| बिना नाम की उदासियाँ एम जे के लिए अंचित |
Abandon all hope ye who enter here
Dante
मैं हूँ ही नहीं मिस झा
सिर्फ़ इस विराट ब्रह्मांड में कौंधता हूँ कभी कभी
कभी कभी कहीं किसी चिराग की रौशनी जैसे
अंधियारी नदी पर एक नौका की रेखा पा लेती है
जैसे एक समुद्री मछली के भीतर कभी कभी
कौंधता है बिजली का एक झटका
एक उज्ज्वल कामना जो तुम लिख रही थी
एक ठुमरी के अंतरे पर थिरका एक घुंघरू
मैं इन अनंत आखिरियों का गवाह
मैं तुम्हारे नशे में झूलता तुम्हारी कमी से दूर
समय के अनंत प्रवाह में,
मैं इन अनंत टूटों का उल्लास,
मैं इनका उजास दुख.
मिस झा,
सुनो मिस झा,
मिस झा
मिस झा
एक बेकार फेंकी हुई मोटरकार के सिरहाने पड़े
एक टायर में जमा पानी सड़ रहा है
भूरा, गंदला, बिना मिट्टी, भभक रहे हैं कीड़े
उमस में बेनामी लाशों की गंध घुल रही है.
बिना खिड़की की एक स्याह दीवार जिसमें गड़ी हैं गिट्टियाँ,
गड़े टूटी बोतलों के टुकड़े चीख रहे हैं निषेध.
उससे टिकी, फटी सीट और जंगाते हैंडिल वाली एक साईकिल
पानी रिस रहा है गंदले फोम से.
अंधेरे में भी जाना जा सकता है कि
लोग रास्ता पार करते हुए वहाँ पेशाब करते होंगे.
यहाँ की स्मृति में घोड़ेगाड़ियों के कोचवान हैं
जिनके शरीर से लीद की बदबू आती है
वर्तमान रोज़ गढ़ता है असफलताओं की नई परिभाषाएँ
देसी शराब और उसका अंधापन हर कोई नहीं जानता भीतर से,
उसकी कड़वाहट, उसका टेक्सचर हर कोई नहीं
महसूस करता अपनी तालू पर.
खुले मैनहोल में जातीं पतली गलियाँ इधर आती हैं,
यहाँ खपरैलों से चू रहा है पानी,
ठसठस भरे हैं लोग जैसे शर्टों की फैक्टरियों में कॉलरों के बंडल रखे होते हैं
यहाँ बेरोज़गारियों के गल्प क़ब्रिस्तानों की पत्थरों पर ख़त्म होते हैं.
वे मौतें नहीं हैं इधर जिनकी उपस्थिति कोई सफ़ेद कपड़ों और कैमरों से जानता है.
मृत्युओं का नाद उम्रदराज़ झड़ते मकान गा रहे हैं,
कूड़ों के ढेर इनके पतों में पैवस्त हैं,
बमों के टुकड़े पेपरवेटों की तरह पड़े हैं,
मुर्दों की हड्डियों में गोलियों के छेद और दस्युओं में जबरन बदल दी गईं स्त्रियाँ,
गिर गए मकानों के मलबे क्रिकेट के विकेट और
पेड़ों और ताड़ी के सपने देखते, न समझ में आते लोग-बाग
जो खप गए जैसे लोहे की जंगाई नाव, बिना नदी के पड़े-पड़े.
यहाँ सबकुछ किसी से कर्ज़े पर लिया हुआ है
कुछ अपना नहीं, न अर्थ, न जीवन, न मोह, न दृष्टि,
अभिधा की एक अश्लील दुनिया जिसका क्षरण मैं तुम्हें कैसे बताऊँगा.
यहाँ रोज़ कोई खो जाता है कभी न मिलने को,
यहाँ रोज़ कोई जेल जाता है फिर बरसों न छुड़ाये जाने को,
नंगे तारों में करेंट बह रही है कि अचरज की तरह चल रही है साँस सूई दर सूई
शताब्दियों से सुनसान बंजर दीयर जहाँ कभी कभी कोई भूत खिलखिलाता है,
अपना सर हाथ में पकड़े, गंदे नाले में तड़के डुबकी लगाता है.
क्या होता है मनुष्य, जैसे तुम जानती हो,
यहाँ कोई नहीं जानता.
क्या होता है गले का दर्द, साँस का फूलना,
काँपना देह का, थरथराना बिना ठंड के,
जैसे यहाँ सब जानते हैं, तुम नहीं जानती.
जिसको तुम सुंदर कहती हो यहाँ वह बारिश नहीं होती
जिस मेघ को तुम दूत मानती हो, वह इधर नहीं आता.
