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समालोचन

Home » सत्यनारायण व्रतकथा : एक आलोचनात्मक पाठ : चंद्रभूषण

सत्यनारायण व्रतकथा : एक आलोचनात्मक पाठ : चंद्रभूषण

भारतीय लोक-वृत्त में प्रसारित कथाओं, पर्वों और अनुष्ठानों पर आलोचनात्मक चिंतन का सूत्रपात औपनिवेशिक भारत में हुआ, देशी और विदेशी लेखकों ने इनको न केवल सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पढ़ा, बल्कि उनके ऐतिहासिक समिश्रण को भी समझने का प्रयास किया. लेकिन आज़ादी के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि इन जीवित परम्पराओं को नए प्रश्नों और नए पद्धतियों से जाँचने की आवश्यकता ही अप्रासंगिक समझ ली गई. इनमें अत्यन्त लोकप्रिय और गृहस्थ जीवन में गहराई से रच-बस चुकी सत्यनारायण व्रत-कथा का उदाहरण उल्लेखनीय है. कथा स्वयं तो सर्वविदित है, पर उसके उद्भव, उसके ऐतिहासिक रूपान्तरणों और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थग्रहणों के प्रति हमारी जानकारी आश्चर्यजनक रूप से सीमित है. क्या यह कथा मध्यकालीन परम्पराओं, लोक-कथात्मक संरचनाओं और इस्लामी आध्यात्मिक वातावरण के मिश्रण का परिणाम है? ‘सत्य पीर पूजा’ के साथ क्या इसका कोई संबंध है? चंद्रभूषण इस जटिल परम्परा को एक नई रोशनी में देखते हैं. मध्यकालीन जन-विश्वासों, बंगाल और पूर्वी भारत की लोक-धाराओं तथा क्षेत्रीय रूपों का गहरा अवदान इसमें दिखता है जो सांस्कृतिक बहुलता और परस्पर संवाद का सजीव प्रमाण भी है. क्या यह भारतीय जन संस्कृति की दीर्घ और परस्पर-विनिमयशील परम्परा की उपज है? प्रस्तुत है यह आलेख.

by arun dev
November 29, 2025
in समाज
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सत्यनारायण व्रतकथा : एक आलोचनात्मक पाठ : चंद्रभूषण
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सत्यनारायण व्रतकथा
इतिहास और भूगोल के घर्षण से निकली एक पूजा

चंद्रभूषण

बचपन की जमी हुई यादों में एक ‘सत्यनारायण व्रतकथा’ भी है. हमारे गांव में इसे ‘सतनरायन बाबा की कथा’ बोलने का चलन था. किसी के घर बच्चा होने, लड़के की शादी के बाद बहू आने, गृहप्रवेश या किसी तरह का निर्माण कार्य होने पर, किसी की मृत्यु के कुछ दिन बाद घर शुद्ध होने पर, या कोई भी मंगल कार्य संपन्न होने पर यह आयोजन होता था. इसका दायरा देशव्यापी है, कश्मीर घाटी, नॉर्थ-ईस्ट के कुछ राज्यों और दक्षिणी कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल के सिवा सभी राज्यों में यह अनुष्ठान ऐसे ही संपन्न होता है, तजुर्बे से हासिल यह जानकारी चौंकाने वाली थी.

‘सत्य पीर पूजा’ के रूप में इसकी निरंतरता लगभग समानांतर शक्ल में बंगाली और उड़िया इस्लाम में भी मौजूद रही है, नारायण और पीर का फर्क छोड़ दें तो वहाँ भी कहानियाँ यही हैं और प्रसाद भी आटे, गुड़ और केले का ही बनता है, यह बात तो समझ के दायरे से ही बाहर थी. इतनी कि इसपर चर्चा भी मैं थोड़ी देर बाद ही कर पाऊंगा.

राम-लक्ष्मण-जानकी, राधा-कृष्ण, हनुमान, काली, दुर्गा आदि के मंदिर मैंने जब-तब शहरों की आवाजाही में देख रखे थे लेकिन ‘सत्यनारायण मंदिर’ कभी सुना भी नहीं था. दस अवतारों के नाम पता थे, उनमें भी सत्यनारायण नहीं आते थे. एक बार पिताजी से पूछा कि यह पूजा किसी अवतार के बजाय सीधे नारायण की ही है तो नाम में दिखने वाले ‘सत्य’ का क्या मतलब है? असत्य जैसा विशेषण तो यहाँ जुड़ ही नहीं सकता, फिर सत्य खामखा क्यों जुड़ा हुआ है?

क्या इस कथा का उद्देश्य धार्मिक लोगों में सच्चाई को एक जीवन मूल्य की तरह प्रतिष्ठित करना है? (गांधी से पहले ही सत्य के साथ प्रयोग!) कथा के पूर्वी संस्करण में यह श्लोक भी है-

‘सत्यं वदति यो नित्यं सत्यदेवः सदा सखा
सत्यस्य व्रतमाख्यातुं शृणुध्वं भक्तिसंयुताः.’
(जो हमेशा सच बोलता है, सत्यदेव सदैव उसके साथ रहते हैं. सत्य के व्रत की कथा कह रहा हूं, भक्ति के साथ सुनें.)

लेकिन यह तर्क श्रृंखला कथा का ध्यान आते ही टूट जाती है. सत्य की फिक्र होती तो व्रतकथा की कहानियाँ पूजा के बजाय सच बोलने भर से श्रद्धालुओं का कल्याण होता दिखातीं. ऐसा तो कुछ वहाँ है नहीं. वहाँ तो कसौटी एक ही दिखती है- व्रत किया या नहीं, कथा सुनकर प्रसाद खाया या नहीं.

आगे, सत्यनारायण व्रतकथा के फैलाव पर आएं तो फिजी-मॉरिशस से लेकर दक्षिणी अमेरिका तक फैले गिरमिटिया भारतीयों और यूरोप-अमेरिका के अमीर हिंदुस्तानी घरों में भी अभी यह धूम-धाम से होने लगी है. दुनिया के कुछ नामी एकेडमीशियनों ने गहराई में जाकर इसके इतिहास-भूगोल, भाषाशास्त्र और किस्सागोई का अध्ययन किया है, मेरे लिए यह खुद में एक विचित्र सूचना थी. कुछ-कुछ ऐसी, जैसे बिना बताए किसी ने मुझपर दूरबीन लगा रखी हो.

 

कथा का कर्मकांड

विदेशों का तो नहीं कह सकता लेकिन मेरे गांव की इस नियमित चहल-पहल पर कोई बड़ा खर्चा नहीं आता था. आंगन या ओसारे में सूखे आटे से चौक पूरा जाता था. ताल की मिट्टी से वेदी बनाकर बीच में केले के पत्ते गाड़ दिए जाते थे. पानी भरे लोटे पर जौ से भरे दीये में आम की पल्लव और कुछ अगरबत्तियाँ सुलगाकर खोंस दी जाती थीं. कथा की जगह पर पूजा के लिए कोई मूर्ति या फोटो रखी मैंने नहीं देखी. बस, पुरोहित एक छोटी सी थैली में काले चिकने पत्थर की शक्ल में शालिग्राम लाते थे. उन्हीं को नहला-धुला कर संकल्प के समय तुलसी की पत्तियां चढ़ाने की याद है.

