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Home » मैं बेहोशी का एक पत्थर था : संतोष अर्श

मैं बेहोशी का एक पत्थर था : संतोष अर्श

‘मैं बेहोशी का एक पत्थर था’ वीरू सोनकर का दूसरा कविता-संग्रह है, जिसे ‘अनबाउंड स्क्रिप्ट’ ने प्रकाशित किया है. इसकी चर्चा कर रहे हैं, युवा आलोचक संतोष अर्श.

by arun dev
January 21, 2026
in समीक्षा
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मैं बेहोशी का एक पत्थर था : संतोष अर्श
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‘आस एक फूल है’ 

संतोष अर्श

आधुनिक कविता व्यक्ति की बेचैनी और अन्तर्भूत यन्त्रणा को जिस रंग-ढंग में धारण करती है, उसे चीन्हने, खोलने के लिए पारम्परिक सौंदर्यशास्त्र से अधिक विकसित होते गये तत्त्व-दर्शन अथवा दार्शनिक सूत्रों की ज़रूरत आन पड़ती है. आत्म-चेतस् कवि-प्राण बाह्य जगत् की निर्ममताओं, प्रवंचनाओं से थक कर अंततः अपने भीतर की अतल गहराइयों में उतरता है, जहाँ उसका सामना अस्मिता के अबूझ संकट, अलगाव, अजनबियत और यातना की उन वास्तविक अवस्थाओं से होता है, जिनमें सभ्यता (इतिहास, संस्कृति, समाज, राजनीति, न्याय, मूल्य, पूँजी) तथा अनेक मानव निर्मित संस्थाएँ बड़े पेचीदा प्रश्नों से घिर जाती हैं. इस जटिल अवस्था की कविताएँ रचने के लिए ज़ाहिर है कि कवि सतही विषय-वस्तु प्रयोग नहीं कर सकता, क्योंकि उससे दुर्दमनीय अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में लाचारी पेश आएगी. गूढ़ कविता के लिए गूढ़ मनःस्थितियाँ और सूक्ष्म तत्त्व-चिन्तन ही प्रेरक हैं. और जिस कवि ने यह साधा है, उसने आसाधारण काव्य सम्भव किया है. इसके लिए शब्द-साधन चाहिए, कबीर के ढब में :

‘बिन सबदै नाचै मनवा, कबहुँ न पावै ठौर.’

वीरू सोनकर के पहले संग्रह ‘मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है’ (2023) की भूमिका में उदय प्रकाश ने कहा था कि उनकी कवितायें ‘अन्तर्व्याप्त यन्त्रणा की विलक्षण कवितायें हैं.’ उनके दूसरे संग्रह ‘मैं बेहोशी का एक पत्थर था’ (2026) पर लिखते हुए अशोक वाजपेयी ने कवि-सामर्थ्य को सराहा है, किन्तु कविता की मूल अंतर्वस्तु से कतरा कर गुज़र गये हैं. अशोक वाजपेयी की बात मुख्यतः काव्य-शिल्प और संवेदना तक सीमित रह जाती है; अस्तित्त्व, अस्मिता, भाषा और सभ्यता के प्रश्न, जो इन कविताओं की आंतरिक ऊर्जा हैं, उनकी ओर संकेत करने का उन्होंने श्रम नहीं किया. लिहाज़ा उदय प्रकाश के ‘अन्तर्व्याप्त यन्त्रणा’ पद-बंध से वीरू की कविताओं में और आगे बढ़ा जा सकता है. और कि हम यदि ‘स्त्रियाँ’ कविता की स्त्रियों को ही कवि का संगीन अस्तित्त्व मान लें तो यह विश्लेषण और सरल होता जाएगा :

वे जब कहती थीं तो बदल जाती थी किसी कुएँ में
पानी की डूब से बाहर आती थी उनकी आवाज़
(स्त्रियाँ)

