भारत जैसे देश के लिए यह महान राष्ट्रीय पर्व है. हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धियों का उत्सव है, भौतिक,सामरिक, सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक उपलब्धियों का उत्सव है. याद आते हैं वे दिन जब विद्यालयों में पढते हुए हम गणतंत्र दिवस या पंद्रह अगस्त मनाया करते थे. कागज पर तिरंगा बनाते हुए और उसे बांस की टहनियों पर फहरा कर चलते हुए एक रोमांच होता था. तब दूरदर्शन और टीवी चैनल न थे. इंडिया गेट से राष्ट्रपति तक गुजरने वाली रंग बिरंगी झांकियां नहीं देखी जा सकती थीं. पर अब सब कुछ बदल गया है. तकनीकी क्रांति और वैज्ञानिक अनुसंधानों ने देश का नक्शा बदल दिया है. देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. हर नागरिक सच्चे मायने में आजाद है,यह वह अनुभव करता है. आज जब अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने वाली कट्टरतावादी ताकतें दुनिया-भर में मौजूद हैं, हमारा संविधान इसका पक्षधर है. कमजोर और पिछड़े वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए संविधान कटिबद्ध है. देखकर आश्वस्ति होती है कि एक समावेशी समाज बनाने के लिए हमारे महापुरुषों ने कितना श्रम किया है.
आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी गणतंत्र की ताकत और लोकतंत्र की मजबूत परंपरा को लेकर आशावादी दिखते हैं. उनका कहना है कि \”यह भारत का सौभाग्य है कि इसके प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू हुए जो इतिहास के विद्वान थे, जिन्होंने ‘भारत: एक खोज’ जैसी पुस्तक लिखी. उनकी आंखों में सपना था समाजवाद व सेक्यूलरिज्म के सिद्धांतों पर आधारित शासन का. दूसरे सबसे बड़ी बात यह कि हमने अपने यहां लोकतंत्र को सुरक्षित रखा है जो कि दुनिया के तमाम मुल्कों में नहीं है.\”जहां वे इस दौरान दलित चेतना नारी चेतना बैंकों के राष्ट्रीयकरण, आणविक शक्ति के विकास व खाद्यान्न निर्भरता को सराहते हैं वहीं उन ताकतों की आलोचना करते हैं जो रूढिवादी व अतीतजीवी हैं तथा वैज्ञानिकता व वैचारिकता का विरोध करती हैं. वे कहते हैं , \”इसमें कोई शक नहीं कि देश आगे बढ रहा है पर आज वित्तीय पूंजी व नव साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा खतरा हमारी संस्कृति व भाषाओं पर पड रहा है. आधुनिकता को लेकर हमारी धारणा बहुत भ्रामक है. आधुनिक रूस भी है, जापान भी, अमेरिका भी; पर क्या वे अपना स्वत्व भूल चुके हैं. अपनी परंपराएं भूल चुके हैं, राष्ट्रीय अस्मिता भूल चुके हैं. हम देशकाल से संपन्न राष्ट्र हैं, हमारी सांस्कृतिक विरासत है, हमारी औषधियां, जीवन पद्धति, सहिष्णुता अन्यत्र अलभ्य हैं. जरूरत इस बात की है कि आज आकाश भूमि जल व अग्नि पर पूंजीवाद का आघात गहरा हो रहा है, वर्तमान पीढी को पूरी सक्रियता से इसकी चिंता करनी चाहिए. क्योंकि सक्रियता ही सबसे बड़ा मूलमंत्र है.\”कैसा है हमारा गणतंत्र पूछने पर साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष एवं सुपरिचत लेखक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं, \”पीछे मुड़कर देखता हूँ तो भारतीय गणतंत्र को देखकर संतोष किया जा सकता है. बदलाव हर क्षेत्र में हुआ, मगर उसकी गति धीमी रही. विकास की गति भी धीमी रही. ख़ुशी इस बात की है कि लोकतंत्र की जड़ें देश में बहुत गहरी हैं. बीच में आपातकाल से एक झटका लगा था परंतु फिर से हमारा लोकतंत्र पटरी पर आ गया. तमाम देश जो हमारे साथ आज़ाद हुए, जिनकी स्वाधीनता ख़तरे में पड़ गई और वहॉं तानाशाही व्यवस्थाएं लागू हो गईं, उन्हें देखते हुए हम अपने गणतंत्र पर संतोष कर सकते हैं.