फिर जिस गृहस्थ के यहाँ कथा हो रही होती थी, उसी घर के कोई एक दंपति, पति-पत्नी जोड़े में बैठते थे और पुरोहित एक तयशुदा विधि से फूल, दीपक, अक्षत, मिठाई और कुछ पैसों के साथ उनका संकल्प छुड़ाकर उनके सामने दो-चार संस्कृत के श्लोक दागते हुए भोजपुरी मिजाज की हिंदी में घंटा भर एक सीधी-सादी कथा बांचते थे. श्रोताओं में पूरा गांव होता था. कुछ बिरादरियों के लोग किनारे बैठते थे लेकिन कथा सुनने भरसक सभी आते थे.

मेरे देखते-देखते इसका विस्तार गांव की सभी बिरादरियों में हुआ. दलित परिवारों में सबसे अंत में, लेकिन वहाँ भी. पुरोहित ब्राह्मण ही होते थे हालांकि उनकी भी कैटेगरी बटी थी. अलग-अलग जातियों में वे अलग-अलग गांवों से आते थे और दक्षिणा संबंधी उनकी अपेक्षा भी एक-सी नहीं होती थी. लेकिन पढ़ाई-लिखाई पुरोहित की चाहे जैसी भी हो, शंख वे लोग हर अध्याय के बाद पूरी जान लगाकर फूंकते थे. आसपास खेल रहे हम गिनते थे- पांचवीं शंख बजने तक मौके पर पहुंच जाना है. फिर ‘सप्तमो अध्यायः समाप्तः’ के बाद आधा घंटा हवन चलता था. महिलाएं सोहर की धुन में ‘केकरे दुआरे होमिया होले’ गाती थीं. अंत में बहुतेरे जैकारे मार लेने के बाद घी में भुने आटे की पंजीरी, केले-बताशे का प्रसाद, साथ ही पलाश के दोने में दूध-दही मिले शर्बत जैसा ‘चन्नामिर्त’ (चरणामृत) बंटता था.

मेरी बात में नॉस्टैल्जिया की छौंक बहुत ज्यादा न महसूस हो, कोई यह न कहने लगे कि आपने तो इस पंडिताऊ कथा-बार्ता को जातिनिरपेक्ष अनुष्ठान ही बता डाला, इसके लिए एक सफाई पहले ही दे दूं कि बात यहाँ तुलनात्मक नजरिये से कही गई है. धार्मिक दायरे में आने वाले जिन दो आयोजनों का चलन मेरे यहाँ था, उनमें दूसरा ‘अखंड रामायण का पाठ’ हुआ करता था. इसमें चौबीस घंटे के अंदर शुरू से अंत तक रामचरितमानस लाउड स्पीकर पर बांचना होता था. जो लोग इस काम में लगते थे उन्हें लय में दोहा-चौपाई पढ़ना आना जरूरी था. रात-बिरात के इस काम में महिलाएं नहीं बैठती थीं. 90-95 फीसदी लोग ऐसे ही छंट जाते थे.

फिर इस ग्रंथ में कुछ स्त्री-शूद्र विरोधी बातें होने की चर्चा शुरू हुई तो इसका आकर्षण घट गया. इसके बरक्स सतनरायन बाबा की कथा सिर्फ सुनने की चीज होने के चलते जरा बीस साबित हुई और इसमें ऐसी कोई बात भी नहीं है जो किसी समुदाय को बुरी लगती हो.

खैर, गांव बिल्कुल ही छूट जाने के पहले तक मैं इस सिलसिले का हिस्सा बना रहा. फिर मन की दुनिया बदल गई और किसी कथा में बैठने का मौका न जाने कितने दशक बाद आया. अभी दो साल पहले भैया के यहाँ किसी शुभ अवसर पर सत्यनारायण व्रतकथा आयोजित हुई तो वहाँ मैं भी उपस्थित था. कथा संपन्न हो जाने के बाद पुरोहित जी भोजन पर बैठे तो अपनी कुछ सहज जिज्ञासाएं शांत करने के लिए उनसे मैंने उनकी पोथी मांग ली और पढ़ने लगा.

मंगलाचरण के अलावा थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ सरल श्लोक इसमें आते थे. बाकी गैर-सामासिक, छोटे शब्दों और वाक्यों से बना किस्सागोई जैसा संस्कृत गद्य था. सात अध्याय पहले से पता थे, पांचवां-छठा बाकियों से बड़े हैं, उसी समय पता चला. इन दोनों में आए इंसानी चरित्रों के नाम भी थे. मैंने भैया से पूछा, जैसे पांचवें अध्याय में साधु वणिक और उनकी पत्नी-बेटी लीलावती-कलावती आते हैं, छठे में राजा तुंगध्वज विराजते हैं, वैसे ही तीसरे अध्याय में काशी के दरिद्र ब्राह्मण और चौथे में लकड़हारे का नाम क्यों नहीं आता? यह भी कि नामित पात्रों वाली कहानियाँ जटिल हैं, पात्रों से चूक होती है, वे कष्ट झेलते हैं, फिर नए सिरे से विश्वास करते हैं. बाकी दो बिल्कुल सादी क्यों हैं?

भैया मेरा मिजाज ठीक से जानते हैं लिहाजा आस्था के मामले में मेरे सवालों को हंसकर टाल जाते हैं. या फिर ऐसे जवाब देते हैं जिनपर मैं कोई प्रतिप्रश्न न करूं. जैसे, इस मामले में उन्होंने कहा कि ब्यौरेवार कहानी यहाँ उनकी ही सुनाई गई है, जिनसे बेहतर दक्षिणा आने की उम्मीद की जाती है. यह भी कि श्रद्धा की जरूरत पैसे वालों को ही है, जिनके हाथ खाली हों वे तो यूं भी झुके रहेंगे. मेरे सवालों के जवाब भले न मिले हों, मनोरंजन अच्छा-खासा हो गया.

 

 

वक्ता और श्रोता

सत्यनारायण व्रत कथा यहाँ संक्षेप में सुनानी हो तो इसकी शुरुआत में महान ऋषिगण नैमिषारण्य में जाकर सूत से एक ऐसे श्रेष्ठ व्रत के बारे में बताने को कहते हैं कि, जिससे सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं, सारे दुखों का नाश हो जाए और पापों का शमन भी हो जाए. यह भी कि यह इतना सरल हो कि कोई भी इसे कर सके. (पोथी में सूत के बारे में कुछ नहीं था लेकिन खोजने पर पता चला कि वे कथावाचकों के आदिपुरुष थे. उनका नाम लोमहर्षण था और वे व्यास के शिष्य थे. नैमिषारण्य में महाभारत और दूसरी कथाएं बांचकर लोगों को रोमांचित करना उनका काम था.)

नैमिषारण्ये महाभागाः ऋषयः सूतमब्रुवन्I
कथयस्व महापुण्यं व्रतं सर्वकामदं॥

जवाब में सूत कहते हैं कि आप सभी मुनिगण मुझसे कल्याणकारी सत्यदेव के व्रत के बारे में सुनें, जिसे सत्यनारायण व्रत कहा जाता है और जो सभी उद्देश्यों का साधक है.

श्रूयतां मुनयः सर्वे सत्यदेवस्य मे शिवम् I  
सत्यनारायण आख्यं व्रतं सर्वार्थसाधकम्॥

कथा में इसके बाद वक्ता और श्रोता की जोड़ी बदल जाती है. बकौल सूत, नारद मुनि एक बार नारायण के पास जाते हैं और उनसे ऋषियों वाला यही सवाल जरा दूसरे लहजे में पूछते हैं. ‘सभी लोकों की रचना करने वाले और दुखों का नाश करने वाले भगवन्, मुझे उस श्रेष्ठ व्रत के बारे में बताएं, जिससे सारे दुख समाप्त हो जाते हों.’

