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Home » पडिक्कमा: एक परिक्रमा: अखिलेश

पडिक्कमा: एक परिक्रमा: अखिलेश

by arun dev
August 17, 2023
in आलेख
Reading Time: 5 mins read
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पडिक्कमा: एक परिक्रमा: अखिलेश
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पडिक्कमा: एक परिक्रमा
अखिलेश

कोई कविता पुस्तक अनेक स्मृतियों को जगा दे या आपकी कल्पना के पंख फड़फड़ा दे तो समझिये कि कवि अपने लेखन में भीतर पैठ चुका है. उसने मर्म का वह हिस्सा छू लिया जिस तक पहुँचने की उम्मीद हर कविता करती है. कवि की कल्पनाशील रचना ही वह रास्ता है जो यहाँ तक पहुँच सकता है और यही वो जगह है जहाँ रवि नहीं पहुँच पाता. पडिक्कमा संगीता का दूसरा काव्य संग्रह है. इस संग्रह में स्मृति है और यह कल्पना की जा रही स्मृति हैं. अनेक स्मृति कल्पना की डोर पर झूल रही है. यह स्मृति से छुटकारा पाने का प्रयास भी है. उस स्मृति से जो व्यथित कर रही है और करती रहेगी. मृत्यु की स्मृति और उसके साथ अपना सम्बन्ध बनाने, समझने का प्रयास भी है. स्मृति और कल्पना.

इन कविताओं को पढ़ते हुये मुझे प्रख्यात चित्रकार स्वामीनाथन से उस मुलाकात की याद आयी, जो अन्तिम मुलाकात थी इस बात का अन्दाजा भी नहीं रखती थी. स्वामी भोपाल स्थित मानव संग्रहालय के निदेशक थे और उन्होंने विश्व भर के आदिवासी जनजातियों के महासंगम ‘चरैवेति’ का आयोजन किया था. दुनिया भर के आदिवासी मानव संग्रहालय आये हुए थे और स्वामी की खुशी पोर-पोर से झलक रही थी. उद्घाटन की दूसरी शाम रसरंजन के दौरान अचानक स्वामी ने कहा मैं एक लेख लिखने की सोच रहा हूँ Reasoning and Oracle. इसके बारे में कुछ विस्तार से बताने का मौका उस शाम मिलने आने वाले लोगों के विचित्र और अनेक विषयान्तरों में डूब गया. हर नया शख्स अपने साथ बातचीत का नया विषय ले आता और स्वामी का अपनी बात पर टिके रहना लगभग नामुमकिन होता गया और रात भी इन सब में डूबती गयी.

स्वामी के चले जाने के बाद यह विषय मेरे मन में घर बना चुका था. अनेक तरह से इस पर विचार करते हुए इस मोटे निष्कर्ष पर पहुँचा ही जा सकता था कि कलाओं में स्मृति और कल्पना के भेद को ही स्वामी इंगित कर रहे होंगे. कलाओं में स्मृति और कल्पना का साथ तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा है. कल्पना का अधिकांश स्मृति का भ्रम लिए है और बहुत से कलाकार की कल्पना को जाग्रत करने का काम स्मृति करती है. अनेक कल्पनाएँ मनुष्य की स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं और यह भेद कर पाना असम्भव हो जाता है कि किस मोड़ पर स्मृति छूटती है और किस तरह कल्पना वहाँ से पंख लगा उड़ जाती है.

