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समालोचन

Home » सहजि सहजि गुन रमैं : निर्मला पुतुल

सहजि सहजि गुन रमैं : निर्मला पुतुल

by arun dev
January 8, 2012
in Uncategorized
Reading Time: 71 mins read
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निर्मला पुतुल ख्यातनाम हैं. निर्मला के काव्य संसार में आदिवासी स्त्री अस्मिता के सरोकार नगाड़े की तरह बजते हैं. यह ऐसी पुकार है जिसने हिंदी कविता का भूगोल बदल दिया है. ये कविताएँ सम्बोधित हैं अपने समाज से और शेष संसार से भी. इसमें लगातार छले गए सबसे भले लोगों की वेदना है, नाराजगी है, और सबसे बड़ी बात इस छल को समझने और उससे जूझने की तैयारी है. वैश्विक पर साथ-ही-साथ एकअर्थी होते जाते समय में अपने शब्दों के ऐश्वर्य और साहस को बचाने की एक कोशिश है यहाँ.
नई कविताओं के साथ कुछ चर्चित कविताएँ भी दी जा रही हैं.

निर्मला पुतुल
06 मार्च 1972 ई, दुधनी कुरूवा, दुमका (झारखंड)

नगाड़े की तरह बजते शब्द (भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली)
अपने घर की तलाश में (रमणिका फाउण्डेशन, नई दिल्ली)
फूटेगा एक नया विद्रोह (शीघ्र प्रकाश्य)
अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया, कन्नड़, नागपुरी, पंजाबी, नेपाली में भी कविताएँ अनुदित
सम्मान
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा ‘साहित्य सम्मान’ 2001 में
झारखंड सरकार द्वारा ‘राजकीय सम्मान’, 2006 में
महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित, 2008 में
हिमाचल प्रदेश हिन्दी साहित्य अकादमी्, द्वारा सम्मानित, 2008 में आदि अनेको सम्मान
जीवन पर आधरित फिल्म बुरू-गारा, जिसे 2010 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला

सम्प्रति
सचिव, जीवन रेखा
अपना पूरा समय लेखन, सामाजिक एवं शैक्षणिक कार्यों को समर्पित
ई-मेल:nirmalaputul@gmail.com





















अगर तुम मेरी जगह होते


जरा सोचो, कि
तुम मेरी जगह होते
और मैं तुम्हारी
तो, कैसा लगता तुम्हें?


कैसा लगता
अगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होता तुम्हारा गाँव
और रह रहे होते तुम
घास-फूस की झोपड़ियों में
गाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथ
और बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी में
देखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरा 
तो, कैसा लगता तुम्हें?



कैसा लगता
अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ता
कोस भर दूर से ढोकर झरनों से पानी
और घर का चूल्हा जलाने के लिए
तोड़ रहे होते पत्थर
या बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, 
या फिर

अपनी खटारा साइकिल पर
लकड़ियों का गट्टर लादे
भाग रहे होते बाजार की ओर सुबह-सुबह
नून-तेल के जोगाड़ में!


कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चे
गाय, बैल, बकरियों के पीछे भागते
बगाली कर रहे होते
और तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाए
किसी स्कूल जाते बच्चे को.


जरा सोचो न, कैसा लगता?
अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठी
चाय सुड़क रही होती चार लोगो के बीच
और तुम सामने हाथ बाँधे खड़े
अपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होते
किसी काम के लिए


बताओं न कैसा लगता ?
जब पीठ थपथपाते हाथ
अचानक माँपने लगते माँसलता की मात्रा
फोटो खींचते, कैमरों के फोकस
होंठो की पपड़ियों से बेखबर
केंद्रित होते छाती के उभारों पर.


सोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,
कि अगर किसी पंक्ति में तुम
सबसे पीछे होते
और मैं सबसे आगे 
और तो और

कैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होते
और चिपटी होती तुम्हारी नाक
पांवो में बिबॉई होती?
और इन सबके लिए कोई फब्ती कस
लगाता जोरदार ठहाका
बताओ न कैसा लगता तुम्हे..?
कैसा लगता तुम्हें..?