भगवन् सर्वलोकानां कारणं दुःखनाशनम् I
ब्रूहि मे व्रतं पुण्यं येन दुःखक्षयो भवेत्॥

जवाब में नारायण कहते हैं कि हे नारद सुनो, मैं तुम्हें सभी व्रतों में श्रेष्ठ और उत्तम सत्यनारायण नाम के व्रत के बारे में बताता हूं, जो सभी पापों का नाश कर देने वाला है.

शृणु नारद वक्ष्यामि व्रतानां श्रेष्ठमुत्तमम् I
सत्यनारायणं नाम व्रतं पापप्रनाशनम्॥

पहला अध्याय इन दो वक्ता-श्रोता युग्मों के वार्ताक्रम में उभरी व्रत-महिमा का है. नारद पूछते हैं कि यह किस देवता का व्रत है, किस समय में इसका उद्भव हुआ? नारायण कहते हैं कि ‘मेरा ही है, कृतयुग (सतयुग) में इसका प्रचलन शुरू हुआ था, अभी कलियुग के लिए यह बहुत ही उपयोगी है.’ (इस परिचय के आधार पर ‘सत्यनारायण’ को सतजुगी नारायण कहा जा सकता है, बशर्ते नारायण पर भी युग का प्रभाव होता हो!) दूसरे अध्याय में व्रत की विधियों के बारे में पूछा गया है. यानी इसे करने का सही तरीका क्या है. यह भी कि इसको किस तिथि पर किया जाए, और यह कि कौन-कौन से लोग यह व्रत कर सकते हैं, या बतौर श्रोता व्रतकथा को सुनने वालों में शामिल हो सकते हैं.

पीछे ऋषियों के सवाल में भी यह बात मौजूद है और नारायण के जवाब में और स्पष्ट होती है कि किसी भी जाति, उम्र या लिंग का व्यक्ति, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, इस व्रत को करने का संकल्प ले सकता है और इसकी विधियाँ पूरी कर सकता है. कथा बांचने वाला ब्राह्मण ही होगा, सभी मानकर चलते हैं. लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट आग्रह न होने के चलते या जिस भी वजह से भारत के पूर्वी राज्यों में, खासकर देश विभाजन से पहले के बंगाल, ओडिशा और असम के विशाल सिलहट जिले में यह कथा ‘सत्य पीर’ के नाम से मुसलमानों में भी ऐसी ही श्रद्धा से सुनी जाती थी. प्रसाद की सामग्री भी आटा, गुड़ और केला ही होती थी लेकिन शक्ल पंजीरी के बजाय सिन्नी (शीरनी) की होती थी. सत्य पीर पर कुछ सामग्री स्वतंत्रता आंदोलन के समय धार्मिक आदान-प्रदान के नमूने के तौर पर मिल जाती है.

 

चूक, संकट और विश्वास

बहरहाल, प्रस्तावना जैसे दो अध्यायों के बाद चार अध्यायों में सत्यनारायण व्रत कथा की चार कहानियाँ आती हैं.

पहली कहानी, यानी अध्याय 3 में.
काशी का एक बहुत गरीब ब्राह्मण भीख मांगकर गुजारा करता था. नारायण ने उसपर कृपा की और भेस बदलकर उसे सत्यनारायण व्रत की शिक्षा दी. ब्राह्मण ने पूरी श्रद्धा से व्रत किया तो अचानक उसे धन की प्राप्ति हुई, उसका परिवार समृद्ध हो गया और उसकी जिंदगी पटरी पर आ गई.

दूसरी कहानी, अध्याय 4 में
एक गरीब लकड़हारा ब्राह्मण के जीवन में आए इस चमत्कारिक बदलाव को देखता है और स्वयं भी यह व्रत करने का संकल्प लेता है. उसी दिन उसको बहुत अच्छी लकड़ियाँ मिलती हैं, एक खरीदार उससे मुंह मांगी कीमत पर लकड़ियाँ खरीद लेता है और उसका सौभाग्य लौट आता है. इस बदलाव के बावजूद लकड़हारा विनम्र बना रहता है. वह व्रत का अपना संकल्प पूरा करता है और आगे भी अपनी जुबान पर खरा उतरता है.

जैसा ऊपर कहा जा चुका है, अगली दो कहानियाँ इतनी सरल नहीं हैं. उनमें बहुत उतार-चढ़ाव मौजूद है.

तीसरी कहानी, पांचवें अध्याय में
साधू नाम के बनिये (साधु वणिक) और उसकी पत्नी लीलावती की है. यह दंपति पैसे-रुपये से संपन्न है लेकिन निस्संतान होने के कारण समृद्धि का आनंद नहीं ले पाता. यह कहानी स्वतंत्र है, पहली दोनों कहानियों जैसी निरंतरता इसमें नहीं है. घटनाओं की शुरुआत भी यहाँ नारद से होती है, सीधे नारायण से नहीं.

नारद इस दंपति को सत्यनारायण व्रत के बारे में बताते हैं, जिसके संकल्प भर से उन्हें लीलावती नाम की बेटी का सुख प्राप्त हो जाता है. लेकिन व्रत का काम वे दोनों आगे के लिए टालते जाते हैं और साधू बनिया अपनी पत्नी से यह कर्मकांड बेटी के ब्याह के बाद ही संपन्न करने की बात कहता है. उसकी शादी हो जाती है, फिर भी व्रत की याद उन्हें नहीं आती. गनीमत एक ही है कि कलावती सत्यनारायण की पूजा बराबर करती है.

एक बार साधु वणिक अपने दामाद के साथ जहाज लेकर व्यापार पर निकला हुआ है, वहाँ परदेस में खूब कमाई करता है, लेकिन लौटानी में काफी सारे माल से लदा जहाज डूब जाता है. इतना ही नहीं, दोनों पर डकैती का आरोप लगता है और वे बंदी बना लिए जाते हैं. तबाही से पहले किसी और प्रकरण में एक सामान्य व्यक्ति के वेष में आए सत्यनारायण के पूछने पर वह जहाज में ‘लता-पत्र’ होने की बात कहता है, लेकिन किस्से की वह शाखा अभी मुझे याद नहीं आ रही. क्या यह दंड उसे झूठ बोलने के लिए मिला है? नहीं. व्रत का संकल्प पूरा न करने के लिए.

इस सारे विध्वंस की सूचना पाकर कलावती अपनी मां को व्रत की याद दिलाती है, जो अपने पति की ओर से इसे संपन्न करती है और संकल्प लेती है कि सत्यनारायण को दिया गया अपना वचन वह कभी नहीं तोड़ेगी. नतीजा यह कि जेल में पड़े ससुर-दामाद छूट जाते हैं, उनके नुकसान की भरपाई राजा स्वयं करता है, और इस परिवार का जहाज हंसी-खुशी के माहौल में दनदनाता हुआ अनजाने रास्तों पर भी हमेशा-हमेशा के लिए फिरने लगता है. आगे हम इस बारे में बात करेंगे कि इस किस्से ने ही कैसे पूरब के हिंदू-मुसलमान मछुआरों, नाविकों और जहाजी व्यापार से जीविका निकालने वाले सभी समुदायों में सत्यनारायण व्रत कथा को कितने जबर्दस्त ढंग से लोकप्रिय बना दिया.

