| स्मरण वीरेंद्र यादव की ख़ाली जगह प्रीति चौधरी |
वीरेंद्र जी सामने हैं, उनके बाल माथे पर उसी चिरपरिचित अंदाज़ और शानदार धज से सुशोभित हैं. वीरेंद्र जी का चेहरा बौद्धिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता के ईमान से प्रदीप्त है पर आज आप उनको चाहे जितनी देर देख लें, नमस्ते करते रहें वे प्रत्युत्तर नहीं देंगे. मैं अपने अगल-बगल से लगभग बेख़बर हूँ पर जल्दी ही महसूस करती हूँ कि बगल में जो खड़ी हैं वे सुप्रसिद्ध कवयित्री कात्यायनी हैं जो स्तब्ध और मौन हैं. उनके चेहरे पर दुख की एक घनी परत है. उन्हें एहसास है कि आज के दौर की एक महत्वपूर्ण मौजूदगी अब नहीं रही.
थोड़ी दूर नज़र जाती है तो लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति व सामाजिक कार्यकर्ता रूपरेखा जी अपने को सँभालने की कोशिश करती दिखती हैं पर आँसू उनकी बात नहीं मान रहे हैं. उन्होंने भी आज अपना एक पुराना भरोसेमंद साथी खो दिया है. लखनऊ का साहित्यिक और बौद्धिक समाज आज इस भैसाकुंड के श्मशान पर एकत्रित है, पर जिसको बीज वक्तव्य देना है वो चिरनिद्रा में है. ज़ालिम जनवरी ने लगता है लखनऊ वालों से मानो बैर पाल लिया है, वो चुन-चुन कर लखनऊ को ख़ाली कर रही है. कमाल ख़ान की पुण्यतिथि बीती ही थी कि वीरेंद्र यादव भी लखनऊ वालों को छोड़ गये.
आपकी कमी वे लोग महसूस करेंगे जिन्हें आपसे साहित्य समझने का शऊर सीखना था. आपका जाना उस समूह को भी शिद्दत से सालेगा जो साहित्य की सबाल्टर्न व्याख्या में अपना अक्स पाते थे, आपका जाना नागरिक समुदाय के हर उस हिस्से को पीड़ा देगा जो हर तरह के शोषण और गैरबराबरी की मुख़ालिफ़त करता है. वीरेंद्र जी, आपका जाना उन पाठकों को व्यथित करेगा जो अभी भी साहित्य से ये उम्मीद लगाये बैठे हैं कि साहित्यकार समाज में सार्थक हस्तक्षेप करते हैं.
आप प्रेमचंद के बहाने भारतीय समाज की जातिगत संरचना, उसके बहुआयामी और सर्वव्यापी वर्चस्व को उजागर करते हुए एक समतावादी, मानवीय गरिमा की अलख को जगाए रखना चाहते थे. जूझना और बोलना आपके लिए जीने की ज़रूरी शर्तें थीं. प्रेमचंद पर जब उनकी एक कहानी “ बड़े घर की बेटी” को केंद्र बनाकर उन्हें स्त्री विरोधी साबित करने की चेष्टा हो रही थी तो वीरेंद्र जी ने प्रेमचंद के स्त्री पात्रों की विवेचना कर उनके स्त्री विमर्श पर एक नया अध्याय ही जोड़ दिया. सुभागी, कुसुम, सिलिया और धनिया को रचने वाले प्रेमचंद ही हैं जहाँ एक मामूली किसान स्त्री, मातादीन के मूँछ के बाल नोच लेने का हौसला रखती है. होरी के बरक्स धनिया की मुखरता और सामंती व्यवस्था के प्रति उसका तंज उसकी व्यक्तित्व संपन्नता को बखूबी प्रकट करते हैं.
गोदान को एक नया पाठ प्रेमचंद ने युवा पाठकों के सामने जैसे रखा वह कृषक जीवन के महाकाव्य की बजाय सामंतवाद व सवर्ण वर्चस्व के हल में जुते पिछड़ी जाति के एक किसान के संघर्ष और बलिदान की गाथा बन जाती है, आज की तारीख़ में इसे संरचनागत हिंसा भी कहा जा सकता है.