\” देश में तमाम क्षेत्रों में बुनियादी संसाधनों का अभूतपूर्व विकास हुआ. भले ही देर से,पर हमारे देश ने भी तकनीकी तरक्की की है. हम तकनीक के शिखर पर हैं. सिलीकोन वैली से लेकर दुनिया के तमाम मुल्कों में यहां के नौजवान और तकनीकयाफ्ता लोग कार्यरत हैं. पर आज भी इस मुल्क में पिछड़े गरीब यतीम और खुली सड़क पर ठिठुरती ठंड में रात बिताने वालों की संख्या कम नही है. ऐसे गरीब, पिछड़े यतीम और अकिंचन लोगों के चेहरे गणतंत्र दिवस की परेड में नजर नही आते. वे झांकियों के ऐश्वर्य पर थिगड़े की तरह हैं. वे शोभा बढ़ाने के लिए नहीं,श्रम और पसीना बहाने के काम आते हैं. देखते देखते हमारा गणतंत्र अधेड़ हो गया. पर इस गणतंत्र से हमें क्या मिला, इस सवाल पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं, \”जैसा कि मैंने कहा, विकास की गति धीमी है तो इसलिए कि भारत के किसानों पर ध्यान नहीं दिया गया. हिंद स्वराज में गांधी जी ने भारतीय किसानों के प्रति गहरा विश्वास व्यक्त किया था. आज़ादी के बाद की सरकारों में इसे मुख्य धारा में लाने की कोशिश नहीं की. इस देश के किसान सभ्यता, संस्कृति और विकास की रीढ़ हैं. आज भी जो भूमि अधिग्रहण का मुद्दा चल रहा है, वह किसानों के हित में नहीं है. इसलिए हमारा गणतंत्र तभी पुष्ट माना जाएगा, जब गण का विकास हो.\”
एक दौर था राष्ट्रीयकरण का जज्बा देश में था. आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और सरकारी नियंत्रण् से चलने वाले संस्थान रुग्णता का शिकार हो रहे हैं. विनिवेश के जरिए उनके निजीकरण का रास्ता प्रशस्त किया जा रहा है . बैंकों का राष्ट्रीयकरण इस उद्देश्य से किया गया था कि बैंक देश की आर्थिक प्रगति के नियामक बनें. बैंकों के जरिए गांवों से लेकर शहर तक विकास की आबोहवा तो बदली किन्तु बहुत जल्दी ही सरकारी ऋण लेकर उसे न चुकाने वालों और सरकारी पैसे पर ऐश करने वालों की तादाद भी बढ़ती गयी. किसानों को मामूली ब्याज पर ऋण देने की सरकार की उदार संकल्पना का भी कोई बहुत लाभ नही हुआ. क्योंकि ज्यादातर पैसा बिचौलियों की भेंट चढ़ जाता था. आज तकनीकी आर्थिक और औद्योगिक तरक्की के बावजूद हमारे निर्यात-व्यापार की कमर ढीली है. चीन जैसी अर्थ व्यवस्थाओं ने पूरी दुनिया को चुनौती दी है. वह आज सुई से लेकर बड़ी से बड़ी चीजें सस्ते दामों और विश्वसनीय गुणवत्ता के साथ बना और बेच रहा है. हम चीन जैसी शक्तियों को लेकर आलोचना का रुख भले अपनाएं किन्तु कहीं न कहीं हमारी योजनाओं में ऐसी कमी रही कि हम इस मामले में पिछड़े बने रहे. मंहगाई से त्रस्त चित्रा मुदगल कहती हैं, \”आज एक तरफ मारक और अनियंत्रित होती महंगाई है, दूसरी तरफ हमारे सपने हैं. आधी आबादी की सुरक्षा भी चिंता का विषय है. मेरी दृष्टि में जब तक स्त्रियों को समता, शिक्षा, स्वावलंबनऔर स्वाधार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक स्त्रियों के हालात नहीं बदल सकते. यदि वे आत्मनिर्भर बनकर भी कहीं अकेले में आ-जा नहीं सकतीं तो इस बहुप्रचारित सशक्तीकरण का क्या फायदा?’’
