| आधुनिक-पूर्व भारत में ‘राजनीति’ का विमर्श हिन्दी राजनीति और नीति-काव्यों में संप्रभुता, नीति-ज्ञान और राजनीतिक संस्कृति का रूपाकार रबि प्रकाश |
सामान्य विमर्श में, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में ‘राजनीति’ को अंग्रेज़ी के शब्द ‘पॉलिटिक्स’ का समानार्थी समझा जाता है. तात्त्विक स्तर पर दोनों शब्दों का संबंध ‘राज्य सत्ता’ के बरक्स सामूहिक जीवन के संगठन से है, और इस लिहाज़ से दोनों समानार्थी प्रतीत होते हैं. लेकिन सांस्कृतिक-ऐतिहासिक दृष्टि से ये दोनों शब्द राजनीतिक जीवन की दो भिन्न संकल्पनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन दोनों के अर्थ अपने-अपने संदर्भों की ऐतिहासिक घटनाओं से रू-ब-रू होते हुए परिवर्तनशील रहे हैं.
जहाँ एक ओर ‘पॉलिटिक्स’ यूरोप की दीर्घ राजनीतिक-ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और संदर्भों में नए-नए अर्थ आत्मसात करती रही है, वहीं ‘राजनीति’ की अवधारणात्मक यात्रा के बारे में भी कमोबेश यही कहा जा सकता है. भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक परिघटनाओं के बरक्स ‘राजनीति’ शब्द के अर्थों में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं.
हालाँकि ‘पॉलिटिक्स’ का अवधारणात्मक इतिहास (conceptual history) अपेक्षाकृत व्यवस्थित रूप में उपलब्ध है, जो यह दर्शाता है कि यह शब्द विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों में अलग-अलग अवधारणात्मक अर्थ ग्रहण करता रहा है.[1] ‘हिस्ट्री ऑफ आइडियाज़’, ‘इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री’ और ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थॉट’ जैसी इतिहास-लेखन की विधाओं में ‘पॉलिटिक्स’ शब्द को केंद्र में रखकर एक व्यवस्थित वैचारिक इतिहास लिखा गया है. इस इतिहास-लेखन से यह स्पष्ट होता है कि ‘पॉलिटिक्स’ के अर्थ यूरोप के राजनीतिक इतिहास में अंतर्निहित हैं.[2]
‘अवधारणाओं के इतिहास-लेखन’ की इन पश्चिमी पद्धतियों को ध्यान में रखते हुए कुछ इतिहासकारों ने भारतीय भाषाओं की अवधारणाओं के ऐतिहासिक विकास का भी क्रमबद्ध वृतांत और व्याख्या प्रस्तुत की है.[3] परंतु यह पहल अभी अपने शैशव-काल में है. इस दिशा में अनेक अवधारणाओं, विशेषकर राजनीतिक अवधारणाओं का एक व्यवस्थित इतिहास लिखा जाना अभी शेष है. गौरतलब है कि भारतीय भाषाओं की अवधारणाओं का इतिहास लिखने की अपनी विशिष्ट चुनौतियाँ हैं, जो पद्धति और प्रश्न— दोनों ही स्तरों पर आती हैं. बावजूद इसके, भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अवधारणात्मक इतिहास-लेखन की यह विधा निश्चय ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है.
अवधारणात्मक इतिहास-लेखन की दृष्टि में, राजनीतिक-संस्कृति की शब्दावली के अवधारणात्मक मायने स्थायी रूप से निर्धारित न होकर, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से निर्मित और पुनर्निर्मित होते रहते हैं.[4]
किसी भी अवधारणा के व्यापक अर्थों की उपलब्धता हमें सांस्कृतिक अनिवार्यवाद (cultural essentialism) और उसके प्रतिघाती प्रभावों के प्रति सावधान करती है. भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक समाज के लिए इतिहास-लेखन की यह विधा विशेष महत्व रखती है.
यूरोप की राजनीतिक-ऐतिहासिक घटनाओं से उपजी आधुनिकता की सैद्धांतिक सामाजिक-नैतिक जीवन की एक आदर्श परिकल्पना प्रस्तुत करती है. आधुनिकता की यह परिकल्पना अन्य संस्कृतियों के अपने राजनीतिक-ऐतिहासिक अनुभवों से उपजी नैतिक व सामाजिक जीवन की संकल्पनाओं पर अधिरोपण का आग्रह करती है. इसका एक उदाहरण हम राजनीतिक सत्ता की वैधता से संबंधित आधुनिक विमर्श में देख सकते हैं. इस विमर्श के अनुसार, आधुनिक राजसत्ता की वैधता की शर्त केवल सांस्थानिक प्रक्रियाओं का पालन मात्र है— जैसे कि संसदीय प्रणाली में नियमित निर्वाचन होना, या बहुमत से पारित होकर किसी प्रस्ताव का कानून का दर्जा प्राप्त कर लेना. यहाँ स्थापित प्रक्रियाओं का अनुगमन न केवल वांछनीय और तर्कसंगतता के अभिप्राय से है, बल्कि वह राजनीतिक आधुनिकता के मानक की संकल्पना का प्रतिनिधित्व भी करता है. राजनीतिक आधुनिकता के इस विमर्श में, राजनीतिक और नैतिक मूल्यों— जैसे सार्वभौम मानवीय मूल्य या मानव-प्रकृति के सह-अस्तित्व का विचार— संसदीय प्रणाली की तकनीकी प्रक्रियाओं के सामने गौण पड़ जाते हैं. यहाँ इन दोनों पहलुओं को कुछ विस्तार से समझना आवश्यक है.
राजनीतिक जीवन के अध्ययन के दो प्रमुख परिप्रेक्ष्य हैं. पहला वह है जिसमें राजनीतिक सत्ता-प्राप्ति (power) को ही अंतिम मूल्य माना गया है. राजनीति को ‘सत्ता के लिए संघर्ष की प्रक्रिया’ मानने वाले विचारकों की एक लंबी श्रृंखला मिलती है, जो इटालियन पुनर्जागरण (15वीं शताब्दी) से प्रारंभ होकर 20वीं शताब्दी तक फैली हुई है. इसमें निकोलो मैकियावेली (1469–1527 ई.) से लेकर मैक्स वेबर (1864–1920) और कार्ल श्मिट (1888–1985) सहित अनेक समकालीन विचारक सम्मिलित हैं. ये सभी राजनीति (पॉलिटिक्स) को राज्य-सत्ता के लिए संघर्ष के समानार्थी के रूप में देखते हैं.
इस विचार के अनुसार, राज्य-सत्ता की वैधता का प्रश्न केवल वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुपालन का प्रश्न है. इस दृष्टिकोण से राज्य-सत्ता का कोई निर्णय केवल इस आधार पर वैध या अवैध ठहरता है कि वह औपचारिक रूप से स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप है या नहीं. राजनीतिक सत्ता की वैधता केवल प्रक्रियाओं की शुचिता से संचालित मानी जाती है. सत्ता-संचालन की ये प्रक्रियाएँ वैधानिक संस्थानों के नियमों के पालन भर से संचालित होती हैं, जिनमें बहुसंख्यक मतों की निर्णायक भूमिका होती है. राजनीति का यह स्वरूप— जो वर्तमान समय में सबसे प्रभावी और सार्वभौमिक है — यूरोपीय आधुनिकता की संकल्पना का परिणाम है और आज यह दुनिया की अन्य राजनीतिक संस्कृतियों के लिए लगभग अनिवार्य प्रतिमान बन चुका है.
इसके बरक्स ‘राजनीति’ की एक दूसरी संकल्पना है, जो इस बात पर बल देती है कि राजनीतिक आदर्शों और प्रक्रियाओं का उद्देश्य केवल राज्य-सत्ता की प्राप्ति न होकर, एक समावेशी समाज और कल्याणकारी राज्य की रचना होना चाहिए. इस संकल्पना में राजनीतिक सत्ता की वैधता निर्णय-प्रक्रियाओं के औपचारिक पालन तक सीमित न रहकर, निर्णयों और नीतियों की विषयवस्तु की नैतिक गुणवत्ता से निर्धारित होती है. ऐसे निर्णय मानक और वांछनीय माने जाते हैं जो समाज की सेवा, बेहतरी और सार्वजनिक जीवन की उत्कृष्टता के प्रति समर्पित हों. इस संकल्पना में राजनीतिक-सामाजिक जीवन में नैतिकता और सदाचार जैसे मूल्य केंद्रीय स्थान रखते हैं. इसमें एक सम्पूर्ण, उत्कृष्ट और सामुदायिक जीवन की परिकल्पना अंतर्निहित है. हालाँकि, यह दृष्टिकोण मूल्यों की सापेक्षता और उनकी सार्वभौमिकता की सीमाओं से जुड़ी बहसों का विषय भी रहा है. इसके समक्ष कुछ मूलभूत प्रश्न उपस्थित होते हैं— जैसे कि सामूहिक जीवन के लिए मूल्य कौन तय करेगा और किस प्रक्रिया से तय होंगे?
यदि ‘राजनीति’ की पहली संकल्पना यूरोपीय आधुनिकता का परिचायक है, तो दूसरी संकल्पना विश्व की अनेक संस्कृतियों में पहले से मौजूद रही है. इसकी एक प्रभावशाली अभिव्यक्ति अरस्तू की राजनीति की अवधारणा में मिलती है. अरस्तू की राजनीति का ग्रहण यूरोप में एक प्रकार से हुआ, जबकि मध्यकालीन इस्लामी समाजों में उसका रूपांतर भिन्न ढंग से हुआ. इस्लामी विद्वानों और दार्शनिकों ने अरस्तू के विचारों को आत्मसात कर अपने दृष्टिकोण से राजनीतिक विषय पर वैकल्पिक विमर्श और वैचारिकी विकसित की.[5]
इस संकल्पना का एक उदाहरण प्लेटो का राजनीतिक दर्शन भी है, जिसमें वह ‘दार्शनिक-शासक’ (philosopher king) की परिकल्पना प्रस्तुत करता है. भारत में राजनीतिक जीवन को लेकर होने वाले आधुनिक-पूर्व विमर्शों को राजनीति की इसी दूसरी संकल्पना के निकट माना जा सकता है, यद्यपि इसकी अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता रही है. इस आलेख में हम ‘राजनीति’ शब्द और उसकी अवधारणा के विमर्श की पड़ताल मध्यकालीन और आरंभिक-आधुनिक काल के राजनीतिक जीवन के संदर्भ में करेंगे. इसके लिए हम ‘राजनीति’ शब्द के साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रयोगों का पुनरावलोकन करने का प्रयास करेंगे. परंतु उससे पूर्व ‘पॉलिटिक्स’ और ‘राजनीति’ के मौजूदा विमर्श पर एक दृष्टि डालना आवश्यक होगा.
पॉलिटिक्स और ‘राजनीति’ पर अवधारणात्मक विमर्श
‘पॉलिटिक्स’ शब्द ग्रीक शब्द पॉलीस से निकला है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नगर’ या ‘शहर’ होता है. अरस्तू ने अपनी प्रसिद्ध कृति Politics में पॉलिटिक्स को एक कला, एक शिक्षा तथा सामूहिक जीवन जीने की तैयारी के रूप में देखा है. उसके अनुसार, सामूहिक जीवन में ‘साधुता’ (goodness) इसका केंद्रीय मूल्य है.
अरस्तू की पॉलिटिक्स की अवधारणा में एक विशिष्ट प्रकार के राज्य की संकल्पना मिलती है, जिसे उसने ‘पॉलिटी’ कहा है. ‘पॉलिटी’ शासन का ऐसा रूप है जो कुलीनतंत्र और लोकतंत्र— दोनों का सम्मिश्रण है, और जिसे अरस्तू ने सर्वोत्तम शासन-व्यवस्था माना. किंतु इस पॉलिटी में बहुसंख्यक लोगों— जैसे कि दासों, स्त्रियों और संपत्ति-विहीन वर्ग— की शासन या प्रशासन में कोई भूमिका नहीं है. इसमें केवल संपत्ति-अधिकार रखने वाले मध्यवर्ग को निर्णायक भूमिका प्राप्त है.
अरस्तू की इस संकल्पना में बुनियादी परिवर्तन मध्यकाल में हुए, जब Politics का अनुवाद और टीकाएँ लैटिन में लिखी जाने लगीं. इस प्रक्रिया में ‘पॉलिटिक्स’ की एक नई संकल्पना विकसित हुई, जो गणतांत्रिक राज्य की पर्याय बनी और आगे चलकर लोकतांत्रिक राज्य के रूप में विकसित हुई.[6] हालाँकि, जैसा कि उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है, ‘पॉलिटिक्स’ की यह आधुनिक संकल्पना अरस्तू की मूल संकल्पना से काफी भिन्न है.[7]
यूरोप की आधुनिक राजनीति की सैद्धांतिकी ‘पॉलिटिक्स’ को सामाजिक जीवन के व्यवहार में विवेकशीलता और लोक-अधिकार के संरक्षण के रूप में देखती है. इस दृष्टिकोण के पीछे यूरोप की आधुनिक राजनीतिक-संस्कृति का वह विकास है, जिसने राजसत्ता में लोक की भागीदारी को ‘पॉलिटिक्स’ का अभिप्राय बना दिया. संक्षेप में कहें तो आधुनिक ‘पॉलिटिक्स’ की अवधारणा राजशासन को लोकशासित बनाने का आग्रह करती है. यही आधुनिक राजनीति का केंद्रीय मानदंड है— जिसके आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन-सा समाज ‘राजनीतिक’ है और कौन-सा ‘अराजनीतिक’.
इस दृष्टिकोण से वे सभी राजसत्ताएँ, जिनमें लोक-भागीदारी का अभाव है, ‘अराजनीतिक’ कही जाती हैं. इसी केंद्रीय मानदंड को ध्यान में रखते हुए तथा राजनीतिक व्यवस्था में लोक की भूमिका को नगण्य मानते हुए, आधुनिक–पूर्व भारत को ‘राजनीतिक-पूर्व’ (pre-political) समाज कहा गया.[8] ऐसे मूल्यांकन के पीछे एक कारण यह भी बताया गया कि भारत के इतिहास में ऐसे निर्णायक क्षण नहीं मिले जब ‘लोक’ ने राजसत्ता को लोककेंद्रित बनाने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभाई हो.[9]
इसके विपरीत, यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति (1789) और इंग्लैंड के राजनीतिक इतिहास की घटनाओं को लोक को विशिष्ट अधिकार प्रदान करने वाली घटनाओं के रूप में देखा गया, जिन्होंने आधुनिक राजनीति को ‘लोकशासित’ होने के आग्रह के रूप में स्थापित किया. यूरोप की ऐसी आधुनिक घटनाओं के आलोक में औपनिवेशिक विमर्श ने यह दलील दी कि उपनिवेशी शासन भारत के लिए एक सांस्कृतिक और राजनीतिक वरदान है, क्योंकि यह भारत में एक आधुनिक प्रशासनिक और राजकीय व्यवस्था की स्थापना करता है. स्पष्ट है कि ऐसी औपनिवेशिक वैचारिकी पश्चिमी आधुनिक राजनीतिक संस्कृति को सर्वोत्कृष्ट के रूप में प्रस्तुत करने और भारतीय राजनीतिक संस्कृति को ऐतिहासिक रूप से पिछड़ा दिखाने का प्रयास थी.
भारतीय राजनीतिक संस्कृति के ऐसे औपनिवेशिक चित्रण ने राष्ट्रवादी विचारकों और बुद्धिजीवियों के बीच एक बौद्धिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न की. इसके परिणामस्वरूप, राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन की एक लंबी परंपरा प्रारंभ हुई, जिसका उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि औपनिवेशिक-पूर्व भारत की राजनीतिक व्यवस्था एक संवैधानिक और नीतिपरक ढाँचे पर आधारित थी. इन राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने यह दिखाने का प्रयास किया कि प्राचीन भारत की राजनीति व्यवस्था निरंकुश न होकर वैधानिक संस्थाओं द्वारा संचालित थी, जिसमें जनता की स्थानीय स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित थी.[10]
इस संदर्भ में ‘गणतंत्र’, ‘मंत्रिपरिषद’, ‘सभा’, ‘समिति’, ‘राज्य’ की संकल्पना तथा सत्ता-सिद्धांत जैसे विषयों पर समृद्ध लेखन सामने आया, जो यह स्थापित करने का प्रयास था कि भारत की प्राचीन राजनीतिक संरचना वैचारिक रूप से परिपक्व और संस्थागत थी.[11]
भारत में राजनीतिक व्यवस्था और उसके विचारों के इतिहास को लेकर होने वाली बहस अपने आरंभिक काल से ही ‘विऔपनिवेशिक’ (de-colonial) विमर्श और उससे उपजी राजनीति से प्रभावित रही है. इस बहस में देशज अवधारणाओं की खोज, उनकी व्याख्या और उनकी ऐतिहासिक स्थापनाओं के प्रयास शामिल हैं. किंतु इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह रहा है कि आधुनिक राजनीतिक विचार और संस्थाएँ भारतीय संस्कृति और उसके इतिहास के साथ किस प्रकार संगत बनाई जाएँ— अर्थात, यह नई राजनीतिक व्यवस्था हमारी सांस्कृतिक परंपरा पर आधारित और उसकी स्वाभाविक अनुवर्ती कैसे हो?