चौथी कहानी, छठे अध्याय में
तुंगध्वज नाम के राजा की है, जो एक दिन चरवाहों को सत्यनारायण की पूजा करते हुए देखता है. वे उसे पूजा में शामिल होने के लिए कहते हैं लेकिन अपने घमंड में वह इस व्रत की अनदेखी कर देता है. नतीजा यह कि उसके राज्य पर किसी और का कब्जा हो जाता है, उसकी सारी संपत्ति लुट जाती है और वह चिरंतन अशांति में डूब जाता है. फिर एक दिन उसे अपनी गलती का एहसास होता है. पूरी गंभीरता के साथ वह सत्यनारायण का व्रत रखता है और कुछ-कुछ संयोगों से उसके शत्रुओं को अपने पांव पीछे खींचने पड़ते हैं, उसका राज-पाट उसे फिर से हासिल हो जाता है और वह एक विनम्र, बुद्धिमान राजा की प्रतिष्ठा प्राप्त करता है.

सातवें अध्याय में नारायण नारद को अपना निष्कर्ष बताते हैं कि जो भी व्यक्ति यह व्रत करेगा और इसकी कथा सुनेगा, उसे इहलोक में समृद्धि प्राप्त होगी और मृत्यु के बाद सीधा मोक्ष मिलेगा. नारद इस कथा का प्रसार देवताओं, साधु-संतों और मनुष्यों में करते हैं और सूत नैमिषारण्य में ऋषियों को इससे अवगत कराते हैं. मेरे गांव में लोग कहते थे, ये कहानियाँ तो सत्यनारायण व्रत कथा का महात्म्य बताने वाली हुईं, उन्हें तो वह मूल कथा सुननी है जो नारायण ने नारद को सुनाई थी. ऐसी कोई कथा शायद थी नहीं. व्रत, उससे जुड़े टोटके और प्रसाद ही सब कुछ था.

 

 

कहाँ से आई व्रत की कथा

सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय के अंत में शंख बजने से पहले पुरोहित की तरफ से एक छोटा सा वक्तव्य आता है- ‘इति श्रीस्कंदपुराणे रेवाखंडे श्रीनारायणेन नारदाय कथितं सत्यनारायणव्रतकथानां पंचमो (या ‘द्वितीयो’, ‘चतुर्थो’) अध्यायः’. (स्कंदपुराण के रेवाखंड में श्रीनारायण द्वारा नारद के लिए कही गई सत्यनारायण व्रतकथा का अमुक अध्याय पूरा हुआ.) इससे पता चलता है कि यह कथा स्कंदपुराण के रेवाखंड में है. पूरी कथा के दौरान सात बार दोहराया जाने वाला यह वाक्य पोथी में लिखा हुआ है और शंखध्वनि से जुड़कर ज्यादा चटख भी हो जाता है.

ज्यादातर पुराणों को लेकर इतिहासकारों की राय उन्हें चौथी-पांचवीं सदी ईस्वी की रचना मानने की रही है. इसके बहुत सारे अपवाद हैं लेकिन अठारह मुख्य पुराणों के साथ मामला ऐसा ही है. बहरहाल, सत्यनारायण व्रतकथा की भाषा और कहन से इसकी सामग्री इतनी पुरानी होने की गंध तक नहीं आती. इस बारे में कुछ शुरुआती पड़ताल मैंने की तो पता चला, स्कंदपुराण की धुरी भले ही चौथी-पांचवीं सदी में तैयार हो गई लेकिन इसमें नई-नई सामग्री जुड़ते जाने और पुराने पाठ में भी थोड़े-बहुत बदलाव होते रहने की प्रक्रिया सोलहवीं सदी ईस्वी तक जारी रही!

ताड़पत्रों पर लिखी स्कंदपुराण की सबसे पुरानी पांडुलिपि काठमांडू में स्थित रॉयल नेपाल लायब्रेरी में मिली है और उसका लेखन समय 810 ईस्वी आंका गया है. लेकिन इसको किसी अधिक पुरानी प्रति से उतारा गया है, यह बात खुद इस पांडुलिपि में ही दर्ज है. ग्रंथ के कुछ ब्यौरों और भाषिक विन्यास के आधार पर इसका रचना समय चौथी-पांचवीं सदी ईस्वी निर्धारित किया गया है. बहरहाल, इस ग्रंथ की और भी पांडुलिपियाँ काठमांडू की उसी लायब्रेरी में मौजूद हैं और सत्यनारायण व्रत कथा तो दूर, पूरा रेवाखंड ही दसवीं सदी तक की पांडुलिपि में नदारद है, जिसमें इस कथा के होने की बात बार-बार आती है. चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले थोड़ी खोजबीन इस रेवाखंड की.

रेवा नर्मदा नदी का ही एक नाम है. रेवाखंड यानी स्कंदपुराण का वह हिस्सा जो या तो नर्मदा नदी के इर्दगिर्द लिखा गया, या जिसमें इस नदी के किनारे या इसके आसपास पड़ने वाले स्थानों का महात्म्य बताया गया है. ऐसी जगहें इस खंड में कई सारी हैं. नैमिषारण्य इस सूची में शायद न शामिल हो लेकिन अमरकंटक, मांधाता (ओंकारेश्वर), नर्मदा-वन, माहिष्मती (महेश्वर), दक्षिण गोवर्धन और भरुकच्छ (भरूच या भड़ौंच) जैसी जगहों का जिक्र इसमें हैं.

16वीं सदी से थोड़े-थोड़े बदलाव के साथ स्कंद पुराण के जो चार स्वरूप मिलते हैं- मालवा और मध्य भारत का, गुजरात-राजस्थान का, गंगा घाटी का और पूर्वी इलाकों का- उनमें रेवाखंड का सबसे बृहत रूप पहले वाले में ही मिलता है. पुराण के इन क्षेत्रीय स्वरूपों का निर्धारण वहाँ मिली पांडुलिपियों और उनमें दिखने वाले छोटे-मोटे बदलावों के आधार पर किया गया. इससे पता चलता है कि मिथिला और उसके पूरब वाले स्वरूप सबसे बाद के हैं.

स्कंद पुराण की 11वीं सदी ईस्वी में उतारी हुई पांडुलिपियों में नर्मदा से जुड़े तीर्थों का जिक्र मिलने लगता है और 12वीं सदी ईस्वी से पुराण के एक हिस्से की तरह रेवाखंड के दर्शन होने लगते हैं. लेकिन सत्यनारायण व्रत कथा 14वीं सदी तक वहाँ भी नदारद है. ध्यान रहे, स्कंद पुराण के केंद्र में कार्तिकेय हैं और इसकी गिनती शैव ग्रंथों के दायरे में ही होती रही है. ऐसे में नारायण (विष्णु) से जुड़ी किसी कथा का इसमें जगह बनाना उतना सहज नहीं है.

15वीं सदी में उतारी गई स्कंद पुराण की एक पांडुलिपि में सत्यनारायण व्रत कथा पहली बार मिलती है और वहाँ इसके आराध्य देव का स्वरूप विष्णु और शिव दोनों का आभास देता हुआ कुछ धुंधला सा है. इसका स्वरूप स्थिर होता है 16वीं सदी ईस्वी से, और कमाल की बात यह कि शेख फैजुल्ला की बांग्ला रचना ‘सत्यपीर काव्य’ का समय भी 1545 से 1575 के बीच का ही है. इस आधार पर कुछ लोग ‘सत्यनारायण’ को ‘सत्यपीर’ का ही हिंदू कृत रूप कहते रहे हैं, लेकिन सत्यनारायण व्रतकथा का भूगोल बड़ा है और स्कंद पुराण में उसकी उपस्थिति भी पहले से है.