वीरू के जीवनानुभव किसी एकाकी, उपेक्षित, उत्पीड़ित और आधुनिक सभ्यता के वीराने में खोई हुयी अस्मिता के एकालाप की तरह रागात्मक,अमूर्त बाना धारण करके जमा होते हैं. इस एकालाप को जीवन की निरर्थकता के दर्शन प्रेरित एकान्त में अधिक स्पष्ट सुना जा सकता है :

रंग काला, रूप कुरूप, जाति-लज्जित, प्रेम विहीन
जीवन नगरी तक मैं यूँ आया
जैसे कम्बल ओढ़े अपराधी
जैसे देश निकाला लिए कोई अधीर
जैसे बिना भीख की चाह में भटके कोई फ़कीर
जैसे विस्मृति की धूल में गिरा याद का कोई सुंदर फूल.
(आलाप से बहिष्कृत)

पूँजीवादी विमुखता और जातिगत अपमान से त्रस्त अस्मिता पर छायी कातरता और आर्तभाव की नीली धुन्ध के पीछे एक बेबस मनुष्य खड़ा है, यह प्रश्न लिये कि मैं, “मनुष्य क्यों नहीं हूँ ?” आदर्शों और सिद्धान्तों की दुष्ट अवमाननाओं से घिरा. नैतिकता का महात्म्य जिसने स्वीकारा था, किन्तु जीवन के निष्ठुर यथार्थ में उसके सम्मुख बेशर्मी का भयावह दैत्य खड़ा था. जिसके लिए करुणा, न्याय, प्रेम की बातें और दीनता का बोध बेमा’नी है. सभ्यता जिसकी ख़ातिर एक खोल या फटा हुआ ढोल थी. उस टोकरी में उसके लिए विभ्रमों के सिवाय कुछ नहीं था और प्रज्ञाशील आत्मपीड़ित (पहले से आरोपित) अस्तित्त्व के लिए तो केवल वंचनाएँ थीं :

बचपन में मुझे चाकू की धार बनाना पसंद था
चाकू को हाथ में लेकर उसकी धार को बहुत प्रेम से देखते हुए कभी भी
हत्या का विचार नहीं आया
मनोविज्ञानी इस बात से अपना मुँह छुपा लेंगे.
(आकुल मन)

वीरू की कविता में अस्मिता सामाजिक यथार्थ से जन्म लेती है, जबकि अस्तित्त्व उस यथार्थ से उपजे आंतरिक संकट की दार्शनिक अनुभूति है. वंचित किये गये इस अस्तित्त्व में आहत अहं का राग भी है. बनैलापन और उजड्डता भी है. और अधिक दिलचस्प यह है कि वीरू वैयक्तिक अहं की चोट के प्रतिकार स्वरूप समूची सभ्यता को सत्य के पारदर्शी कटघरे में खड़ा कर देते हैं. इससे उनकी विस्तृत काव्य सीमाओं का बोध होता है.

सभ्यता को प्रश्नांकित करने के उनके तर्क पैने हैं, बचपन के उस चाकू से भी ज़्यादा, जिस पर वे धार लगाते थे; लेकिन तर्क की रूखी निरंकुशता से जीवन के कोमल सौन्दर्य की पीली तितली को नहीं बचाया जा सकता:

वह जो थक कर मर गये एक अदद भूख और नींद के लिए
जिन्हें यह सभ्यता भूल गई
उनकी याद की एक सुरंग खुलती है
मेरे स्वप्नों के भीतर

मैं जात से खटीक हूँ
मेरा बाप सूअर से भी ज़्यादा जानता था उसकी पीठ पर उगे अड़ियल बालों का समूचा व्याकरण.
(मिज़ाज से लगभग अपराधी)

सूअर के बालों से ही बनती हैं कूचियाँ. जिनसे उकेरे जाते हैं ज़िन्दगी के चित्र सौ, (मुक्तिबोध की तरह) यदि बनाने का चाव हो, श्रद्धा हो भाव हो. यह अड़ियल बालों वाला वराह सभ्यता के अतल समुद्र में से डूबते अस्तित्त्व को अपने दाँतों पर उठा लाएगा:
“उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं विगृह्य.” (श्रीविष्णुपुराण- 29)

अस्मिता सभ्यता की देन है, यह व्यक्ति का चुनाव नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी विभ्रममूलक यातनाओं का एक अलग बुनाव है. इसमें फँसा अस्तित्त्व जीवन भर छटपटाता रहता है. कहाँ कोई इससे त्राण पाता है ?