इसी क्रम में, सुदीप्तो कविराज ने अपने एक चर्चित लेख ‘On the Historicity of the Political’ में ‘राजनीति’ की व्यापक अवधारणा पर अपना अवलोकन प्रस्तुत किया है. उनके अनुसार, समकालीन भारत में ‘राजनीति’ का कार्यक्षेत्र दो समूहों में विभाजित है, जो क्रमशः ‘पॉलिटिक्स’ और ‘राजनीति’ की दो भिन्न अवधारणाओं से संचालित हैं. ‘पॉलिटिक्स’ जहाँ आधुनिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं ‘राजनीति’ भारतीय परंपरागत राजनीतिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती है.[12]
पहली अवधारणा का प्रतिनिधित्व वे लोग करते हैं जो व्यावहारिक राजनीतिक कार्यक्षेत्र में अंग्रेज़ी-पोषित राजनीतिक-नैतिक समझ और वैचारिकी को व्यवहार में लाने की वकालत करते हैं. दूसरी ओर, राजनीतिक जीवन के कार्यक्षेत्र में दूसरी अवधारणा का प्रतिनिधित्व वे लोग करते हैं जिनकी राजनीति की समझ और वैचारिकी स्थानीय परिस्थितियों और संस्कृति से पोषित है, तथा जिसकी अभिव्यक्ति देश-भाषाओं में होती है. इस तरह राजनीति का कार्यक्षेत्र देशभाषा और अंग्रेज़ी के बीच विभाजित है.
कविराज के दीर्घ राजनीतिक चिंतन में राज्य का स्वभाव और उसका किरदार केंद्र में रहा है. वे औपनिवेशिक भारत में राज्य की अवधारणा में एक नाटकीय परिवर्तन देखते हैं, क्योंकि इसी काल में एक आधुनिक राज्य की अवधारणा की नींव पड़ी. औपनिवेशिक शासन-प्रशासन की प्रक्रियाओं से उपजी राज्य-व्यवस्था अपनी प्रकृति और संकल्पना में अपने पूर्ववर्ती राज्य-रूपों से बहुत भिन्न थी. औपनिवेशिक-पूर्व भारतीय राज्य अपनी संप्रभु शक्ति से रहित थे— मसलन, कोई भी हिन्दू राज्य जाति या निजी विषयों पर कानून नहीं बना सकता था, क्योंकि ये विषय धर्मशास्त्र द्वारा शासित थे, और धर्मशास्त्रों का अधिकार-क्षेत्र राज्यों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी था. कोई राज्य धर्मशास्त्र के प्रभुत्व और प्राधिकार को न तो नकार सकता था, न ही उसमें आमूल-चूल संशोधन कर सकता था. सामाजिक विषयों में राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप करने का अधिकार रखने वाले संप्रभु राज्य की संकल्पना भारत में औपनिवेशिक शासन के साथ ही विकसित हुई.[13]
अपनी इसी प्रस्थापना को आगे बढ़ाते हुए कविराज ‘राजनीति’ शब्द का अवधारणात्मक और ऐतिहासिक अवलोकन करते हैं. एक अवधारणात्मक शब्दावली के रूप में ‘राजनीति’ पर वे यह विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं कि यह शब्द ऐतिहासिक कारणों से केवल उन लोगों को संबोधित करता था जिनका संबंध राजनीतिक सत्ता से था— अर्थात् केवल शासक वर्ग को. जो लोग सत्ता के दायरे से बाहर थे, या जो सत्ता के प्रापक थे, उनके जीवन में ‘राजनीति’ शब्द का कोई वास्तविक अर्थ नहीं था.
अपने इस अवलोकन को प्रस्थापित करने हेतु कविराज आधुनिक-पूर्व भारतीय समाज-व्यवस्था के दो विशिष्ट प्रलक्षणों— ‘जाति-आधारित सामाजिक बहिष्करण’ तथा ‘सामाजिक स्तरीकरण’— का हवाला देते हैं और शास्त्रीय एवं सामाजिक तौर पर स्थापित ‘अधिकारभेद’ की मान्यता की ओर संकेत करते हैं, जो विभिन्न जातियों के लिए सामाजिक और धार्मिक अधिकारों की सीमाएँ निर्धारित करती है. कविराज यह भी रेखांकित करते हैं कि बहिष्करण का यह तंत्र केवल दबाव या बल के माध्यम से नहीं चलता, बल्कि सामाजिक भूमिकाओं की एक वैचारिक प्रणाली के ज़रिए कार्य करता है. उनके अनुसार, जाति की ऐसी सुदृढ़ व्यवस्था के कारण राजनीति की आधुनिक परिकल्पना ‘राजनीति’ शब्द के पारंपरिक अर्थ से परे रही है.
कविराज के ये अवलोकन संस्कृत में निरंतर चलने वाले धर्मशास्त्रीय विमर्श पर आधारित हैं. हालाँकि कई भारतीय इतिहासकारों— विशेषकर मध्यकालीन इतिहासकारों— ने यह दर्शाया है कि भारतीय राज-सत्ता में लोक की भागीदारी, सहमति और असहमति की गुंजाइश मौजूद थी, और धर्मशास्त्रीय विमर्श के बाहर भी राज-सत्ता की वैधता पर विचार-विमर्श की संभावना थी.[14] इसलिए यह ध्यान देने योग्य है कि संस्कृत में चलने वाला धर्मशास्त्रीय विमर्श भारतीय राजनीतिक संस्कृति और उसके ऐतिहासिक रूपांतरणों का संपूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करता. इस दृष्टि से, कविराज के अवलोकन राजनीति की अवधारणा में हुए बदलावों का आंशिक ही प्रतिनिधित्व करते हैं.
इसीलिए, कविराज की इस विचारोत्तेजक प्रस्थापना से आंशिक सहमति व्यक्त करते हुए, इस आलेख में हम यह स्थापित करने का प्रयास करेंगे कि ‘राजनीति’ शब्द का एक अर्थ धर्मशास्त्रीय व्याख्या के बाहर भी मौजूद था — जो एक विशिष्ट ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की उपज था और जिसका संचालन देशभाषाओं में हो रहा था. देशभाषा में संचालित यह विमर्श राजनीतिक सत्ता से जुड़े परिवर्तनों का प्रतिनिधित्व करता है. ‘राजनीति’ की इस संकल्पना में राजनीतिक जीवन को सांस्कृतिक रूप से परिकल्पित करने की एक धारणा विद्यमान है, जिसमें राजनीतिक जीवन में सदाचार, सौंदर्यबोध और प्रजा-कल्याण जैसे मूल्यों को प्रमुखता देते हुए एक नई राजनीतिक संस्कृति के निर्माण की परियोजना निहित है.
इन मूल्यों के निर्माण और पुनर्निर्माण में राज्य-सत्ता के बरक्स शासक और शासक वर्ग के चरित्र-निर्माण की परियोजना केंद्र में है. यह चरित्र-निर्माण परियोजना, जाति-आधारित और अधिकारभेद-संचालित धर्मशास्त्रीय विमर्श से बाहर जाकर, राज-सत्ता की वैधता पर एक नया विमर्श प्रस्तुत करती है.
औपनिवेशिक-पूर्व काल में ‘राजनीति’ की अवधारणा: मशवरा और मंत्रणा की साहित्यिक-संस्कृति
अवधारणात्मक इतिहास-लेखन की प्रविधि को ध्यान में रखते हुए यदि औपनिवेशिक-पूर्व काल में ‘राजनीति’ शब्द के शास्त्रीय और साहित्यिक प्रयोगों पर दृष्टि डालें, तो हम पाते हैं कि ‘राजनीति’ शब्द का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है. संस्कृत के अनेक काव्य, महाकाव्य और शास्त्र— जैसे नीति-शास्त्र और धर्मशास्त्र—में राजनीति एक केन्द्रीय विषय-वस्तु के रूप में उपस्थित है. उदाहरणार्थ, ‘चाणक्य राजनीतिशास्त्र’ (सूक्ति-संग्रह की एक लोकप्रिय विधा) जो ‘चाणक्य नीतिशास्त्र’ के नाम से भी प्रसिद्ध है[15], अथवा मध्यकालीन रचना ‘राजनीति रत्नाकर’ (धर्मशास्त्रों पर टीका की विधा) में राजनीति पर विस्तृत विमर्श मिलता है.
संस्कृत साहित्य की विविध विधाएँ राजनीति की भिन्न-भिन्न संकल्पनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. इसके विपरीत, हिंदी और अन्य देश-भाषाओं में धर्मशास्त्रों पर टीकाएँ या भाष्य प्रायः नहीं मिलते, जिसके कारण राजनीति का धर्मशास्त्रीय विमर्श इन भाषाओं में लगभग अनुपस्थित है. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि देश-भाषाएँ धर्मशास्त्र या कर्मकांड की भाषा बनने की न तो आकांक्षी थीं और न ही उन्हें इस दिशा में राजनीतिक प्रोत्साहन प्राप्त था. इसके अतिरिक्त, बौद्धिक और तकनीकी कारण भी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी रहे होंगे.[16]
उत्तर-मध्यकाल में हिंदी साहित्य में ‘राजनीति’ का प्रयोग एक नए रूप में देखने को मिलता है. एक ओर हिंदी में संस्कृत की लोकप्रिय नीति-विधा—जैसे ‘चाणक्य नीतिशास्त्र’— का आत्मसात करते हुए नीति और राजनीति-गत सूक्तियाँ रची गईं, तो दूसरी ओर विधा-स्तर पर कई प्रयोग हुए, जो व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हो रहे बदलावों के परिचायक हैं. हिंदी साहित्य में ‘राजनीति’ शीर्षक से कई रचनाएँ मिलती हैं, जो प्रथम दृष्टया नीति-काव्य या सूत्र विधा को अभिव्यक्त करती हैं, परंतु उनकी आंतरिक विविधता एक गहन विमर्श का संकेत देती है.
औपनिवेशिक काल के आरंभिक दशकों में फोर्ट विलियम कॉलेज के मुंशी पंडित लल्लूलाल (1763–1835) ने ‘हितोपदेश’ की कहानियों का ब्रजभाषा में अनुवाद किया और उसे ‘राजनीति’ की संज्ञा दी. इसके तात्कालिक अंग्रेज़ी अनुवादक ने इस पुस्तक को ‘राजनीति’ और ‘नीति-शिक्षा’ की पुस्तक बताया.[17] प्रथम दृष्टया, पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी कहानियों (जिन्हें सामान्यतः बाल-उपदेशक माना जाता है) को राजनीति के ग्रंथ का दर्जा देना आधुनिक पाठक के लिए ‘राजनीति’ शब्द के अर्थ को लेकर एक जिज्ञासा उत्पन्न करता है.
किंतु साहित्य की इस विधा से परिचित कोई भी व्यक्ति जानता है कि पंचतंत्र की कहानियाँ आधुनिक-पूर्व युग में न केवल अत्यंत लोकप्रिय थीं, बल्कि बौद्धिक रूप से प्रभावशाली भी थीं. इन कहानियों के अनुवाद विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में हुए और इनके राजनीतिक-दार्शनिक तत्वों को केन्द्र में रखकर “मशवरा-साहित्य” (advice literature) की एक विशिष्ट विधा विकसित हुई.[18]
उदाहरणस्वरूप, फारसी और अरबी भाषाओं में ‘Mirror of Princes’ नामक मशवरा-साहित्य विकसित हुआ, जो पंचतंत्र से प्रेरित था. यह विधा शासन-संचालन में व्यावहारिक मार्गदर्शन, प्रशासनिक दृष्टि, तथा राजनीतिक और सामरिक निर्णयों के प्रक्रियात्मक पक्षों पर विचार प्रस्तुत करते हुए शासक की भूमिका में नैतिक आदर्शों पर बल देती है.
इस परंपरा में ‘कलीला व डिमना’ (अरबी और फारसी, दोनों भाषाओं में पंचतंत्र की अनूदित और रूपांतरित कृति) अत्यंत प्रसिद्ध हुई. इसका अरबी अनुवाद फारसी विद्वान इब्न अल-मुक़फ़्फ़ा (मृत्यु 759 ई.) ने किया था, जो अब्बासी ख़िलाफ़त के उच्चाधिकारी थे. उन्होंने इस विमर्श से संबंधित एक और प्रसिद्ध रचना ‘रिसाला फ़ि-अस-सहाबा’ (साथियों के बारे में पत्र) लिखी, जो इस्लामिक राजनीतिक-सांस्कृतिक संसार में मशवरा-साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है.[19]
‘कलीला व डिमना’ के फारसी अनुवादों की एक लंबी श्रृंखला बनी, जिनमें हुसैन काशिफ़ी की ‘अनवार-ए सुहैली’ (तिमूरीद शासक हुसैन मिर्ज़ा बायकरा, हेरात दरबार) विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इसी ग्रंथ के आधार पर और पंचतंत्र के अन्य संस्कृत व जैन संस्करणों से प्रेरित होकर अबुल फ़ज़ल ने ‘ऐयार-ए दानिश’ नामक ग्रंथ की रचना की.
‘अनवार-ए सुहैली’ का उपयोग इंग्लैंड के ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज, हैलिबरी में अफ़सरों के प्रशिक्षण-पाठ्यक्रम में लंबे समय तक एक पाठ्यपुस्तक के रूप में किया गया. इसी ग्रंथ का उर्दू अनुवाद मौलवी हाफ़िज़ुद्दीन अहमद ने ‘ऐयार-ए दानिश’ शीर्षक से फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता में किया, जिसे 1803 ई. से ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अनिवार्य पठन के रूप में शामिल किया गया था.
पंचतंत्र की कहानियाँ नीति के व्यापक विमर्श की एक आधार-रचना हैं. ये कहानियाँ एक ऐसे उपकरण के रूप में उभरती हैं जो न केवल राजनीतिक जीवन में व्यावसायिक (professional) दक्षता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं, बल्कि एक सम्पूर्ण नैतिक जीवन का खाका प्रस्तुत करने में भी सक्षम हैं. संस्कृत की शास्त्रीय शिक्षण-प्रशिक्षण परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध एक विशिष्ट अवयव है, जो पंचतंत्र की संरचना में अनिवार्य रूप से उपस्थित है. यहाँ एक शिक्षक कुछ अयोग्य राजकुमारों को राजनीतिक जीवन से जुड़ी व्यावहारिक और सैद्धांतिक शिक्षा देने का दायित्व निभाता है.
पंचतंत्र का उद्देश्य शासन-प्रशासन के संचालन के लिए आवश्यक अंतर्दृष्टि का विकास करना है, जिसके लिए एक विशेष प्रकार के ज्ञान-निकाय में प्रवेश आवश्यक है. इसी ज्ञान-निकाय के अनुशासन को ‘नीति’ कहा गया है.[20]
कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में ‘नीति’ नामक इस ज्ञान-निकाय को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हैं. इसकी प्राप्ति न केवल अन्य ज्ञान-शाखाओं का समुचित संचालन करने में सहायक है, बल्कि उत्कृष्ट जीवन जीने की कला भी सिखाती है. अर्थशास्त्र राज-काज से संबंधित व्यक्तियों के लिए नैतिकता और सौंदर्य-बोध से परिष्कृत व्यक्तित्व को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानता है, और साथ ही व्यक्तित्व परिष्कार हेतु अनेक गुणों के आत्मसात करने की सलाह देता है.
‘गुण’ शब्द के अनेक अर्थ हैं. एक स्तर पर इसका अर्थ सद्गुणों—जैसे ईमानदारी, सच्चाई, दया—से है, तो दूसरे स्तर पर यह सांस्कृतिक कौशलों—जैसे सामाजिक आचरण, वक्तृत्व (rhetoric), संगीत, साहित्य, ललित और सैन्य कलाओं में पारंगतता—की ओर संकेत करता है. नीति के ज्ञान-निकाय में ‘गुण’ के इन दोनों आयामों का समावेश है.
लल्लूलाल द्वारा पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियों का देशभाषा में अनुवाद और उन्हें ‘राजनीति’ की संज्ञा देने के प्रयास को इसी व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए.
हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन और ‘राजनीति’ विधा की रचनाओं का मूल्यांकन
‘राजनीति’ और ‘नीति’ विषयक रचनाओं को अब तक हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन में कोई प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त नहीं हुआ है. इनका उपयोग न तो इतिहास-लेखन के स्रोत के रूप में किया गया है, और न ही विधा (genre) के स्तर पर एक विश्लेषणात्मक प्रवर्ग (analytical category) के रूप में.
‘राजनीति’ शीर्षक से संबोधित रचनाओं की संख्या भले ही बहुत अधिक नहीं है, फिर भी एक विधा की हैसियत से इनका महत्व विशेष है.
एक ओर, ‘राजनीति’ की ये रचनाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करती हैं; वहीं दूसरी ओर, ये एक विश्लेषणात्मक प्रवर्ग के रूप में हिन्दी साहित्य की स्थापित विधाओं—जैसे भक्ति, रीति और नीति—पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करती हैं.
