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Home » ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

‘ट्राम में एक याद’ के कवि ज्ञानेन्द्रपति की यात्रा लगातार अधिक बीहड़, अधिक अपरिचित और अधिक जोखिम भरे क्षेत्रों की रही है. साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित 76 वर्षीय इस कवि को इस वर्ष ‘अज्ञेय स्मृति सम्मान प्रदान’ किए जाने की घोषणा हुई है. 7 मार्च को अज्ञेय के जन्मदिन के अवसर पर कुशीनगर में ‘श्रीमती कलावती न्यास’ द्वारा आयोजित एक गरिमामय समारोह में यह सम्मान उन्हें प्रदान किया जाएगा. इस अवसर पर प्रस्तुत ज्ञानेन्द्रपति की ये कविताएँ उनके विशिष्ट नागरिक-बोध का परिचय देती हैं. इनमें अपने समय की पहचान है, मुठभेड़ है, और उसे काव्य में दर्ज कर लेने की एक सधी हुई कलात्मक दक्षता भी. समय की सतह को मात्र छूने के बजाय ये कविताएँ उसमें गहरे धँसकर लिखी गई हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
March 6, 2026
in कविता
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ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ
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ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

१.
नसीहत

कथा कहनी है तो
ठीक है
कथाकार बनने की सोचो भी मत
उसमें रखा ही क्या है
संभावित दण्ड और निश्चित फजीहत के सिवा
करो यह कि सिलवा लो जरीदार सुनहरा चोगा
बाँध लो मुकुट सरीखा भव्य साफा
डाल लो भाँति-भाँति के मनकों की मालाएँ गले में सुशोभन
माँज लो कुछ रिझाऊ मुद्राएँ मनभावन जनलुभावन
और कथावाचक बनो
चोखा धंधा है
तुम उसे धोखा-धंधा मानते हो न!
इसीलिए तो गुर्बत की गर्दिश में फँसे हो
डोलते हो यहाँ-वहाँ धूल फाँकते
परिवार पोसना तक मुहाल
हाल बेहाल
निकलो इससे बाहर
अपनी प्रतिभा पहचानो
उसे उच्चासन दो
देखो कैसे दसो नोंह जोड़े
दुनिया झुकती है तुम्हारे आगे
दण्डनायक दण्डवत करते हैं
कुण्डली में के रोग-भोग भोग-योग में बदलते हैं
याद रखो, सारी कथाएँ कही जा चुकी हैं कबकी
उन्हीं को शब्दों के हेर-फेर के साथ फिर-फिर कहना है असल कला
कलाकार बनो
सनातन के स्वर्ग में रहो
आज के नरक में क्यों जीते हो
अमृत छोड़, हलाहल पीते हो
देवताओं की पाँत में बैठो
शिव बनने में क्या रखा है
साँपों की लपेटन के सिवा!

 

 

२.
स्वतंत्रता के बारे में

स्वतंत्रता की लड़ाई का एक मोर्चा
हमारे अपने भीतर भी होता है
ज़रूरी मोर्चा
जिससे आँखें नहीं फेरी जा सकतीं
कहा था कभी एक अस्तित्व-चिंतक दार्शनिक ने
कहा क्या था चेताया था
कि लड़ना वहीं नहीं होता है, जहाँ
छेंकी जाती है स्वतंत्रता
वहाँ भी लड़ते रहना होता है अपने आप से
जहाँ अबाध मिली होती है स्वतंत्रता
कि हम उसे
बख़ुशी सौंप न दें
दूसरे दिखते-अनदिखते हाथों में

कि जैसे यह ठीक
कि अभिव्यक्ति पर बंदिश के खिलाफ
लड़ने को उठते हैं हम
अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं
यह भी देखें
कि मिली हुई जो वैचारिक स्वतंत्रता
क्या उसे ठीक से बरत भी पाते हैं हम
मुक्तधी सोच भी पाते हैं
कि हमारे सोच के साँचे
गढ़ दिये हैं किन्हीं कुशल कारीगरों ने
जो दिमागी खेल में माहिर
और हमारी हार
खेल शुरू होने से पहले ही पक्की कर दी है
हालाँकि वे खेलते हुए दिखाई नहीं देते
हम खुद से ही हारते हुए होते हैं
जीवन की धरती पर बिछी हुई बिसात पर
वैसे लड़ते हुए बिसात भर