दार्शनिक अडोर्नो ने सभ्यता को किसी ‘प्रगति-कथा’ के रूप में नहीं देखा. उन्होंने कहा कि, इसके दामन में हिंसा, बर्बरता, उत्पीड़न, दमन और आत्म-विनाश छिपे हुए हैं. इस तरह वे इसे एक विरोधाभासी प्रक्रिया मानते हैं. वे कहते हैं कि ‘सभ्यता कोई नैतिक गारण्टी नहीं देती.’ इसीलिए वे पूर्णता को असत्य मानते हैं और ‘नैतिक-सतर्कता’ को सर्वोपरि रखते हैं. नैतिक सतर्कता करुणा के सौन्दर्य से आती है.

जीवन के नैसर्गिक सौन्दर्य से विलगा कर अस्मिता सभ्यता के बुने गये जालों में उलझा देती है. अस्मिता की इस पेचीदगी से लोग कारुण्य बरतते हैं. दूर-ही-दूर. ऐसी करुणा वास्तविक करुणा नहीं होती. केवल एक भय होता है कि ‘अच्छा हुआ कि हम उसके जैसे नहीं हैं.’ यानी अच्छा हुआ कि हम खटीक नहीं हैं. वणिक हैं. कि हम अश्वेत नहीं हैं श्वेत हैं. कि हम स्त्री नहीं हैं, मर्द हैं. कि हम…. अस्तित्त्व करुणा की पुकार में गाता है. यह गान भी अरण्यरोदन रह जाता है :

ओ जीवन के शिल्प,
करुणा बहुत दूर से टिमटिमाता एक दीया है
अंधेरे की आँख में चुभता हुआ एक नन्हा सूरज.
(पृथ्वी पर मोक्ष)

अस्मिता की मार खा कर मोक्ष (मुक्ति) की इच्छा उत्पन्न होती है. यहीं धर्म, दर्शन और अध्यात्म के रस्ते बनते हैं. इसी अपूर्णता के लिए कला है, कविता है. फिर मोक्ष भी तो ‘इसी काया’ में चाहिए ! काया के इर्द-गिर्द माया की नाचती छायाओं की बाड़ है जिनके उस पार देखने के लिए वीरू की कवितायें दार्शनिक अवधारणाओं (तत्त्व-मीमांसा) की ओर अधिक प्रवृत्त होती हैं. इसके मूल में पीड़ित अस्तित्त्व और अबूझ अस्मिता की दो-पाटी है.

यहाँ कविता में दृश्य न तो केवल दृश्यात्मक है, न ही केवल स्मृति; वे वह स्थान हैं जहाँ अस्तित्त्व पहली बार भाषा से पहले प्रकट होता है. वीरू ने शुरुआती कविताओं से ही भावात्मक अमूर्तन की सिद्धि की है. अमूर्तन की पिघलन दृश्यों में समाप्त होती है. आन्तरिक सत्य और अस्तित्त्वगत पीड़ा को अभिव्यक्त करते दृश्य कहीं तो चौखटों की तरह तो कहीं सलीब की तरह हैं, जिन पर टंगे अस्तित्त्व से लहू रिस कर कविता की ज़मीन पर टपक रहा है :

एक मुकम्मल चित्र है
ध्वनि नहीं है उसमें और प्रकाश भी है कुछ धुँधला सा
(बहुत दूर)

मुझे जाग के भीतर दिखते हैं मटमैले दृश्य
धीमा संगीत
बेसुरे स्वर में करुणा का अलाप भरती स्त्रियाँ
नदी और पास दिखने लगती है.
(कहीं मिल गया एक नंगा हड़कंप है)