अपने वक्तव्यों में वीरेंद्र जी कई बार प्रेमचंद की कहानी “सहभागी” का ज़िक्र किया करते थे. सुभागी के चरित्र से उन्हें विशेष अनुराग था, एक स्त्री जो परिश्रम, ईमानदारी, स्वाभिमान और मानवीय गरिमा का साकार रूप है, जो भाई के रहते हुए भी अपने पिता को मुखाग्नि देती है क्योंकि पिता की यही इच्छा थी. प्रेमचंद ने इसी कहानी में दिखाया है कि कैसे सुभागी के गुणों से प्रभावित होकर उसका विवाह जाति की सीमा को लाँघ कर होता है. बक़ौल वीरेंद्र जी तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनज़र प्रेमचंद की इस कहानी को उनकी प्रगतिशीलता के सिग्नेचर मार्क के रूप में देखना ग़लत नहीं होगा.
वीरेंद्र जी आख़िरी कलाम का ज़िक्र भी अपने लेखों, भाषणों और फ़ेसबुक पर बार-बार किया करते थे क्योंकि आज भारत जिस दौर से गुज़र रहा है उस वैचारिक ध्रुवीकरण के आसन्न संकट को दूधनाथ सिंह के तथागत पांडेय ने भविष्यवक्ता की तरह पिछली सदी में ही बताने का जोखिम उठाया था. वीरेंद्र जी की अध्येतावृत्ति ने ही केदारनाथ अग्रवाल के विस्मृत हो चुके उपन्यास “ पतिया” को ढूँढ निकाला था.
कवि केदार नाथ अग्रवाल ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि में स्त्री समलैंगिकता पर दशकों पहले इतना महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा है, यह हिंदी जगत के संज्ञान में लाने वाले वीरेंद्र यादव ही हैं. उन्होंने इस उपन्यास पर एक विस्तृत लेख लिखा जो तद्भव में प्रकाशित हुआ, भारत में यदि मौलिक स्त्री विमर्श पर अनुसंधान हो तो यह पतला-सा उपन्यास भी अपनी जगह ज़रूर बनायेगा भले ही इसे किसी पुरुष लेखक ने लिखा हो. इसी तरह से एक दौर में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों चाक, इदन्नमम और अल्मा कबूतरी को भी चर्चा में लाने और उनकी सम्यक व्याख्या करके उन्होंने स्त्री चेतना से संपन्न देसी स्त्रियों मंदा और अल्मा की तरफ़ उपन्यासों की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने वालों का ध्यान खींचा
अभी हाल ही में विनोद कुमार शुक्ल के जाने से हिंदी साहित्य जगत में व्याप्त शोक आश्वस्त कर रहा था कि लोगों के मन में एक बड़े लेखक के अवदान के प्रति इतना सम्मान है कि हर पीढ़ी के पाठक उन्हें याद करके गमगीन हैं. ज्ञानरंजन जी के जाने की सूचना से लोग उबर ही रहे थे कि वीरेंद्र यादव के यकायक चले जाने की ख़बर ने सबको स्तब्ध कर दिया. कल लखनऊ में जिस तरह से लोग वीरेंद्र जी के अवसान की ख़बर पाकर इकट्ठे हो गये थे और फ़ेसबुक पर राजेंद्र कुमार जी के साथ वीरेंद्र जी को जिस तरह याद किया जा रहा था वो भी उम्मीद बचाये रखने के जतन के रूप में देखा जा सकता है. बतौर आलोचक वीरेंद्र जी लेखक से अपने समय और समाज के बड़े सवालों से जूझने की अपेक्षा करते थे, इसीलिए वे बार-बार प्रेमचंद, रेणु , यशपाल और दूधनाथ सिंह के आख़िरी कलाम पर लौटते थे. वीरेंद्र यादव स्वान्त: सुखाय वाली रचना धर्मिता की बजाय कबीर की परंपरा में विश्वास रखते थे जो अपने तईं उपलब्ध लुकाठी को लेकर जमाने से भिड़ंत करने निकल लेता है.