अक्सर कविताएँ स्मृति आधारित होती हैं और इन दिनों सामाजिक मंच फेसबुक पर इस तरह की कविताओं की भरमार है. अधिकांश कविताएँ किसी घटना, वाक्या, ठुकराए प्रेम की ख़बर, बलात्कार, शोषण, लिचिंग के अवसाद में ठोकर खायी टूटी-बिखरी स्मृति से भरी कविताएँ पाठक के मन की रिक्ती को बढ़ाती ही है. ख़बर के वायरल होने से कवि के अनुभव को टरका दिया है. ख़बर की सचाई से बेख़बर कवि एक जिम्मेदार नागरिक होने के झूठे आवरण में लिपटा तत्काल ही एक कविता फेसबुक पर चस्पा कर, उत्सव मनाती दूसरी पोस्ट पर कूद-फाँद मचाता हुआ दिख जाता है. इन कविताओं को पढ़कर तृप्ति का, भाषा की समृद्धि का अहसास नहीं होता. कल्पनाहीन अख़बारी रिपोर्ट की तरह यह कविता उसी शाम मर भी जाती है.

स्मृति और कल्पना में बहुत थोड़ा सा फर्क है, कल्पना संस्कृति के व्यापक पटल पर अभिव्यक्ति का प्रकटन है, स्मृति राजनीति का एक अवसरवादी हथियार भर भी है. ख़तरा इसी राजनीति के शिकार हो जाने का है.
कलाकृतियाँ मनुष्य की कल्पना को सम्बोधित है.

सभी कलाकृतियाँ स्मृति और कल्पना की तनी हुई रस्सी पर चलती हुई अपने होने के अचम्भे को प्रकट करती है, ज़रा सी चूक उन्हें स्मृति के उस गहरे कुएँ में गिरा सकती हैं जहाँ आत्मग्लानि हाथ पकड़ सकती है. एक अच्छी कविता आपके कल्पना लोक का दरवाजा खोल अचम्भे के प्रांगण में ले आती है और आप उसमें घट रहे चमत्कार से रूबरू होते हैं.

यह अनुभूति आपको समृद्ध करती है, आपका हिस्सा बन जाती है. आप उपकृत होते हैं, कृतज्ञ महसूस करते हैं. यह अनुभव पर आपका अधिकार नहीं बन पाता, एक अनजान की तरह टकराता हुआ अपना निशान छोड़ गुजर जाता है. समय की अन्तहीन विकराल उपस्थिति का अंग बन लुप्त हो जाता है. बाकी सब माफ़ है.

पडिक्कमा संग्रह के चार हिस्से हैं. चम्पू कविता से शुरुआत होती हैं, और कुछ अन्य कविताएँ है. दूसरा हिस्सा ‘जी’ कविताओं का है. तीसरे में हाइकुनुमा कुछ कविताएँ हैं और अन्तिम चरण उदाहरण काव्य का है. यानी सभी हिस्से स्मृति से भरे हुए हैं. प्रियजनों की मृत्यु, ‘जी’ की मृत्यु, पहले दो हिस्सों में तीसरे में प्रकृति की स्मृति और अन्त में प्राकृत और संस्कृत के उन कवियों की कविताओं से सम्वाद है जो काव्यशास्त्री आचार्य मम्मट की किताब ‘काव्यप्रकाश’ में उदाहरण स्वरूप आयी हैं. अमरुक, कालिदास, हर्ष, राजशेखर, दामोदर गुप्त आदि ज्ञात अज्ञात कवियों की कृतियों से यह सम्वाद रोचक है. संगीता ने उनकी कविताओं का अनुवाद भी किया और अपने सम्वाद को सार्थक करते हुए इन कवियों का स्मरण भी. संगीता संस्कृत पढ़ती-पढ़ाती भी हैं शायद यह सम्वाद इसी कारण सम्भव भी हो सका. एक उदाहरण:

उगता चन्द्रमा
पहले लाल कान्ति फिर स्वर्णाभ
फिर विरह व्याकुल तन्वी के गालों जैसा
फिर रसीली कमलनाल के टुकड़े जैसा
उगता चन्द्रमा
अँधेरे को ध्वस्त कर रहा है
(काव्यप्रकाश/139)

उदाहरण काव्य की इन कविताओं का आत्म उस कल्पना में निहित है जो संगीता की है. यही इन कविताओं का सरस, सहज, सरल, प्रकटन भी हैं जो पाठक को बाँध लेता है.