और अब, जब
संहिताओं, शास्त्रों, स्मृतियों, पुराणों, आप्तवाक्यों, सुभाषितों
के उपदेश-निर्देश विधि-निषेध
हमारा आपा बन चुके हैं आधी दूर तक
बाकी आधे में सिमटी हुई स्वतंत्रता—
नये यंत्र-युग के प्रभावी मायावी संचार-माध्यमों से
नित निःसृत
विचारवेशी प्रचार से आच्छादित कर मति को
बुद्धि को बरगला —
पूँजीपति-सेवक सत्ता की बौद्धिक गुलामी की रज़ामंदी में
बदली जा रही है
और भी आसानी से
भले ही हम कितने भी जोश से
गाते-दुहराते रहें ‘प्रसाद’ के शब्दों को
‘स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती’
इससे क्या!

 

 

३.
एक प्रशिक्षु पत्रकार की लिखी पहली रपट

बड़ी धूम-धाम थी
विभाजन-विभीषिका-स्मृति दिवस को
भरपूर उत्साह से मनाया
ऊर्जस्वी कार्यकर्ताओं ने
जिनमें अधिकतर नौजवान थे
उनमें विद्यार्थी भी शामिल थे
कार्यक्रम भी तो जाने-माने स्कूल में आयोजित था
राष्ट्रीय कला-केंद्र के उदार सहयोग से
संचालन वगैरह सब
नौजवानों के जिम्मे था
क्या खूब जिम्मेदारी निभायी उन्होंने
जी खुश हो गया
उनके चेहरे राष्ट्र-प्रेम से दमक रहे थे
माइक पर बोलते थे तो आवाज़ में दहाड़ गूँजती थी
हाँ, मंच पर एक-दो तपे-तपाये राष्ट्रजापी संघनेता ज़रूर मौजूद थे
लेकिन वे पृष्ठभूमि में ही थे
हालाँकि वे बोले भी
उन्होंने विभाजन के जिम्मेदारों को जम कर कोसा
पर विभाजन के सिद्धांतकारों-पैरोकारों से दूर ही रहे
यह तो उन जैसों की ही बरसों की मेहनत थी
जो आज रंग ला रही थी
सभागार भरा पड़ा था जोशीले नौजवानों से
लेकिन ख़ास चीज़ तो आगे थी
वह थी मुख्य अतिथि का भाव-भीना सम्बोधन
क्या कहने!
समाँ बाँध दिया भाई ने
ग़ज़ब बोलते हैं गुरू!
और क्यों नहीं
विद्वान आदमी हैं, ख्यात साहित्यकार, नामी संस्था के प्रधान
एक-एक शब्द तोल कर उचारते हैं
ओजस्वी भाषणों के बीच उन्होंने करुणा की लकीर खींच दी
बेशक विलक्षण वक्ता हैं, सजीव चित्रण में माहिर
लगा, खून की नदी बह रही है आँखों के आगे
जिसमें हमीं डूब-उतरा रहे हैं
जब तक ऐसे लोग हैं हमारे बीच
विभाजन के जख़्म कभी भरने न पाएँगे
हम हरगिज सुखनींद सोने न पाएँगे
जागते रहना ज़रूरी है
भले ही भागते रहना मजबूरी है
अरे! देखा न!
संगत में मैं भी कवियाने लगा
गाल बजाने लगा
ऐसी ही होती है बड़ों की संगत
बदल जाती है रंगत
मैं तो कहूँ, भविष्य के सारे भूषण-आभूषण
उन्हें अदेर सौंप दिये जाएँ
पुरस्कारों की प्रशस्त ज़मीन पर
उनके नाम के प्रशस्ति-पत्र
जल्द से जल्द रोप दिये जाएँ!