वीरेंद्र यादव का जाना बहुतों को उद्विग्न कर रहा है, निरंतर धूमिल होती प्रतिरोध की आवाज़ मानो एकदम से मंद पड़ गयी हो. विराट सत्तातंत्र के सूराखों को कलम से कोंच कर उसके मलबे को बाहर लाने का साहस आज के दौर में वही कर सकता है जिसे सत्ता से कोई अपेक्षा ना हो, जो सहर्ष चाटुकारिता कर किसी लाभ के जुगाड़ में ना हो और जिसकी रचनात्मकता दुनिया के केंद्र में सचमुच का जन हो. वीरेंद्र यादव प्रेमचंदमय थे, उनके वाक्य, उद्धरण और प्रस्थापनाएं उन्हें सुनने वालों को याद हो गयीं थीं. उनकी अंतिम विदा में आज जब उन्हें “जनता का लेखक“ कहा जा रहा था तो प्रेमचंद के बगल में कबीर को भी खड़ा कर मित्रगण उनके अनुयायी को सलाम पेश कर रहे थे.
प्रेमचंद के रचना संसार में जहाँ सामंतवाद से जूझते, जातिगत श्रेणीक्रम के दंश को झेलते पात्र देस काल का हाल बयान करते हैं वहीं कबीर धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ बेख़ौफ़ आवाज़ उठाते हैं और दोनों ही आस्था और श्रद्धा की बजाय तर्क और यथार्थ के बूते अपने समय के सच को समझते और कहते हैं .
वीरेंद्र जी ने अपने विशद अध्ययन और चेतना के बूते जो रूप अख़्तियार किया वह ऐसे आलोचक का था जिसका मूलाधार सामाजिक न्याय व समता आधारित लोकतंत्र की आकांक्षा का पोषण था. साहित्य का उद्देश्य अंततः जनता की बेहतरी के लिए है और व्यवस्था के दमन की मुख़ालिफ़त ही उसका मुस्तकबिल है, यही आलोचक वीरेंद्र यादव के मानदंड थे. इस पर जो खरा उतरे वही अच्छा साहित्य. देखा जाये तो घनघोर कविता विरोधी थे वीरेंद्र जी, कविता पढ़ने तक से परहेज करते थे और कलावाद तो उन्हें तड़पा ही देता था. कहना चाहती हूँ कि यदि उनकी प्रखरता का ये मूलबिंदु था तो उनकी सीमा भी संभवतः यही तय करता था. बाद के दिनों में वीरेंद्र जी की अंबेडकर-फूलेवादी चेतना उन्हें रूढ़ वामपंथी साँचे से बाहर निकल कर हाशिये के अस्मितावादी विमर्शों के क़रीब ले जाती है और दलित तथा स्त्रीविमर्श उनकी आलोचना के केंद्र में आते हैं. कल वीरेंद्र जी के न रहने की ख़बर फैलते ही फ़ेसबुक उनकी तस्वीरों से जैसे पट गया,एहसास हुआ कि उनकी जिस सक्रियता से उनके हम जैसे दोस्त कभी-कभी परेशान हो जाते थे वही उन्हें बौद्धिक रूप से अध्ययनशील और चौकन्ना भी बनाये रखता था. वीरेंद्र जी का जाना लखनऊ की साहित्यिक दुनिया की एक अपूरणीय क्षति तो है ही, फ़ेसबुक की उनकी दीवार का सूना हो जाना भी एक सार्थक हस्तक्षेप करती प्रोफ़ाइल का परिदृश्य से ओझल हो जाना है.