यहाँ कुछ शोधकर्मियों का उल्लेख कर देना जरूरी लग रहा है. इस स्वीकारोक्ति के साथ कि इन सभी के लिखे मूलग्रंथों से नहीं, ऑनलाइन शोधपत्रों में बतौर संदर्भ आने वाले इनके उल्लेखों से ही मेरा परिचय हो सका है. किसी-किसी के बारे में थोड़ी ज्यादा जानकारी मिल गई, बाकियों की नहीं मिल पाई. सबसे पहले एफ. ई. पार्जिटर, पिछली सदी की पहली चौथाई में चर्चित हुए ब्रिटिश अधिकारी और न्यायाधीश, जिन्होंने अपनी किताब ‘द पुराण टेक्स् ट ऑफ द डायनेस्टीज ऑफ द कलि एज’ में पहली बार पुराणों के ऐतिहासिक अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति दी.

फिर हाँस बैकर और पीटर बिसचॉप, दो जर्मन पुरातत्वविद, जिन्होंने स्कंद पुराण में एक हजार साल तक आए बदलावों पर बिल्कुल ठोस काम किया. नेपाली पांडुलिपियों पर शोध के लिए प्रो. हारुनागा इसाक्सन याद किए जाते हैं, हालांकि उनकी ख्याति शाक्त परंपराओं और वज्रयान के अध्ययन के लिए ज्यादा है. और साथ में जापानी विदुषी युको योकोची, जिन्होंने स्कंद पुराण के अलग-अलग खंडों पर काम किया और इतिहास में उनकी जगह तय की.

सत्य पीर और सत्यनारायण के अंतर्संबंध पर बांग्लादेशी इतिहासकार अब्दुल करीम की संबंधित लिखाई का एक हिस्सा आप पढ़ने वाले हैं. प्रवृत्तिगत बातें मुख्यतः लोककथाओं के अध्येता, ‘बांग्ला पौराणिक साहित्य’ नामक ग्रंथ के लिए प्रसिद्ध बंगाली लेखक सुकुमार सेन के शोधपत्रों और वरिष्ठ पाकिस्तानी-अमेरिकी शोधकर्मी आयशा जलाल के निबंध संग्रह ‘सूफीज़ ऑफ साउथ एशिया’ पर आधारित हैं. आगे भी इन स्रोतों का उपयोग खुले हाथों किया जाएगा.

प्रतिष्ठित प्रकाशन मोतीलाल बनारसीदास के संपादक जे. एल. शास्त्री को स्कंद पुराण का अखिल भारतीय स्वरूप निर्धारित करने का श्रेय जाता है. उन्होंने इसकी पांडुलिपियों में मौजूद क्षेत्रीय भिन्नताएं देखीं और उन्हें दूर किया. ग्रंथ का क्रिटिकल एडिशन यह नहीं है तो गुजरात के आसपास मिलने वाले इसके स्वरूपों में मौजूद सत्यनारायण व्रतकथा में वहाँ की कुछ विशिष्ट जातियों और जगहों का जो जिक्र मिलता है, उसकी उम्मीद यहाँ नहीं की जा सकती. इस देसी गंध के बिना कथा के आम इंसानी पात्र ब्राह्मण, लकड़हारा, बनिया और राजा कुछ ज्यादा ही इकहरे हो जाते हैं. ‘अखिल भारतीय’ तो वे हैं लेकिन कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की स्क्रिप्ट में.

 

 

सत्य पीर की जगह

बांग्लादेश के प्रतिष्ठित इतिहासकार, ‘सोशल हिस्ट्री ऑफ द मुस्लिम्स इन बंगाल’ के लेखक प्रो. अब्दुल करीम ने बंगाल, ओडिशा और असम के एक इलाके में पांच सौ साल लगातार पूजे गए सत्य पीर का जो संक्षिप्त परिचय दिया है, उसकी सामग्री को और छोटी करके अपनी भाषिक सीमाओं के साथ मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूं. मेरे ख्याल से, इसे लिखने की प्रेरणा भी उन्हें बांग्ला मुक्ति आंदोलन के माहौल से ही मिली होगी. वरना, जैसा वह बता रहे हैं, बीसवीं सदी के बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण तेज होने के साथ ही इस प्रथा का दम निकल गया था. साझा हिंदू-मुस्लिम परंपरा की तरह सबसे देर तक यह ओडिशा में बनी रही लेकिन इस बारे में वहाँ लिखा कम गया है. संयोग कहें कि ‘सत्य पीर’ की समानांतरता का सूत्र भी मुझे हरियाणा के एक वरिष्ठ उड़िया प्रशासनिक अधिकारी से ही मिला था.

बंगाल के सूफी चरित्रों पर केंद्रित निबंधों की एक श्रृंखला में प्रो. करीम सत्य पीर के बारे में लिखते हैं-

‘सत्य पीर उन लोकप्रिय मान्यताओं और प्रथाओं में से एक हैं जो मुसलमानों के अन्य धर्मावलंबियों के साथ लंबे जुड़ाव और संभवतः धर्मांतरित लोगों की बढ़ती संख्या के कारण इस्लाम के आम दायरे में शामिल हो गईं. हिंदू लेखकों ने पीर शब्द को नारायण में बदल दिया, हालांकि मुसलमानों के सत्य-पीर और हिंदूओं के सत्य-नारायण में शायद ही कोई अंतर रहा हो. सत्य-पीर की पूजा बीसवीं सदी की शुरुआत में भी, खासकर बंगाल के उत्तरी और पश्चिमी भागों में की जाती थी. लकड़ी के एक पीढ़े को सत्य पीर का आसन बनाया जाता था और मिठाई, दूध, चीनी, पान, सुपारी वगैरह उनको चढ़ाए जाते थे.

‘दो किस्से सत्य पीर के बारे में प्रमुखता से कहे जाते हैं. पहले किस्से के मुताबिक हिंदू भगवान श्रीहरि एक फकीर के वेश में एक गरीब ब्राह्मण के सामने प्रकट होते हैं और उसे सत्यनारायण को प्रसाद चढ़ाने का आदेश देते हैं. ब्राह्मण आदेश का पालन करता है और धनवान बन जाता है. दूसरी परंपरा के अनुसार, सत्यनारायण के आशीर्वाद से एक व्यापारी को बेटी होती है. लड़की बड़ी हो गई तो उसका विवाह कर दिया गया और व्यापारी अपने दामाद को साथ लेकर एक कारोबारी सफर पर निकल पड़ा.

‘वहाँ सत्य-पीर की पूजा न करने के कारण व्यापारी मुसीबत में पड़ गया. लेकिन व्यापारी की पत्नी सत्य-पीर की मुरीद थी, इसलिए वह मुसीबत से बच गया. जब व्यापारी अपने दामाद के साथ लौट रहा था तो उनका जहाज तूफान में फंस गया. व्यापारी की बेटी ने अपने पति को देखने की हड़बड़ी में सत्य-पीर के प्रसाद की उपेक्षा कर दी. बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और इस तरह उसका पति और पिता तबाह-बर्बाद होने से बच गए.

‘इस तरह, सत्य-पीर (या सत्य-नारायण) से जुड़े साहित्य ने लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल की. इस लेखन का मुख्य उद्देश्य सत्य-पीर का महिमामंडन करना था. सत्य-पीर पर पहली पुस्तक, जिसका नाम ‘सत्य-पीर काव्य’ है, उसके लेखक शेख फैजुल्ला माने जाते हैं. यह पुस्तक 1545 से 1575 ईस्वी के बीच लिखी गई थी. कुछ विद्वानों का मानना है कि सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह (बंगाल सल्तनत, 1494 से 1519 ईस्वी) सत्य-पीर आंदोलन के प्रवर्तक थे, लेकिन इस नजरिये को सही साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है.