रपट के अंत में टाँक ही दूँ
आयोजन की भव्यता के अनुरूप
चाय-पानी का प्रबंध उत्तम से भी उत्तम था
लेकिन सारी प्रचुरता के बीच पता नहीं वह क्या था
जो कम से भी कम था
शायद वह ग़म था
या फिर मेरा वहम था.

 

 

४.
पर्यावरणविद्

गिरगिट को ठीक रंग बदलते वक़्त देखो
तो तुम्हें मानना होगा
सृष्टि में नहीं है उससे बड़ा पर्यावरणविद् कोई और

हमारे कई परिवर्तनकामी मित्रों ने भी नाउम्मीद होकर
परिवर्तन की परिभाषा बदल ली है
और बदले हुए पर्यावरण की अनुकूलता में
खुद को ढाल लिया है

अब वे ही युगबोध-सम्पन्न माने जाते हैं
यह युग उन्हीं का है
वे ही हैं इसके वाहक-संवाहक
जो इस युग में मिसफ़िट हैं
वे बाहर फेंक दिये गये हैं
वे इस युग से निष्कासित हैं
अपनी आत्मा के साथ अकेले
किसी पुराकाल में पड़े हुए

धुरंधर युगंधर
जो कल तक बहुजन के पक्षधर थे
अब बहुसंख्यक के पक्षपाती हैं
जो कल तक कल-युग की बात करते थे
अब कलियुग की चर्चा करते हैं
कलियुग के अंतिम चरण में
वे आने वाले सतयुग की पूर्वाभा से नहाये हुए हैं
ऊपर-ऊपर
भीतर-भीतर वे काली पड़ गई अपनी आत्मा को
ख़ुद से ही छुपाने में लगे रहते हैं निरंतर.

५.
जूतों की ज़मीन

जूते पहन कर ही मनुष्यता
सभ्यता की राह पर दौड़ी थी
नंगे पैरों यह मुमकिन नहीं था
जूतों ने तभी से
मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ा

कभी-कभी जूतों को
आदमी से लम्बी उम्र मिली
बेकाम की

जूतों की इस लम्बी यात्रा में
लेकिन ऐसे मौके-बेमौके आते रहे
जब बीच रास्ते
जूते हाथों में लेने पड़े
जूतमपैज़ार हुई
मुश्किल से मामला शांत हुआ
ऐसे मौकों पर जूते
आग्नेयास्त्रों से अधिक हिंसक हो उठते हैं
उनके तल्लों से बारूदी गंध उठती है

इतिहास में ऐसे मौके भी हमने देखे हैं
जब जूते
ज़बर आततायियों के सामने तन कर खड़ी
अवेध्य आत्मा का अभय-संदेश बन जाते हैं
जैसे वह एक मौका, जब
बगदाद में
इराक के बर्बर महाविनाश के ख़िलाफ़
एक साहसी पत्रकार ने
अपने जूते फेंके थे दूर से ही
एकध्रुवीय हो चुकी विश्व-व्यवस्था के विश्व-प्रभु
अमेरिकी प्रेज़ीडेंट के दमकते चेहरे पर
विजयोत्सवी प्रेस-वार्ता के दौरान
और मंद पड़ गई थीं दिपदिपाती रोशनियाँ
नृशंस लालच को ढँक रखने वाला दर्प
मुखौटे की तरह हठात् उतर गया था
एक गोरा चेहरा तमतमा कर बाहर से लाल
और भीतर से काला पड़ गया था
वे जूते केवल पैरों से उतार कर ही नहीं
प्रतिरोध की मानवीय ज़मीन से उठा कर
फेंके गये थे
अमेरिकी मिसाइलों के पास
जितनी भी विध्वंसक ताकत हो
उन जूतों के पास उससे ज़ियादा नैतिक ताक़त थी
वे जूते आज भी हवा में एक चाप बनाते
जाते दिखते हैं
वे अनश्वर हैं अब

