घर बनाता हूँ
अपने शरीर की मुश्किलात से गुज़रते हुए भी समाज के सुख के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मनीष जी लिखते हैं मनपसंद मिलन
की ‘क़ैद’ और पढ़ चुकने की ‘रिहाई’ दोनों का अहसास सुखद होता है । ‘अब्बू की ताक़त है मौसा, मौसा की ताक़त है अब्बू, इन दोनों की ताक़त है मौसी, हम सब की ताक़त है खाना’ । फिर मनीष जी आज़ाद लिखते हैं-दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था’
मनीष और अमिता के घर में मार्क्स, ब्रेख़्त, भगत सिंह आदि के Quotation के पोस्टर मुझे भी हौसला देते हैं । मैंने पहले भी लिखा था कि मुझ में भी कुछ कुछ Communism है ।
पुलिस मनीष को क़ैद करने आयी । बदलाव करने वाले व्यक्ति पुलिस का बेवजह शिकार बनते हैं ।
अब्बू के मन में नाज़ीवाद के लिए नफ़रत है और उसकी यादें हैं । सुखकर है । हिटलर फिर से न पैदा हों । समाज जागरुक करने की कोशिशें जारी रहें ।
प्रोफ़ेसर अरुण देव जी यदि मनीष आज़ाद ने इस डायरी का विस्तृत वर्णन किसी किताब की शक्ल में किया हो तो मैं ख़रीदना चाहता हूँ ।
बहुत गज़ब का लेखन। विवरण ही नहीं उन्हें दर्ज़ करने का तरीका भी निहायत ही भीगा हुआ सा है। उच्चस्तरीय।
बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण ! क्रांति के सपने देखते-बुनते लोगबाग जो सत्ता से टकराने के बाद किस तरह अनेक शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलते हैं और जेल की सलाखों के पीछे जो अमानवीय बदसलूकी एवं नरक जैसी यंत्रणा भोगते हैं-इन सबका यहाँ बड़ा हीं मार्मिक वर्णन है। अब्बू के साथ उसके एक काल्पनिक साहचर्य में जीते हुए गहरी संवेदना से भरी यह आपबीती सचमुच जगबीती बन गयी है। समालोचन एवं मनीष जी को बधाई !
मनीष आजाद ने अपनी आप-बीती इतने सरल, मार्मिक और हदय को छूने वाले शब्दों से लिखी है कि कला तो उसमें अपने आप अंकुरित हो आयी है। अविस्मरणीय पाठ। ऐसी ही रचनाओं से साहित्य समृद्ध होता है। समालोचन ऐसी सामग्री पढ़वाता है इसके लिए उसका आभार।
एक अनुभव के यथार्थ को इस तरह लिखा जाए कि वह एक कृति भी बन जाए: यह उदाहरण है। मनीष का गद्य जीवंत, दृष्टिसंपन्न और मार्मिक तो है ही, प्रतिवाद और यातना को भी प्रभावी ढंग से दर्ज करता है।
अरुण देव को इसे प्रकाशित करने के लिए बधाई।
बेहद जीवंत,मार्मिक।बच्चे के माध्यम से यथार्थ,इतिहास और फंतासी का अद्भुत समन्वय। जेल में बिताए दिन याद आये।
गद्य का एक साथ प्रासंगिक, विचारोत्तेजक और रोचक होना एक दुर्लभ संयोग है। मनीष आज़ाद के इस गद्यांश को पढ़ते हुए इसी विरलता के दर्शन होते हैं। एक ऐसे नैराश्यपूर्ण समय में जबकि साहित्य भी कई बार सत्ता की भाषा बोलने लगी है, या अपनी पुनरावृत्ति में वह प्रायः एक विदूषक की भूमिका में दिखती है, प्रतिवाद का साहित्य हमें नई आशाओं से भर देता है। पूरे संस्मरण में अब्बू की उपस्थिति किसी सुखद प्रतीकात्मकता की तरह है।