कवि दृश्यों में अपनी सत्ता (entity) को उद्घाटित करना चाहता है. (दृश्यों में) अपनी उदासी प्रकट करने के लिए उन्हें थोड़ा धुँधला करना पड़ता है. उस धुँधलेपन में है पीड़ित अस्तित्त्व और ठुकराई गयी अबूझ अस्मिता. यह धुँधलापन यंत्रणाओं का घना छाया कोहरा है जिसमें आगे बढ़ने पर और कोहरा मिलता है. करुणा की चाह में स्त्रियों के दर पर खड़ा होना, वहाँ साँकल खटखटाना फ्रायडियन कामपीड़ित चेतना का द्योतक नहीं है, बल्कि फ्रायडीय कामेच्छा से अधिक, उस करुणामूलक स्वीकार्यता की तलाश है, जिसे अस्तित्त्ववादी दर्शन में ‘अन्य के सम्मुख अनावृत्त होना’ कहता है:

दृश्य से किसी चित्रकार ने वापस खींच लिए हैं उदासी के तमाम रंग
(अनिष्ट)

बहुत सारे रंग है मिलकर एक दृश्य को रचते हुए
एक भटक है कहीं बस जाने के स्वप्न से भरी हुई
एक कविता है जो कभी समाप्त नहीं होती
(किसी भाषा में एक शब्द है)

इन दृश्यों में अर्थ है, मौन है, सत्ता है, अनुभव हैं. वे सभी साथ घटित होते हैं. फ्रायड कहते हैं कि दृश्य हमारी दबी हुयी इच्छाओं और स्मृतियों से बनते हैं. प्रत्येक दृश्य के पीछे एक अभाव छिपा रहता है. वीरू की कविताओं में दृश्यों की मौज़ूदगी स्मृतियों, अभावों और अनुभवों के लिए जितनी है, उतनी ही सत्ता के उद्घाटन के लिए भी. कहीं वे अवर्णनीय अर्थ के लिए हैं तो कहीं भाषा पूर्व के संकेत के लिए. हाइडेगर कहते हैं कि दृश्य वह जगह है जिसमें सत्ता प्रकट होती है :

दृश्य में गाढ़ापन है उदासी के रंग को हल्का करते हुए
(किसी भाषा में एक शब्द है)

पिता पके हुए घाव की पीड़ा बनकर स्मृति में आते थे
और बिना माँगे ही कुछ ख़र्च
डाल देते थे जेब में
पिता अब यथार्थ में छूट चुकी एक रेलगाड़ी हैं
जिसकी पूँछ
दृश्य के भीतर दबी है.
(दृश्य के भीतर)

ज़ाहिर हुए बिना कवि अपनी बात बहुत आसानी से प्रभावी रूप में कहता है, कथन को कभी-कभी दृश्य में बदलता, रूप के साथ निकट जाता है उस गूलर के फूल जैसे यथार्थ को हासिल करने के लिए जो लगभग असम्प्रेषणीय है. किसी दृश्य के भीतर से सिमटा हुआ अस्तित्त्व झाँकता है, फिर दृश्य को तटस्थता से देखती हुयी पीड़ित, आरोपित अस्मिता है. इन त्रासद अवस्थाओं में जीवन के यातनागृह के परनाले से बहती हुई दिखाई देती है पीड़ा. यातना के पिघलते हुए बिम्ब कविताओं में झालरों की तरह सजे हुए हैं:

मैं स्मृति की विराट डूब में महसूस करता हूँ
यातना की गंध

(आयु का धैर्य कहीं भूलता हूँ)

दुख इस मायने में सुख है कि वह जल्दी छिनता नहीं
(भग्नावशेष)

मेरा दुख आ कर ठहर जाता है मेरी देह पर
मेरा दुख नदी है
मेरी देह उसे संभालती कोई घाट
(कला यूँ ही चली जाएगी मेरे घर)