कुछ भी तो बचा नहीं सके तुम


तुम्हारे पास थोड़ा सा वक्त है…..
अगर नहीं तो निकालो थोड़ी फुर्सत
याद करो अपने उन तमाम पत्रों को
जिससे बहुत कुछ बचाने की बात करते रहे हो तुम


बताओ दिल पर हाथ रखकर सच-सच
तुमने क्या-क्या बचाया अपने भीतर
संकट के इस दौर में ………
बचा सके मेरा विश्वास
मेरी तस्वीर, मेरे खत, मेरी स्मृतियाँ
मेरी रींग, मेरी डायरी, मेरे गीत
मेरा प्यार, मेरा सम्मान, मेरी इज्जत
मेरा नाम, मेरी शोहरत, मेरी प्रतिष्ठा ?
निभा सके अपना वचन, अपनी कसमें
लड़ सके अपने अस्तित्व और इज्जत के लिए
अपने वादे, अपने विश्वास की रक्षा के लिए
लड़ सके वहाँ-वहाँ उससे

जहाँ-जहाँ जिससे
लड़ने की जरूरत थी
कर सके विरोध
जहाँ विरोध की पूरी संभावना थी ?


माँगे हो कभी अपने आपसे उसका जवाब
सवाल करते रहे हो तुम एक पुरूष होकर, हजारों पुरूषों से.
आलिंगन, स्पर्श, चुंबन बचा सके तुम
जिसके दूर-दूर तक बचे रहने की कोई उम्मीद नहीं
ओैर न ही विश्वास दिलाने को पुख्ता सबूत ?


बचा पाये अपने भीतर, थोड़ी सी पवित्र जगह
जहाँ पुनर्स्थापित कर सको अपने खोए देवी को ?


अभी-अभी यह सब पढ़ते
किसी चील की झपटदार चंगुल से
बचा सकोगे इसे
जिसकी एक-एक शब्द
खून, आँसू, नफरत और प्रेम के
गाढ़े घोल में डूबी है.


कुछ भी तो बचा नहीं सके तुम
और तो और तन-मन भी बचा नहीं सके तुम
जिस पर थोड़ा सा भी गर्व करके
खुद को कर सकूँ तैयार
तुम्हारे वापसी पर ………..



मिटा पाओगे सबकुछ


तो मिटा दो न
भयानक काली रात को
जो बरबस उमड़ती घुमड़ती
चुभती है मेरी आत्मा को
कैसे मिटा पाओगे
मेरी यातनामय गूंगी चीत्कार

क्या करोगे क्रूर नजरों और नजरानों का
निपट अकेले जूझ रही हूं जिनसे
मेरी नाभी में उठते शूल को ?


मन सिंहासन पर विराजमान
इंसाफ माँगती स्त्री के उठते
बलात्कारित सवालों को
कैसे मिटा पाओगे?


क्या पाँव में चुभे
काँटो की तरह
कूरेद निकाल फेंकोगे
आत्मा में फंसी हुई पिन
गर्भ में गड़ी हुई जहर बुझी तीर
अन्दर ही अन्दर
नासूर बन टीसते टीस को
मिटा पाओगे किसी जन्म में?


हजारों स्त्रियों के
बचाव में लड़ती
जो खुद को बचा नहीं सकी
तेरी हैवानियत से
हजारों स्त्रियों की उफनती बेबसी को
मेरे बलात्कारित होने का जबाव दे
क्या मिटा पाओगे उन सबकी बेबसी ?


अभी-अभी जब बता रही हूँ
क्या सुन रहे हो मेरी आवाज
क्या समझा सकोगे खुद को ही
अपने जीवन और जन्म के रहस्य?