विधा के स्तर पर भी ‘राजनीति’ की रचनाओं में एक आंतरिक विविधता दिखाई देती है, जो इन्हें एक स्वतंत्र विश्लेषणात्मक प्रवर्ग के रूप में महत्त्वपूर्ण बनाती है. उदाहरण के लिए, लल्लूलाल की ‘राजनीति’ से भिन्न, ब्रजभाषा में कई अन्य रचनाएँ इसी शीर्षक से मिलती हैं, किंतु वे विधा और शैली—दोनों स्तरों पर— लल्लूलाल की रचना से भिन्न हैं.
देव कवि (१६७३–१७६७) की ‘राजनीति’ नामक रचना उपदेशात्मक कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक राजनीतिक-सैद्धांतिक कृति है, जो उस समय के ‘राजनीति’ विमर्श का एक नियामक प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करती है.[21] इसी प्रकार, राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र से संबद्ध देविदास की रचना ‘राजनीति रा कवित’ नीति-सूत्रात्मक पदों का संकलन है, जो देव कवि और लल्लूलाल—दोनों से विधा की दृष्टि से भिन्न है.[22]
‘राजनीति के दोहे’ नामक रचना, जो रेवा के शासक विश्वनाथ सिंह द्वारा रचित है, देविदास की रचना से विधागत समानता रखती है, किंतु शैलीगत दृष्टि से भिन्न है.
‘राजनीति रा कवित’ और ‘राजनीति के दोहे’ जैसी रचनाएँ, राजनीति-विषयक सूक्तियों के संग्रह के रूप में, संस्कृत की लोकप्रिय नीति-सूत्र परंपरा—जैसे ‘चाणक्य राजनीतिशास्त्र’, ‘चाणक्य नीतिशास्त्र’ और ‘नीतिशतकम’—के देशभाषीय प्रतिपादन के रूप में देखी जा सकती हैं, यद्यपि इनके स्वतंत्र आधारों और ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखना आवश्यक है.
विधा और शैली के स्तर पर पाई जाने वाली इस विविधता के कारण, ‘राजनीति’ रचनाओं को साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक अवधारणा के रूप में समझना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. यह कठिनाई तब और बढ़ जाती है जब हम इन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास की स्थापित परिपाटियों के भीतर समझने का प्रयास करते हैं.
राजनीति और नीति-विधा की रचनाएँ, मानक इतिहास-लेखन की रूपरेखा में स्थान नहीं पातीं, यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों के लिए ये रचनाएँ अपरिचित रही हैं.
हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास-लेखन में काल-विभाजन की पद्धति की केंद्रीय भूमिका रही है. चार काल-खंडों में विभाजित हिन्दी साहित्य का इतिहास, वस्तुतः चार प्रकार की प्रमुख साहित्यिक प्रवृत्तियों का इतिहास है. उदाहरणस्वरूप, भक्ति काल और रीति काल — दोनों अपने-अपने समय की प्रबल साहित्यिक प्रवृत्तियों को लक्षित करते हैं. देखने योग्य तथ्य यह है कि चार सदियों से अधिक अवधि तक फैले इन दोनों काल-खंडों में नीति और राजनीति-विषयक साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिए कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है.
समकालीन विद्वानों और इतिहासकारों ने काल-विभाजन-आधारित हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की पद्धति की व्याख्यात्मक सीमाओं को इस आधार पर रेखांकित किया है कि यह पद्धति साहित्यिक शैली की विविधता, साहित्यिक प्रवृत्तियों की समकालीनता और पारस्परिकता जैसे जटिल विषयों को अपने ढाँचे में समाहित नहीं कर पाती.[23]
नीति-विषयक रचनाओं की प्रत्येक काल में उपस्थिति के कारण, नीति-साहित्य का कोई एक समर्पित काल निश्चित नहीं किया जा सकता. यही कारण है कि नीति-काव्य के इतिहासकार, नीति के रचनाकारों को सभी काल-खंडों में खोज निकालते हैं या इन रचनाओं के समानांतर विकास को चारों कालों के बरक्स देखने का प्रयास करते हैं. हिन्दी नीति-काव्य के दो प्रमुख इतिहासकार — भोलानाथ तिवारी और रामस्वरूप शास्त्री ‘रसीकेश’ — ने नीति-काव्यों एवं कवियों की स्वतंत्र पहचान, उनका वर्गीकरण, नीति-काव्य का स्वरूप और नीति-काव्य तथा नीति-शास्त्र के बीच अवधारणात्मक भेद को स्पष्ट करने की कोशिश की है.
भोलानाथ तिवारी चार प्रकार के नीति-काव्य के रचनाकारों का वर्गीकरण इस प्रकार करते हैं—
(1) नीति-प्राधान्य कवि,
(2) भक्ति-कवि जिन्होंने नीति के पद लिखे,
(3) रीति-कवि जिन्होंने नीति-विषयक पदों की रचना की, और
(4) लोक कवि जिन्होंने नीतिगत पदों की रचना की.
तिवारी के अनुसार, नीति-प्राधान्य कवियों में मुग़ल दरबार के प्रमुख स्तंभ और बहुभाषी विद्वान अब्दुर रहीम खान-ए-खानाँ (1556–1627), जान कवि (1614–1664) — जिनकी एक पहचान नेआमत ख़ान के रूप में थी और जो फतेहपुर के नवाब घराने से संबंध रखते थे — तथा वृंद कवि (1643–1723), जो बादशाह औरंगज़ेब के दरबार से संबद्ध थे, प्रमुख हैं. इसी श्रेणी में देविदास, जो ‘राजनीति रा कवित’ के रचयिता थे, भी सम्मिलित हैं. दूसरी श्रेणी में ऐसे भक्ति कवि आते हैं जिनमें तुलसीदास, कबीर, सूरदास और सुंदरदास (जो दादू पंथ के एक संत और कवि थे) शामिल हैं.[24]
दूसरी ओर, रामस्वरूप शास्त्री ‘रसीकेश’ ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी में नीति-काव्य का विकास’ में नीति-काव्य और नीति-शास्त्र के बीच विधागत अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया. उनके लिए यह आवश्यक था क्योंकि रामचंद्र शुक्ल ने नीति-विषयक पदों में काव्यत्व के गुण का अभाव बताते हुए उन्हें ‘शिक्षाप्रद पद’ कहकर नीति-काव्य का दर्जा देने से इंकार किया था.[25]
‘रसीकेश’ ने ऐतिहासिक स्रोतों जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कमंदक का नीति-सार और सोमदेव सूरी का नीतिवाक्यामृत का विश्लेषण करते हुए इन्हें तकनीकी रूप से नीति-शास्त्र की रचनाएँ माना — क्योंकि इनका उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार था और ये राजाओं तथा राजकुमारों को शासन एवं नीतिगत जीवन में शिक्षित करने के लिए रची गई थीं.
हालाँकि, हिन्दी में नीति-विषयक पदों को नीति-काव्य का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं — यह प्रश्न तब भी बना रहा. इस संदर्भ में, ‘रसीकेश’ ने संस्कृत काव्यशास्त्रों में काव्य की प्रचलित परिभाषाओं का सहारा लेते हुए काव्य के दो प्रयोजनों — आनंद और शिक्षा — का उल्लेख किया. वे स्वीकार करते हैं कि नीति की रचनाएँ मुख्यतः शिक्षोन्मुख होती हैं, किन्तु वे भाव और रस को भी संबोधित करती हैं, इसलिए आनंद-प्रेरक भी हैं. दूसरी ओर, नीति-शास्त्र की रचनाओं में तार्किकता और सूत्रबद्धता पर बल दिया जाता है, जिसके कारण उन्हें भावहीन, रसविहीन और शुष्क माना गया है.
‘रसीकेश’ नीति-काव्य का तात्त्विक विश्लेषण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नीति-काव्य का प्राथमिक प्रयोजन शिक्षा है, परंतु यह काव्य के दूसरे प्रयोजन — रस, भाव और सौंदर्य-बोध — को भी समान प्राथमिकता देता है. इस आधार पर, वे हिन्दी नीति-पदों को काव्यशास्त्रीय मीमांसा की कसौटी पर परखते हुए नीति-काव्य की उपाधि प्रदान करते हैं. वे आगे यह भी निष्कर्ष निकालते हैं कि हिन्दी नीति-काव्य के दायरे में रीति और भक्ति कविता के तत्व समाविष्ट हैं, जिससे नीति-काव्य के अध्ययन में रीति-काव्य को सम्मिलित करने की संभावना खुलती है.[26]
रीति-साहित्य के संबंध में हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों के एक वर्ग का मत रहा है[27] कि यह सांस्कृतिक पतन का द्योतक तथा कुलीन वर्ग की ऐहिक विलासिता की अभिव्यक्ति का माध्यम था.[28] इस पूर्वाग्रह के कारण, इन इतिहासकारों ने रीति-साहित्य में नैतिक या आचारिक विमर्श की संभावना नहीं देखी. परंतु हाल के ऐतिहासिक शोध यह दर्शाते हैं कि रीति-साहित्य अपने समय के व्यापक बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श का अंग था, जो राजनीतिक, भावनात्मक और नैतिक विचारधाराओं के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था.[29]
हालाँकि, रीति-साहित्य को नीति-विधा के विस्तार के रूप में देखने का प्रस्ताव अब तक पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो सका है. इस लेख में, हम रीति-काव्य की विधा को नीति के व्यापक विमर्श के एक अंग के रूप में देखने का प्रयास करेंगे.
रीति-काव्य की विधा में सबसे लोकप्रिय रचनाएँ ‘रीतिग्रंथ’ हैं, जो वस्तुतः कविता-लेखन की नियमावली प्रस्तुत करने वाली एक शैली है. इन ग्रंथों में काव्यशास्त्र के प्रमुख विषयों — जैसे अलंकार, लक्षणा, दृष्टांत और रूपकात्मकता — के उपयोग के सूत्र और विधियाँ दी गई हैं. इन उपकरणों का समुचित प्रयोग जिन विषय-वस्तुओं में होना है, उनकी सूची अत्यंत व्यापक है.
रीति-ग्रंथों की विषयवस्तु में राजनीतिक, नैतिक, बौद्धिक, भावात्मक, सौंदर्यात्मक और भौतिक जीवन के वे सभी पहलू सम्मिलित हैं जो राजसभाओं और राजदरबारों से संबंध रखते हैं. एक आदर्श नायक या नायिका के चरित्र-चित्रण में दैहिक सौंदर्य के साथ-साथ उनके अंतःजीवन, मनोस्थितियों और भावदशाओं का सूक्ष्म और भावपूर्ण वर्णन किया गया है. इन रचनाओं में एक सम्पन्न और परिष्कृत अंतःजीवन के बौद्धिक और भावात्मक अर्थों पर भी विचार किया गया है.
इसके साथ-साथ, रीति-ग्रंथों में एक आदर्श शासक, आदर्श राज्य, राज्य की भौगोलिक एवं प्राकृतिक स्थितियों, तथा सामाजिक और धार्मिक संप्रदायों का सुविचारित वर्णन भी मिलता है. रीतिग्रंथ प्रायः शासकों या राजघरानों के कुलीन सदस्यों द्वारा प्रायोजित या संरक्षित होते थे. इस संरक्षण का प्रमुख उद्देश्य एक विशिष्ट राजनीतिक और बौद्धिक संस्कृति का विकास करना था, जो राजसभाओं के सांस्कृतिक जीवन को पोषित और सुदृढ़ कर सके.
रीति साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य में चरित-काव्य भी एक लोकप्रिय विधा के रूप में उभरती है. चरित-काव्य किसी विशिष्ट राजनीतिक नायक के आदर्श जीवन-वृत्त का काव्यात्मक रूपांतरण है, जिसमें उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संदर्भों को केंद्र में रखकर एक व्यापक वैचारिकी प्रस्तुत की जाती है. इन कथाओं की पृष्ठभूमि प्रायः वे क्षेत्रीय राजनीतिक नायक हैं जो मुग़ल साम्राज्य के अधीन रहकर अपने-अपने क्षेत्रों में शासन किया करते थे. इनके अधिकार-क्षेत्र सीमित रियासतों तक फैले थे, जो एक शक्तिशाली साम्राज्य की व्यापक राजनीतिक सत्ता के अधीन कार्यरत थीं.[30]
रीति-काव्य के प्रमुख बौद्धिक वर्ग — इसके रचयिता, पाठक, श्रोता और साधक — मूलतः इन्हीं रियासतों से आते थे. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि नीति और राजनीति विषयक रचनाओं का पाठक और श्रोता वर्ग भी इसी बौद्धिक-राजनीतिक संसार का हिस्सा था. इसलिए, ‘राजनीति’ शीर्षक साझा करने वाली रचनाओं के विमर्श को समझने के लिए रीति-काव्य में निहित प्रवृत्तियों का विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि नीति और राजनीति की रचनाओं को रीति-काव्य के व्यापक विमर्श के परिप्रेक्ष्य में रखकर ही सही रूप में समझा जा सकता है.
रीति साहित्य: भावात्मक, सौन्दर्य और राजनीतिक जीवन के पुनर्गठन की परिकल्पना
‘रीति’ को काव्यशास्त्रीय शब्दावली के रूप में स्थापित करने का श्रेय संस्कृत के आचार्य वामन (8वीं–9वीं सदी) को जाता है, जिन्होंने अपनी रचना ‘काव्यालंकारसूत्र’ में रीति को ‘काव्य की आत्मा’ कहा है.[31] संस्कृत काव्य में ‘रीति’ शब्द का प्रयोग अलंकारिक गुण के रूप में हुआ है. इस सन्दर्भ में रीति का उपयोग काव्य में अलंकारपूर्ण अभिव्यक्ति, रस–भाव की अभिव्यक्ति तथा छंदशास्त्रीय उपकरणों के प्रयोग के रूप में किया जाता रहा.
दूसरी सहस्त्राब्दी में जब देशज भाषाओं में साहित्यिक प्रवृत्तियों का विकास हुआ, तो उनके लिए यह स्वाभाविक था कि वे संस्कृत की विकसित साहित्यिक विधाओं और तकनीकों—विशेषतः काव्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र और छंदशास्त्र जैसी काव्य-मीमांसा परंपराओं—को आत्मसात करें. हिन्दी रीति-काव्य ऐसी ही एक देशभाषिक काव्य-विधा के रूप में विकसित हुआ, जिसने काव्य-लेखन में अलंकरण और शब्द-प्रचुरता को प्रमुख मानक बनाया. रीति-काव्य ने भावात्मक जीवन और प्रेम को अपने केन्द्रीय विषय के रूप में प्रतिष्ठित किया. इन विषयों की अभिव्यक्ति के लिए जिस भाषा-शैली का चयन रीति-ग्रंथों और कवियों ने किया, वह अलंकृत, शब्दाडंबरपूर्ण और वाक्चातुर्य-प्रधान रही. यही शैलियाँ रीति-काव्य की केन्द्रीय और विशिष्ट पहचान बनीं.
अब यह प्रश्न उठता है कि यदि शैलीगत स्तर पर शब्द-प्रचुरता और विषयगत स्तर पर प्रेम तथा भावात्मक जीवन रीति-काव्य की विशेषताएँ हैं, तो इनके प्रादुर्भाव से पहले प्रेम और भावनात्मक जीवन का विमर्श किस रूप में व्यक्त हो रहा था? इसका एक सन्दर्भ यह है कि रीति-काव्य जिस बौद्धिक और सांस्कृतिक परिवेश में पनपा, उसमें भक्ति का धर्मशास्त्रीय (theological) और साहित्यिक विमर्श विद्यमान था. दूसरा सन्दर्भ क्षेत्रीय राज्यों के उद्भव से जुड़ा है.
रीति-काव्य की लाक्षणिक शैली, प्रेम और भावात्मक जीवन जैसे विषयों पर विचार करते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह अवलोकन उल्लेखनीय है कि रीति-काव्यों में ‘लक्षणा’ विधा के प्रति रुझान की पृष्ठभूमि मध्यकालीन सौन्दर्य-शास्त्रीय विमर्श के उत्थान में निहित है. वे रेखांकित करते हैं कि यह सौन्दर्य-विमर्श काव्यशास्त्र और वात्स्यायन के कामशास्त्र की परंपराओं के पुनर्पाठ से उभरा.[32] इसी विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कुछ विद्वानों ने साहित्य में शृंगार के प्रचलन को मध्यकाल में प्रेम की प्रचलित अवधारणाओं से भी जोड़कर देखने की आवश्यकता बताई है.[33]
इस दिशा में कालीचरण बहल का तर्क है कि मध्यकाल में प्रेम की तीन प्रमुख अवधारणाएँ देखने को मिलती हैं—
- कामशास्त्र की परंपरा में ‘प्रेम’ एक नैसर्गिक चाह (काम) के रूप में,
- काव्यशास्त्र की परंपरा में ‘प्रेम’ शृंगार-रस के रूप में सौन्दर्य-बोध के रूप में, और
- भक्ति-शास्त्र की परंपरा में ‘प्रेम’ अध्यात्म-बोध के रूप में.