कई बार कविताओं की आदिम सुगंध सृष्टि के प्रारंभ में ले जाना चाहती है. इसलिए कवि तत्त्व-दर्शन के वन में किसी बनैले आखेटक की भाँति विचरता है. किसी चट्टान, किसी झाड़ के पीछे वह दम साध कर खड़ा है. विचार की डोर से बँधी फैन्टेसी आगे बढ़ने पाए, इससे पूर्व उन्हें तत्त्व-दर्शन रोक लेता है. यह प्रवृत्ति पिछले संग्रह में भी थी. अब इसलिए उन्हें इससे आगे बढ़ना चाहिए. इस राह में लम्बी कवितायें उनके पास हैं, लेकिन वे बयानात और रेटरिक से भरी हैं. उन्हें और अधिक दुर्गम, बीहड़ रास्ता चुनना होगा, जिससे वे और अधिक सौन्दर्य रच सकें, यद्यपि कि ये पंक्तियाँ उनकी तत्त्व-मीमांसक क्षमताओं का लोहा मनवाती हैं :

ऊंघ जो नींद के घर तक ले जाती थी.
(अंधेरे का अरण्य)

पानी किसी को नहीं बताता था
कि उसके भीतर आग है
(पानी)

बारिश हो चुकने के बाद भी बची रहती है वृक्ष के पत्तों पर
(भग्नावशेष)

यह पृथ्वी मेरा पहला घर है
यह पृथ्वी मेरा अंतिम घर नहीं है
(भग्नावशेष)

कविता की नर्म उँगलियों से दिखायी, उठायी गईं वस्तुएँ स्मृतिलोक में चमक उठती हैं. यथार्थ पर रंदा चलता है, वह स्पष्ट, नफ़ीस और कारगर हो जाता है. वस्तुएँ स्मृति से जुड़ी होती हैं और स्थान से भी. जहाँ वस्तुएँ धरी होती हैं वहाँ समय और स्थान पहले से मौज़ूद होते हैं, ऐसा भी कहा जा सकता है. स्मृति में वस्तुएँ विशिष्टता के साथ आती हैं, वैसी नहीं जैसी वे मूर्त अवस्था में हमारे साथ होती हैं. वे जीवन के यथार्थ से जुड़ जाती हैं और कई दफ़ा उसे अभिव्यक्ति देने में सुन्दर प्रतीकों-सा आभास पैदा कर देती हैं. वीरू की कविताओं के बक्से में साँसें हैं और बचपन एक ताखे पर धरा हुआ है :

बहुत बार उसके भीतर कोई सामान नहीं होता था सिर्फ हवा होती थी
और आश्चर्यजनक रूप से
एक पूरा घर उससे अपनी साँसें लेता था
(बक्सा)

फूल का एक गिलास
जिस पर मेरा नाम लिखा था
अभी भी मेरे बचपन के ताखे पर रखा हुआ है.
(पुकार की एक चाबी)

वस्तुओं से जुड़ी स्मृतियों के सहारे आगे बढ़कर जब वे जीवन के घरौंदे में उतरते हैं, तो आत्मानुभव उनकी छलनी आत्मा के छिद्रों में से धूप की बनी रौशन-रेखाओं की तरह आते हैं. वे मनुष्यता के मर्म-गीतों का करुणामिश्रित गान प्रस्तुत करते हैं. व्यष्टि के घाव जब कविता की कारीगरी से कुरेदे जाते हैं, तब वे समष्टि के दुःख बन जाते हैं और वहाँ कारुणिक उत्तर-जीविता एक सामाजिक अनुभव की तरह संचित हो जाती है. यह पिता की एक फोटो तक न होने के अभाव की बात नहीं है, बल्कि वर्गीय विफलता है, जहाँ प्रियजन को स्मरण करने के साधन तक नहीं हैं:

मेरी माँ अब बहुत कम हँसती है
मेरे पास गुज़र गये पिता की एक भी हँसती हुयी फोटो नहीं है.