(2)
अब बहुत दिनों तक यही बात सालती रहेगी कि कहीं भी किसी कार्यक्रम में मिलने पर मैं हर बार सबसे यही कहती थी कि जल्दी ही एक बैठकी होगी जिसमें सारे साहित्यिक मित्र आयेंगे. यह बैठकी बहुत दिनों से टलते-टलते सत्रह से बीस जनवरी के बीच होना तय हुई थी पर अब यह बात गहरे कचोट रही है कि काश जनवरी के पहले सप्ताह में ही इसे आयोजित कर लेती मैं. मुझे इस बात पर भी ग्लानि महसूस हुई कि इधर उनके घर जाकर ही क्यों नहीं मिल आयी मैं. पिछले दो महीनों के भीतर वीरेंद्र जी से फ़ोन पर मेरी दो बार बातचीत हुई एक माँ की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम की रूपरेखा को लेकर और दूसरी नव वर्ष की शुभकामनाओं के आदान प्रदान को लेकर. इधर पिछले दो सालों से माँ की पुण्यतिथि पर अपने विश्वविद्यालय में नयनतारा स्मृति व्याख्यान और जेंडर सेंसेटाइजेशन से संबंधित कार्यशालाओं का आयोजन कर रही हूँ. मैं चाहती थी कि वीरेंद्र जी भी उस कार्यक्रम का हिस्सा बनें. इसके बाबत जब मैंने वीरेंद्र जी को आमंत्रित किया तो ‘जीवन को रचती स्मृतियाँ’ विषय वीरेंद्र जी को कुछ जँचा नहीं था, ऐसा मुझे महसूस हुआ या फिर इस तरह के अमूर्त क़िस्म के विषय में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. मेरी योजना थी कि यदि वीरेंद्र जी हाँ बोलेंगे तो वो भी अखिलेश जी के साथ ही आ जाएँगे पर ऐसा हो ना सका. बताना लाज़िमी है कि अखिलेश जी और वीरेंद्र जी के सिर्फ़ घर ही नहीं पास हैं, दोनों के दिल भी एक दूसरे के बहुत क़रीब रहे हैं. वीरेंद्र जी से गंभीर और लंबे लेख लिखवा लेने का श्रेय भी अखिलेश जी को है. तद्भव की विकास यात्रा की कभी बात होगी तो हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकारों की सर्वश्रेष्ठ आकाशगंगा नज़र आयेगी और उसमें वीरेंद्र यादव नाम का नक्षत्र भी अपनी आभा बिखेरेता नज़र आयेगा.
वीरेंद्र जी ने कई बार मेरे कुछ लेख और कविताओं को पढ़ने के बाद मुझे व्यवस्थित रूप से कुछ ठोस लिखने को भी कहा जो मैंने अपने वीतरागी स्वभाव के कारण कभी नहीं किया. अलका सरावगी की सरलादेवी चौधरानी पर आयी किताब की जो समीक्षा मैंने की थी उस पर भी उन्होंने एक प्रदीर्घ लेख लिखने के लिए ज़ोर दिया था. कैफी आज़मी प्रेक्षागृह में मैंने कितनी ही बार उनके साथ मंच साझा किया पर कई बार वीरेंद्र जी की बहुत लंबा बोलने की आदत से मुझे खीझ भी होती थी, मुझे हमेशा लगता है कि एक वक्ता को चाहे वो जितना बड़ा नाम हो अपने निर्धारित समय से ज़्यादा नहीं बोलना चाहिए .
पिछले मार्च में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्त्री विमर्श से संबंधित एक आयोजन में शिरकत कर जब हम इलाहाबाद से लखनऊ लौट रहे थे तो गाड़ी में वीरेंद्र यादव जी भी साथ थे. वीरेंद्र जी वैचारिक प्रतिबद्धता के रास्ते पर इतना लंबा सफ़र तय कर चुके थे कि कई बार उसके पार या उससे इतर देखना भी शायद ख़ुद के साथ उनको बेईमानी करने जैसा लगता होगा. हर मसले पर फ़ेसबुक पर त्वरित प्रतिक्रिया करते देख वीरेंद्र जी के हम जैसे बहुत सारे दोस्तों को लगता था कि उनको थोड़ा रुक कर गंभीर लेखन करना चाहिए, पर वीरेंद्र जी इस समय में चुप्पी को अवांछनीय मानने लगे थे उन्हें प्रतिकार करना था तो वे इन टिप्पणियों को बहुत ज़रूरी मानते थे, और साथ ही अपने लिखे हुए पर बहुत लोकतांत्रिक तरीक़े से सहमति और असहमति के बिंदुओं पर राय दर्ज करते रहे थे. राहत की बात ये है कि वीरेंद्र जी ने अपना लिखा हुआ अधिकतर अब प्रकाशित करके पाठकों के सामने छोड़ दिया है. उनकी आख़िरी किताब ‘विमर्श और व्यक्तित्व‘ मार्च 2025 में इलाहाबाद से लौटते समय मुझे मिली. ’उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता ‘और ‘उपन्यास तथा देस‘ पुस्तकों ने अपनी प्रखर और गहन समीक्षात्मक दृष्टि से साहित्यिक समाजशास्त्रीय आलोचना के क्षेत्र में निश्चित रूप से नये आयाम जोड़े हैं. नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसे दिग्गजों के साथ हमने वीरेंद्र यादव से भी बहुत कुछ सीखा है.