ओह! अभी
एक जूता यहाँ भारत में भी चला है
सबसे ऊँची अदालत में
तान कर फेंका गया
एक सिरफिरे वकील के हाथों
प्रधान न्यायाधीश की ओर
प्रधान न्यायाधीश जो भारत के संविधान-संरक्षक
अरे! जिन्होंने
शेरनी का दूध पिया है छक कर
जैसा चाहते-कहते थे करने को
संविधान-शिल्पी अम्बेडकर
शिक्षा-शेरनी का अमृतोपम दूध पी
जो न्याय-चेतना से भरे हुए निर्भीक
विधानों के रखवाले
मति-गति-शील

वह दुर्मति वकील
जो कहता ख़ुद को सनातन-सेवक सगर्व
जिसके क्षोभ में
जो बारूदी गंध है, वह
सदियों से उत्पीड़क होने की अभ्यस्त
अहंकारी आत्मा की है
कि जो बहुजनों को समझती क्षुद्र शूद्र
उन्हें मानव-पशुओं की तरह चाहती बरतना अब भी
नरवाहन कुबेर के वाहन मात्र
जो बस बनायें-पहनायें जूते
ख़ुद पहन गुज़रने की गुस्ताखी न करें सामने की सड़क पर
वह अहंकारी आत्मा खड़ी दर्प-स्फीत
किन्हीं स्मृतियों की सुझायी
वर्ण-व्यवस्था की विषम ज़मीन के ऊँचे टीले पर
संविधान का समतल जिसके पैरों में चुभता है
वह जूता
पैर से छुड़ा कर ही नहीं
उसी विषमीली विष-मैली ज़मीन से उठा कर
फेंका गया है
देखो, वह लौटता है
जिस तरह आकाश पर थूका लौट गिरता है
थुकवैये के मुँह पर
अनिवार्य भवितव्य को टारने-नकारने की योजना
अंततः सफल होने वाली नहीं
कल्पित स्वर्णिम अतीत का तुम्हारा मतिमोहक माया-जाल
बिथरने ही वाला है, जालिको!
मानव-मति और इतिहास-गति को
बहुत दिनों तक बाँध कर नहीं रखा जा सकता.

 

 

६.
लेबर-चौराहे पर

भारत के जन-संकुल नगरों में
कितने-कितने हैं चौराहे
जहाँ अलस्सुबह से जुटने लगते हैं
लोग
तपे-तपाये चेहरे वाले कर्मठ लोग
अगल-बगल के इलाक़ों से आये
अपने घरों से झुग्गी-झोपड़ियों से मलिन रहवासों से
निकल कर आये
उम्मीद से भरे
काम की तलाश में
जहाँ कामगार की तलाश में
दिन चढ़ने से पहले ही
पहुँचते हैं लोग
उनकी आँखों में झाँक कर
कार्य-कुशलता थाहते
हाथों की ताक़त अंदाज़ते
उन्हें ले जाने काम कराने दिहाड़ी पर

ये चौराहे
लेबर-चौराहे के नाम से मशहूर
सुबह-सुबह के शहर की सूनी-सूनी सड़कों के बीच
अलस्सुबह से गुलज़ार

इन मज़दूर-चौराहों पर
जुटने वालों में
भाँति-भाँति के कारीगर
अपने औजार सँभाल लपेटे प्लंबर, बढ़ई,
कर्नीधर राजगीर, पेंटर, बाहुबली श्रमिक—
जिन्हें बाहुबली कहना चाहे अटपटा लगता हो
इन्हीं के बीच कोई-कोई ख़ासा पढ़ा-लिखा बेरोज़गार नौजवान
सुथरे कपड़ों से अधिक अपनी नीची निगाहों से
पहचाना जाता
जिसे आख़िर यहाँ आना पड़ा है
इनमें से अधिकतर की तरह ही
एक पहर दिन बीतते न बीतते
धीरे-धीरे घर लौट जाने भारी क़दमों