तुम्हारे आसपास जो भीड़ है बोबा पीती हुई
मल्टीकल्चरिज़्म का ढोल बजाती
सौ रुपये से कम दिहाड़ी वालों को दया दिखाती
भर गई है यूनिवर्सिटियों, दफ़्तरों, प्रासादों, शहरों में,
इतिहास अब इनके लिए सिर्फ़ माथे की शिकन जितना रह गया है
मृत्यु तीस सेकंड की क्षणिकता, भरोसा बाज़ार की वारंटी,
और जीवन दोहराव के डांडिया नृत्यों, ईश्वरों, दुकानों, चौराहों पर
गुलामी का झंडा उठाए, ख़ुशी से, प्रत्याशा से कूद रहा है,
यह एक विराट अदृश्यताओं वाला समय है
जहाँ लीक की लाठी चल रही है सबसे मज़बूती से
यह एक प्रश्न की संभावनाओं से हीन समय है
जहाँ आकुलता और करुणा की फैक्टरियाँ उगी हुईं हैं फ्लाइओवरों की तरह.
मैं इस समय कविता जितना बना दिया गया हूँ, कम से भी कमतर.
और हो रहा हूँ नोट की तरह इस्तेमाल, फ़ौरी ज़रूरतों में अपनी उपयोगिताओं से संचालित
कार्यक्रमों में, सभागारों में, संसदों में ग़लत संदर्भों की जानिब
संगोष्ठियों में कॉमिक रिलीफ की तरह संविदा पर.
मुझे चौराहे पर भीड़ पीट कर चली जाती है.
मुझको अकेलापन कैसे सताता है तुम नहीं जानती.
तुम कह भी दो तो मैं एक फूँकी हुई सिगरेट से ज़्यादा नहीं हो पाऊँगा तुम्हारे लिए
बहुत से बहुत एक दूर-तारा जो तुमको फुर्सत के वक्त शौकिया याद आता है
बहुत से बहुत विरह का कोई विमर्श लिखते हुए एक ज़रूरी अनुभव
वह होटल भी नहीं जहाँ तुमने पहली बार शराब चखी थी
मेरा अनजानापन ही तुम्हें मेरे पास लाया था और
एक शाम तुमने मुझे एक राग की तरह बरता, बस!
इधर आते हुए घुटनों तक नालियों से निकला कीचड़ आयेगा
जमे काले पानी को हेलते हुए, उसको सोखते अपनी त्वचा में
इस तरह कि रात नींद में टभटभायेंगे पैर, यहाँ आना होगा.
यह भाषा में नहीं कहा गया लोक है, यहाँ रौशनी पड़ेगी तो डूब जाएगी
यहाँ चाँद मातम पर तना शामियाना है, कविप्रिया.
तुम को कहाँ इधर आना है, तुम मानो न मानो,
तुमने दूर से देखा है सबकुछ
बिना यह गुरुत्वाकर्षण महसूस किए,
बिना डरे यहाँ की धूल से,
बिना यहाँ की आग का पसीना चखे.
तुम्हारे फ़ैसले, तुम्हारी शर्तें, तुम्हारा जग, तुम्हारा जी
इधर इस मलिनता में कैसे आयेंगे!
समय के हिस्से में इस, तुम अपना जाना तय करो
मुझमें दया का सत्कार करने की काबिलीयत नहीं है.
जैसे जामुन के बीज से कहीं भी उग जाता है पेड़ और फिर कहीं नहीं जाता,
मैं यहीं उगा हूँ, इसी मिट्टी में.
मेरी नींद की अतड़ियों से उलझते तुम्हारी देह के रेशे
एक वबा टूटी हुई मेरी बायीं पसलियों पर, इतनी पुरानी
कि जैसे पूरा पुराना शहर बाँबियों में मेरी हड्डियों पर घर बनाता है
कि मेरी मौत के दिन वह सुफ़ैद बस्ती जिसमें तुम नहीं रही कभी
मैं समेट लिए जाऊँगा चयनों और प्रार्थनाओं से दूर,
कुछ नहीं मिलेगा किसी को,
कामना का एक गड्ढा भी नहीं.
तुम तुम्हारे चुम्बन, तुम तुम्हारी छुअन, तुम तुम्हारा रोना,
तुम तुम्हारा धोखा, तुम मेरी पढ़ी हुई किताब,
तुम ख़ुद से निर्वासित, तुम उदासी की सुंदर चाहना,
तुम अपने नाम बदलती, बदलती केंचुलियाँ, बदलती आकार,
और मैं तुम्हारा अधूरा प्रेमी, मिस झा,
जिसको तुमने अपनी बड़ी आँखों में कुछ दिन बसाया था
समय के इस अनंत अनुभवप्रवीण प्रवाह में.
मिस झा मिस झा मिस झा.