आज जब वीरेंद्र जी से आख़िरी मुलाक़ात कर के लौटी हूँ तो उनसे हुई अपनी पहली मुलाक़ात याद आती है. ये साल दो हज़ार दो के कथाक्रम का वार्षिक आयोजन था और लखनऊ में मेरी रहनवारी का पहला साल भी. अख़बार में कथाक्रम के कार्यक्रम से संबंधित सूचना पढ़ कर मैं उमानाथ बली प्रेक्षागृह पहुँची थी. पहुँचने पर पाया कि सभागार खचाखच भरा हुआ है और बैठने की तनिक भी जगह नहीं है. मैं जगह तलाश ही रही थी कि एक दाढ़ी वाले सज्जन ने बड़प्पन दिखाते हुए अपनी कुर्सी ख़ाली करके मेरे हवाले कर दी. बाद में पता चला कि वे प्रसिद्ध रंगकर्मी वेदा राकेश थे जो कथाक्रम के आयोजक मंडल में हुआ करते हैं. तब का कथाक्रम लखनऊ में होने वाला सबसे भव्य साहित्यिक आयोजन हुआ करता था जिसकी अनुगूँज अगले कथाक्रम तक देशभर में बनी रहती. कथाक्रम में हमेशा से मंच को खुला रखने की रवायत थी और मंचासीन वक्ताओं के अलावा सभागार में बैठे लोगों को भी अपनी बात कहने का अवसर प्राप्त होता था.
मैं जेएनयू छोड़कर दो तीन महीने पहले ही लखनऊ आयी थी तो संगोष्ठियों में बोलना और सवाल पूछना व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप से अनुस्यूत था. अब जब मैं बीसेक साल पहले की बातों को याद कर इन पंक्तियों को टंकित कर रही हूँ तो ये एहसास तारी है कि पिछले चौबीस पच्चीस सालों में समय समाज देश और खुद मैं, कितने बदल चुके हैं.
कथाक्रम के आख़िरी सत्र में जब मंच को सबके लिए खोल देने की उद्घोषणा हुई तो मैंने अपना नाम पर्ची पर लिख कर आगे बढ़ा दिया. टिप्पणी करके जब मैं मंच से उतरी तो दो लोग पास आकर बहुत शराफ़त से प्रशंसात्मक और उत्साहवर्धन करने लगे. इन दोनों से जो उस दिन परिचय हुआ वह समय के साथ प्रगाढ़ होता गया. तद्भव के संपादक अखिलेश और आलोचक वीरेंद्र यादव से परिचय प्राप्त कर उस दिन जो ख़ुशी हुई वह हमारे लखनऊ में बनाये संसार का ज़रूरी हिस्सा बन गयी. मैंने वीरेंद्र जी से कहा कि आप वहीं वीरेंद्र यादव हैं ना जिन्होंने रोहिंटन मिस्त्री के अंग्रेज़ी उपन्यासों पर तद्भव में लिखा है.
अब वीरेंद्र जी हमारे बीच भले नहीं हैं, पर जब भी जनता के लेखन की बात होगी आपका नाम अलग आभा से प्रदीप्त होगा, अब तो जब तक हिंदी समाज प्रेमचंद को याद रखेगा, प्रेमचंद की बात बार-बार करने, उनके सरोकारों को याद दिलाने के लिए ये दुनिया वीरेंद्र यादव को भी याद रखेगी. सत्ता की सरपरस्ती करते साहित्यकार बड़ी कुर्सियाँ तो हासिल कर सकते है, बड़े लोगों की तारीफ़ करने के इनाम भी पा सकते हैं, पर वे भी ये जानते हैं कि जब उनको भारतीय मूल्यों के प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, उन्होंने क़सीदे पढ़े थे.