क्या करें
घटती कमाई बढ़ती महँगाई ने
हौसले पस्त कर रखे हैं लोगों के
बस केवल उन थोड़े-से लोगों की चाँदी है
सत्ता संग साँठ-गाँठ से
जन-धन को लूट-खसोट, जो
बने जा रहे धन्नासेठ से जगत्सेठ
श्रम-सघन औद्योगिक उत्पादन से विरत
निपट स्वार्थ-साधन में निरत

ऐसे में, जब
भारत के मज़दूर-चौराहों पर
नाउम्मीदी पसरी है
विश्व के लेबर-चौराहे पर
क्रयशक्तिशाली श्रम-ग्राहकों के बीच
खड़ा हुआ है भारत झुकाये सिर हथेलियाँ मसलता
जा रहे तरह-तरह के मज़दूर चुने जा कर
अलग-अलग देशों में
पश्चिमी देशों में डॉक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन
घर-घर नौ मन तेल वाले खाड़ी-देशों में
ड्राइवर, कारीगर, नौकर सबकुछकर
और अब
युद्धरत इज़राइल और रूस सरीखे देशों में
मोर्चे पर ज़ब्रिया भेजे जाने सबलतन भारतीय जन
अबूझ अनुबंध के अधीन
विकल्पहीन

सच तो यह
धन्य-धन्य की गद्गद ध्वनियों के बीच
दूँ कह
ज्ञान-प्रसारक विश्व-गुरु बनते-बनते अब भारत
विश्व का सबसे बड़ा मज़दूर-निर्यातक
निर्विवाद.
हो जाये इस पर एक ऊँचा-सा शंखनाद!

 

 

७.
पलायन एक्सप्रेस

जिसे कहा जा रहा है
स्वाधीन भारत का अमृत-काल
वह अनृत-काल है, सच पूछो तो
सुहाने झूठों का जंजाल

इसे ही देखो
बिहार-यू पी से चलायी जा रही हैं जो नई ट्रेनें
कहने को किफायती व स्तरीय सुविधा-सम्पन्न
विकसित आर्थिकी वाले उन सुदूर प्रदेशों तक पहुँचाने वाली ट्रेनें
जहाँ खटने-कमाने पहुँचते हैं ठसमठस
बिहार-यू पी के बेरोजगार नौजवान
विपन्नता के मारे
कतार बाँधे
स्वार्थी समृद्धि के दुआरे
शोषित होने
पोषित होने
बहिरागत घोषित होने
हतभागे
भागे-भागे
जन्मभूमि से दूर
तलाशते कर्मभूमि
चुनते अनचाहा विस्थापन, बेमन
खाली हाथों की मुट्ठी में
गड़ती भाग्य-रेखा लिये, मौन
खटने-हड़ने को तत्पर ज़िंदगी की कड़ी धूप में
स्नेह-छाया से वंचित
उचाट-चित्त

ये ट्रेनें
उन्हीं नौजवानों को
कृपालु सौगात हैं दयालु सरकार की
रेलवे मंत्रालय-यंत्रालय की
जिन्हें कहा जा रहा है —
अमृत भारत एक्सप्रेस
सम्पन्न जनों के महँगे नफ़ीस वातानुकूलित द्रुतगामी
वंदे भारत एक्सप्रेस का विपन्न सहोदर
अमृत भारत एक्सप्रेस
अरे! इन्हें
पलायन एक्सप्रेस क्यों नहीं कहते
जो होता इनका सही नाम
राष्ट्रजापी महानुभाव!
लेकिन हाँ, तुम्हारा अमृत-काल तो है ही
अनृत-काल
सुहाने झूठों का जंजाल!