मेरी आख़िरी स्मृति में मैं अपने पिता के साथ नहीं,
किसी चौराहे पर नहीं,
किसी नदी की गहराई में डूबते-उतराते नहीं,
मैं मेरी थकान के भीतर खड़ा हूँ.
(वही)

वीरू के वैचारिक अवबोध में जो शैथिल्य है वह इस प्रकार की रचना-बुनाई में झोल पैदा करता है और बुनी गयी चादर में सलवटें डाल देता है. जहाँ वे स्टेटमेंट देने लगते हैं, कविता की टेंशन में लोच आ जाता है. ऐसा अनुभव होता है कि वे तत्त्व-मीमांसा और अमूर्तन के अपने सिद्ध रस्ते से भटक कर संभाषण के सर्वमान्य मंच पर आ खड़े हो गये हैं. यहाँ कविता वैचारिकी के कच्चे गीले गलियारे पर फिसल जाती है, जिससे वह उस सूक्ष्म अस्तित्वगत तनाव को खो देती है, जो अन्यत्र इसकी बड़ी शक्ति है. तब ऐसी अशक्त पंक्तियाँ सामने आती हैं, जो न केवल कविता के प्रतीकात्मक रूप-नाम को झीना करती हैं, बल्कि उदारवादी विवशताओं का पुलिन्दा खोल देती हैं :

मुझे मार्क्सवादी हिंसा से परहेज है मेरे लोगों
पर मैं जानता हूँ कि पूँजीवाद कितना मादरचोद है
यह मेरे बाप को खो गया.
(वही)

यहाँ मार्क्सवादी हिंसा से परहेज़ दरअसल मार्क्सवाद का खंडन नहीं, बल्कि उस अस्तित्ववादी नैतिक दुविधा की अभिव्यक्ति है, जहाँ व्यक्ति दृश्य हिंसा से भयभीत है, लेकिन अदृश्य संरचनात्मक हिंसा को पहचानने में असमर्थ या असहाय है.

मार्क्सवाद में हिंसा कोई नैतिक आग्रह नहीं है, वह ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज मानी जाती है. वीरू को पूँजीवादी संरचनात्मक हिंसा की ओर भी देखना चाहिए जो ‘अदृश्य’ है. मार्क्स ने जिसे ‘प्रणालीगत-बाध्यता’ कहा है. जिसे बाद में योहान गाल्तुंग ने ‘Structural Violence’ कहा, उसकी बुनियादी अवधारणा मार्क्स के शोषण और अलगाव के सिद्धान्त में पहले से निहित थी.

पूँजीवाद ने अस्तित्ववादी अनुभूति को तीव्र किया. यह वैचारिक अक्षमता अस्तित्त्व का दबाव है जो मार्क्सवादी हिंसा से परहेज़ रख रहा है और पूँजीवादी हिंसा जिसके लिए अपने बाप को खाने तक सीमित है. वह पता नहीं कितने बापों, माओं, बेटियों इत्यादि को खा कर पचा गया. ख़ैर, यहाँ कहना होगा कि मार्क्सीय भाषा में जो ऐलिएनेशन है वही अस्तित्त्ववादी मीनिंगलेसनेस है.

वीरू वहाँ सर्वाधिक सशक्त होते हैं, जहाँ वे वक्तव्य से बचते हुए अनुभव, दृश्य और मौन के माध्यम से अस्तित्व की दरारों को उद्घाटित करते हैं. इसी पथ का अधिक अनुशासन उनकी कविता को गहन और प्रगाढ़ बनाता है. वीरू तब ज़्यादा प्रोफ़ाउंड लगते हैं जब वे अपने अस्तित्त्व के गार में कूदते हैं या कि सभ्यता और उसकी भाषा को प्रश्नांकित करते हैं, या कि जीवन की यातना के क्रूर पशु से अपनी आँखें मिलाते हैं. वीरू की कविताओं के प्रतीकों, बिम्बों, विरोधाभासों एवं आध्यात्मिक संकेतों की ओर देखने पर ज्ञात होता है कि अस्तित्त्व की ‘गुत्थी’ उनके यहाँ एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न है और कविताओं में उसकी गहन व्याप्ति किसी गूढ़ सत्य की ओर बढ़ने का उपक्रम है. कवि अपने अस्तित्त्व को किसी स्थिर रूप में नहीं पाता बल्कि वह उसे असंगत, विघटित और डगमग चेतना की भाँति प्रतीत होता है. जब वह कहते हैं कि,

