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समालोचन

Home » कृष्ण कल्पित : || गद्य की ग़ुरबत उर्फ़ छंदों को देश-निकाला ||

कृष्ण कल्पित : || गद्य की ग़ुरबत उर्फ़ छंदों को देश-निकाला ||

by arun dev
October 30, 2020
in कविता
Reading Time: 35 mins read
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वैद्य को कविराज भी कहा जाता था. प्राचीन सभी विद्याएँ छंद की मदद से कंठस्थ हो लम्बे समय तक सुरक्षित रहीं, चाहे वह कौटिल्य का अर्थशास्त्र ही क्यों न हो. पर ये कविताएँ न थीं. छंद भर होने से कोई भी गद्य पद्य नहीं हो जाता.

लम्बे समय तक कविताएँ छंदों में कही जाती थीं सभी भाषाओं में. अब अधिकतर कविताएँ, अधिकतर भाषाओं में  छंद जैसे किसी अनुशासन में नहीं लिखी जाती हैं. इससे इनकी  सामूहिक सम्प्रेषणीयता पर बहुत बुरा असर पड़ा है अब यह अकेले में पढ़ी जाने वाली क्रिया हो चली है.  

कविता में छंद के पुनरागमन को लेकर कुछ कोशिशें भी इधर की गयीं हैं और उनपर बहस मुबाहिसे भी चलते  रहते  हैं.   

कवि कृष्ण कल्पित की ये ग्यारह कविताएँ छंद में नहीं लिखी गयीं हैं पर कविता से छंद के रिश्तों पर आधारित हैं, कवित्व से भरपूर हैं, और इस नजदीकी रिश्ते के टूटन की तड़प आप यहाँ बखूबी महसूस कर सकते हैं.

आज कृष्ण कल्पित का जन्म दिन भी है. आप सबकी ओर से उन्हें बधाई .

और आपके लिए ये कविताएँ  



                          || गद्य की ग़ुरबत
   
   उर्फ़ छंदों को देश-निकाला ||
   

                      कृष्ण कल्पित 

                      
                     

 (१)

आज़ादी से कुछ वर्ष पहले
और तार-सप्तक के प्रकाशन के कुछ बाद
जब आधुनिक नागरी प्रचारिणी सभा ने
जारी किया यह फ़रमान कि छंद अब पुराने हुए
उनकी आभा मटमैली हुई
नए साहित्य में इनके लिए नहीं बचा कोई स्थान

उपेक्षित और अपमानित होकर
छंद निकल आए कविता से बाहर
छंद निकल आए हिन्दी-भवन से बाहर

तब से भटक रहे हैं छंद
इस महादेश के रास्तों पर
गाड़िया लुहारों की तरह बंजारों की तरह यायावरों की तरह बेरोज़गारों की तरह

वे सुनसान रास्तों से गुज़रते हैं
भटकते हैं वीरान रातों में
गीत गाते हुए मजीरा बजाते हुए
लोहा गर्म करते हुए लोहा कूटते हुए

वे ठहर जाते हैं कभी किसी सुदूर गाँव में
किसी सुनार के सुरीले कंठ में
किसी जोगी के इकतारे में किसी स्त्री के रुदन में

वे करते हैं विश्राम
किसी बूढ़े पीपल किसी अश्वत्थ किसी नीम किसी बरगद की घनी छाँव में
पुरानी स्मृतियों में डूबे हुए !


(२)


छंद अब बेकार हुए
जैसे बेकार हुई बैलगाड़ियाँ
जैसे बेकार हुए इक्के-तांगे और पालकियाँ-डोलियाँ
केवल रिक्शे अभी भी बचे हुए हैं
जो चल रहे हैं शहर की सड़कों पर
त्रिष्टुप छंद के बल पर

साइकिल चलाते हुए बच्चे, मज़दूर और कुछ अभागे नागरिक अभी बचे हुए हैं
जो साध रहे हैं अपने चपल पाँवों का छंद

अपने ही देश में विस्थापित छंद
भटक रहे हैं पगडंडियों और धूल भरे रास्तों पर
गिरते सम्भलते और संतुलन साधते हुए !