और ये कविताएँ इन कवियों से संगीता के संवाद की तरह हम पढ़ते हैं. इनकी पुनर्रचना में ज़रूरी तत्व कल्पना का भरपूर निवेश है. ये कविताएँ मृत्यु की उपस्थिति को पराये भाव से नहीं देखती बल्कि उससे अपनापा बनाती हुई पास बिठा लेती हैं.

संगीता चूँकि मालवा से है और उनका बचपन मालवा में ही गुजरा, अतः इस पूरे संग्रह में मालवी भाषा का भरपूर प्रयोग हुआ है जो कि किसी भी कवि के लिए सहज होना ही है.

हाइकूनुमा कविताएँ प्रकृति में घट रहे उस असम्भव की तरफ इशारा भी है जिस पर ध्यान नहीं जाता. प्रकृति की स्मृति नहीं उसके होने से उपजी कल्पना है. छोटा सा हाईकुनुमा उदाहरण:

किनारे पर खड़ी बगुली की परछाईं से
बिंध जाता है-
मछली का शरीर

प्रेम, विछोह, आकाँक्षा से बिंधि इन कविताओं में मन उदास भी है और उत्फुल्लित भी. अचरज भी है और क्षोभ भी.

(2)

संगीता की स्मृति में अनेक कल्पनाएँ हैं. और इस स्मृति में मालवी भाषा का गहरा हस्तक्षेप है. संगीता मालवा प्रदेश के आगर गाँव से आयी हैं और इस संग्रह के कृतज्ञता ज्ञापन में वे बतलाती हैं कि पडिक्कमा-चम्पू कविता दो परिजनों, बाऊजी (पिता) और बड़े भाई रमाकान्त की मृत्यु की परिक्रमा करती कविता हैं. पडिक्कमा जो कि प्राकृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ-प्रतिक्रमण या लौटना है. जो मेरे हिसाब से परिक्रमा ही है. हम परिक्रमा में बार-बार उसी जगह लौटते हें जहाँ से शुरू किया था. उनके पिता और भाई, दोनों की मृत्यु एक-दो माह के अन्तराल से हुई और जाहिर है ये सदमा किसी भी सहृदय को विचलित करने के लिए थोड़ा अधिक है.

संगीता इस बेतरतीब घटना को, बारिश के धागों से बाँधकर मृत्यु की ओढ़नी बुनती दिखायी देती हैं. कविता स्मृति कक्ष से निकलकर कल्पना के चौबारे में आ फलती है. कविता कारण से मुक्त हो तर्क-वितर्क से परे अनुभव के उस बीहड़ क्षेत्र में फैले बादल और बारिश के कवि समय में प्रकट होती है. एक अच्छी कलाकृति हमेशा अनुभव को प्रकट करती है उसके होने का कोई कारण नहीं है. वह बस हैं. यह अनुभव हर पाठक का अलग हो सकता है या नहीं भी होता है. कविता उसकी कल्पना पर दस्तक देती है. वह उसके घटने पर अपना होना अनुभव करता है. संगीता सहज ही कल्पना का वितान फैलाकर स्मृति को सोख लेती है.

कवि-मित्र गीत चतुर्वेदी ने इस कविता के तीन पड़ाव रेखांकित किये हैं. पहला पड़ाव ‘वह चल पड़ी है’, दूसरा पड़ाव ‘वह बस पहुँचने को है’, तीसरा पड़ाव ‘वह अपने गन्तव्य पर पहुँच गयी हैं.’ मृत्यु का यह वर्णन कविता में बीच-बीच में अमूर्तन की तरह आता है. इसमें एक पड़ाव और है, चौथा पड़ाव, ‘काउसग्ग’, काया का उत्सर्ग’. यह चार पड़ाव सभी के जीवन का सच भी है. पैदा होने के साथ ही वह चल पड़ती है. मृत्यु की इस यात्रा को एक अनुभव की तरह दर्ज करती है यह कविता. इस कविता में बारिश का शोर है. बादलों की उपस्थिति है. मौसम का माहौल है. प्रकृति भी मौजूद है.