“मैं जीवन के भीतर हूँ एक असंगत तंबू”

तो इससे यही व्यंजित होता है कि उन्हें अस्तित्त्व की कोई ठोस पहचान नहीं है. वे इसे असंगतियों की चलायमान संरचना के रूप में पाते हैं और इससे उनकी कविताओं में अस्तित्ववादी दृष्टिकोण प्रभावी हो जाता है.

भाषा को लेकर कवि का नज़रिया उसे किसी टूल की तरह देखने में स्थित नहीं है. वीरू उसे एक सत्ता के रूप में पाते हैं जो ‘अँधेरे के पानी पर’ उभरती है और जिसे शाब्दिक ध्वनियों की आवश्यकता नहीं है. यह प्रवृत्ति हाइडेगर की धारणा को सिद्ध करती है कि ‘भाषा हमारे अस्तित्त्व का घर है.’ किन्तु ऐसा भी होता है कि जब अस्तित्त्व के प्रति सन्देह उपजता है तो भाषा भी सन्देहास्पद हो जाती है. भाषा को लेकर कवि के सन्देह वाजिब हैं. और कभी-कभी वे भाषा को झूठ का पर्याय बनाकर प्रस्तुत कर देते हैं. भाषा की यह पड़ताल सर्वेश्वर और उदय प्रकाश जैसे कवियों में यथार्थवादी है, वीरू इसे दार्शनिक मसअलों में तब्दील करते हैं.

वीरू सोनकर

कविताओं का दर्शन इस प्रकार का है कि वह तत्त्वों को स्मृतिशीलता और चैतन्यता प्रदान कर देती है. जैसे ‘पानी याद रखता है, पानी भूलता भी है’, ‘हवा अपनी नरम सहलाहट से बर्फ़ की देह तोड़ती है’, ‘मेरे पास आग की पहली स्मृति है’ इत्यादि. यह दृष्टिकोण भारतीय तत्त्व -चिंतन का नवीन रचनात्मक रूप है. वीरू की कविताओं में दार्शनिक बोध गहरा है. वे शून्य, मौन और चुप्पी को एक ऊँचे दार्शनिक बोध की तरह प्रयोग करते हैं. वे रिक्तियों का अनुभव करते हैं और विचारों को खोने के बाद प्राप्त होने वाले बिल्कुल नये बोध को अंगीकार करते हैं. वीरू की सामाजिक पीड़ाएँ भी अस्तित्त्व से सम्बद्ध हैं. उनके दार्शनिक बोध के पार्श्व में गहरे सामाजिक अनुभव हैं:

“मैं जात से खटीक हूँ… सभ्यता में कुछ भी नहीं था मेरा”

यहाँ सामाजिक अन्याय एक तत्त्व -मीमांसक प्रश्न के रूप में आता है. ऐसे अस्तित्त्व का क्या करें जिसकी कोई ऐतिहासिक, मानवीय स्थिति नहीं है. खटीक होना यहाँ केवल सामाजिक अपमान नहीं, बल्कि एक ऐसी ज्ञान-स्थिति है, जहाँ से सभ्यता की झूठी नैतिकता अधिक नग्न होकर दिखाई देती है. इस लहजे में वीरू चलताऊ अस्मिता बोध को नकार देते हैं और इसे एक प्रकार के नये रचनात्मक भावबोध और दर्शनमूलक कलात्मक मेयार के साथ प्रस्तुत करते हैं.
सभ्यता की समस्याओं अथवा अपने साभ्यतिक असंतोष को व्यक्त करने में वीरू ने पर्याप्त काव्य ऊर्जा को खर्च किया है. वे सभ्यता के घटनात्मक (phenomenological) संकट को देख पा रहे हैं.