इस दृष्टि से देखा जाए तो रीति-साहित्य में शृंगार-रस के प्रति आग्रह, प्रेम के उसी व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो उपर्युक्त तीनों बौद्धिक-साहित्यिक परंपराओं की अंतःक्रिया से विकसित हुआ. उदाहरणस्वरूप, रीति-साहित्य की प्रारम्भिक रचना ‘केशवदास की रसिकप्रिया’ न केवल एक प्रेम-काव्य है, जो शृंगार-रस और लक्षणा-भेद जैसे काव्यशास्त्रीय उपकरणों से सुसज्जित है[34] (जैसा कि अधिकांश इतिहासकार मानते हैं), बल्कि यह रचना कामशास्त्र, काव्यशास्त्र और भक्ति-शास्त्र — तीनों के तत्त्वों को समाहित करने वाली आरंभिक रीति-कृति भी है.[35]
एक ठेठ रीति-ग्रंथ को परिभाषित करने वाले तत्त्वों में प्रेम विषयवस्तु के रूप में शृंगार-रस में आता है, जो राधा–कृष्ण के प्रेम प्रसंग का लाक्षणिक चित्रण करता है.[36] राधा–कृष्ण प्रेम के धर्मशास्त्रीय विमर्श की सैद्धांतिक स्थापना का श्रेय रूप गोस्वामी और जीव गोस्वामी जैसे धर्मशास्त्रकारों को जाता है. इनके लेखन से भक्ति का ऐसा साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श विकसित हुआ जिसने शृंगार-रस और काव्यशास्त्रीय मानकों को भक्ति के सौन्दर्य-आधार के रूप में स्थापित किया.
रूप गोस्वामी की ‘भक्तिरसमृतसिंधु’ और ‘उज्जवल नीलमणि’ भक्ति-रस सिद्धांत की दो आधारभूत कृतियाँ हैं. इनमें उन्होंने नाट्यकला और साहित्य में स्थापित रस-सिद्धांतों का पुनर्विचार करते हुए ‘लौकिक’ और ‘अलौकिक’ रसों का भेद प्रस्तुत किया. उनका तर्क है कि ‘स्थायी भाव’ से रहित रस की अनुभूति, रसानुभूति नहीं कही जा सकती, क्योंकि ऐसी अनुभूति सच्चे अर्थों में ‘असीम तृप्ति’ नहीं देती. ऐसी तृप्ति केवल अलौकिक अनुभूति से ही संभव है—जैसे कि वासुदेव के प्रति प्रेम से. इस प्रकार, उनके सिद्धांत में कृष्ण और राधा दैवीय पात्रों के रूप में रसानुभूति के अलौकिक स्रोत माने गए हैं.[37]
रीति-साहित्य में ‘नायक’ की अवधारणा और भक्ति-विमर्श का प्रभाव
एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भक्ति के धर्मशास्त्रियों द्वारा विकसित प्रेम, शृंगार और सौन्दर्य की संकल्पनाओं ने इस काल में साहित्यिक और बौद्धिक संस्कृति को इस कदर कैसे प्रभावित किया कि राज-दरबारों से सम्बद्ध रीति-साहित्य ने भी इस विमर्श को आत्मसात कर लिया. दूसरे शब्दों में, भक्ति-परक प्रेम, सौन्दर्य और शृंगार की संकल्पना राजनीति के अभिजात्य वर्गों के बीच किस प्रकार लोकप्रिय हुई?
इस प्रश्न को समझने के लिए ‘नायक’ की अवधारणा पर विचार करना आवश्यक है, क्योंकि ‘नायक’ का रूपक रीति और भक्ति—दोनों साहित्यिक परंपराओं की केन्द्रीय विषयवस्तु है. यद्यपि ‘नायक’ और ‘नायिका’ की संकल्पनाओं का प्रारम्भिक सूत्रपात भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में हुआ, परन्तु यह अवधारणा नाट्यशास्त्र की सीमाओं से बाहर निकलकर काव्यशास्त्र, भक्ति-शास्त्र और आगे चलकर रीति-साहित्य में विकसित और परिष्कृत हुई.
नाट्यशास्त्र में नायक के चार प्रकार बताए गए हैं—धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशांत. इन चारों में ‘धैर्य’ एक सामान्य और केन्द्रीय गुण है, जो नायकत्व की मूल विशेषता का निर्धारण करता है.[38]
- धीरोदात्त नायक आत्मश्लाघा-रहित, क्षमाशील, गंभीर, महाबलशाली, स्थिर और विनम्र होता है; जैसे—राम या युधिष्ठिर.
- धीरोद्धत नायक प्रचंड, मायावी, अहंकारयुक्त और आत्मश्लाघी होता है; जैसे—भीम.
- धीरललित नायक मृदु, रसिक, गीत-संगीतप्रिय और रमणीय स्वभाव का होता है; जैसे—कृष्ण या दशरथ.
- धीरप्रशांत नायक शांत, धैर्यवान, समन्वयकारी और विवेकशील होता है; जैसे—बुद्ध या विदुर.
रीति-काव्य में इन शास्त्रीय नायकों का पुनर्वर्गीकरण हुआ. यहाँ नायक को चार प्रकारों—अनुकूल, दक्षिण, धृष्ट और शठ—में बाँटा गया. इसके पहले शृंगार-रस के सन्दर्भ में नायक के तीन भेद बताए गए थे—पति, उपपति और वैशिक (वेश्यानुरक्त).[39]
अब प्रश्न यह है कि रीति-साहित्य में नायक-नायिका वर्णन की यह लम्बी परंपरा किस उद्देश्य की पूर्ति करती है. राधा–कृष्ण प्रेम का साहित्यिक विकास तो भक्ति-साहित्य में पहले ही हो चुका था. अतः रीति-साहित्य का उद्देश्य केवल प्रेम-वर्णन नहीं था, बल्कि वह भक्ति-विमर्श से बाहर एक ऐसी सांस्कृतिक भाषा विकसित करना चाहता था, जिसमें आदर्श नायक और नायिका के भावात्मक जीवन को एक परिष्कृत और आलंकारिक शैली में अभिव्यक्त किया जा सके.
रीति-ग्रंथों का यह प्रयत्न केवल काव्यशास्त्रीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक भी था—वे प्रेम, भावना, सौन्दर्य और पौरुष जैसे विषयों पर संवाद के लिए एक परिष्कृत भाषिक रूप गढ़ रहे थे. ‘नायक’ की केन्द्रीयता के माध्यम से ये ग्रंथ दरबारी जीवन में सौन्दर्यशास्त्र, नैतिकता और शक्ति-संवेदना के संवाद को समृद्ध करते हैं.
जैसा कि पहले उल्लेखित है, रीति-ग्रंथों का प्रायोजन राजसभाओं के सांस्कृतिक जीवन को सुसंगठित करने के उद्देश्य से हुआ था. इनमें राज-वर्णन, राजकुमार-वर्णन और दरबारी संस्कृति के सौन्दर्यशास्त्रीय रूपों का निरूपण प्रमुख है. इसी कारण रीति-ग्रंथों को उदीयमान कवियों के लिए एक प्रकार की काव्यशिक्षा-संहिता या तकनीकी मार्गदर्शिका भी कहा जा सकता है—जहाँ कवि काव्य-रचना की तकनीक और भाषा की परिष्कृत संवेदना सीखते थे.
दूसरी ओर, नीति-काव्य को परंपरागत रूप से शिक्षाप्रद माना गया है. नीति-साहित्य में ‘शिक्षात्मकता’ का अर्थ सामान्यतः नैतिक और आचरण-संबंधी सिद्धांतों से है; जबकि रीति-काव्य का शिक्षात्मक स्वरूप सौन्दर्यात्मक और भाषिक अभिव्यक्ति की तकनीक से सम्बद्ध है.
इस सन्दर्भ में यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि राजनीतिक जीवन में ‘नीति’ एक साहित्यिक, राजनीतिक और सौन्दर्यात्मक श्रेणी के रूप में क्या अर्थ रखती है?
यहीं से रीति और नीति—दोनों विधाओं के पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी सांस्कृतिक भूमिका पर विचार की आवश्यकता उत्पन्न होती है.
वाक्चातुर्यता, संयमता, धीरता तथा राजनीतिक संवाद की संस्कृति
हमारी आधुनिक राजनीतिक चेतना में स्वतंत्र और सीधी शैली में किया गया संवाद लोकतान्त्रिक मूल्यों और अधिकारों का अभिन्न हिस्सा माना जाता है. इन्हीं मूल्यों के कारण अप्रत्यक्ष, प्रशंसात्मक और आलंकारिक भाषा का प्रयोग प्रायः हेय दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि ऐसी भाषा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासक और शासित के बीच असमानता को व्यक्त और स्थापित करती है.[40] जबकि स्वतंत्र, स्पष्ट और सपाट भाषा के लिए गैर-लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं — विशेषतः राजतंत्र — में कोई स्थान नहीं होता. आधुनिक-पूर्व राज-व्यवस्थाओं में अधिकांश शासक स्वयं को दैवीय शक्ति का प्रतिनिधि मानते थे. अतः उनसे संवाद की अपेक्षित भाषा ऐसी होती थी जो न केवल उनके प्रति श्रद्धा और आदर का भाव प्रकट करे, बल्कि उनकी गरिमा और सत्ता-प्रतिष्ठान को भी अलंकृत भाषा में स्थापित करे. यही कारण है कि ऐसी शासन-व्यवस्थाओं में संवाद की भाषा परोक्ष, प्रशस्तिपरक, अलंकृत और वाक्पटु (rhetorical) होती थी.
यदि शासक की दैवीय शक्ति का सिद्धांत एक राजनीतिक और सामाजिक रूप से निर्मित वैचारिकी (ideology) है, तो इस वैचारिकी को पोषित और स्थिर करने वाली भाषा स्वाभाविक रूप से ‘प्रशस्ति की भाषा’ होगी — वह आलोचनात्मक या सपाट शैली की भाषा नहीं हो सकती. इसलिए, दैवीय शक्ति की इस वैचारिकी से संचालित राज-व्यवस्था एक ऐसी बौद्धिक संस्कृति का पोषण करती है जो प्रशस्तिपरक भाषा को तकनीकी रूप से विकसित करती है. इसीलिए आधुनिक-पूर्व शासन-व्यवस्थाओं में एक ऐसी सांस्कृतिक और शैक्षिक व्यवस्था विकसित हुई जो संवाद में वाक्पटुता को विशेष महत्त्व देती थी.
वाक्पटुता की इस संस्कृति की आवश्यकता को समझने के लिए प्रशासन की एक सामान्य स्थिति की कल्पना करें: एक अधिकारी या सलाहकार किसी विषय पर अपने शासक को कोई सूचना या सलाह देता है. उस पर शासक की प्रतिक्रिया चार प्रकार की हो सकती है — वह सलाह या सूचना सही या गलत हो सकती है, और साथ ही सुखद (pleasing) या अप्रिय (unpleasing) भी लग सकती है. यदि सही सलाह अप्रिय भाषा में दी गई है, तो वह शासक को बुरी लग सकती है. यदि गलत सलाह सुखद भाषा में दी गई हो, तो भी सलाहकार के लिए जोखिम है. सलाह की ‘प्रियता’ केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सलाहकार के हाव-भाव, व्यवहार और स्वर से भी निर्धारित होती है. दोनों ही परिस्थितियों — गलत सलाह या अप्रिय भाषा — में शासक उसे दंडित कर सकता है, क्योंकि उसका दायित्व ‘सही’ सलाह देना है. अतः सलाहकार के लिए एकमात्र उपाय यही है कि वह सही सलाह भी संयमित, परोक्ष और प्रिय लगने वाली भाषा में दे.
ऐसी भाषा का विकास व्यक्तिगत योग्यता भर नहीं, बल्कि एक व्यापक बौद्धिक और राजनीतिक संस्कृति का परिणाम है, जो संवाद में सीधेपन के बजाय परोक्षता, संकेत, रूपक, लक्षणा और अलंकार को सामान्य बनाती है. ऐसी संस्कृति में वाक्पटुता एक सामाजिक और सांस्कृतिक गुण बन जाती है. यही कारण है कि रीति-काव्य और दरबारी साहित्य की भाषा में अलंकारिकता और वाक्पटुता के विशेष विकास को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए.
पंचतंत्र की कहानियाँ वस्तुतः राजनीतिक संवाद की ऐसी ही परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं— ये न केवल भाषिक स्तर पर सुगम हैं, बल्कि राज-व्यवस्था की विविध परिस्थितियों को संबोधित करने वाली भाषा, शब्दावली और वाच्य-शैली का सुसंगत दृष्टांत प्रस्तुत करती हैं. इन कथाओं के पात्र — पशु-पक्षी — मानवीय प्रवृत्तियों के रूपक हैं, जो शासकीय या राजनीतिक परिस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक भाषा और विवेक प्रदान करते हैं. इस दृष्टि से पंचतंत्र, राजनीतिक जीवन में वाक्पटुता, संयमता, विनम्रता और व्यवहारिक समझ विकसित करने का उपकरण है.
राजनीतिक जीवन में संदिग्ध, अनिश्चित और अप्रत्याशित परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं. सत्ता की स्थिरता और निर्णय-क्षमता के लिए संयम और धैर्य आवश्यक कौशल हैं, जो नैतिक सद्गुण के रूप में माने जाते हैं. नैतिक सद्गुणों को सीखने-सिखाने में ‘नीति’-विषयक साहित्य सदैव प्रभावशाली माध्यम रहा है.
इब्न अल-मुक़फ़्फ़ा (मृत्यु: ७५९ ई.) ने ‘कलीला व डिमना’ में बौद्ध कथा-स्रोतों से प्रेरित होकर ‘हिल्म’ की अवधारणा विकसित की और उसे राजनीतिक सफलता की कुंजी बताया.[41] ‘हिल्म’ दैहिक और नैतिक संयम, सत्यनिष्ठा और आत्मसंयम जैसे सद्गुणों का प्रतीक है, जो व्यक्ति को ‘हालिम’ बनाता है. ‘हालिम’ होना, दरअसल, सभ्यता, शिष्टता और परिष्कृत आचरण का द्योतक है — जो ‘जाहिल’ अर्थात भावावेश और अविवेक से संचालित व्यक्ति की स्थिति के विपरीत है. इस प्रकार ‘हालिम’ व्यक्ति वह है जो सौंदर्यबोध, विवेक और नैतिकता से संपन्न है.
पंचतंत्र, ‘कलीला व डिमना’ और उनसे प्रेरित मध्यकालीन रचनाओं ने ऐसी राजनीतिक संस्कृति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसमें राजनीतिक व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व — जैसे सौंदर्यबोध, बौद्धिक अभिरुचि, नैतिक-बोध और भाव-बोध — समाहित हैं. इसी सांस्कृतिक क्रम में इस्लामी-फ़ारसी परंपरा में ‘अख़लाक़’ की अवधारणा विकसित हुई[42], जो सदाचार, न्यायप्रिय शासनकला तथा दार्शनिक जीवन के निर्माण पर केंद्रित थी.[43]
मुग़ल साम्राज्य के दौरान ‘अख़लाक़’ एक प्रभावशाली दार्शनिक, साहित्यिक और राजनीतिक सिद्धांत के रूप में विकसित हुआ. अबुल फ़ज़ल ने नसीरुद्दीन तूस़ी की प्रसिद्ध कृति ‘अख़लाक़-ए-नासिरी’ को आधार बनाकर कई इंशाएँ लिखीं, जो प्रशासनिक आचार-संहिता और नियमावलियों के रूप में प्रयुक्त हुईं.[44] उन्होंने ‘आईने-ए-अकबरी’ में ‘राजनीति’ शीर्षक से एक खंड लिखा, जिसमें ‘राजनीति’ की परिभाषा दी — यह परिभाषा न केवल ‘हिल्म’ की अवधारणा के समीप है, बल्कि कौटिल्य की ‘नीति’ के विचार से भी समानता रखती है.[45] अबुल फ़ज़ल के अनुसार ‘राजनीति’ वह ज्ञान-संहिता है जो शासक को उसकी अवांछित प्रवृत्तियों — जैसे काम, क्रोध, राग और मद — के नियंत्रण के लिए आवश्यक है.[46]
इस दृष्टि से ‘राजनीति’ एक आत्म-नियंत्रण की विधा है जो शासक को निरंकुशता से बचाने वाली बौद्धिक शक्ति प्रदान करती है. यह वही नैतिक-आचारिक और बौद्धिक संस्कृति है जो सत्ता को नियंत्रित करने का आंतरिक तंत्र बनाती है — जो न केवल शासन के संचालन के लिए आवश्यक है बल्कि शासक के नैतिक, सौन्दर्यात्मक और दार्शनिक बोध को भी जाग्रत करती है.[47]
इस पूरी प्रक्रिया में लाक्षणिक और आलंकारिक भाषा की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. यह भाषा न केवल भावात्मक और सौंदर्य-बोध की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है, बल्कि राजनीतिक संवाद की परिष्कृत परंपरा को भी जीवित रखती है. इस प्रकार नीति के व्यापक विमर्श से विकसित यह परंपरा उस राजनीतिक संस्कृति की नींव रखती है जिसकी अभिव्यक्ति देशभाषा की ‘राजनीति’-संबंधी रचनाओं में अत्यंत सारगर्भित रूप में मिलती है.