बारिश में सबकुछ घट रहा है. साक्षी बादल हैं. जीवन से भरी इस कविता में कलाकंद खाया जा रहा है, कैथेटर लगाया जा रहा है, सभी से क्षमा माँगी जा रही है. घोड़े पर सवार ‘धूली बई’ भी आ रही है. कलाकंद, कैथेटर, घर, गंगापुर, वार्ड 723, घाटी, पातालवासी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, माँ की आँखें, भेरूवा, राख, फूल, नीरू, शब्द, अर्थ आदि जगत रूप की मौजूदगी में मृत्यु का साक्षात्कार हो रहा. कविता का अन्त बाऊजी और विमल की पुकार का है जो काया उत्सर्ग कर चुके हें. इस कविता में रोमांच है, जिज्ञासा है, कविता एक लय में खुलती चली जाती है, अनुभव की देहरी लाँघकर, गीले प्रांगण में आलोकित होती है. यहाँ दुनियावी जोड़ कुछ नहीं है. शब्द-अर्थ के परे हैं. पाठक चमत्कार की उम्मीद नहीं रखता, न ही सोचता है कि कुछ नया घटना चाहिये किन्तु यही वो जगह हैं जो कलाकृति को अनूठा बनाता है, वह कुछ ऐसे प्रकट होती है कि सहृदय अचम्भित रह जाता है. यहाँ उस कविता का एक अंश देना उचित होगा.

बादल बादल बादल बादल
बारिश बारिश बारिश बारिश
वह बस पहुँचने को है

बादल बादल बादल
पाताल वासी क्षमा करें
जल थल मय्यल वासी क्षमा करें
पेड़-पौधे जीव-जन्तु क्षमा करें
घट घट क्षमा करे

बारिश बारिश बारिश
माँ की आँखों में उतरता है शून्य

दो प्रियजनों के नहीं रहने को दर्ज करती कविता स्मृति से भरी पड़ी है. यह स्मृति संगीता की है. इसके सार्वजनिक होने का सहारा शब्द है, वो शब्द जिनके अर्थ अनेक हैं. पाठक के लिए यह सिर्फ कल्पना का आँगन खोलती है, उसमें वह अपने प्रियजन के गुजर जाने को महसूस कर भी सकता है, नहीं भी. कलाकृति किसी एक अर्थ में बँधी नहीं रह सकती है, वह अनेक अर्थ खोलती हैं. इसमें एक पंक्ति है, बारिश मा..चो.. पाठक के लिए यह अर्थ स्पष्ट ही है कि बारिश को कोसा जा रहा है. बारिश में दोनों मृत्यु हुई हैं. यह एक मुद्रा भर है. साथ ही यह स्मृति भी है कि यह गाली बाउजी की प्रिय गाली थी. मालवी भाषा में गाली की प्रचुरता उसकी मिठास की तरह है. सामान्य बोलचाल में गाली का प्रयोग प्रचलन में हैं, बोलचाल में गाली तिरस्कार, उलाहने के रूप में प्रयोग नहीं की जाती बल्कि वह अभिव्यक्ति का एक दमदार ढँग है. अपनी बात को सहज व्यक्त करने का सामान्य प्रचलन है. इस एक गाली के अनेक अर्थ उसके प्रयोग परिस्थिति पर निर्भर करते हैं.