प्रीति चौधरी ने उच्च शिक्षा जेएनयू से प्राप्त की है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, राजनय, भारतीय विदेश नीति, लोक नीति और महिला अध्ययन के क्षेत्र में सक्रिय हैं. लोकसभा की फेलोशिप के तहत विदेश नीति पर काम कर चुकी हैं. साहित्य में गहरी रुचि और गति है. कविताएँ और कुछ आलोचनात्मक लेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.बुंदेलखंड में कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार की महिलाओं को राहत पहुँचाने के उनके कार्यों की प्रशंसा हुई है.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में राजनीति विज्ञान पढ़ाती हैं.
preetychoudhari2009@gmail.com |

सक्रिय हैं. लोकसभा की फेलोशिप के तहत विदेश नीति पर काम कर चुकी हैं. साहित्य में गहरी रुचि और गति है. कविताएँ और कुछ आलोचनात्मक लेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.बुंदेलखंड में कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार की महिलाओं को राहत पहुँचाने के उनके कार्यों की प्रशंसा हुई है.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में राजनीति विज्ञान पढ़ाती हैं.



वीरेन्द्र यादव से बहुत उम्मीदें थीं कि वे साहित्य के यथार्थ को पूरी तरह पहचान सकेंगे, मृत्यु ने उन्हें इतना वक्त ही नहीं दिया, नाकाबिल और नाकारा लोग साहित्य में कूड़ा करते रहते हैं और अच्छे लोग जल्दी चले जाते हैं,,,,सादर स्मरण,,,
वीरेन्द्र यादव जी के साथ छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा बिलासपुर के संयुक्त आयोजन ।। प्रसंग मुक्तिबोध ।। के दौरान दिन बातचीत तो होती थी, असली बातचीत लगती शाम से देर रात तक होती थी । यह और भी अच्छी बात रही कि उनको एयरपोर्ट तक बिदा करने का मौका मुझे मिला और खूब बातें भी हुई।इस बीच उनके आलोचनात्मक दृष्टि और सामाजिक बोध को साक्षात जानना-समझना हुआ। असमय हमने उन्हें खो दिया।
बहुत सच लिखा प्रीति जी ने।वीरेंद्र यादव का मौन साहित्य में बुलंद आवाज़ का चुप हो जाना है।उनकी आलोचना और पुस्तकें ही अब पथ -प्रदर्शक का कार्य करेंगी।कोविड के दौरान उन्होंने अति उत्साह के साथ जेएनयू की मेरे हिस्से की कक्षा को उपन्यास पर समृद्ध,लंबा ऑनलाइन व्याख्यान दिया था -ढाई घंटे के व्याख्यान में उन्होंने प्रेमचंद की स्त्री -दृष्टि की गुत्थियों को सुलझाया तो मन में अपार आदर उमड़ा कि -आज भी ऐसे लोग हैं जो एक बार के अनुरोध पर अपनी समूची पढ़ाई -लिखाई को छात्रों के साथ बेहद सहजता से साझा कर डालते हैं,यूँ ही!प्रीति जी ने अद्भुत स्मृति -लेख लिखा है और मुझे मालूम है कि इसका एक शब्द भी बनावटी नहीं है।भाव,वैचारिक चेतना और स्मृति प्रवाह की सात्यता के साथ समालोचना के क़द को बढ़ाने का काम यह लेख कर रहा है।प्रीति चौधरी की संवेदनशील बौद्धिकता क़ाबिले -तारीफ़ है।वीरेंद्र जी की स्मृति को नमन।उनका न होना अब भी अविश्वसनीय -सा है।
वीरेन्द्र दादा के व्यक्तित्त्व और साहित्य-संसार में उनकी ठोस उपस्थिति के मायने बताता हुआ प्रीती जी का यह संस्मरण उदास करता है।
वीरेन्द्र यादव का कार्य हिन्दी साहित्य में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह रचना को उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों से काटकर नहीं देखता। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि जनपक्षधरता, वैचारिक सजगता और प्रतिरोध की चेतना से निर्मित है। वे साहित्यिक प्रतिष्ठानों, बाज़ारवादी प्रभावों और आलोचना की रूढ़ियों पर प्रश्न उठाते हुए उसे एक सृजनात्मक और हस्तक्षेपकारी कर्म के रूप में स्थापित करते हैं। इस कारण उनका लेखन समकालीन हिन्दी साहित्य को समझने का एक ज़रूरी बौद्धिक उपकरण बन जाता है।