देविदास की ‘राजनीति रा कवित’: राजनीतिक जीवन में नीति-ज्ञान निकाय की वांछनीयता
देविदास की ‘राजनीति रा कवित’ सूक्तिपरक और शिक्षाप्रद कथनों का एक सुविख्यात संग्रह है. इसकी पांडुलिपियों की अनेक प्रतियाँ देश के विभिन्न भागों में पाई गई हैं, साथ ही इसके प्रकाशित संस्करण भी अनेक हैं — जो इसकी लोकप्रियता के स्पष्ट संकेतक हैं. ‘राजनीति रा कवित’ को नीति-सूक्ति संग्रह की विधा की एक प्रतिनिधि रचना कहा जा सकता है.
हिन्दी में सूक्ति-संग्रहों की विशाल परंपरा रही है, जो अपने समय में इस विधा की व्यापक लोकप्रियता का प्रमाण है. किंतु आधुनिक अध्येताओं में इस विधा के अध्ययन के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं रही. इसे प्रायः फुटकल या उपदेशात्मक पद्य की श्रेणी में रखकर गैर-गंभीर साहित्यिक विधा मान लिया गया. न तो इसे ‘काव्यात्मक’ स्वीकार किया गया, न ही ‘इतिहासात्मक’. संभवतः इसी कारण इस पर कोई सुस्पष्ट सैद्धांतिक निरूपण उपलब्ध नहीं है.
हालाँकि कुछ समकालीन विद्वानों ने संस्कृत की सूक्तियों के संदर्भ में एक वैचारिकी विकसित करने का प्रयास किया है, जिसके अंतर्गत वे इन्हें ‘नीतिगत विमर्श की शिल्पकृतियाँ’ (artefacts of ethics) मानते हैं.[48] उनके अनुसार ये सूक्तियाँ राज-दरबार और राज-सभा के जीवन में कलात्मक तथा नैतिक मूल्य की वाहक हैं.
संस्कृत के नीतिगत विमर्श को समझने के लिए प्रस्तावित इस वैचारिकी का प्रयोग यदि हम हिन्दी के सूक्ति-संग्रहों को समझने में करें, तो कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं — जैसे, इन सूक्तियों के रचयिता और पाठक-वर्ग कौन थे? क्या ये संग्रह किसी बड़े बौद्धिक विमर्श का हिस्सा थे, या किसी विशिष्ट वैचारिक सूत्रीकरण की परियोजना का भाग?
इन प्रश्नों की व्याख्या दो स्तरों पर की जा सकती है. पहला, इन सूक्तियों की भाषा और अंतर्निहित विचारों का अध्ययन उनके समकालीन साहित्यिक और बौद्धिक परिवेश के आलोक में करना. इससे यह समझा जा सकता है कि इन सूत्रों के पीछे कौन-सा व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक आधार कार्यरत था. दूसरा तरीका है — साहित्य को समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से देखना. इस दृष्टि से ‘सूत्रकारों’, उनके प्रश्रयकारों (संरक्षकों) और पाठकों की सामाजिक-सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन आवश्यक हो जाता है.
इन दोनों पद्धतियों को परस्पर पूरक रूप में देखना चाहिए. यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी विधा की रचना, उसकी प्रस्तुति, तथा उसके पाठक और संरक्षक — अपने समय के परिवेश से पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो सकते. प्रत्येक कृति अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ की उपज होती है.
इतिहास-संबंधी स्रोतों की सीमाओं के बावजूद यदि इन दोनों पद्धतियों का संयुक्त उपयोग किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि ‘राजनीति रा कवित’ एक सूक्ति-संग्रह होने के साथ-साथ राजनीति के एक गहरे विमर्श का प्रतिनिधित्व करती है. इसकी विषय-वस्तु में राजनीतिक जीवन में सदाचार की भूमिका, राज-सभाओं में उचित व्यवहार और आदर्श आचरण, तथा राजनीतिक जीवन में ‘नीति’ की संकल्पना जैसे मुद्दों पर मौलिक सूक्तियाँ प्रस्तुत की गई हैं. ये सूक्तियाँ राजनीतिक जीवन के व्यावहारिक पक्षों का सारभूत सूत्रीकरण हैं.
इसे और गहराई से समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम उस सूत्रकार के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को भी देखें, जिसके आलोक में इन सूक्तियों की रचना और अर्थ-संरचना को समझा जा सकता है.
राजनीति की जो परिभाषा देविदास सूत्रबद्ध करते हैं, वह तत्वतः अबुल फ़ज़ल की ‘राजनीति’ और कौटिल्य की ‘नीति’ की परंपरा का पुनःसूत्रीकरण है. देविदास के लिए भी राजनीति एक ऐसा ज्ञान-विषय है, जो विविध परिस्थितियों में सामंजस्य और संतुलन स्थापित करने का कौशल प्रदान करता है. इस ज्ञान के केंद्र में संयम और धैर्य की अवधारणा स्थित है. दृष्टांत के लिए देखें —
काम पर वाम राखै, विस पर अमृत राखै,
आग पर पानी राखै, सोइ जुग जीत है.
देवीदास देखो, ग्यानी सकर की सावधानी,
सबै बात लायक पै राखै राजनीत है॥ [६]
उपर्युक्त सूक्ति में जहाँ राजनीति के मूल तत्वों का सूत्रीकरण मिलता है, वहीं देविदास नीति को सर्वोपरि सिद्धांत और स्वतंत्र ज्ञान-निकाय के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं. वे नीति को धर्म तथा समस्त सिद्धियों का स्रोत मानते हैं. निम्नलिखित सूत्र में नीति को ज्ञान की संहिता कहा गया है, जो न केवल सैद्धांतिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी अत्यंत वांछनीय मानी गई है.
नीति के सम्यक ज्ञान से न केवल सभा में आदर और वाकपटुता प्राप्त होती है, बल्कि इसके पालन से ही राज्य और सत्ता की प्राप्ति संभव होती है. इसीलिए, नीति की महिमा को नौ खंडों में सुनने और सुनाने की अपील करते हुए, देविदास कहते हैं कि राजनीति छोटे लोगों को बड़ा और बड़ों को महान बना सकती है —
नीत ही तै धरम, धरम तै सकल सिद्ध,
नीत ही तै आदर सभान बीच पाइये.
नीत तै अनीत छुटै, नीत ही तै सुख जुटै,
नीत लीयै, बोलै भलो वकता कहाइये॥
नीत ही तै राज राजै, नीत ही तै पातिसाही,
नीत ही को नव खंड माहि जस गाइये.
छोटन को वड़े करै, वड़े महावड़े करै,
तातै सबही को राजनीत ही सुनाइये॥ [१]
स्पष्ट है कि देविदास के लिए राजनीति के विशिष्ट विमर्श के केंद्र में राजसभा का सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन निहित है. नीति का ज्ञान राजसभा में सफलता पाने का एक व्यावसायिक कौशल (professional knowledge) है, जिसमें जीवन के सभी पहलुओं का सम्यक विचार अपेक्षित है.
इस पक्ष को स्पष्ट करने के लिए देविदास ‘सिंहासन-बत्तीसी’ के विमर्श का उल्लेख करते हैं, जिसमें एक आदर्श शासक को बत्तीस सदाचारों और गुणों से परिपूर्ण माना गया है. ‘सिंहासन-बत्तीसी’ संस्कृत की ‘सिंहासन द्वात्रिंशिका’ नामक नीति-कथा का देशी भाषाओं में अत्यंत लोकप्रिय रूपांतरण है. यह कृति मुग़ल दरबार में भी अत्यंत लोकप्रिय रही; फ़ारसी और ब्रजभाषा में इसके कई अनुवाद विभिन्न शासकों द्वारा कराए गए. ‘सिंहासन-बत्तीसी’ राजनीति जीवन के समग्र स्वरूप को प्रस्तुत करती है.[49] इसी समग्रता को देविदास ने ‘बत्तीस दाँतों’ के रूपक के माध्यम से निम्नलिखित रूप में सूत्रबद्ध किया है —
मानस में लच्छन बत्तीस, दाँत हू बत्तीस,
दोऊ ए समान, ऐसे राजनीति मैं कहै.
दोऊ आच्छे उजरे हैं, दोऊ सोभा देत देवो,
दोऊ आच्छे राखि कै, अपने हाथ मैं गहै.
दोऊ एक साथी हैं, पै कदाचित लच्छन जो
रहै तो रहेई, और दाँत ढहै तो ढहै.
सभा माहि बैठ बड़ों मानस कहै जब,
दाँत काढ़ दीने, तब लच्छन कहा रहै॥ [१०९]
इन सूक्तियों के माध्यम से देविदास राजनीति के सैद्धांतिक स्तर पर सूत्र प्रस्तुत करते हैं. हालांकि, इन्हें समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखने पर इनके उद्गम, प्रसार और प्रासंगिकता को सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ समझने की आवश्यकता भी स्पष्ट होती है. इस दृष्टि से, सूत्रकार देविदास के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को उनके ऐतिहासिक संदर्भों में समझना आवश्यक है. यद्यपि ‘राजनीति रा कवित’ देविदास की एकमात्र उपलब्ध रचना है, जिससे उनके व्यक्तिगत जीवन की अधिक जानकारी नहीं मिलती, फिर भी ‘रायसल जस सरोज’ नामक चरित-काव्य हमें उनके जीवन और सूक्तियों के व्यावहारिक पक्ष के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उपलब्ध कराता है. यह चरित-काव्य मुग़ल दरबार के अधिकारी और मनसबदार रायसल दरबारी (मृत्यु: १६१४ ई.) के जीवन पर आधारित है, और इसी के माध्यम से देविदास का उल्लेख मिलता है. इसके अनुसार, देविदास शेखावटी के राजा लूनकरण के दरबार में मंत्री के रूप में कार्यरत थे और एक कुशल नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध थे. राजा लूनकरण ने अपने अनुज रायसल को प्रशिक्षित करने का उत्तरदायित्व देविदास को सौंपा था. इस प्रशिक्षण का उद्देश्य रायसल को मुग़ल दरबार में एक सफल अधिकारी बनाना था.
उस समय छोटे क्षेत्रीय राजघरानों के लिए मुग़ल साम्राज्य की सेवा में सैन्य और प्रशासनिक कैरियर सर्वाधिक लाभकारी अवसरों में से एक था.[50] चूँकि मुग़ल साम्राज्य एक बहु-सांस्कृतिक राजनीतिक व्यवस्था थी, इसलिए वहाँ एक सफल पेशेवर अधिकारी बनने के लिए केवल सैन्य कौशल ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक दक्षता भी आवश्यक थी.[51]
जैसा कि पूर्व में उल्लेखित है, मुग़ल दरबार के नैतिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श की भाषा विभिन्न बौद्धिक परंपराओं — जैसे फ़ारसी अदब और अख़लाक़, संस्कृत नीति, सूफ़ी दर्शन और भारतीय दार्शनिक परंपराओं — से निर्मित थी. ऐसे बृहद सांस्कृतिक परिवेश में सफलता के लिए दरबारी प्रशिक्षण का आधार भी व्यापक होना स्वाभाविक था.[52]
‘रायसल जस सरोज’ देविदास को एक दक्ष प्रशिक्षक और व्यावहारिक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में चित्रित करता है.[53] उन्होंने रायसल को साहित्यिक और बौद्धिक कौशल विकसित करने में सहायता की — ये वही दक्षताएँ थीं जो मुग़ल दरबार के बहु-सांस्कृतिक वातावरण में अनुकूलता प्राप्त करने हेतु आवश्यक थीं.
रायसल के शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में देविदास की भूमिका इस तथ्य को रेखांकित करती है कि मुग़ल और क्षेत्रीय दरबारों में नीति-ज्ञान का महत्त्व अत्यंत केंद्रीय था. यह इस बात का भी संकेत देती है कि नीतिवादी प्रशिक्षण मुग़ल और स्थानीय दरबारों के बीच एक ज्ञानात्मक सेतु के रूप में कार्य करता था.
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ‘राजनीति रा कवित’ में यह उल्लेख नहीं मिलता कि इसकी रचना रायसल के प्रशिक्षण के उद्देश्य से की गई थी. तथापि, एक सूक्ति-संग्रह के रूप में यह ग्रंथ राजनीतिक व्यक्तित्व को नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बनाने वाले सूत्र प्रस्तुत करता है. इसमें एक ओर राज-शासन और उसकी संप्रभुता के प्रति निष्ठा का आग्रह है, तो दूसरी ओर राजसभा में व्यवहार और आवश्यक दक्षताओं का विवेचन भी.
अकबर और जहाँगीर — दोनों के दरबारों में रायसल दरबारी एक सफल अधिकारी बने और उच्च श्रेणी की मनसबदारी प्राप्त की. मनसबदारों के सामाजिक इतिहास से ज्ञात होता है कि इस पद को प्राप्त करना और बनाए रखना अत्यंत प्रतिस्पर्धापूर्ण कार्य था. इसके लिए केवल सम्राट की कृपा ही नहीं, बल्कि प्रभावी सैन्य क्षमता, बौद्धिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक दक्षताएँ — जैसे निष्ठा, धैर्य, वाक्पटुता, तथा राजनीतिक-सामरिक अंतर्दृष्टि — सभी आवश्यक थीं.[54]
‘रायसल जस सरोज’ एक प्रारूपिक चरित-काव्य है, जो अपने नायक रायसल दरबारी को एक विशिष्ट नायक के रूप में प्रस्तुत करती है. यह कृति नायक के चरित्र को केवल सैन्य-शौर्य में ही नहीं, बल्कि साहित्यिक, नैतिक और वाक्-कला जैसे बौद्धिक कौशलों में भी पारंगत के रूप में चित्रित करती है.
एक प्रसंग का उल्लेख यहाँ आवश्यक है. ‘रायसल जस सरोज’ में एक घटना का वर्णन मिलता है, जिसमें रायसल ने अकबर की जान गुजरात के सरनाल के युद्ध के दौरान बचाई थी. युद्ध के समय अकबर अपनी जान बचाने वाले सैनिक को पहचान नहीं सका. युद्ध समाप्त होने पर उसने उस सैनिक को इनाम देने की घोषणा की. इस पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने यह दावा किया कि उन्होंने ही सम्राट की जान बचाई थी.
अकबर को उस क्षण की एक पंक्ति याद थी—“चल हट खल्लड़, क्षत्रियां का हाथ देख.” उसने सही व्यक्ति की पहचान के लिए प्रत्येक दावेदार से यह वाक्य दोहराने को कहा. परन्तु, रायसल ने उस वाक्य को अपमानजनक मानते हुए उसे न दोहराया; बल्कि, अपने वाक्-कौशल और मर्यादित बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए निम्नलिखित पदों में उत्तर दिया[55]—
साह हूत कही रायसल, समय समय कि सार,
समय चुकी बोले सु, जे गुणीजन कहत गंवार.
सेज समय प्रिय सवाल, जो भट जग बाल सुभाखि,
कवि पंडित नीति कहै, रेकरो प्रिय राखि॥[56]
अकबर यह समझ गया कि युद्ध के समय कही गई वह पंक्ति अपमानजनक थी, और रायसल ने उसे न दोहराकर अपनी वाक्-चातुर्य और विवेकशीलता का परिचय दिया. इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि रायसल न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी परिष्कृत और वाक्पटु व्यक्ति थे — जो राज-दरबार के जीवन, विशेषकर संप्रभु शासक से संवाद के लिए आवश्यक गुण हैं.
चरित-काव्य में रायसल के सफल मुग़ल दरबारी कैरियर का श्रेय उनकी साहित्यिक दक्षता और वाक्-कला की निपुणता को दिया गया है. अकबर ने रायसल को अपने हरम का मुख्य पर्यवेक्षक नियुक्त किया, साथ ही उन्हें राज-दरबार का विश्वसनीय अधिकारी और ‘दरबारी’ का दर्ज़ा प्रदान किया. आगे चलकर उन्हें ‘राजा’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया.
‘राजनीति रा कवित’ में देविदास राज-दरबार या राजसभा में सम्मानजनक पद प्राप्त करने को सर्वोच्च योग्यता मानते हैं. उनके अनुसार, वही व्यक्ति राजसभाओं को सुशोभित करते हैं जो प्रबुद्ध, सर्वगुणसंपन्न और नीतिशास्त्र के ज्ञाता हों. वे इस विचार को अत्यंत सूक्ष्मता से सूत्रबद्ध करते हैं.
उनका कहना है कि मानव-जीवन अत्यंत दुर्लभ है, जो अनेक योनियों में भटकने के बाद प्राप्त होता है. अतः इस जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ राजसभा में सम्मान अर्जित करना होना चाहिए—
उरग-मुरग हैं कै, लगर-मगर हैं कै,
दुरद तुरंग हैं कै, थिर जग माई में.
नाहर लंगूर हैं कै, न्यौर हैं कै, नीर हैं कै,
निरचर हैं कै, निठ नर जोन पाई में.
ताहु माझ सुद्ध है, सुबुद्धि सभासद है कै,
समझ की हद है कै, सबै सरमाई में.