कथाओं, घटनाओं, किस्सों, मिथकों पर आधारित न हो कर वीरू की कविता अनुभूति, चेतना, शून्य और स्मृति के प्रवाह से आती है. जो एक परिपक्व चिंतनशील प्रज्ञा की द्योतक है. उनकी कवितायें रैखिक न होकर गहन दार्शनिक, आंतरिक और भाषा पर विशेष ध्यान देने वाले अनुभूतिजन्य प्रतीकों से रची गई हैं. यानी कविताएँ बाहर से न घटकर भीतर घटित होती हैं. उर्दू में हम जिसे दाख़िली शायरी कहते हैं.

खण्डित अस्तित्त्व की संरचना इसके प्रवाह को स्वीकार करने के लिए है. ‘बेहोशी का पत्थर’ और ‘औचक का औघड़’ यह बताता है कि मनुष्य वस्तु नहीं है, घटना है. जिस तरह ‘मीर’ के यहाँ इंसान ‘ख़ाक के परदे से’ निकलता है. समय का प्रयोग वीरू चक्रीय और स्मृतिपरक स्वरूप में नहीं करते. वह लौटता है, टूटता है, धुंधलाता है और उभर आता है. यहाँ बर्गसाँ और हाइडेगर के ‘इनर ड्यूरेशन’ को स्मरण रखना आवश्यक है. कविताओं में शून्य, मौन और अँधेरे का आना भय या रिक्ति नहीं, बोध का संघनन है. कविताओं में जिससे स्थूलता का भान नहीं होता, बल्कि एक ध्यानमूलक तत्परता की लय सुनाई देती है. स्मृति यहाँ याद न होकर एक चेतनशील सत्ता के रूप में है, जो समय-मीमांसा की गुरु-गम्भीर शाखा है.

तत्त्व-मीमांसक स्वर में उनकी कवितायें कहती हैं:

अस्तित्त्व स्थिर नहीं है. यह असंगत और विघटित है. भाषा का जन्म अनुभवों के ताप से होता है. समय स्मृति की भाँति लौटता है. पानी, जल, अग्नि, वायु, इत्यादि चेतन और स्मृतिशील तत्त्व हैं. शून्य और मौन उच्चतम बोध के माध्यम हैं. सामाजिक पीड़ा एक दार्शनिक भाव है. इस तरह वीरू की काव्य-भूमि अनुभव केंद्रित, स्मृति प्रधान और अस्तित्त्ववादी है.

लेकिन जब आशा की बात होती है तो कांट की नैतिक नियमावली आती है, जिसे वह निर्विवाद मानता है. नैतिकता की परिणामविहीनता अथवा निरर्थक त्याग को ही वह आशा का जनक मानता है. और कवि जब रूपात्मक भाषा में कहता है कि ‘आस एक फूल है’ तो जैसे कि कांट है जो कह रहा है कि ‘मैं क्या आशा कर सकता हूँ ?’ आशा यहाँ भावना नहीं, नैतिक विवेक है:

ख़ुद को जितना समेटता हूँ
धज्जियाँ उतनी ही उड़ती हैं
सबसे अंत में देखता हूँ ख़ुद को
और पाता हूँ
कि आस एक फूल है
और फिर यह कि जिसका मुरझाना तय है.
(आस एक फूल है)

आस के इस फूल के मुरझाने की लीला भले ही निराशावादी है, किन्तु यह मुक्तिबोधीय नैतिक-विवेक की परिचायक है. वीरू सोनकर की कविता में आशा कोई भावुक प्रत्याशा नहीं, बल्कि कांट के अर्थ में नैतिक दृढ़ता है—जिसे उसके मुरझाने का पूरा ज्ञान है, फिर भी जो खिलने का जोखिम उठाती है.

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संतोष अर्श
कविताएँ, संपादन, आलोचना
.
रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ पर संतोष अर्श की संपादित क़िताब ‘विद्रोही होगा हमारा कवि’ अगोरा प्रकाशन से तथा ‘आलोचना की दूसरी किताब’अक्षर से प्रकाशित.
poetarshbbk@gmail.com
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