हमने आजादी और गणतंत्र के वैभव का गान बहुत किया है. देखते देखते आजादी के तराने अप्रासंगिक हो गए. वे केवल इसी दिन याद आते हैं. गणतंत्र दिवस के भव्य परेड में हमारे सम्मुख भले ही देश का सामरिक ओद्योगिक सांस्कृतिक आर्थिक विकास बेहतर नजर आता हो, कहीं न कहीं देश का हर आम आदमी बदहाली से परेशान है. हर हाथ मे मोबाइल होने का अर्थ विकास के पैरामीटर पर विकसित होना नही है. आज भी हर आदमी की प्रतिव्यक्ति आय बहुत ही दयनीय है तथा विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम है. आज भी विदर्भ के किसान आत्महत्या करने को विवश हैं. आज भी आदिवासियों को नक्सली करार देकर उनका दमन किया जाता है. नक्सल समस्या को हमने शासन की चाबुक से दूर करने की राह अपनाई जिसके दुष्परिणामों से हम आए दिन गुजरते हैं. कभी सुपरिचित साहित्यकार अज्ञेय ने लिखा था : \”मिला बहुत कुछ : सब बेपेंदी का. शिक्षा मिली;उसकी नींव,भाषा,नहीं मिली. आजादी मिली,उसकी नींव आत्म गौरव नहीं मिला. राष्ट्रीयता मिली,उसकी नींव अपनी ऐतिहासिक पहचान नहीं मिली. यानी आजादी में जन्में,पले मुझको—आजादी के आदि पुरुष को —चेहरा मिला,व्यक्तित्व नहींमिला. ओर विना व्यक्तित्व के चेहरा क्या होता है? स्पष्ट है –वह फ़कत चेहरा होता है. पहन लो,उतार लो, उस पर अलकतरा पोत दो,चूना लगा दो—और यही सब तो हम कर रहे हैं—हर कोई कर रहा है.\’\’ चित्रा जी कहती हैं सरकार आदिवासियों को माओवादियों के हवाले न करके उनके असंतोष को पहचाने और उनका समाधान करे. विकास का अर्थ यह नही है कि गली गली राजनीतिक गुंडो के कटआउट लगें बल्कि होना तो यह चाहिए कि गलियों व सड़कों के नाम दार्शनिकों चिंतकों व लेखकों के नाम पर क्यों न रखे जाएं और राज्यों के हवाई अड्डों के नाम वहां के लेखकों पर क्यों न हों.
अज्ञेय ने हमारे राष्ट्रचिह्न यानी सारनाथ की सिंहत्रयी पर भी टिप्पणी की है. वे कहते हैं, ‘कभी सिंहत्रयी के ऊपर धर्मचक्र भी था—पर वह प्रतीकपूजा भर थी न,तभी तो धर्मचक्र टूट कर गिर गया और पीठिका की सिंहत्रयी भर राष्ट्र का नया गौरव चिह्न बन गयी! \’सत्यमेव जयते\’ —-हां जरूर,लेकिन किस अर्थ में सत्य जयी होता है,इसे जो ठीक ठीक देखते वे इस वाक्य की मुहर लाल फीते पर लगाते हुए थोड़ा तो हिचकते.‘’एक वक्त गांधीवादी आदर्शों के अनुगायक रामराज का सपना देखा करते थे. पर कविवर केदारनाथ अग्रवाल ने बहुत पहले ही एक कविता लिख कर इसे खारिज कर दिया था: आग लगे इस रामराज में/ ढोलक मढ़ती है अमीर की/ चमड़ी बजती है गरीब की. खून बहा है रामराज में/ आग लगे इस राम राज में. कहना न होगा कि रामराज भले उन अर्थों में कभी न आया हो,सियासत में राम नाम का दबदबा कायम रहा है. किन्तु कानून व्यवस्था जस की तस है.