इस संस्मरणात्मक गद्य को पढ़कर अनायास मुझे पिछले दिनों इतालवी सिद्धांतकार एंटोनियो ग्राम्स्की के प्रिज़न नोटबुक्स के पढ़े गए कुछ अंश याद आ गए। यद्यपि कंटेंट की दृष्टि से वे बिल्कुल भिन्न हैं और मूलतः राजनीतिक सिद्धांतों पर केंद्रित हैं किन्तु यह बात तो सामने आती ही है कि देह के बंदी बनाए जाने के बाद भी विचारों को बंदी नहीं बनाया जा सकता।
पिछले दिनों साहित्य के इतर भी इतिहास, संस्कृति, कला, सिनेमा, विचार और संगीत पर विविध तरह की सामग्रियाँ प्रकाशित कर समालोचन ने इसके उत्तरदायित्व और इसकी रोचकता दोनों को जिस तरह से संतुलित रखा है, वह श्लाघनीय है।
मनीष आज़ाद की जेल में लिखी कहानी पढ़ते हुए लगा जैसे मैं लेखन की क्लास में बैठा हूं। और सोचता हूं लेखन के लिए इतनी अच्छी और मुफीद जगह सभी को नहीं मिलती। इसका आशय यही हुआ कि यातना के क्षण हमें जुर्म के खिलाफ लिखने को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का मौलिक स्वभाव है मनुष्यता के विरुद्ध होनेवाली कार्रवाई को स्थगित करना।
मनीष आज़ाद की इस खूबसूरत शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं।
पढ़ रही हूं, शब्द, शब्द अनुभव कर पा रही हूँ, मन में बहुत देर तक ठहरने वाला है यह गद्य, बहुत शुक्रिया 🙏
एक एक शब्द रुककर संभलकर पढ़ना पड़ा। भावनाओं का एक कैप्सूल
मनीष आजाद द्वारा लिखी गई बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण डायरी को हम सब के बीच प्रस्तुत करने लिए ‘ समालोचन ‘ को बहुत शुक्रिया।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ में जेल की सुबह, शाम और रात जो चार दिवारी में कैद हो जाती है, उसकी इतनी गहराई से मनीष जी ने वर्णन किया है जो हमारी कल्पना में संभव ही नहीं है। पर इसे मनीष जी ने सच कर दिखाया है। एक-एक, छोटी – छोटी बारीक से बारीक चीजों का जिस तरह से चित्रण किया गया है वह बेहद आश्चर्यजनक है। मनीष जी कि गंभीर दृष्टि और समझ ने उनके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई भावना गढ़ ली है।
मैं जब पढ़ने बैठी तो पता नहीं चला कि कब अंत की निर्णायक शुरुआत में पहुंच गई। अब्बू का मासूम चेहरा और उसकी बातें दिलों, दिमाग में छाने लगी।
‘ मेरी जेल डायरी ‘ पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो कोई फिल्म चल रही हो और उस फिल्म को बीच में एक क्षण के लिए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। भाषा ऐसी जैसे कोई शांत नदी चुपचाप अपनी कहानी किसी नाविक को सुनाते हुए बह रही हो और
नाविक उस नदी में इस तरह खो जाता है जैसे अब उसने फैसला कर लिया हो कि मुझे किनारे नहीं पहुंचना सिर्फ बहना है नदी के साथ दूर तक।
मेरी जेल डायरी बहुत मार्मिक होने के साथ – साथ जीवन की अनेक कहानियों को एक साथ प्रस्तुत करने वाली सुंदर डायरी है। इसके लिए बहुत बधाई और बहुत शुक्रिया मनीष जी और समालोचन को।
वेहद सहज , सम्प्रेषणीय और मार्मिक गद्य
बेहद संजीदा जेल डायरी.
मौजूदा दौर ऐसी ढेरों डायरियां सामने लाने के लिए मुफीद है.