वीरेन्द्र यादव की आलोचना की सबाल्टर्न दृष्टि हिन्दी साहित्य में हाशिये पर पड़े समुदायों, अनुभवों और भाषिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को केन्द्र में लाने का प्रयत्न है। वे साहित्य को प्रभुत्वशाली और अभिजात वर्गों की संवेदना का विस्तार मात्र नहीं मानते, बल्कि उसे उन आवाज़ों का क्षेत्र मानते हैं जिन्हें इतिहास, सत्ता और स्थापित साहित्यिक कैनन ने लम्बे समय तक दबाया या अदृश्य किया। उनकी आलोचना में सबाल्टर्न केवल एक सामाजिक श्रेणी नहीं, बल्कि एक ज्ञानात्मक और वैचारिक स्थिति है—जहाँ से साहित्य, भाषा और सौंदर्यबोध का पुनर्पाठ किया जाता है।
वीरेन्द्र यादव अपनी आलोचकीय दृष्टि के माध्यम से अभिजन साहित्यिक मूल्यों, एकरैखिक इतिहास-बोध और कथित ‘ उदात्त साहित्य’ की संकल्पना पर प्रश्न उठाते हैं। वे दलित, आदिवासी, स्त्री और अन्य श्रमशील वर्गों के अनुभवों को साहित्यिक मूल्यांकन का अनिवार्य आधार बनाते हुए आलोचना का लोकतांत्रिकीकरण करते हैं। इस अर्थ में उनकी सबाल्टर्न आलोचना हिन्दी साहित्य में केवल प्रतिनिधित्व की माँग नहीं करती, बल्कि आलोचना की दृष्टि, भाषा और सत्ता-संरचना को बदलने का हस्तक्षेपकारी प्रयास करती है।
प्रीति चौधरी का संस्मरण आलेख ‘ वीरेन्द्र यादव की खाली जगह ‘ पढ़ा. उन्होंने बहुत आत्मीय ढंग से वीरेन्द्र जी के लेखन, विचार और हस्तक्षेप की उनकी भूमिका को रेखांकित किया है. आलेख में उनके असमय जाने की कसक भी है जो हम सबको चुभ रही है.
आत्मीय, तरल। जैसे चाक्षुष भी।
प्रिय लेखक की याद का गद्य।
सचमुच वीरेंद्र जी के हस्तक्षेप के बिना वैचारिक/ साहित्यिक स्पेस कितना सूना लग रहा है। यह स्पेस कोई नहीं भर सकता।
ऐसी शख्सियत को इसी तरह याद करना चाहिए। उनके व्यक्तित्व और कर्म के कितने ही पहलू आत्मीय ढंग से उभरे और सीमाओं पर उंगली रखने में कोई गुरेज नहीं किया गया।
समतामूलक चेतना के वाहक व्यक्ति को याद करने और उनकी परंपरा आगे ले जाने का तो यही सलीका है। इसी से हमें भी अनुमान हुआ कि कैसे लोकतांत्रिक परिवेश में आप लोग के संवाद होते रहे होंगे। सीमाओं को इंगित करती उंगली से ठस्स चेतना ही क्षुब्ध होती है। उन्नत चेतना में तो इससे रंध्र खुलते हैं।।
जेंडर दृष्टि को लेकर काफी समय से पेंडिंग था उनसे एक लंबा संवाद। अब वह कभी आवाज के जरिए नहीं हो पाएगा। यह एक अतिरिक्त अफसोस भी है उनकी अनुपस्थिति से उपजा।
इस कठिन समय में वीरेन्द्र जी की पारखी, तीखी, हस्तक्षेपकारी उपस्थिति बहुत जरुरी थी। उनके न रहने से बड़ा शून्य पैदा हो गया है। प्रीति जी ने सटीक टिप्पणी की है।
वीरेंद्र जी के व्यक्तित्व और उनके वैचारिक, बौद्धिक हस्तक्षेप सभी पक्षों को समेटे बहुत सारगर्भित टिप्पणी, हम जैसे तमाम लोगों को वो बगैर निजी परिचय के भी अपने इसलिए लगते रहे क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक संवाद किया, सहमति के साथ व्यापक असहमतियों को स्पेस देते हुए! वो सच में पब्लिक इंटेलेक्चुअल थे, इस दौर में उनके जैसे बौद्धिक हस्तक्षेप, विमर्श और संवाद करते रहने वाले का जाना एक बहुत बड़ी क्षति है!
वीरेंद्र जी को बहुत गहराई से याद लिया है, उनका अवदान बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रीति जी ने उनके महत्त्व और प्रभाव को बहुत सार्थक अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है।