सीधे-सीधे पूछती हूँ तुमसे
रात के सन्नाटे में
क्या कभी काँपती नहीं है तुम्हारी रूह
क्या कुछ भी तुम्हें याद नहीं आता
सुनाई नहीं देती औरतों की हिचकियाँ
और मेरी चुप्पी
क्या तुम्हें सुनाई नहीं देता
क्या तुम सो पाते हो
बेखबर हो नींद में
ले पाते हो खुली साँस
क्या पलक ढंपी आँखों से
दिखता नहीं मेरा मासूम चेहरा
अपनी निरीहता का सबूत माँगते ?


क्या तुम्हें नहीं लगता कि
तुमने किया है कत्ल मेरे विश्वास का
मेरी आबरू को सहेजने के बजाय
चढ़ा दी बलि
ऐसे में तुम पर समर्पित हो
कैसे कर लूँ यकीन
क्या करूं न करूं
बोलो न
कैसे मिटा पाओगे मेरा यह संशय
यह दुख यह दर्द
और अंधेरा
जो जून से जून तक फैला है.


आखिर कहें तो किससे कहें


वे कौन लोग थे सिद्धो-कान्हू
जो अंधेरे में सियार की तरह आए
और उठा ले गए तुम्हारे हाथों से तीर-धनुष
तुम्हारी मूर्ति तोड़ी
वे कौन लोग थे,

तुम आज जिन्दा होते तो
शायद ही ऐसा दुस्साहस करता कोई.


सुनी नहीं जिन्होंने तुम्हारी वीरता की गाथा
पढ़ा नहीं तुम्हारा इतिहास
वे तीर और तीर के लक्ष्य नहीं जानते
तभी तो इतिहास के पन्नों से
मिटाना चाहते हैं तुम्हारा नामों निशान.


वे कितने नादान हैं, बेईमान
कभी लुच्चा लंपट बता-बता कर
छोटा करते रहे तुम्हारी कद
और तुम्हारे आंदोलन को
देश की आजादी न मानकर
एक झूठी कहानी को बताते रहे सच.


आदिवासीयत के नाम पर
तुम करते रहे सच्ची वीरता की विरासत का बंदरबांट
देखते रहे तुम्हें हिकारत से वे
उड़ाते रहे मजाक तुम्हारी लंगोटी का
सोतार कह अभी भी
तुम्हारे वंशजों को चिढ़ाते बाज नहीं आते.


वे कौन लोग हैं
चाहते क्या हैं, जानते क्या हैं,
जो उठाते रहे सवाल तुम्हारे कुर्बानी पर
ताकि साबित कर सके तुम्हें आवारा बदमाश
फिर उतना बड़ा योगदान आदिवासियों का
कैसे रास आएगा भला उन्हें
हमारे किए करते हैं राज
और हमें आदमी तक नहीं मानते
उन्हें यह बात चुभती है, पेट में पथरी सी
उबकाई आती है उन्हें
दरअसल वे डरते हैं तुमसे सिद्धो-कान्हू
तभी तो गहरी रात में उठा ले जाते हैं तुम्हारे तीर धनुष.


और किसका क्या कहना
अपने बुशी सोरेन को देखो
राजभवन के दरवाजे पर डंका पीटते हुए
आर-पार की लड़ाई की करते हैं घोषणा
उन्हें आज तक नहीं मिली
तुम्हारे निहत्थे कर दिए जाने की खबर
और तो और
जिस रोज कायरों ने तोड़ी प्रतिमा तुम्हारी.


कल तक जो तुम्हारे साथ
एक जुट हो लड़ रहे थे
वे आज अपनी-अपनी कुर्सी के लिए लड़ रहे हैं
पर तुम तो कभी कुर्सी के लिए लड़े नहीं
और उस वक्त कोई कुर्सी नहीं थी.


देखो न
तुम्हारे नाम भुनाकर जो सत्ता पर काबिज हैं
लड़वा रहे हैं हमें आपस में ही अब
चाहे वो बुशी सोरेन हो या जुन मुंडा हो
टिफिन मराण्डी हो या नील सोरेन हो.


भूल गये वे आज
जिस कुर्सी पर विराजमान हैं
वह तुम्हारी हथेलियों पर टिकी है.