एक चिंता मन के चरण चित लाग्यौ नाहि,
देविदास कहै, बड़ी चूक चतुराई में॥ [१०४]
देविदास की सूक्तियाँ राजनीति के उस विमर्श का उद्घाटन करती हैं, जो मुग़ल शासन और सांस्कृतिक व्यवस्था में राजनीतिक जीवन के लिए एक समग्र जीवन-दर्शन प्रस्तुत करती हैं. राजसभाओं की महत्ता को वे जिस रूप में सिद्धांतित करते हैं, उसमें नीति-परक ज्ञान-निकाय की केन्द्रीय भूमिका है.
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि देविदास नीति को धर्म के स्रोत के रूप में देखते हैं, किंतु वे राज-सत्ता के लिए वर्ण-आधारित विचारधारा का उल्लेख नहीं करते — जो कि धर्मशास्त्रीय परंपरा का अनिवार्य तत्व रहा है.
देविदास एक आदर्श राजा की परिकल्पना को ऐसे रक्षक के रूप में करते हैं जो अपनी भूमि और प्रजा के हित-संरक्षण के लिए उत्तरदायी हो. वह राजा, जो अपनी प्रजा के दुःखों और कठिनाइयों का निवारण करे तथा उनका कल्याण एक संरक्षक के रूप में सुनिश्चित करे. साथ ही, वे राजा की बौद्धिक क्षमता को उसकी आवश्यक योग्यताओं में प्रमुख मानते हैं.
यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि राजनीति और नीति के सौ से अधिक सूत्रों वाले संग्रह में एक भी सूत्र ऐसा नहीं है जो आदर्श राजा या शासक के लिए क्षत्रिय होने की अनिवार्यता को प्रतिपादित करता हो. इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं—
पहली, कि नीति और राजनीति के विमर्श में क्षत्रियत्व कोई आवश्यक शर्त नहीं है; और दूसरी, कि संभवतः देविदास के लिए यह प्रश्न अप्रासंगिक था.
चूँकि देविदास एक राजपूत राज्य में अधिकारी थे, इसलिए यह भी संभव है कि उनके लिए क्षत्रियता का प्रश्न व्यावहारिक रूप से महत्त्वपूर्ण न रहा हो. परंतु अधिक तर्कसंगत यह प्रतीत होता है कि नीति के विमर्श में वर्णाधारित दृष्टिकोण को वे अप्रासंगिक मानते थे. यदि क्षत्रिय होने की शर्त उनके लिए महत्त्वपूर्ण होती, तो वे उसका स्पष्ट सूत्रीकरण अवश्य करते.
अन्य नीति और राजनीति-परक ग्रंथों में भी क्षत्रिय-केन्द्रित विमर्श गौण ही रहा है. स्वयं देविदास इसका उदाहरण हैं — जो वैश्य समुदाय से आते हुए भी एक सफल दरबारी और कुशल नीतिज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित हुए.
इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि जैसे धर्मशास्त्रों के लिए क्षत्रिय का प्रवर्ग अपरिहार्य है, वैसे ही नीति-विमर्श में क्षत्रियता गौण है. इसका एक सशक्त उदाहरण हमें देवकवि की ‘राजनीति’ में भी प्राप्त होता है.
देव कवि की ‘राजनीति’: व्यक्तित्व का सांस्कृतिक गठन और संप्रभुता का स्रोत
देव कवि की ‘राजनीति’ विधा की दृष्टि से देविदास की ‘राजनीति’ से एक भिन्न और विशिष्ट रचना है. यह न तो सूक्तियों का संग्रह है, न ही नीति-कथाओं का, फिर भी इसकी संरचना और उद्देश्य दोनों ही राजनीति से संबंधित प्रमुख प्रश्नों से जुड़ते हैं—जैसे कि संप्रभु सत्ता की प्रकृति, उसका स्रोत और उसकी वैधता क्या है और कैसे निर्धारित होती है? साथ ही, यह रचना आदर्श शासक की संकल्पना से जुड़े प्रश्न उठाती है—एक शासक का व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए, उसमें नैतिक-बोध और सौंदर्य-बोध की क्या भूमिका होनी चाहिए?
राजनीतिक विचारों से संबंधित इन मूलभूत प्रश्नों पर देव कवि की रचना एक सुसंगत और सारगर्भित वैचारिकी प्रस्तुत करती है. संक्षिप्त किंतु गहन रचना के रूप में देव कवि की राजनीति अनेक स्रोतों के विचारों का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है. एक ओर यह सूक्ति-संग्रह की शैली में राजनीति के विचारों का सूत्रीकरण करती है, तो दूसरी ओर चरित-काव्य की परंपरा में प्रचलित आदर्श शासक की संकल्पना को आत्मसात करते हुए शासन और शासक की वैधता के प्रश्नों पर अपनी दृष्टि प्रकट करती है.
विधागत दृष्टि से देव कवि की रचना चरित-काव्य और नीति-शास्त्र — दोनों साहित्यिक विधाओं का समन्वित रूप प्रस्तुत करती है. चरित-काव्य अपने नायकों को न केवल आदर्श शासक के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करते हैं, बल्कि उनके राज-शासन की वैधता पर भी एक सैद्धांतिक और परिस्थितिजन्य विमर्श प्रस्तुत करते हैं.[57]
उदाहरण के लिए, संस्कृत के परंपरागत धर्मशास्त्रीय स्रोतों के अनुसार शासन की वैधता शासक के जन्मजात क्षत्रिय होने और उसके शास्त्रीय विधि के अनुसार राज्याभिषेक की प्रक्रिया से निर्धारित होती थी.[58] ये दोनों ही तत्व—क्षत्रिय जन्म और विधिवत अभिषेक—शासक तथा शासन की वैधता की अनिवार्य शर्तें मानी जाती थीं.[59]
हालांकि, इन दोनों शर्तों की सैद्धांतिक मान्यता और व्यवहारिक यथार्थ को लेकर १५वीं से १७वीं शताब्दी के मध्य संस्कृत धर्मशास्त्रियों और मीमांसाकारों के बीच विस्तृत बहसें हुईं, जिनका परिणाम विभाजित मतों के रूप में सामने आया. यह बहस जिस ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भ में चल रही थी, उस समय अधिकांश शासक या तो मुस्लिम थे—जो न क्षत्रिय थे, न ही शास्त्रीय विधि से अभिषिक्त होने के अधिकारी. साथ ही, अनेक स्थानीय शासकों की क्षत्रिय पहचान भी संदिग्ध या विवादास्पद थी.
यह प्रश्न तब और प्रबल हुआ जब मुग़ल सम्राट अकबर ने कुछ चुनिंदा स्थानीय (विशेषतः राजपूत) राजाओं को ‘वतन जागीर’ प्रदान करने की नीति अपनाई, जिसमें शर्त रखी गई कि केवल वे ही राजघराने इस विशेषाधिकार के पात्र होंगे जो क्षत्रिय वंश से हों और जिनके पूर्वजों ने उस भू-भाग पर ऐतिहासिक रूप से शासन किया हो. वतन जागीर से सम्मानित राज्यों को शासन में अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्तता प्राप्त थी — यह एक प्रकार से स्व-शासन का अधिकार था.
अकबर की इस नीति के बाद क्षेत्रीय शासकों और सैन्य-राजनीतिक उपक्रमियों (political entrepreneurs) के बीच स्वयं को ‘क्षत्रिय’ सिद्ध करने की होड़ आरंभ हुई.[60] इसके परिणामस्वरूप कई गैर-क्षत्रिय जातियों के क्षेत्रीय शासकों ने अपनी वंशावली और पौराणिक कथाओं पर आधारित जातीय उत्पत्ति की गाथाएँ लिखवानी शुरू कीं.
ऐसे नायकों के इर्द-गिर्द रची जाने वाली इन गाथाओं के लिए चरित-काव्य सर्वाधिक उपयुक्त विधा सिद्ध हुई. यह विधा न केवल अपने शासक-नायक को आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित करती थी, बल्कि उसे एक गौरवशाली वंश का उत्तराधिकारी भी सिद्ध करती थी.
जैसा कि पूर्व में उल्लेखित है, देव कवि की राजनीति चरित-काव्य और नीति-शास्त्र दोनों का एक संश्लेषित विमर्श प्रस्तुत करती है. परंतु, पारंपरिक चरित-काव्यों से एक महत्त्वपूर्ण प्रस्थान यह है कि देव कवि शासक की सांस्कृतिक और बौद्धिक परिष्कृति को राज्य-सत्ता की वैधता का मूलाधार मानते हैं. वे शासक की सामाजिक या धार्मिक पहचान को गौण ठहराते हैं.
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि देव कवि की राजनीति का नायक एक मुस्लिम शासक है. इस दृष्टि से, देव कवि संभवतः ऐसा विमर्श निर्मित करना चाहते हैं जिसमें शासक का संस्कारित और बौद्धिक व्यक्तित्व ही उसकी शासन-वैधता का प्रमुख आधार हो.
इस विचार पर ध्यान देने से यह स्पष्ट होता है कि देव कवि अपने समय के व्यापक बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श में इस नए दृष्टिकोण को प्रस्तुत और प्रतिष्ठित कर रहे हैं. वे जिन शब्दावलियों और अवधारणाओं का प्रयोग करते हैं—जैसे पुरुषार्थ, पुरुष-अवतार और पूर्ण-पुरुष—वे उत्तर-मध्यकालीन बौद्धिक संसार की स्थापित शब्दावलियाँ हैं, जो उस काल के राजनीतिक और सांस्कृतिक चिंतन को दिशा दे रही थीं.
देव कवि का नायक-शासक सैद्धांतिक स्तर पर ‘पूर्ण-पुरुष’ की अवधारणा का प्रतीक है, जो इस्लामी सूफ़ी विचारधारा के ‘इंसान-ए-कामिल’ के समकक्ष है. दोनों ही अवधारणाएँ शासक को एक ऐसी सत्ता के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो ईश्वरीय कृपा से उत्पन्न होती है और मानव रूप में दैवी गुणों का प्रतिनिधित्व करती है.
यह विदित है कि ‘इंसान-ए-कामिल’ और ‘पूर्ण-पुरुष’ दोनों ही संकल्पनाएँ मूलतः ईश्वरीय शक्ति से प्रदत्त मानी जाती हैं. पुरुष-अवतार की धारणा हिन्दू धर्मशास्त्रीय परंपरा में एक दैवी घटना मानी जाती है, परंतु मध्यकालीन राजनीतिक विमर्श में इन अवधारणाओं का प्रयोग संप्रभुता और वैधता को वैचारिक रूप से स्थापित करने के लिए किया गया.[61]
ये अवधारणाएँ मुग़ल और हिन्दू दोनों प्रकार के शासकों द्वारा समान रूप से प्रयुक्त हुईं. परंतु देव कवि के लिए पूर्ण-पुरुष की अवधारणा किसी विशिष्ट धर्म की धर्मशास्त्रीय (theological) व्याख्या से प्रेरित नहीं है. वे मानते हैं कि पूर्ण-पुरुष का अवतरण प्रभु की कृपा से होता है — और वह किसी भी समुदाय में संभव है.
देव कवि की इस दृष्टि में शासक की धार्मिक या सामुदायिक पहचान उसके शासकत्व की तुलना में द्वितीयक है. इस अर्थ में, उनकी शासक-संकल्पना परंपरागत धर्मशास्त्रीय अवधारणाओं से एक स्पष्ट प्रस्थान प्रस्तुत करती है. राजनीतिक विचार की दृष्टि से यह एक सुधारवादी और समावेशी सोच का प्रतिनिधित्व करती है.
देव कवि की ‘राजनीति’: पूर्ण-पुरुष की संकल्पना और राजनीतिक व्यक्तित्व का विमर्श
निम्नलिखित पदों में देव कवि इस विचार को सूत्रबद्ध करते हैं—
परम पुरुष की कृपा ते होतु पुरुष अवतार.
जिही पुरुषारथ लीक पर चलो जातु संसार॥ [१-१]
जो पूरान पूरन पुरुष व्यापक विमल विसाल.
घट-घट मैं निकटहि प्रकट घर घर दीपक साल॥ [१-२]
इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि देव कवि पुरुष-अवतार को परम पुरुष की कृपा से घटित होने वाली एक दिव्य घटना मानते हैं. इस अवतार का पुरुषार्थ समाज के लिए अनुकरणीय है क्योंकि उसमें दूसरों के जीवन को आलोकित करने की क्षमता निहित है.
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि देव कवि शासक के चरित्र-चित्रण के लिए योगी, वर-ज्ञानी और सुर जैसे आदर्श चरित्रों का उपयोग करते हैं, और इन सभी को प्रभु-अंश या ईश्वरीय कृपा से अवतरित मानते हैं. वे अपने शासक-नायक के लिए पहले “पश्चिम देश के यवन-अवतार” की संज्ञा देते हैं, तत्पश्चात उसे हिंदुस्तान का श्रेष्ठ और उदार पुरुष बताते हैं — ऐसा पुरुष, जिसे दूसरों की सेवा में ही अपने पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है.
देव कवि अपने नायक को हिन्दू और यवन जैसी पहचान से ऊपर उठाकर देखते हैं. वे मानते हैं कि ऐसे “सपूत” जहाँ कहीं भी जन्म लेते हैं, अपने कुल और समुदाय ही नहीं, बल्कि समस्त लोक का कल्याण करते हैं.
जोगी, भोगी, भूप, वर-ज्ञानी, दाता, सुर.
प्रभु इच्छा को अंसु लै जनमत जसरज पुर॥ [१-५]
पहले पच्छिम देस के वरनी जवन अवतार.
ता पिछे वरनो पुरुष हिंद नरिंद उदार॥ [१-६]
जिनकी वचन सुधा अचै, निहचै रहे न प्यास.
परमारथ पुरुषारथनि जग में सुजस उज्यास॥ [१-७]
कै हिन्दू कै जवन घर जहाँ सपूत.
सो कुल कलसा सकल कुल सकल पुरुष पुरहुत॥ [१-८]
इन पदों में योगी, भूप, वरज्ञानी और सुर के साथ शासक को धर्म और सांप्रदायिक सीमाओं से परे रखकर देखना उस समय की राजनीतिक संस्कृति पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है.
भारतीय समाजशास्त्रियों ने सन्यासियों और योगियों को सामाजिक संस्थाओं से बाहर का व्यक्ति माना है, जबकि शासक को हमेशा सामाजिक संरचना का अभिन्न हिस्सा और उसका संरक्षक माना गया है. परंतु देव कवि इन चरित्रों—योगी, ज्ञानी, भूप और सुर—को धार्मिक-सामाजिक वर्गीकरणों से परे रखते हैं, भले ही वे उन्हें ईश्वरीय सत्ता से प्रदत्त मानते हैं.
उनके लिए ‘पूर्ण-पुरुष’ और ‘पुरुष-अवतार’ केंद्रीय अवधारणाएँ हैं, जिन्हें वे एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखते हैं. उनका शासक-नायक एक “सुपुत्र” के रूप में अवतरित होता है, और उसके “पूर्ण-पुरुष” के रूप में विकसित होने के लिए सांस्कृतिक और बौद्धिक परिष्करण को आवश्यक मानते हैं.
देव कवि ‘पुरुष-अवतार’ की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसे सुपुत्र और पुरुषार्थी का समानार्थी बनाते हैं. वे “सुपुत्र” और “पुरुषार्थ” की परिभाषा को राजनीतिक नायकत्व के आधार पर प्रस्तुत करते हैं, जहाँ कल्याण-भावना अनिवार्य तत्व है.
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि देव कवि का सुपुत्र धर्मशास्त्रीय ज्येष्ठाधिकारी (primogeniture) नहीं है. धर्मशास्त्रों में जहाँ ज्येष्ठ पुत्र को ही सुपुत्र और राजसत्ता का अधिकारी माना गया है, वहीं देव कवि के यहाँ सुपुत्र एक पुरुषार्थी नायक है — जो ईश्वरीय कृपा से अवतरित, करिश्माई व्यक्तित्व वाला और जनकल्याण की भावना से प्रेरित है.
निम्नलिखित दो पदों में देव कवि सुपुत्र और आदर्श नायक का रूप चित्रित करते हैं—
सोई सपूतु सोई पुरुषारथी, पुरुष को अवतारु कहावै.
ताही सौ साथु सनाथु सवै, जो अनाथनि हाथनि मैं गथु लावै॥
सो कुल गोतु उज्यारो करै, जग में जसु उज्जलू ताही कौ भावै.
आठहू जामुनी ताही को नामु, सराहियै काहू के काम जु आवै॥ [२-१३]
संपति भाल विसाल लसै, चतुरंग चमू रतिमूर्ति मानियै.
देव दया द्विज दीननि देशि, कृपारस पूरन पुण्य प्रमानियै.
उद्धत वाहू विरुद्धनि युद्धनि, कीरति दुद्धनि सौ गुन सानियै.
धर्म सरूप निरूपन नयाइ, प्रभूपन भूपन कौ पहिचानियै॥ [३-१]
देव कवि के आदर्श शासक का चरित्र न केवल शारीरिक सौंदर्य से सम्पन्न है, बल्कि उसमें दीन, असहाय और पीड़ित लोगों के प्रति करुणा का भाव है. वह युद्ध-कला में दक्ष है, पर साथ ही न्याय-बोध और धर्म-निष्ठा की ईश्वरीय क्षमता रखता है.