 

ज्ञानेन्द्रपति

जन्म 1 जनवरी, 1950 को झारखंड के एक गाँव पथरगामा के किसान परिवार में. उच्च शिक्षा पटना में हुई. इस दौरान छात्र-राजनीति और जन-संघर्षों में  गहरी सक्रियता रही. बिहार सरकार में लगभग एक दशक अधिकारी के रूप में कार्य करने के उपरांत नौकरी को नकार बनारसी हो गए. तब से जीवन और समय लेखन को समर्पित है. शतरंज और यायावरी से लगाव, विचार में दृढ़ता और स्वभाव में नम्रता, समानता के पक्षघर, जीवन-वैविध्य के आकांक्षी, हृदय की आर्द्रता और उष्णता से संपन्न ज्ञानेन्द्रपति संवाद-विश्वासी हैं. प्रमुख प्रकाशित कृतियों : ‘आँख हाथ बनते हुए’, ‘शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना हे’, ‘गंगातट’, ‘संशयात्मा’, ‘मिनसार’, ‘कवि ने कहा’, ‘मनु को बनाती मनई’, ‘गंगा-बीतीः गंगू तेली की जवानी’, ‘कविता भविता’, प्रतिनिधि कविताएँ, प्रकृति और कृति  (कविता-संग्रह); ‘एकचक्रानगरी’ (काव्य-नाटक); ‘पढ़ते-गढ़ते’ (कथेतर गय). ‘संशयात्मा’ के लिए ज्ञानेन्द्रपति को वर्ष 2006 का ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ प्रदान किया गया. समग्र लेखन के लिए उन्हें पहन सम्मान’, आदि मिले हैं.

Tags: 20262026 कविताअज्ञेय स्मृति सम्मानज्ञानेन्द्रपति
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Comments 2

  1. कुमार मंगलम says:
    1 hour ago

    समय सत्य का आख्यान और प्रत्याख्यन रचती यह कविताएं अपने समकालीन सच को उजागर करती हैं, ज्ञानेंद्रपति का बीहड़ और बहियार दोनों दृश्य से अलक्षित रह गईं चीजों पर टिकती हैं। ज्ञानेंद्रपति की काव्यात्मक संवेदना अलक्षित को लक्ष्य करती है। वह चाहे विभाजन विभीषिका दिवस पर लिखी हुई कविता हो या अनृत काल की सच्चाइयों को उजागर करती हुई वंदे भारत की सहोदर अमृत भारत के द्वैत को समझती हुई हो या कि गिरगिट की काव्यात्मक फलश्रुति जो कि गिरगिट को रिड्यूस किए बग़ैर काव्यात्मक निर्मिति तक पहुंचने का उद्यम करती है। अपने समय के सत्य का साक्षात्कार करती कविताएं हैं यह। कविताओं के लिए और अरुण कमल, उदय प्रकाश के बाद तीसरे अज्ञेय सम्मान के लिए भी ज्ञानेंद्रपति को हार्दिक बधाई और शुभेच्छाएं। सादर।

    Reply
  2. Om Nishchal says:
    1 hour ago

    पहले की तरह ही ज्ञानेंद्रपति की कविताएं अपने समय की वक्रताओं, मलिनताओं, संकीर्णताओं और पूंजीवादी प्रतिज्ञाओं और राष्ट्रवाद की नकली दुहराहटों और सामान्य जन को दूर-दुर करती वर्ण व्यवस्था की पोल खोलती हैं।

    इन कविताओं में आज की बेचारगी बोलती है। लेबर चौराहों की भीड़ के बीच पसरा बेरोजगारी का सन्नाटा, अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों के पीछे बड़े पैमाने पर होते पलायन, जूता बाजार के पीछे उभरती जूता संस्कृति, कथावाचकों के चोखे धोखे धंधे और पुराने आख्यानों की पटरी पर बार-बार भक्तगणों के भावुक दोहन पर केंद्रित इन कविताओं को पढ़कर सचमुच लगता है कि कविता हमारे समय, समाज, देश, मानवीय छद्म ,और गिरगिट की तरह रंग बदलते जीवन चरित्र का क्रिटीक है ।

    कविता कला के अवगुंठन में जिस तरह कवियों की बेबाकी संदिग्ध हुई है होती जा रही है ऐसे में ये कविताएं ज्ञानेंद्रपति जैसे कवि के प्रति एक भरोसा जताती हैं।

    जन-जन के पढ़ने और गुनने योग्य कविताएं।
    ओम निश्चल

    Reply

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