![]() अंचित 1990 दो कविता संग्रह प्रकाशित– ‘साथ-असाथ’ और ‘शहर पढ़ते हुए’ |





नोटिस मिलते ही पढ़ने लग गया । अचिंत जी कविता दिमाग़ में हिलोरे ले रही है । यदि रोंगटों का एक पर्यायवाची रंध्र मान लिया जाए तो उभर आए । रिअ’लटि शोज़ में सेलिब्रिटीज़ goose bumps किस वजह से कहते हैं । उन्हें रोंगटे खड़े होना पता है । बीती शाम पड़ोस में एक माँ अपने ८-९ साल के पुत्र से पूछती थी कि येलो दाल बना दूँ । ‘हिन्दोस्ताँ में क्या हो रहा है’ कि भाषा को विकृत किया जाता है । पीली दाल नहीं कह सकती थी । येलो पता है तो पल्स भी पता होगा । ऐसे उदाहरण नईं विवाहित युवतियों को कहते सुनता हूँ । पुत्र से कहती चुप कर डोगी आ जाएगा । मनोवैज्ञानिक रूप से मन में कुत्ते से डर बिठाया जा रहा ।
बहरहाल, कविता झंकृत और झिंझोड़ती है । कॉपी नहीं होती या मुझसे नहीं हुई ।
इसे डायरी में लिख कर कल साझा करूँगा । समालोचन का संदर्भ ज़रूरी है ।
वाह, क्या बात है। प्रेम में अपने होने को न होना करना इसी को कहते हैं। बजबजाती जिंदगी में फिर भी एक नाद है और प्रेम शब्द एक जिज्ञासु पुकार बन गया है कि इतना सब होने के बावजूद कवि मन ही मन चाहता है कि मिस झा उसे सुने।
कोई पुरानी पुकार है जो इस कविता में गुंज रही है। यह पुकार अंचित की कई कविताओं में ध्वनित हुई है। अंचित का मन मूलत: कवि का मन है। प्रिय कवि को बधाई। समय इस कवि को ऊर्जा दे। सुकामनानाएँ 🙂❤
अंचित की ये लंबी कविता महज़ उनके जटिलतम भावों का बयान नहीं.. बल्कि एक विराट परिदृश्य है जिसमें शहर की सड़ांध, बेचैनी, उदासियों की थरथराहट और प्रेम की टूटी पसलियाँ एक साथ धड़क रही हैं. पढ़ते हुए यह कविता आपको अपने भीतर खींच लेती है..जैसे किसी अंधेरी बस्ती की गलियों में चलते हुए अचानक कोई अनाम आवाज़ नाम पुकार दे! ‘मिस झा’ का दोहराव एक haunting refrain बन गया है इसमें, जैसे स्मृति अपने ही मृत भार के साथ लौटकर दरवाज़ा धीरे-धीरे खटका रही हो.
भाषा उतनी ही सांद्र, उतनी ही तीव्र, बहुत raw और बिल्कुल जीवित बिंब जो लगभग त्वचा पर महसूस होते हैं! और सबसे बड़ी बात.. अंचित प्यार को रूमानी नहीं बनाते, उसे raw, real, throbbing, कीचड़ में सना हुआ और मनुष्य की टूटन के साथ आने देते हैं.
यह ईमानदारी दुर्लभ है, प्यार को इतनी क्रूर ईमानदारी से लिखना दुर्लभ है.
इस कविता की सबसे ख़ास बात कि यह सिर्फ़ अर्थ नहीं रचती, एक विराट, भारी, असहज अनुभव रचती है.. ऐसा अनुभव जिसमें असफलताएं, कड़वाहट, धूल, कचरा, आग का पसीना, रोशनी, सड़ांध, सबकुछ बराबर जगह माँगते हैं.
बहुत विलक्षण, बहुत visceral अभिव्यक्ति !
कविता पाठक के भीतर देर तक ठहरती है, उसपर हावी रहती है और अपने साथ एक बेचैन करने वाली चुप्पी बनकर रिसती रहती है. रफ़्ता-रफ़्ता.
मेरी दृष्टि में यह कविता स्वयं में इस समय की विराट तस्वीर है.यहाँ निज का दुःख सार्वजनिक दुःख में परिणत हो गया है.ऐसा बहुत कम होता है और जहाँ जब भी संभव होता है औदात्य स्वाभाविक रूप से आ जाता है. संक्षेप में कहूँ तो क्या नहीं है इस कविता में.आसपास के दृश्यों को उठाकर अंचित ने शब्दों में ढाल दिया है.कविता पढने का सुख होने के बावजूद मन उदास हो चला है.
बेहतरीन।चकित करने वाली कविता।वेदना का विराट दर्शन रचा है अंचित ने।उन्हें मुबारकबाद।
कविता में मिस झा से जो संवाद शैली में कहा गया है वो अपने समय का यथार्थ है सटीक बिंबों में -‘अभिधा की एक अश्लील दुनिया जिसका क्षरण मैं तुम्हें कैसे बताऊंगा .