अपने नायक को वे एक ऐसे प्रशासक के रूप में देखते हैं जो भेदभाव से परे रहकर स्वयं ही दंडदाता और न्यायकर्ता दोनों की भूमिका निभाता है — जो दंड भी देता है और सेवा भी करता है.
आदर्श शासक के साथ देव कवि एक वैध शासन-सिद्धांत भी प्रस्तुत करते हैं — कि वही साहब (शासक) है, जिसके सभी सेवक सुखी हों, और वही राज्य वैध है, जिसकी प्रजा प्रसन्न हो.
जाकी दया सौ सवै वडे मानस, नैक दयानी घटें सव पाजी.
आपुही दूरी रह्यो भरिपुरि, सु आपुही हाकीमु, आपुही काजी.
मारतु आपु, निवाजतु आपही है, सव के सिर गाजतु गाजी.
साहिबवु सोई, सूषि सब सेवक; राज सोई जु प्रजा सव राजी॥ [३-२]
नीति-विमर्श को और दृढ़ करते हुए देव कवि शासक के लिए मंत्रणा (सल्लाह) को सबसे आवश्यक गुण बताते हैं. उनके अनुसार, शासक के तीन बल होते हैं — सैन्य बल, कोष बल और मंत्रणा बल— जिनमें से मंत्रणा बल को वे सर्वोपरि मानते हैं.
कोष नश्वर है, और सैन्य बल केवल युद्ध की विजय तक सीमित है; किंतु सच्ची विजय तो चित्त की शुद्धता से ही संभव है.
राजनी के बल तीनी कहे, तिनमै वल मंत्रु तिहु वल को वलु.
दूसरो कोस भंडार अखै, धनु जासौ मड्यो महीमंडल को फलु.
तीसरो संगमू सुरणी को, चतुरंग चमू विसरै न कहू पलु.
सत्रुनि जै धरी पत्रु विजै, वसुधा सव सीचै सु चित सुधाजलु॥ [३-८]
कृति के आगामी अंशों में देव कवि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रमुख सिद्धांतों को पुनःसूत्रित करते हैं. वे राजनीति के छह गुण — संधि, विग्रह, आसन (निरपेक्षता), यान (सैन्य तैयारी), समरस्य और द्वैधभाव — को अपने शब्दों में व्याख्यायित करते हैं तथा राज्य के सप्तांग सिद्धांत का भी उल्लेख करते हैं.
इसके साथ ही वे एक शासक के लिए वर्जित आचरणों की सूची भी प्रस्तुत करते हैं — जो कई मायनों में अबुल फ़ज़ल की सूची से मिलती-जुलती है — और यह भी कि यह अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का देशभाषा में अंगीकरण है.
देव कवि की राजनीति एक प्रारूपिक नीति-ग्रंथ है — जो न केवल नीति-विधा के पारंपरिक और शास्त्रीय तत्त्वों को पुनर्परिभाषित करती है, बल्कि उन्हें अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में पुनःस्थापित करती है.
इस कृति का सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह है कि यह राजनीतिक जीवन और संस्कृति में नीति के ज्ञान-निकाय को केंद्रीय स्थान देती है, और शासक को एक उभरती हुई दृष्टि — जिसमें पूर्ण-पुरुष और पुरुष-अवतार जैसी अवधारणाएँ सम्मिलित हैं — के माध्यम से परिभाषित करती है.
निष्कर्ष
इस आलेख में हमने यह देखने का प्रयास किया है कि आधुनिक-पूर्व काल में ‘राजनीति’ की अवधारणा को समझने में देशभाषा में ‘राजनीति’ शीर्षक से रचित कृतियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है. एक ओर ये रचनाएँ राजनीति-विमर्श में निहित अवधारणात्मक परिवर्तनों को पहचानने में सहायक हैं, तो दूसरी ओर यह भी दर्शाती हैं कि भारत में राजनीतिक चिंतन का मूल स्रोत केवल धर्मशास्त्रीय विमर्श नहीं था.
धर्मशास्त्रीय विमर्श के समानांतर एक ऐसा राजनीतिक विमर्श भी विकसित हुआ, जिसने भारतीय राजनीतिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया. इस विमर्श के केंद्र में एक ऐसी बौद्धिक संस्कृति का निर्माण हुआ, जो राजनीति को सामूहिक नैतिकता के बोध से संचालित करने की क्षमता रखती थी.
जहाँ धर्मशास्त्रीय परंपरा जन्मजात अधिकार-भेद और कर्मकांड की रूढ़ियों से बँधी थी— जिसमें शासन की वैधता शासक के अनुष्ठानिक अधिकार पर आधारित मानी जाती थी— वहीं नीति और राजनीति का विमर्श एक नए प्रकार के राजनीतिक नायक की परिकल्पना प्रस्तुत कर रहा था. यह नायक अपनी व्यक्तिगत योग्यता, नीति-बोध और सांस्कृतिक परिष्कार के बल पर शासन की वैधता अर्जित करता था.
धीरे-धीरे विकसित होने वाला यह विमर्श राजनीति और सांस्कृतिक जीवन के अनेक पक्षों को एक साथ समेटने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना था. इसमें रीति-विधा का साहित्य, नीति का ज्ञान-निकाय, तथा राजसभा के इर्द-गिर्द विकसित सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन — सभी की सक्रिय भूमिका थी.
निस्संदेह, राजनीति की यह अवधारणा एक अभिजात्य संकल्पना थी, जो व्यापक बौद्धिक और सांस्कृतिक पूंजी की माँग करती थी; परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इसने राजनीति के कार्य-क्षेत्र को अधिक खुला, गतिशील और प्रतिभा-केंद्रित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इस विमर्श में शासन और प्रशासन का क्षेत्र जन्मगत अधिकार की बजाय प्रतिभा और कौशल की विषय-वस्तु बन गया— जिसे एक स्थापित ज्ञान-निकाय में प्रवेश और साधना के माध्यम से अर्जित किया जा सकता था.
यहाँ शासक-नायक का एक ऐसा प्रारूप निर्मित होता है, जिसके माध्यम से कोई भी शासक स्वयं का आत्म-परीक्षण कर सकता है कि वह एक आदर्श शासक है या नहीं. साथ ही, यह प्रारूप एक सार्वजनिक आदर्श के रूप में भी प्रयुक्त हो सकता था.
इस दृष्टि से, राजनीति की इस अवधारणा में शासक के व्यक्तित्व का सांस्कृतिक परिष्कार उसकी वैधता की अनिवार्य शर्त है. स्पष्ट है कि इस दृष्टिकोण में राजनीति केवल सत्ता के संघर्ष तक सीमित नहीं है, और शासन भी मात्र संस्थागत प्रक्रियाओं के पालन का नाम नहीं है. इस विमर्श के केंद्र में एक ऐसी भाषा और बौद्धिक परंपरा का विकास है, जो राजनीतिक सत्ता के सैद्धांतिक मानक निर्धारित करती है और उसे वैचारिक वैधता प्रदान करती है. यदि राजसत्ता में दैवी हस्तक्षेप को मान्यता दी जाती है, तो साथ ही यह भी अपेक्षित है कि शासक अपने व्यक्तित्व में नीति के मानक मूल्यों को आत्मसात करे. यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई शासक निरंकुश हो जाए, तब भी सत्ता-संचालन के स्थापित विमर्श— जिसमें दरबार, नीति, और परामर्श की परंपरा शामिल है— उसे पुनः एक वैचारिक ढाँचे में बाँध देते हैं. इसी कारण मंत्रणा, सलाह-मशवरा और संवाद की भाषा का विकास केवल प्रशासनिक व्यवहार नहीं, बल्कि एक विकसित राजनीतिक-बौद्धिक संस्कृति का अंग था— जो शासन को न केवल वैधता देती है, बल्कि उसे सांस्कृतिक और नैतिक दिशा भी प्रदान करती है.
संदर्भ
[1] रुबीन्सटीन निकोलाई,/ द हिस्ट्री ऑफ द वर्ड पॉलिटिकस’ (politicus) इन अर्ली मॉडर्न यूरोप, (संपा.) एंथनी पगडेन, द लैंग्वेज ऑफ पोलिटिकल थ्योरी इन अर्ली मॉडर्न यूरोप, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, १९८७, पृ. ४१-५७
[2] इतिहास-लेखन के इन विधायों में प्रमुख रूप से न्यूजीलैंड के इतिहासकर जे. जी. ए. पोकॉक को इसके संस्थापक इतिहासकर माना जाता है क्योंकि इन्होंने राजनैतिक विचारों के इतिहास में उसे ऐतिहासिक परिवेश के बरक्स देखने की वकालत की. बाद में ब्रिटिश राजनैतिक विचारों के इतिहासकार और राजनैतिक सिद्धांतकार, क्विंटन स्किनर ने आगे परिष्कृत किया और यूरोप के संदर्भ राजनैतिक अवधारणाओं के मायने को उनके परिवेश व पृष्ठभूमि के संदर्भ के बरक्स देखने की वकालत किया. ऐसे ‘अवधारणा का इतिहास’ जर्मन इतिहासकर, राइनहार्ट कोशलेक का प्रमुख देन है. इन्होंने, जर्मन शब्दावलीयों का एक लिस्ट बनाया और उनके मायनों में आने वाली तब्दीलीयों का इतिहास लिखने का एक सुगठित प्रयास किया है. उनके काम को सारगर्भित तरीके से समझने के लिए देखें, कोशलेक, राइनहार्ट, द प्रैक्टिस ऑफ कॉनसेपचुअल हिस्ट्री: टाइमिंग हिस्ट्री, स्पैसिंग कॅन्सेप्टस, स्टनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, २००२. और देखें, बॉल टी. फार, व हैंसन, आर. एल. (संपादित) पॉलिटिकल इनोवैशन एण्ड कोंकपेटूअल चेंज, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, १९८९.
[3]देखें, परनाऊ, मार्गरीत व अन्य, (संपादित) सिविलाइजिंग इमोशन्स: कान्सेप्टस इन नाइन्टीन्थ सेंचुरी एशिया एण्ड यूरोप, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१५.
[4] स्किन्नर, क्विंटन. मीनिंग एण्ड अन्डर्स्टैन्डिंग इन हिस्ट्री ऑफ आइडियास, हिस्ट्री एण्ड थ्योरी, वॉल. ८, नंबर, १. १९६९, पृ. ३-५३.
[5] देखें, पैट्रीसिया क्रोन, मिड्यीवल इस्लामिक पोलिटिकल थॉट, एडीनबरा यूनिवर्सिटी प्रेस, २००५.
[6] [6] देखें रुबीन्सटीन निकोलाई, १९८७, पृ. ४१-५७
[7] एक विस्तृत व्याख्या के लिए, देखें, स्किनर, क्विंटन, फाउंडेशनस फॉर मॉडर्न पोलिटिकल थॉट: द ऐज ऑफ रेनोसंस वॉल्यूम 1. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, १९८७
[8] ‘राजनैतिक-पूर्व समाज’ के अवधारणा विकसित करने मे प्रमुख रूप से मानव-शास्त्रियों की भूमिका है. इन्होंने कुछ समाजों को राजनैतिक संस्थानों से अनभिज्ञ करार दिया या तो उन्हे राज्य जैसे संस्था के प्रतिरोधी पाया. ऐसे अवलोकन के लिए देखें, जेम्स स्कॉट, द आर्ट ऑफ नॉट बीइंग गवर्न्ड, येल यूनिवर्सिटी प्रेस, २००९. क्लस्टर्स पीयरे, सोसाइटी अगैन्स्ट द स्टेट, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, १९७४. लेकिन राजनैतिक-पूर्व (pre-political) की अवधारणा प्रख्यात रूप से आता है एरिक हॉबसबॉम के लेखन में. देखें, ‘प्रिमिटिव रेबेलस: स्टडीस इन थे अर्काइक फॉर्मस ऑफ सोशल मूवमेंट इन द १९थ एण्ड २० सेंचुरीज़, मैंचेस्टर यूनिवर्सिटी प्रेस, १९५९. भारत के संदर्भ में मैक्स वेबर ने भारतीय समाज को राजनीति-पूर्व समाज इस आधारर पर करार दिया क्योंकि इनके नजर में आधुनिक पूर्व समाज परंपरागत रूप से राजनैतिक सत्ता को वैधता प्राप्त थी. देखें, वेबर, मैक्स ईकॉनमी एण्ड सोसाइटी: एन आउट्लाइन ऑफ इंट्रप्रेटीव सोसीआलजी, यूनिवर्सिटी ऑफ क्यालिफोर्निया प्रेस, १९७८, पृ. ९०१-९१०
[9] इस धारणा के पीछे औपनिवेशिक इतिहासकारों का बड़ी भूमिका है, खासकर, जेम्स मिल की. इन्होंने अपनी किताब, थे हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया में इस बात पर काफी जोर दिया था
[10] देखें राधा कमाल मुखर्जी, डेमोक्रेसीस इन द ईस्ट : अ स्टडी इन द कॉम्प्रेटीव पॉलिटिक्स, पी एस टी एण्ड कंपनी, लंदन १९२३
[11] इन विषयों पर लेखन का आरंभ इस श्रेय काशी प्रसाद जायसवाल को जात है. इन्होंने २०वीं सदी के शुरूयात में लेखन की एक शृंखला शुरू की जिसमे प्राचीन भारत के राजनैतिक व्यवस्था को एक सांविधानिक व्यवस्था के रूप में दिखाने का प्रयास था. बाद मे यही लेख की शृंखला ‘हिन्दू पॉलिटी’: ए कॉन्सटीचयूशनल हिस्ट्री इन इंडिया इन हिन्दू टाइम्स, नाम से प्रकाशित हुई. राष्ट्रवादी लेखकों के एक पूरी पीढ़ी ने भारतीय राजनैतिक विचारों और संस्थानों के इतिहास लिखा जिसमे, यू. एन. घोसाल, के. एम. पन्निकर, औरोबिंदों घोष, राधा कमल मुखर्जी, ए. एस. आलटेकर, नरेंद्र नाथ लॉ, आर. रामशास्त्री, राधा कुमुद मुखर्जी, एन. सी. बनर्जी, जैसे राष्ट्रवादी चिंतक शामिल रहे.
[12] कविराज, सुदीपतो. ऑन द हिस्टोरिसीटी ऑफ द पॉलिटिकल’: राजनीति एण्ड पॉलिटिक्स इन मॉडर्न इंडियन थॉट, (संपा.) फ्रीडेन माइकल व विंसेंट एंड्रू, कॉम्परिटिव पॉलिटिकल थॉट: थिओ राइज़िंग प्रैक्टिसेस, रुतलेज, न्यूयॉर्क, २०१३.
[13] [13] कविराज, सुदीपतो, द ट्रेजेक्टरी ऑफ इंडियन स्टेट : पॉलिटिक्स एण्ड आइडियाज़्, पर्मानेन्ट ब्लैक, रानीखेत २०१०.
[14] पिछले कुछ सालों में, कुछ भारतीय इतिहासकारों ने भारतीय शासन-व्यवस्था में लोक की भूमिका को दर्शाने का प्रयास किया है. इनमे इसे प्रमुख रूप से मध्य-काल के इतिहासकर हैं. देखें, नंदिता प्रसाद सहाय, पॉलिटिक्स ऑफ पैट्रनिज एण्ड प्रोटेस्ट: द स्टेट, सोसाइटी एण्ड आर्टिसन्स इन अर्ली मॉडर्न राजस्थान,ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, २००६. अभिषेक कैकर, द किंग एण्ड द पीपल: साव्रिन्टी, एण्ड पॉपुलर पॉलिटिक्स इन मुग़ल इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, २०२०. और देखें फरहत हसन, पेपर, परफॉरमेंस, एण्ड द स्टेट: सोशल चेंज एण्ड पोलिटिकल कल्चर इन मुग़ल इंडिया, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, २०२१.
[15] स्टर्नबॅक, लुडविक, चाणक्य राजनीति, मैक्सिमस् ऑन राजा नीति,आदयार लाइब्रेरी एण्ड रिसर्च सेंटर, मद्रास, १९६३.
[16] इस विषय पर बहस के दो पहलू हैं, पहला तो यह की धर्मशास्त्र के प्रकृति और वैचारिकी से जुड़ी प्रश्न है, तो दूसरा पहलू, राज सत्ता के अधिकार और धर्म के बीच संबंध से जुड़े प्रश्न. पहले विषय पर बहस के लिए देखें, डेविस, आर डोनाल्ड, जूनियर, थे स्पिरिट ऑफ हिन्दू लॉ, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१९. पृ. ४७-७०. दूसरे पहलू के लिए देखें, पॉलक, शेल्डन, पोलिटिकल फॉर्मैशन एण्ड कल्चरल ईथास, लैंग्वेज ऑफ गॉडस इन थे वर्ल्ड ऑफ मेन, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, २००६, पृ. २२३-२३७.
[17] लल्लू लाल के राजनीति का अंग्रेजी अनुवाद, जे. आर. डब्लू. एस. लोवे ने १८२७ में किया था. उनके इस अनूदित रचना का शीर्षक ‘राजनीति ऑर टेल्स एक्सजहिबिटिङ द मॉरल डॉक्टरिनस् एण्ड द सिवल एण्ड मिलिटरी पॉलिसी ऑफ द हिंदूस’ था.