‘साहित्य, पूजा पद्धति और परंपराओं की गहन जांच से पता चलता है कि सत्य-पीर (या सत्य-नारायण) की पूजा स्थानीय देवियों मनसा या चंडी की पूजा के लगभग समान थी. सत्य-पीर का प्रतिनिधित्व किसी देवता की मूर्ति नहीं लकड़ी का एक साधारण तख्ता ही करता था. सत्य पीर के उपासक आम तौर पर गरीब तबके के लोग होते थे और उनके चढ़ावे भी साधारण ही होते थे. सत्य पीर की अवधारणा में मुस्लिम और हिंदू दोनों तत्व मौजूद थे और निश्चय के साथ यह कहा जा सकता है कि सत्य-पीर (सत्य-नारायण) अवधारणा की उत्पत्ति पीर की मुस्लिम धारणा और स्थानीय देवताओं की हिंदू धारणा के सम्मिश्रण से हुई.

‘इसको पीरों में आस्था वाली पुरानी मुस्लिम समझ का ही एक स्थानीय रूपांतर कहा जा सकता है. बंगाल के स्थानीय लोगों ने जब इस्लाम को अपनाया तो उन्होंने इसमें पहले से चली आ रही पीरवाद की अवधारणा को अपने देवताओं की अलौकिक शक्ति वाली पुरानी अवधारणा के साथ मिला दिया. इस प्रक्रिया का विकास आगे इस रूप में हुआ कि पीर को खुद ही एक अलौकिक शक्ति की तरह देखा जाने लगा.’

‘सोशल हिस्ट्री ऑफ द मुस्लिम्स इन बंगाल’ (चटगांव से प्रकाशित दूसरा संस्करण, 1985)

पहले ही पैरा में प्रो. अब्दुल करीम कहते हैं कि ‘हिंदू लेखकों ने पीर शब्द को नारायण में बदल दिया’. यह एक विवादास्पद बयान है. शेख फैजुल्ला की किताब ‘सत्य-पीर काव्य’ सोलहवीं सदी ईस्वी के मध्य की है, जबकि सत्यनारायण व्रतकथा पंद्रहवीं सदी में उतारी गई स्कंदपुराण की पांडुलिपियों में भी मिल जाती है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि दोनों लिखावटों में समय का ज्यादा अंतर नहीं है और बिल्कुल संभव है कि जनता में लोकप्रिय एक ही चरित्र की कहानियाँ अलग-अलग रूपों में दोनों जगह पहुंची हों.

यहाँ एक और दिलचस्प अध्ययन के निष्कर्षों को रेखांकित करना जरूरी है. स्कंदपुराण में रेवाखंड सबसे पहले भले ही मालवा क्षेत्र में जुड़ा हो और एक तीर्थ के रूप में भरूच का उसमें शामिल होना गुजरात को इस खंड के लिए आंगिक जुड़ाव का स्थल बनाता हो, लेकिन रेवाखंड में सत्यनारायण व्रतकथा के भी शामिल होने वाली बात सबसे पहले पूरब में मिली स्कंदपुराण की पांडुलिपियों में दिखाई पड़ती है और गुजरात में मिली पांडुलिपियों में इसके दर्शन सबसे बाद में होते हैं. इसी तरह सत्यनारायण व्रतकथा का चलन उत्तरी कर्नाटक और दक्षिणी महाराष्ट्र में ही सबसे बाद में दिखाई पड़ता है, जबकि गुजरात और उत्तरी महाराष्ट्र में भी यह इनसे थोड़ा ही पहले आती है.

यह निष्कर्ष प्रतिष्ठित इंडोलॉजिस्ट आर. एन. दांडेकर के निबंध ‘नोट्स ऑन द लेट मेडाइवल कंपाइलेशन ऑफ रेवाखंड’ पर आधारित है और इससे एक बात पक्की हो जाती है कि स्कंदपुराण और उसमें भी रेवाखंड के अखिल भारतीय विकासों से परे, सत्यनारायण व्रतकथा के इसमें शामिल होने की जगह बंगाल ही है.

 

 

समाज मंथन से निकली कथा

कुछ ऐतिहासिक वजहों से बंगाल में बहुत बड़े पैमाने का धर्मांतरण बहुत कम समय में हो गया था. इन वजहों पर और इससे जुड़ी जटिलताओं पर भी कुछ बातें हम आगे करेंगे. अभी तो इतना ही कि चमत्कारिक ख्याति वाले किसी व्यक्ति की गाथाएं पीर और नारायण के द्वैत में शायद देर तक झूलती रह गईं और वहाँ से उठकर एक पुराण का हिस्सा बन गईं. शुरुआत जहाँ से भी हुई हो, सत्यनारायण या सत्यपीर, लेकिन वादा करके मुकर जाने वाले किसी बड़े सौदागर या राजा को उलटा टांग देना नई बात लगती है. इसकी जड़ें लोक में ही हो सकती हैं, भद्रलोक में नहीं.

अब उपसंहार के रूप में हम उन ऐतिहासिक कारणों पर बात करते हैं, जिनका जिक्र ऊपर वाले पैराग्राफ के शुरू में आया है. भारत के समूचे भूगोल में बंगाल और ओडिशा की खासियत यह है कि बौद्ध धर्म बाकी जगहों की तुलना में यहाँ ज्यादा देर तक रह गया. निश्चय ही इसका स्वरूप वैसा नहीं था जैसा हम त्रिपिटक में पढ़ते हैं या जो श्रीलंकाई, बर्मी और थाई भिक्षुओं के प्रभाव में अभी नवबौद्धों के जीवन-व्यवहार में दिखाई पड़ता है.

अनुमान है कि यह अभी के नेपाली बौद्ध धर्म के करीब रहा होगा. इस इलाके की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का था न जाने कितनी पीढ़ियों से, शायद हमेशा से ही खुद को बौद्ध मानते आ रहे थे. चार वर्णों और मधुमक्खी के छत्ते जैसी ढेरों जातियों की स्थिति वहाँ क्या थी, इसका पता अबतक नहीं लगाया जा सका है, लेकिन पालवंश की शुरुआत गोपाल नाम के जिस राजा से हुई थी उसका संंबंध सत्ता पर दावे वाले किसी जाति या वंश से नहीं था.

जो भी हो, लगभग समूचे पूर्वी भारत पर राज करने वाले बौद्ध राजवंशों- पालवंश (मगध और बंगाल, 750-1120 ई.), चंद्रवंश (बर्मा से उड़ीसा तक के समुद्रतटीय इलाके, 900-1050 ई.) और भौमकार वंश (लगभग पूरा ओडिशा, 736-949 ई.) अपनी समाज व्यवस्था को बाकी भारत की तुलना में थोड़ा अलग ढंग से चला रहे थे. इस पूरे इलाके पर पहले धीरे-धीरे, फिर एक झटके में चोल और सेन राजवंशों का कब्जा हुआ तो यह सिर्फ सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने का भी मामला बन गया. कन्नौज पर कब्जे को लेकर चले दो सौ साल लंबे त्रिपक्षीय युद्ध में बौद्ध केंद्रों को नष्ट करने और उनपर कब्जा करने की मुहिम बड़े भूगोल में चली लेकिन मगध, बंगाल और ओडिशा में इसका अंत कुछ ज्यादा ही भयानक हुआ. भारत में बौद्ध धर्म के विलोप को बख्तियार खिलजी द्वारा चार महाविहारों के विध्वंस से जोड़कर देखने की ही परंपरा चल पड़ी है. अपनी किताब ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ में मैंने इतिहास के कुछ अन्य पहलुओं की खोजबीन की है, जिनसे तस्वीर कुछ अलग बनती है. लेकिन यहाँ उन बातों को दोहराने के बजाय मैं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किताब ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ से एक लंबा उद्धरण देना चाहूंगा.