‘ यहां रोज़ कोई खो जाता है कभी न मिलने को
यहां रोज़ कोई जेल जाता है फिर बरसों न छुड़ाये जाने को ‘
ऐसे अनेक बिंब हैं।आम जिंदगी में जो उदासी तारी है उसका चित्रण कविता में प्रभावशाली है ; संवेदनशील को विचलित करती है।
श्रीमती Plauf के घर से देर रात जब श्रीमती Eszter निकल कर सड़क पर आती है तो शहर का जो वर्णन करती है,उसकी उदासी दिल तोड़ने वाली है –‘the irreversible process of ruin,schism and disintegration would continue according to the own infrangible rules….She saw all this as she saw the rusty shutters on shops not opened for weeks….and suddenly a delightful sensation ran down her spine because this slow decay had,for her long ceased to signify some terminal disillusion… .The Melancholy of Resistance by Laszlo Kransznahorkai.
बेहतरीन कविता।
अंचित के भाव और उनके विचारों के द्वंद इसमें समाहित हो गए हैं। एक अच्छी बात ये है कि उनकी यह कविता पाठक को अपने साथ बांधे रखने में सफल होती है। लोग अक्सर थोड़ी सी भी बड़ी कविता को बीच में छोड़ देते हैं लेकिन इस कविता के साथ ऐसा नहीं होगा। इसमें प्रेम है, द्वंद है, करुणा है, आत्मबोध है, समाज के कटु सत्य भी इसमें शामिल हो गए हैं। समाज, राजनीति और प्रेम के बीच झूलती यह कविता अपने आप में उम्दा है।
शुभकामनाएं 💐
आसपास के ऐसे बहुत सारे दृश्य जो अपने यथार्थ में जुगुप्सा का भाव उत्पन्न करते हैं कविता में जब विविध बिंबो के आलंबन में प्रस्तुत किए जाते हैं तो एक अलग प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इस कविता में कवि ने उसे प्रभाव को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है । लंबी कविता पाठक से बहुत धैर्य की मांग करती है । कविता के अलावा यदि उसमें कथा तत्व हो तो वह कुछ रुचिकर हो सकती है किंतु यदि यह कथा तत्व अपने स्थूल रूप में नहीं है तो पाठक को अपने अवचेतन में उसका एक ताना-बना बुनना होता है। ऐसा ही कुछ प्रयास इस लंबी कविता में मुझे दिखाई देता है। प्रेम का इसमें एक ऐसा चित्र है जो वर्तमान की वीथिका में अतीत की फ्रेम में सजा हुआ दिखाई देता है । अंचित को इस लंबी कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई।
Anchit मैंने पढ़ी तुम्हारी यह कविता। तुरन्त कुछ कहने से ख़ुद को रोक रही हूँ, लेकिन फिर भी कुछ तो कहकर ही दम लूंगी। मालूम है कि प्रतिक्रिया वह होनी चाहिए जो कवि के कुछ काम की हो।
सबसे पहले तो लगा जैसे एक कविता नहीं, किसी श्रृंखला को पढ़ रही हूँ। बिम्बों, दृश्यों का सैलाब है, वे सब अर्थपूर्ण हैं, लेकिन मानो ओवरफ्लो कर रहे हों। एकाग्रता भंग होती है, उनमें स्पेस और खला का एहसास नहीं होता। सभी दृश्यों को एक के बाद एक साफ़ साफ़ देखने की सामर्थ्य जुटाना आसान नहीं है।
अपने धैर्य की सीमा अखरने भी लगती है।
यह असाधारण कविता हो सकती है। लेकिन फिलवक्त मुझे नहीं लग रही।
अंत में मिस झा को तीन बार पुकारना भी शायद अच्छी युक्ति नहीं बन पड़ी। ऐसा मुझे लगा।
कभी प्रिंट लेकर पढूंगी तो शायद मेरी रीडिंग भी अलग हो सकती है।
इस मुख़्तसर कमेंट को स्नेह के रूप में ही स्वीकार करना, यदि हो सके तो। मुझे तुम्हारी सर्जनात्मक ऊर्जा और सामर्थ्य पर भरोसा भी तो कम नहीं है, अंचित।
क्या फलसफा क्या ईश्क और क्या आलमे-बसीत: इनको मिलाजुला कर एक सम्मिश्रण तैयार करना, गोया के च्यवनप्राश बनाने के चक्कर में बारह मसाले की चाट बन गयी हो। लेकिन चाट का भी अपना स्वाद है वरना हर गली और नुक्कड़ पर ठेले न खड़े होते। रचनाकार की दुविधा होती है कलात्मकता और लोकप्रियता के की चाहतों के बीच पेंडुलम की तरह झूलना।