[18] एडगेरटॉन फ़्रेंकलिन, द पंचतंत्र: रीकॉन्सट्रकटेड, १९२४
[19] लैथम, जे. डी. इब्न अल मुकफ़ा एण्ड अर्ली अबेसिद प्रोज़, (संपा.) जूलिया आस्तियानी व अन्य, आबेसिद बेलेस्-लेटर्स, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१२. पृ. ४८-७७.
[20] इस विषय पर विश्लेषण के लिए देखें, दाऊद अली, द सुभाषिता, एज एन आर्टफैक्ट ऑफ एथिकल लाइफ इन medieval इंडिया, (संपा.) आनंद पंडियन, एण्ड दाऊद अली, एथिकल लाइफ इन साउथ एशिया, इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१०. पृष्ठ, २१-४२.
[21] देव कवि, राजनीति, (संपा.) लक्ष्मीधर मालवीय, देव ग्रंथावली, तृतीय खंड, नैशनल पब्लिकैशन हाउस, १९६७.
[22] देविदास कृत राजनीति रा कवित (संपा.) नारायण दत्त श्रीमाली, राजस्थान प्राच्य विधा प्रतिष्ठान, १९६८.
[23] रीति-काल और भक्ति-काल के साहित्यिक प्रवृतियों को लेकर कई समकालीन विद्वानों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. वस्तृत विमर्श के लिए देखें, बुश, एलिशन, क्वेस्चनिंग द ट्रोप अबाउट भक्ति एण्ड रीति इन हिन्दी लिटरेरी हिस्टोरीओग्रफी, (संपा.) मोनिका हॉर्स्टमन, भक्ति इन करंट रिसर्च 2001-2003. पृ. ३३- ४७. दिल्ली, २००१. स्नेल, रूपर्ट, भक्ति वर्सज़ रीति? द सतसई ऑफ बिहारीलाल, जर्नल ऑफ वैशनवा स्टडीस, ३/१. १५३-१७०. और देखें राजपुरोहित, दलपत, भक्ति वर्सज़ रीति? द संतस् पर्सपेक्टिव, बुलेटिन ऑफ सोआस, ८४१ १. २०२१ पृ. ९५- ११३.
[24] तिवारी, भोलानाथ, हिन्दी नीति काव्य-धारा, किताब महल, नई दिल्ली १९८४
[25] रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, १९२९, पृष्ठ, २२३.
[26] रसीकेश, रामस्वरूप शास्त्री, हिन्दी में नीति काव्य का विकास, दिल्ली पुस्तक सदन, १९६२.
[27] २०वीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में कोई संदर्भ नहीं मिलता है. रीति-काव्य पर ये इल्जाम लगाए जाते हैं कि वो एक सांस्कृतिक, राजनैतिक, और नैतिक रूप से पतन की ओर अग्रसर समाज के प्रतिनीतिधत्व करने वाली साहित्य है. वो सामंती समाज और राज-दरबार के कुलीन तबके के ऐहिक आनंद के लिए रचे गए थे. रीति-काव्य के प्रति ऐसे निन्दात्मक और तिरस्कारपूर्ण रवैया के दो प्रमुख कारण गिनाए जा सकते हैं; पहले तो यह की रीति-काव्य के प्रति ऐसी नजरिया मध्यकालीन इतिहास के प्रति परिप्रेक्ष्य से ही जुड़ी हुई थी. भारतीय मध्यकाल एक ‘अंधकार काल’ का प्रातनिधित्व करता था, दूसरा कि भक्ति-काल का इतिहास भारतीय इतिहास में एक कीर्तिगान की तरह से मनाया जा रहा था. रीति-काल को भक्ति-काल की तरह एक उन्मुक्तता और धार्मिक व सामाजिक पुनर्जागरण के प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता था, जैसे की भक्ति-काल को कुछ इतिहासकारों ने देखने की पेशकश की थी. दूसरी तरफ, हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने रीति काव्य के एक समग्र संग्रह को कुछ खास साहित्यिक प्रवृतियों मे सीमित कर के देखने की प्रवृति विकसित कर ली थीं. नायिका–भेद, नख-शिख वर्णन जैसे लाक्षणिक प्रधान कथ्य विषयों को विशिष्ट रूप से रेखांकित कर के, रीति काव्यों को बहुत हद तक इन्हीं दो शैलियों तक सीमित कर देतें हैं. जबकि अगर समग्रता में देखें तो रीति साहित्य का ग्रंथ-संग्रह बहुत व्यापक है. इसमें साहित्य के विभिन्न प्रकारों, शैलियों, और विधायें जैसे कि छंदशास्त्र, वर्णका, कोश, नाममाला, चरित काव्य, नीति व राजनीति काव्य, इत्यादि अनेक विधायों की रचनाएँ रीति साहित्य के अंदर लिखी गईं है. गौरतलब बात यह है कि ये सारी रचनाएँ केवल संस्कृत के रचनायों के केवल द्विरावृति और प्रतिरूप नहीं हैं, बल्कि ये एक नई साहित्यिक परंपरा के उत्थान के लिए आवश्यक प्रक्रियों के हिस्से के रूप मे हैं. फिर भी ये बात तथ्य है की रीति साहित्य के प्रधान साहित्यिक प्रवृति जिसमे अधिक लौकिक, और गैर-धार्मिक, गैर-अनुष्ठानिक, विषयों में शृंगार रस की प्रचुरता है. इसलिए, इस काल के चित्रण शृंगार काल मे रूप में जायज ही है.
[28] महावीर प्रसाद द्विवेदी, रसज्ञ रंजन, आगरा, १९२०.
[29] रीति-साहित्य के नए दृष्टि से लिखे जाने वाले परिप्रेक्ष्य के लिए देखें बुश एलिशन, पोइट्री ऑफ किंग्स, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली, २०१२.
[30] [30] मुग़ल और क्षेत्रीय राजायों के संबंध का ब्रजभाषा साहित्य में प्रतिनिधित्व पर चर्चा के लिए देखें, पॉवेल, हेदी, द संतस् , द वार लॉर्ड्स, एण्ड द एम्परर: दडिसकोर्सस ऑफ ब्रज भक्ति एण्ड बुंदेला लॉयल्टी, जर्नल ऑफ इकनॉमिक एण्ड सोशल हिस्ट्री ऑफ द ओरिएंट, वॉल्यूम ५२, नंबर, २. २००९, पृ. १८७-२२८
[31] देखें आचार्य वामन रचित काव्यालंकारसूत्र (संपा. और हिन्दी में अनूदित) डॉ. बेचन झा, चौखंभा संस्कृत संस्थान, १९६७, वाराणसी.
[32] द्विवेदी, हजारी प्रसाद. व त्रिपाठी, विश्वनाथ. संदेश-रासक, हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर, बॉम्बे, १९६५.
बहल, कालीचरण. द हिन्दी ‘रीति’ ट्रडिशन एण्ड थे रसिक प्रिया ऑफ केशवदास: एन इन्ट्रोडक्टरी रिव्यू, जर्नल ऑफ साउथ एशियन लिटरचर वॉल्यूम, १०, नंबर १. १९७४, पृ. १-३८.
[33] बहल, कालीचरण. द हिन्दी ‘रीति’ ट्रडिशन एण्ड थे रसिक प्रिया ऑफ केशवदास: एन इन्ट्रोडक्टरी रिव्यू, जर्नल ऑफ साउथ एशियन लिटरचर वॉल्यूम, १०, नंबर १. १९७४, पृ. १-३८.
[34] इस विषय पर हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों के नजरिए का सर्वेक्षण के लिए देखें, सच्चिदानंद चौधरी, रीति-कालीन रस-शास्त्र, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, काशी १९७१.
[35] बहल, पृ. १७-२३.
[36] देसाई, विशाखा. कनौआईजरस’ डीलाइटस: अर्ली रसिकप्रिया पेंटिंगस इन इंडिया, पी. एच. डीजरटेशन यूनिवर्सिटी ऊफ मिशिगन, १९७५.
[37] पॉलक, शेल्डन, ए रसा रीडर: क्लासिकल इंडियन एस्थेटिक्स, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१६. पृष्ठ २८०.२९०.
[38] भरतमुनी, नाट्यशास्त्र, (अंग्रेजी अनुवाद) मनमोहन घोष, एसीयाटिक सोसाइटी, कलकता, १९६१. खंड २. ३४.१७-१९. पृष्ठ २०३.
[39] केशव दास रसिकप्रिया (संपा.) विश्वनाथ मिश्र, २.३- २.१८. कल्याणदास एण्ड ब्रदर्स, वाराणसी, १९६३
[40] इस विमर्श पर एक सैद्धांतिकी बहस के लिए देखें, फुको, मिशेल. फियरलेस स्पीच, (संपादित) जोसेफ पेयर्सन, सेमिऑटिस, २००१.
[41] यहाँ ध्यातव्य ये है की पंचतंत्र मूलरूप में, बौद्ध धर्म की कहानियों का संग्रह नहीं है. इब्न अल मुकफ़ा ने इस खास कहानी को शामिल किया है. ये कहानी, कालीला व डिमना की अंग्रेजी अनुवाद में इसके की संस्करण में अलग अलग शीर्षक से उपलब्ध है. ज्यादातर अनुवाद इस कहानी को ‘द किंग एण्ड हिस ऐट ड्रीम्स’ के नाम से शीर्षक दिया है. पर कीथ-फ़ॅलकॅनर ने ‘द स्टोरी ऑफ द वाईज़ बिलार’ के नाम से अनुवाद किया है. देखें, ईबं अल मुकफ़ा ‘कलीला वा डिमना’ ओर द फैबल्स ऑफ बिदपाई, (अनु.) आई. जी. एन. कीथ-फ़ॅलकॅनर, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, १९८५, पृ. २१९-२४७.
[42] अखलाक के विचार का विकास में नीति से संबंधित विमर्श की भूमिका के लिए देखें, अरजोमंद, सैयद आमिर, पर्सों-इंडियन स्टैट्क्रैफ्ट एण्ड द मुस्लिम आइडिया ऑफ गवर्नमेंट, इंटरनेशनल सोसीयॉलजी, सेपटेमबर्र, २००१, वॉल १६(३), पृ. ४५५-४७३.
[43] मध्यकाल में अखलाक के मुस्लिम शासन व्यवस्था में उभरते भूमिका को समझने के लिए देखें, आलम, मुज़फ्फ़र, द लैंग्वेजज़् ऑफ पॉलिटिकल इस्लाम: १२००-१८०० ईस्वी सन. पर्मानेंट ब्लैक, रानीखेत २००४.
[44] इंशा-ए-अबुल फजल, खंड, १. पृ. ५७-६०.
[45] हबीब, इरफान, ए पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ मुग़ल एम्पायर- ए स्टडी ऑफ द आइडियास ऑफ अबुल फजल, परोकईडिंग्स ऑफ थे इंडियन हिस्ट्री काँग्रेस, खंड, ५९, (१९९८) पृ. ३२९-३४०.
[46] अबुल फ़ज़ल, आईने अकबरी (संपादित व अनूदित) एच ब्लॉकमान, खंड ३, लो प्राइस एडीशन, दिल्ली 2009, पृ. २७४-२७५.
[47] कौटिलिय अर्थशास्त्र में राजाओं, राजकुमारों, अमात्ययों, मंत्रियों, के लिए सदाचार और अभिरुचि को विकसित करने की सलाह देता है जिससे उनका जीवन, अनुशासित और नियंत्रित हो. देखें, कौटिलीय का अर्थशास्त्र, १.८.२६, १.९.१. और देखें, ६.१.२ व ६.१.८.
[48] अली, दाऊद. द सुभाषिता एज एन आर्टीफैक्ट ऑफ एथिकल लाइफ इन मिड्यीवल इंडिया, (संपा.) पांडीयन, आनंद व अली दाऊद, एथिकल लाइफ इन साउथ एशिया, इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१०, पृ. २१-४२
[49] सिंहासन बत्तीसी का कई संस्करण मिलती है, पर मुग़ल सम्राट शाह जहाँ के लिए ब्रज-भाषा में अनूदित रचना काफी चर्चित है. सुंदर कवि द्वारा अनूदित इस रचना की मूल प्रति अब शायद उपलब्ध नहीं है पर, इसकी मिर्जा अली और लल्लू लाल (अनुवाद, और संपा.) सिंहासन बत्तीसी ऑफ सुंदरदास, हिन्दुस्तानी प्रेस, कलकत्ता, १८०५, उपलब्ध है.
[50] वी. मार्टेन वन डर, सेमी-इम्पीरीअल पॉलिटी एण्ड सर्विस ऐरिस्टाक्रसी: थे मनसबदार इन मुग़ल इंडिया, डाइअलेक्टिक ऐन्थ्रपालजी, १९८८, वॉल. १३, नंबर ३, १९८८. पृ. २१५-२१७.
[51] [51] ब्लैक स्टीफन, कोर्ट्ली कल्चर अन्डर बाबर एण्ड अर्ली मुग़लस्, जर्नल ऑफ एशियन हिस्ट्री, वॉल. २०, २, १९८६, पृ. १९३-२१४. आलम, मुजफ्फर, ए मुस्लिम स्टेट इन ए नॉन-मुस्लिम कांटेक्स्ट, (संपादित) बोरोज़र्दी, मेहरजद, द मिरर फॉर द प्रिंस, इस्लाम एण्ड द थ्योरी ऑफ स्टैट्क्रैफ्ट, सीराकूज यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१३. पृ. ११३-१३२.
[52] मुग़ल संस्कृति में सदाचार, वाक्यपटुता, और राजसभा से जुड़ी कौशल पर विमर्श के लिए देखें, कामरान, मिर्जा, मिर्जानामाह,(अनु.) हुसैन, एम. हिदायत, जर्नल ऑफ ऐसियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, ९, १९१३, पृ. १-१३.
[53] श्रीमाली, नारायणदत, (संपा.) भूमिका, राजनीति रा कवित, राजस्थान राज्य प्राच्च विधा संस्थान, जोधपुर, १९६८ ई. पृ. , ३३-३
[54] रॉय कौशिक, फ्रॉम मामलुक्स तो मनसबदारस्: ए सोशल हिस्ट्री ऑफ मिलिट्री सर्विस इन साउथ एशिया १५००-१६५०. (संपा.) जुरकर, एरिक-यान, फाइटिंग फॉर ए लिविंग: ए कम्पैरटिव स्टडी ऑफ मिलिट्री लेबर १५००-२०००. अमस्टर्डम यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१५. पृ. ८१-११४.
[55] रायसल जस सरोज के एक अंश जो की नारायणदत श्रीमाली द्वारा उद्धृत है राजनीति रा कवित के भूमिका में. देखें, श्रीमलाई (संपा.) राजनीति रा कवित, पृ. ४१.
[56] वही, पृ. ४१-४२.
[57] बुश एलिशन, पोर्टरैट ऑफ ए राजा इन ए बादशाह’स् वर्ल्ड अमृत राय’स बायोग्रफी ऑफ मानसिंह (१५८५) जर्नल ऑफ द इकनॉमिक एण्ड सोशल हिस्ट्री ऑफ द ओरिएंट ५५, २०१२, पृ. २८७-३२८.
[58] ये दोनों शर्तों का जिक्र मनुस्मृति से शुरू होकर, लगभग सभी धर्मशास्त्रों और उनके टीकायों में उपलब्ध है.
[59] विशेष चर्चा के लिए देखें, पॉलक शेल्डन, द एंड ऑफ मैन ऐट द एंड ऑफ प्रिमाडर्निटी, रॉयल निदरलैंडस् अकडेमकी ऑफ आर्ट्स एण्ड साइंसेस, २००५.
[60] डर्क, कॉफ एच. ए. नौकर, राजपूत और सेपॉय: द एथनोग्राफी ऑफ द मिलिट्री लेबर मार्केट इन हिंदुस्तान १४५०-१८५०. ई. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, १९९०.
[61] अकबर के ‘इंसान-ए-कामिल’ की संकल्पना में ईश्वरीय सत्ता की भूमिका पर शोधपरक विश्लेषण के लिए देखें, मोइन, ए. अज़हर, द मिलेनियल सॉव्रेन: सेक्रेड किंगशिप एण्ड सैन्ट्हुड इन इस्लाम, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, २०१२.
| रबि प्रकाश, थापर स्कूल ऑफ लिब्रल आर्ट्स, पटियाला, पंजाब, में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. ईमेल- rprakash.rabi@gmail.com |




“हरि हैं, राजनीति पढ़ि आए!”
रबि प्रकाश का यह आलेख आरंभिक आधुनिक काल में राजनीति की अवधारणा, ‘राजनीति’ शीर्षक वाले प्रमुख ब्रज ग्रंथों के विश्लेषण, तथा संस्कृत के धर्मशास्त्रीय विमर्श के बरक्स देशभाषा में उभरती राजनीतिक नायक-परिकल्पना की गहन पड़ताल है। ब्रज के राजनीति-संबंधी ग्रंथों में गुँथे नीति-बोध, व्यक्तिगत योग्यता और सांस्कृतिक परिष्कार के मानकों पर यह आलेख महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि देता है।
सुचिंतित ,सुगठित और उपयोगी लेख है ये।इस लेख को संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।