“ग्यारहवीं सदी के बाद निबंध-ग्रंथों की परंपरा बढ़ने लगी. धर्मशास्त्रीय वचनों की छानबीन करके लोकजीवन के लिए व्यवहार के लिए उपयोगी विधियों की व्यवस्था देना निबंध-ग्रंथों का कार्य है. कौन सा व्रत या उपवास कब करना चाहिए, किसे करना चाहिए, किसे नहीं करना चाहिए, विवाहादि अनुष्ठानों की छोटी-मोटी से लेकर बड़ी-बड़ी विधियों का निर्देश, उनके अधिकारी या अनधिकारी का निर्णय आदि लोकजीवन से संबद्ध छोटी-मोटी सैकड़ों बातों का विचार, विश्लेषण और व्यवस्थापन इन ग्रंथों में किया गया है. … हिंदूओं में धर्म-परिवर्तन कराने की कोई प्रथा नहीं थी, पर इतिहास से ऐसी सैकड़ों प्रकार की जातियाँ खोज निकाली जा सकती हैं, जो समूह रूप में एक ही साथ ब्राह्मण-धर्म में शामिल हो गई थीं.

यह एक प्रकार से सामूहिक धर्म-परिवर्तन ही होता था. तो जो बात मैं कहने जा रहा था, वह यह है कि बौद्ध धर्म के लोप होने के बाद ऐसी बहुत सी जातियाँ ब्राह्मण-धर्म के अंदर आ गई थीं. इन जातियों के आने के कारण बहुत से व्रत, पूजा, पार्वण आदि इस धर्म में आ घुसे, जिनकी प्राचीन ग्रंथों में कोई व्यवस्था नहीं थी.… इन जातियों और इनकी समस्त आचार-परंपरा को धीरे-धीरे इन टीकाओं तथा ऋषियों के नाम पर लिखे गए नए-नए स्मृति और पुराण ग्रंथों में अंतर्भुक्त किया गया.”

(हिंदी साहित्य की भूमिका, पृ. 23-24)

द्विवेदी जी यहाँ हिंदू धर्म में कराए गए बौद्ध जातियों के धर्म-परिवर्तन के बारे में बता रहे हैं और नए ग्रंथों के निर्माण की उस प्रक्रिया की ओर भी संकेत कर रहे हैं, जिसके तहत स्कंदपुराण में रेवाखंड जुड़ने और उसमें ‘सत्यनारायण व्रतकथा’ को शामिल किए जाने की स्थितियाँ तैयार हुई होंगी. यह निबंध-ग्रंथ नहीं है और इसका संबंध ग्यारहवीं की बजाय पंद्रहवीं सदी से है, लेकिन धर्म में किसी नए समुदाय को, उसके आस्था तत्व को समाहित करते हुए उसके लिए एक शास्त्रसम्मत पूजा पद्धति पेश करने की छाया इसमें दिखती है.

बहरहाल, यहाँ मामला और भी ज्यादा उलझा हुआ है. खासकर बंगाल में तो सौ-डेढ़ सौ साल के अंदर, यानी छह से आठ पीढ़ियों के अंदर बहुत बड़ी आबादी को दो धर्म-परिवर्तनों से गुजरना पड़ा. पहले उन्हें बौद्ध से हिंदू बनाया गया, जहाँ सामाजिक व्यवस्था में कोई ऊंची जगह उन्हें शायद ही मिल पाई हो. फिर अपने आस्था केंद्रों के विध्वंस, उनपर कब्जे और समाज के निचले पायदानों पर धकेल दिए जाने की खुन्नस पाले हुए वे लोग मुसलमान बने और कुछ समुदाय ऐसे भी रहे जो दोनों धर्मों के बीच आवाजाही करते रहे.

लालबेगी, यानी नाम से हिंदू और प्रथाओं में मुसलमान. या फिर संगीतकार अलाउद्दीन खां जैसे लोग, जिनके वंश में स्त्रियों के लिए हिंदू नाम ही चुने जाते रहे.

इस खुन्नस की एक शक्ल रमाई पंडित द्वारा रचे गए ग्रंथ ‘शून्य पुराण’ के एक पद में देखी जा सकती है, जिसे यहाँ रामधारी सिंह दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ से उद्धृत किया गया है. रमाई पंडित के समय को कुछ इतिहासकार ग्यारहवीं सदी तो कुछ तेरहवीं सदी बताते हैं. शून्य पुराण के केंद्र में बंगाल के एक लोक देवता ‘धर्म देवता’ हैं. वहाँ के पिछड़ा-दलित टोलों के बाहर पकी मिट्टी के घोड़े पर मिट्टी की ही बनी उनकी मूर्ति दिखाई पड़ती है. इस धर्म में बौद्ध धर्म का ‘सहज’ और ‘शून्य’ है तो नाथपंथ का ‘अलख निरंजन’ भी है.

इस ग्रंथ के ‘निरंजनेर रुस्म’ (निरंजन का क्रोध) अध्याय में यह पद आया है, जहाँ धर्म-परिवर्तन एक उल्लासपूर्ण गतिविधि जैसा दिखाई देता है. हालांकि न इस धर्माचार्य, न ही उसके अनुयायियों ने कभी इस्लाम की राह पकड़ी-

‘यतेक देवतागण सभै हल्ये एकमत आनंदेते परिलो इजार
ब्रह्मा हइलो महामद विष्णु हइलो पैगंबर आदम हइलो शूलपाणि
गणेश हइलो गाजी कार्तिक हइलो काजी फकीर हइलो यति मुनि
तेजिया आपन भेक नारद हइलो सेख पुरंदर हइलो मल्लना
चंद्र सूर्य आदि देवे पदातिक हइया सेबे, सेबे मिलि बाजाय बाजना
आपुन चंडिका देवी तेहु हैला हाया बीबी पद्मावती हली बीबी नूर
यतेक देवतागण हय्ये सबे एकमत प्रवेश कोरल जाजपूर.’

(हिंदी अनुवाद- जितने भी देवता हैं, सभी ने एकमत होकर आनंद से पाजामा पहन लिया. (पाजामा तबतक मुसलमानी वेश ही माना जाता था.) ब्रह्मा हुए मुहम्मद, विष्णु हुए पैगंबर, शंकर हुए आदम. गणेश गाजी, कार्तिक काजी और ऋषि-मुनि फकीर हो गए. नारद अपना वेश छोड़कर शेख बन गए और इंद्र मौलाना हो गए. चंद्र-सूर्य आदि पैदल चल पड़े और सब मिलकर बाजा बजाने लगे. स्वयं चंडिका देवी हाया बीबी और पद्मावती नूर बीबी बन गईं. जितने भी देवता हैं, सारे एकमत होकर (मंदिरों के शहर) जाजपुर में प्रवेश कर गए.)