यहाँ एक वाकया, जो सुमनजी (शिवमंगल सिंह ‘सुमन’) ने अपने मित्रों को सुनाया था जिस वक्त छात्र हैसियत में, हम लोग पुरातत्ववेत्ता वाकणकर सर के बुलाने पर कालिदास चित्रकला प्रदर्शनी लगाने उज्जैन आये हुए थे, तब सुना था. इस वाकये से मालवी भाषा का चलन थोड़ा स्पष्ट हो जा सकता है. बाद में यह वाकया चुटकुले के रूप में भी प्रचलित हो गया था. किस्सा इस तरह है-

एक महिला ‘मालवी भाषा में मौजूदा काव्य’ विषय पर पीएच.डी. कर रही थी. उसके प्रोफ़ेसर ने उसे सलाह दी कि पहले मालवी भाषा सीख लो. एक वर्ष का समय दिया और कहा अगले वर्ष मिलेंगे. एक साल बाद वह खुशी-खुशी आई और प्रोफ़ेसर को कहा मैंने एक साल भाषा सीखने में लगाये. प्रोफ़ेसर ने कहा अच्छा ये बताओ ‘ये दूध किसने ढोला’ को मालवी में कैसे कहेंगे? महिला ने तत्काल कहा ‘यो दूद कीने ढोल्यो’. प्रोफ़ेसर बोला नहीं अभी आपको मालवी पूरी तरह नहीं आयी. एक साल और लगाओ. एक साल बाद वह वापस लौटी और प्रोफ़ेसर ने वही प्रश्न दोहराया. ‘यो दूद कीने खड्लायो!’ महिला का यह वाक्य सुनकर प्रोफ़ेसर ने निराशा में सर हिलाया और कहा नहीं अभी भी आप मालवी नहीं सीख सकी हैं. फिर से एक साल लगायें और ध्यान दीजिये. आपका मन एकाग्र नहीं हो रहा है. भटक रहा है. महिला वापस चली जाती हैं और एक साल बाद आकर बोलती है सर मैं लौट आई. इस बार मैंने ध्यान दिया है. प्रोफ़ेसर ने वही प्रश्न रखा. ये दूध किसने ढोला को मालवी में कैसे कहेंगे. महिला ने चहक कर जवाब दिया ‘या कीने अपनी मा.. चु..वई’.

इस तरह गालियों का प्रयोग रोजमर्रा की बातचीत में मालवी में बेहद सामान्य हैं. इन्हें पूरे परिवार के बीच इस्तेमाल किया जाता है और इसका बुरा कोई नहीं मानता, बाप बच्चों को बारिश भीगता देख सहज ही कह उठेगा ‘बारिश मा..चो.’. यानी अन्दर चलो, भीगो मत, या बहुत तेज बारिश है. या कई दिनों से हो रही बारिश है. आदि आदि अनेक अर्थ प्रयोग इस अकेली अभिव्यक्ति में है. इसे समझना ज़रूरी हैं. इसी पुस्तक की एक कविता ‘अर्थ’ और अर्थ खोलती हैं. कविता: अर्थ

मैं कहती हूँ घर
अर्थ कुछ और होता है

मैं कहती हूँ प्रेम
अर्थ कुछ और होता है

मैं कहती हूँ आग
अर्थ कुछ और होता है

मैं कहती हूँ शब्द
अर्थ कुछ और होता है

सारे नाम तुम्हारे नाम में कल्पित हैं
मैं कहती हूँ तुम
अर्थ कुछ और होता है

इस चम्पू कविता में बारिश मृत्यु समय है. बारिश क्रमशः बढ़ रही है, गिरने के बाद, काॅमा में जाने के बाद, निमोनिया के कारण गुज़र जाना बारिश का बढ़ता जाना है. एक बेतरतीब क्रम जो स्मृतिहीन है, मृत्यु आलिंगन करती है प्रियजनों का और कविता आलिंगन करती है कल्पना का.

(3)

बस एक बुखार की देर ओर हे
जी कहती है
वह आँखें मटकाती एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती हैः
बस एक बुखार को बदन ओर बच्यो!