(photo by Yeow Chin Liang)


(३)


अपने ही देश में जब छिन गई उनकी नागरिकता
तब देश निकाले का फ़रमान सुनकर
छंद चले जिप्सियों की तरह अपना देश छोड़कर

तब वेद-त्रयी भी चली उनके साथ
छंद मेरे पाँव हैं कहा वेद-त्रयी ने
वे जहाँ जाएँगे मुझे भी जाना होगा
छंद के छोटे-छोटे पहियों ने ढोया है मुझे
पाँच हज़ार वर्षों तक
मुझे स्मृति से अधिक बचाया है छंदों ने !


(४)


वेद-त्रयी चली तो
साथ-साथ चले सभी छंद
त्रिष्टुप चला अनुष्टुप चला
एकपदा द्विपदा और पँक्ति छंद भी चला साथ
अगाध चला वृहती चला गायत्री चला अष्टि चला
प्रगाध चला प्रस्तार चला शक्वरी चलाऔर साथ में अत्यष्टि और अतिजागती भी चला

मालिनी-मंदाक्रांता जैसे वर्णिक छंद भी चले
रोला रूपमाला और दोहा चौपाई जैसे
मात्रिक छंद भी चले

त्रयी के पीछे-पीछे
आदिकवि वाल्मीकि चले
कालिदास चले तो उनके साथ उपमा चली
भारवि का अर्थ-गाम्भीर्य चला

सरहप्पा चले दोहाकोश के साथ
गोरख चले जोग जगाते हुए
अमीर ख़ुसरो भी चला साथ सितार बजाते हुए
दो सुखने गाते हुए
जायसी चले तो तुलसीदास भी चले
पद्मावत और रामचरितमानस चला साथ

कासी का जुलाहा भी चला
दोहा रमैनी और साखी के साथ
कबीर के साथ रैदास भी चले मीरा भी चली
नाचते हुए
मतिराम चले घनानंद चले गंग चले केशव चले
तुकाराम चले अभंग गाते हुए

मीर चले ग़ालिब चले सौदा चले ज़ौक़ चले
फ़िराक़ चले मजाज़ चले जोश चले
रवीन्द्र चले नज़रुल चले इक़बाल चले
पंत चले प्रसाद चले निराला चले महादेवी चली
और चले नागार्जुन

संगीत चला
और चला पदलालित्य

ऊँटों की सात कतारें चली
प्राचीन पांडुलिपियाँ लादकर
कुमैत अश्वों का समूह चला सीमा पार करता हुआ !


(५)


\”छंद अब पुराने हुए. आधुनिक समय की जटिलताओं, विडम्बनाओं और विरोधाभासों को छंद में व्यक्त करना अब असम्भव है . इस आधुनिक समय में भारतीय साहित्य को भी आधुनिक होना होगा. छंद अब अजायबघरों की वस्तु है. छंद कविता का अंधविश्वास है-  इसे मिटाना होगा. छंद पिछ्ड़ेपन की निशानी है . हमें पश्चिम की तरफ़ देखना होगा . सभी भारतीय भाषाओं को नए साहित्य और नई कविता का निर्माण करना होगा. खुली खिड़कियों से बाहर झाँकना होगा .\”


आज़ादी के कुछ वर्ष बाद एथेंस की साहित्य-कला अकादमियों की नक़ल में बनी भारतीय साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने सारस्वत-सभा में उक्त प्रस्ताव को पारित कराने के बाद कुछ अनुवादकों को कविता के पुरस्कार अर्पित किए. नयी दिल्ली के कॉपरनिकस मार्ग पर अवस्थित रवीन्द्र-भवन की तीसरी मंज़िल स्थित साहित्य अकादमी के कार्यालय के एक कक्ष में कपड़ों से बंधे पुराने दस्तावेज़ों में यह प्रस्ताव आज भी ज़रूर धूल खा रहा होगा !