इस पूरी बतकही से एक ही बात निकलती है कि ‘सत्यनारायण व्रतकथा’ का ठिकाना भले ही ‘स्कंदपुराणे रेवाखंडे’ नाम की जगह में सुरक्षित हो, लेकिन वह इतिहास और भूगोल की एक कठिन घर्षण प्रक्रिया की उपज है. उसके पौराणिक साहित्य का अंग बनने का संदर्भ ‘बंगाल सल्तनत’ से जुड़ा हुआ है, जब दो धर्म-परिवर्तनों की अग्निरेखा पार करके आए आम लोग एक स्थिर और नगण्य सांप्रदायिक नजरिये वाली शासन-व्यवस्था का आनंद ले रहे थे. संभवतः यह चैतन्य महाप्रभु का समय था और एक चमत्कारिक शक्ति नारायण और पीर, दोनों ही शक्लों में पूजी जा रही थी.

सत्यनारायण व्रतकथा अभी सात समुंदर पार जा रही है लेकिन वह सहजता भारतभूमि से विदा हो चुकी है.

 

चंद्रभूषण
(
जन्म: 18 मई 1964)

‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ (यात्रा-राजनय-इतिहास) और ‘पच्छूं का घर’ (संस्मरणात्मक उपन्यास) से पहले दो कविता संग्रह ‘इतनी रात गए’ और ‘आता रहूँगा तुम्हारे पास’ प्रकाशित. इक्कीसवीं सदी में विज्ञान का ढांचा निर्धारित करने वाली खोजों पर केंद्रित किताब ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियाँ’, पर्यावरण चिंताओं को संबोधित किताब ‘कैसे जाएगा धरती का बुखार’, भारत से बौद्ध धर्म की विदाई से जुड़ी ऐतिहासिक जटिलताओं को लेकर ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ आदि  पुस्तकें प्रकाशित.patrakarcb@gmail.com

Tags: 20252025 शोधचंद्रभूषणसत्यनारायण व्रतकथा
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Comments 7

  1. PIYUSH KUMAR says:
    2 months ago

    ज्ञात और प्रचलित कथा पर विस्तृत, शोधपूर्ण और रोचक लेख। नये विषयों पर नई आलोचना दृष्टि के विकास को ‘समालोचन’ संग्रहित कर रहा है। यह दृष्टि अकादमिक शोधकर्ता और विश्विद्यालय लगभग खो चुके हैं। सुझाव है कि विषयों का वर्गीकरण करके इसे प्रिंट रूप में लाये जाने की भी योजना बनाई जाए। हम सहयोग के लिए प्रस्तुत हैं।

    Reply
  2. Chandra Bhushan pandeya says:
    2 months ago

    बहुत शानदार लेख है, अच्छी जानकारियां हैं। मैं इस विषय पर सोचता हूं तो मुझे लगता है कि दरअसल यह सत नारायण भगवान की पूजा है। कार्यों का कारणों में विलोप करते करते जो अंतिम कारण बचता है, जो किसी अन्य कारण का कार्य नहीं है, वही सत है, उसे माया कहो ब्रह्म कहो आत्मा कहो, उसी सत नारायण भगवान की यह पूजा है। पुरोहित जी लोग जो पूजा करा देते हैं और जो पूजा होनी चाहिए उसमें बहुत अंतर है। इस पूजा में पहले गणेश जी की, फिर वरुण देवता की सब नदियों, समुद्रों पर्वतों, वेदों, पुराणों, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि आदि देवताओं की, फिर नवग्रहों की, उनके अधि देवता, प्रत्यधिदेवता की, पांच लोकपालों की, दश दिक्पालों की और फिर अंत में सत नारायण भगवान की पूजा होती है। कथा भी पूजा का ही एक अंग है, स्त्रोत आदि भी पढ़ सकते हैं, क्योंकि यह एक लंबी बड़ी पूजा है और इसमें 46 देवताओं की पूजा होती है, इसलिए उसका चलताऊ रूप लोक में अपना लिया गया है। धार्मिक लोगों की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण पूजा होती है, इसे किसी भी एकादशी, पूर्णिमा, संक्रांति को करना चाहिए। यह बहुत प्रभावशाली पूजा होती है।

    Reply
  3. गोपाल कृष्ण रंजन says:
    2 months ago

    बहुत उम्दा लेख। सत्यनारायण और सत्य पीर व्रत की कथाओं के बारे में तथा संस्कृतियों के घर्षण कैसे हमारी सोच और हमारी मान्यताओं पर प्रभाव डालते हैं, इस बारे हमारी जानकारी को समृद्ध करने का बहुत शुक्रिया। आधुनिक समय में जब हम चीज़ों के सरलीकरण कर और निश्चित खांचों में डाल कर, फ़िर्क़े और समुदाय बनाकर अपनी संकुचित सोचों की कीचड़ में लोटते रहते हैं, ऐसे समय के लिए ऐसे लेख बहुत प्रासंगिक हैं। साधुवाद।🙏🏻

    Reply
  4. सुजीत कुमार सिंह says:
    2 months ago

    चन्द्रभूषण जी ने बहुत अच्छा लिखा है। इसे पढ़कर मुझे वासुदेव शरण अग्रवाल का 1930 में लिखा निबंध “सत्यनारायण व्रत कथा” की याद आ गयी। निबंध के आरम्भ में ही वे लिखते हैं :

    “हिंदू जाति में उत्पन्न होकर बच्चे से लेकर बूढ़े तक कोई भी व्यक्ति ऐसा न होगा, जिसने सत्यनारायण-व्रत-कथा न सुनी हो। घर-घर में इस कथा का प्रचार है। हर पर्व के समय ब्राह्मण को बुला-कर गृहस्थ लोग सत्यनारायण की कथा सुनते हैं। जब कोई संकट का समय पड़ता है या कोई गंभीर काम अटकता है, तो लोग संकल्प करते हैं कि अमुक काम के पूरा होने में जो सत्यनारायण हमारी सहायता करें, तो हम उनकी कथा करायेंगे। जब कोई मुकदमा लग जाता है, चट उभयपक्ष के लोग सत्यनारायण की कथा बोल लेते हैं। मुकदमे के लड़ने में यथाशक्ति झूठ-सच से काम लेकर भी जीतनेवाला पक्ष सत्यनारायण की व्रत-कथा सुनकर बंधु-बांधवों समेत आनंद मनाता है। दुःख है कि जैसे धर्म और सभ्यता के और दूसरे अंग रोग-ग्रस्त हुए पड़े हैं और समाज कराहकर किसी तरह उनसे अपना काम चला रहा है, उसी तरह सत्यनारायण की व्रत-कथा में जो महान् तत्व था, उसकी ओर हज़ार कथा सुननेवालों में से एक का भी ध्यान नहीं जाता और लोगों ने सत्य के साथ भी भाव-ताववाली बनियाऊ नीति बरत रक्खी है।”

    Reply
  5. nawal sharma says:
    2 months ago

    उत्पादन के साथ बाज़ार बढ़ा , लोगों का आपसी निभान बढ़ा , सत्ता के साथ धर्म की आवक जावक और मेलजोल का मुकाम भी बना ही । बाज़ार में ग्राहक , व्यापारी और उत्पादक का जोड़ है , यही जोड़ कथाओं और मान्यताओं के साथ समाज में स्वीकार्य होता रहता है । सत्ता से लाभ और संरक्षण पाने वाला ब्रह्मा मुहम्मद बन जाये चाहे मुहम्मद ब्रह्मा बन जायें स्वीकार्य एक सा ही होगा । सत्य पीर हो या सत्य नारायण , इसमें सत्य है निभान का भाव और पीर और नारायण है आम जन मन …..

    Reply
  6. Anonymous says:
    2 months ago

    बहुत ज़रूरी लेख

    Reply
  7. खुशबू सिंह says:
    1 month ago

    शोधपरक, जरूरी आलेख।

    Reply

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