इस पुस्तक के चार हिस्से है दूसरे में ‘जी’ कविताएँ हैं. ‘जी’ यहाँ मन भी हैं नानी भी. मेरी मनपसन्द कविताएँ या मेरे ‘जी’ की कविताएँ. जहाँ जर्जर नानी ‘काउसग्ग’ की प्रतिक्षा में हैं. संगीता ने शुरू में ही बता दिया है कि यह ‘जी’ कविताएँ मेरी नानी यानी ‘जी’ की मृत्यु के आसपास लिखी गई हैं. नानी का बचपन भी नानी के साथ है और वे अभी भी घाघरा, लुगड़ी, काँचली में गिलहरी की तरह फिसलती रहती हैं, आँख मटकाती कहती है ‘बस एक बुखार को बदन और बच्यो’. इन कविताओं को पढ़ते हुये हमें पहले ही पता चलता है कि बस एक बुखार की देर है, मृत्यु चल पड़ी है, पहुँचने वाली हैं, इन्तज़ार है इन सभी कविताओं में धड़कता हुआ जीवन स्पंदन महसूस होता है. रम्भाती गायें, फूलों से लदा पेड़, रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने स्त्रियाँ, मटके पर की जाने वाली चित्रकारी, मालिन गुलाब रखने आती है. और माँ, जो उनकी बिटिया हैं धीरे से पूछती भी है कोई दुख तो नहीं? वे जवाब देती है ‘कइ कोनि’. इस भरे पूरे जीवन में मृत्यु प्रवेश करती है जीवन के ही एक अंश की तरह. ‘काउसग्ग’, काया उत्सर्ग के बाद प्रकृति में एक छोटा-सा बदलाव आता है. फूल आना कम हो जाते हैं.

इन कविताओं में जी की मृत्यु से अधिक जी का जीवन है. उनके होने और न रहने के बाद का जीवन जी की स्मृति में मृत्यु है. कवि की कल्पना में जीवन. जीवन में घट रही मृत्यु प्रतीक्षारत हैं. काउसग्ग घटना की. और ‘जी’ को भी प्रतीक्षा है एक बुखार की. इस बुखार की प्रतीक्षा में डाक्टर के पास जाने से मना कर रही हैं जिन्हें विश्वास है कि मृत्यु इसी जगह आयेगी सो पूनमचन्द को मना कर रही हैं यहाँ से कहीं नहीं ले जाने का. यानी भरपूर जीवन में मौत का इन्तज़ार है. उनकी यह कामना कई तरह से प्रकट होती है. जीवन की चाहना नहीं है. जीवन चारों तरफ फैला हुआ है और चाहना मृत्यु की है. जीवन की निरर्थकता का अहसास उनसे इन्तज़ार करा रहा है. ‘जी’ के जी में मृत्यु बसी है और बाकि लोग मृत्यु से बेखबर उनके आस-पास हैं.

अखिलेश
(२८ अगस्त, १९५६)

इंदौर के ललित कला संस्थान से उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद दस साल तक लगातार काले रंग में अमूर्त शैली में काम करते रहे. भारतीय समकालीन चित्रकला में अपनी एक खास अवधारणा रूप अध्यात्म के कारण खासे चर्चित और विवादित. देश-विदेश में अब तक उनकी कई एकल और समूह प्रदर्शनियां हो चुकी हैं. कुछ युवा और वरिष्ठ चित्रकारों की समूह प्रदर्शनियां क्यूरेट कर चुके हैं.

प्रकाशन :
अखिलेश : एक संवाद (पीयूष दईया)
आपबीती (रूसी चित्रकार मार्क शागाल की आत्मकथा का अनुवाद)
अचम्भे का रोना, दरसपोथी, शीर्षक नहीं, मकबूल (हुसैन की जीवनी),देखना, रज़ा: जैसा मैंने देखा. आदि
भोपाल में रहते हैं.
56akhilesh@gmail.com
Tags: 20232023 आलेखअखिलेशपडिक्कमासंगीता गुन्देचा
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Comments 2

  1. कमलेश जोशी says:
    3 years ago

    बढ़िया लिखा है |

    Reply
  2. लीलाधर मंडलोई says:
    3 years ago

    सुघड़ भाषा के वितान में अर्थ संम्पृक्त…रवानी आकर्षक।

    Reply

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