अंग्रेजों के अप्रत्यक्ष उत्तराधिकारी अभी भी
अपनी मानसिकता के साथ सक्रिय हैं सिद्धो-कान्हू
काश! तुम होते तो देखते
तुम्हारे नारे से हमारे ही विरूद्ध
और तुम्हारे विरूद्ध लड़ रहे हैं वे.


कैसे लड़े इनसे
कैसे निपटे हम
हमारे तीर-धनुष सब इनके कब्जे में ही तो है.


और फादर टोप्नो की सुनो
वे तुम्हारे आंदोलन को बता रहे हैं
महाजनों और जमींदारों की लड़ाई
इन मगजहीनों का हम क्या करें
इनसे कैसे शुरू करें लड़ाई
पर करना तो होगा कुछ न कुछ
देखो न पड़ा है नगाड़ा किनारे उदास
और भाई सब हड़िया पीकर कैसे दिमलाए हैं यहाँ-वहाँ
सिद्धो मैं पीटती हूँ नगाड़ा
कि इसकी आवाज सुन
तुम आओगे कहीं न कहीं से
मैं पीटती हूँ नगाड़ा.



जब टेबुल पर गुलदस्ते की जगह बेसलरी की बोतलें सजती हैं


यह कहते हुए
शर्मिन्दा महसूस कर रही हूँ
कि बाजार में घूमते
जब प्यास लगती है
तो पानी से ज्यादा
पेप्सी और स्प्राइट की तलब होती है
पता नहीं कब
हमारी प्यास में घुस गया यह सब.


सभा सम्मेलनों में आते-जाते
कब बोतल बंद पानी ने
जगह बना लिया हमारे भीतर
कि अब हम अपनी यात्राओं में भी
बेसलरी की बोतल साथ रखते हैं.


वे सारे लोग
जो हममे देशज संस्कृति तलाशते हैं
झारखण्डी अस्मिता पर बोलवाते हैं
और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर
हमारी राय चाहते हैं
वही लोग बेसलरी की बोतलें बढ़ाते हैं
बोलते-बोलते जब प्यास लगती है सभा में.


अब जबकि गुलदस्ते की जगह
सम्मेलनों में हमारे टेबुलों पर बेसलरी बोतलें सजती हैं
न चाहते हुए भी पानी पी-पीकर बोलना पड़ता है
अपने इलाके के सूखे स्रोतों  पर.


ऐसे में जब बाजार से गुजरते
एक ग्लास पानी मिलना कठिन हो गया है
और पेप्सी आसान
नहीं चाहकर हम आसान रास्ते अपना लेते हैं दोस्त ! 
आखिर वे लोग

जो हमारे भीतर
जल-जंगल-जमीन बचाने का जज्बा देखते हैं
झारखण्डी अस्मिता और देशज संस्कृति तलाशते हैं
उन्हीं की संगति ने हमारी भाषा बिगाड़ दी
और प्यास बुझाने के लिए
पेप्सी और स्प्राइट का चस्का लगा दिया.

















क्या तुम जानते हो


क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत ?

घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन
के बारे में बता सकते हो तुम ?

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता ?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ?

सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तो के कुरुक्षेत्र में
अपने…आपसे लड़ते ?

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठे खोल कर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास ?

पढ़ा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ
शब्दो की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को ?

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ो को अपने भीतर ?

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं !
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में…..?




उतनी दूर मत ब्याहना बाबा !


बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन

वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी

उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे .

मत चुनना ऐसा वर
जो पोचई और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर

काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर

कोई थारी-लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर

जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या  कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए हमे

और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया

और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो \”ह\” से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ

ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…..

महुआ की लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी

मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
    ऐसी जगह  मुझे  ब्याहना !

उस देश में ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
         वहीं ब्याहना मुझे !

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोडे और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदल बजाने में हो पारंगत

बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल

जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
      उसी से ब्याहना मुझे !!

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