(६)


इसके बाद पुताई ही कला थी. अनुकृति ही मूल थी . नॉवेल ही उपन्यास था. शॉर्ट-स्टोरी ही कहानी थी. ड्रामा ही नाटक था. क्रिटिसिज़्म ही आलोचना थी. सटायर ही व्यंग्य था. एस्से ही निबंध था.

कला से आकृतियाँ ग़ायब थीं. कथा से क़िस्सागोई लुप्त थी. आलोचना से काव्यशास्त्र बेदख़ल था. कविता से वक्रोक्ति और रस नदारद था.


अब कोई रसिक नहीं था. कोई दर्शक नहीं था. कोई पाठक नहीं था. कोई भावक नहीं था.

यह एक नीच-ट्रेजेडी थी. दारुण-दुखान्तिका थी. अवर्णनीय अधोपतन था.

अब अनुवादक ही कवि था ! 


 

(७)


यूरोप से उठी
आधुनिकता की आँधी में
देखते-देखते
कविता कला में बदल गई जो कभी पंचमी विद्या थी

यदि कविता कला होती
तो कवि कलाकार होता
नहीं होता ब्रम्हा का सहोदर

कलाएँ चौंसठ थी
जिसे उपविद्या में परिगणित किया था वात्स्यायन ने

आधुनिक वात्स्यायन के तार-सप्तक के बाद
कविता कलाकारी थी
कलाबाज़ी थी सरासर दग़ाबाज़ी थी
पूरब की परम्परा के साथ

कविता अब बढ़ई की खाट थी
अनुकरण का अनुकरण थी !


(८)


भटक रहे हैं छंद
पूरब से पश्चिम उत्तर से दक्षिण
दक्षिण से उत्तर पश्चिम से पूरब
अपने ही देश में उजड़े हुए अपने ही घर में पराये

चले जा रहे हैं छंद
जैसे घर लौटते बेरोज़गार मज़दूर

कई कुचलकर मर गए रेलगाड़ियों से
कइयों ने दम तोड़ दिया भूख से
नंगे-पाँव लहू-लुहान

वे चल रहे हैं अनवरत और बिना थकान
छंद से कट रहे हैं छंद
गिरते-पड़ते गाते-गुनगुनाते
चले जा रहे हैं छंद !


(९)


देखकर कवियों का कारवाँ
काव्यशास्त्रकार भी चले पीछे-पीछे

भरतमुनि चले
भामह चले भरत चले
काव्यमीमांसा वाले राजशेखर चले
आनन्दवर्धन मम्मट दंडी चले
क्षेमेन्द्र कुंतक और अभिनव गुप्त
पण्डितराज जगन्नाथ चले

अलंकार रस रीति ध्वनि वक्रोक्ति
सभी सम्प्रदाय चले
छंदों के कारवाँ के साथ
नदियों पहाड़ों और रेगिस्तान से गुज़रते हुए !

(१०)

क्या सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हुई कविता
इस धरा-धाम से
क्या मिट गईं पाँच हज़ार वर्ष पुरानी स्मृतियाँ
क्या छिन गया हमसे हमेशा के लिए
कविता का ऐश्वर्य !

क्या अब गुज़र-बसर करनी होगी
गद्य की ग़ुरबत में !


(११)


फिर कब खिलेंगे इस मरुभूमि में
कविता के पुष्प

फिर कब बरसेगा
अटूट पानी धारासार
फिर कब होगी यह वसुंधरा छंदमय !

________________________

कृष्ण कल्पित

K -701, महिमा पैनोरमा,
जगतपुरा,जयपुर 302017.
Mob:  7289072959/krishnakalpit@gmail.com
Tags: कविताएँ
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