• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » मुर्दों का धरना : अशअर नज्मी

मुर्दों का धरना : अशअर नज्मी

कोई कहानी अपने समय का आईना कब बन जाती है, यह उसके शिल्प और दृष्टि, दोनों से तय होता है. अशअर नज्मी की कहानी ‘मुर्दों का धरना’ इस अर्थ में उल्लेखनीय है कि वह राजनीतिक यथार्थ को सीधे दर्ज करने के बजाय उसे अतियथार्थ की एक सुसंगठित संरचना में रूपांतरित करती है. जब पूरी दुनिया में जीवित समाज के प्रतिरोध निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं, तब अपने सामूहिक विनाश के विरुद्ध, एक अंतिम और विडंबनापूर्ण विरोध दर्ज करने के लिए इस कथा के मुर्दे अपनी कब्रों से बाहर निकल आते हैं. आगे क्या होता है? यह तो कहानी पढ़ कर ही आप जान पायेंगे. प्रसिद्ध कथाकार अशअर नज्मी की इस कहानी का उतना ही अच्छा अनुवाद रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी ने किया है. प्रस्तुत है.

by arun dev
January 28, 2026
in कथा
A A
मुर्दों का धरना : अशअर नज्मी
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें

मुर्दों का धरना
अशअर नज्मी

उर्दू से अनुवाद: रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी

 

अदालत के आख़िरी फ़ैसले की स्याही अभी गीली ही थी कि शहर के उस पुराने कोने में ख़ामोशी का रंग बदल गया. वो क़ानूनी जंग, जो पिछले तीन सालों से फ़ाइलों के आसपास लड़ी जा रही थी, अब लोहे और कंक्रीट का रूप धर चुकी थी. अब्दुल जब्बार ने मिट्टी से सनी हुई अपनी चादर झाड़ी और क़ब्रिस्तान के आख़िरी छोर पर बनी उस पुरानी कोठरी की दहलीज़ पर बैठ गया जहाँ से क़ब्रों की टूटी हुई दीवारें एक थकी हुई क़तार की तरह नज़र आती थीं.

शहर के अख़बारों में इसे ‘विकास की राह में रुकावट’ कहा गया था, लेकिन जब्बार के लिए ये वो ज़मीन थी जहाँ उसने अपनी उम्र की तमाम दोपहरें कुदाल चलाते गुज़ारी थीं. उसने अपना हाथ एक काई लगे शिलालेख पर रखा. शिलालेख की ठंडक उसकी उंगलियों के पोरों में समा गई.

“अब यहाँ बुलडोज़र चलेगा…”

उसने सिर उठाकर उन पीली मशीनों को देखा जो गेट के बाहर ग़ुर्रा रही थीं. पुलिस की भारी तैनाती ने पूरे इलाक़े को अपने घेरे में ले लिया था, जैसे वो मुर्दों की किसी बग़ावत को कुचलने आए हों. जब्बार ने महसूस किया कि उसके पैरों के नीचे स्थित ज़मीन में एक थरथराहट पैदा हो रही है; वैसी ही थरथराहट जो तब होती है जब कोई पुराना घाव दोबारा कुरेदा जाए.

शहर अपने कंधे पर बरसों से पड़ा ये बोझ झटकने का इंतज़ार कर रहा था, जिसका वक़्त आख़िरकार आ चुका था, क़ानूनी इजाज़त अब उसके पास थी.

‘जेसीबी’ के लोहे के पंजे ने जब क़ब्रिस्तान की बाहरी दीवार को झकझोरा, तो हवा में मिट्टी और चूने का एक ऐसा ग़ुबार उठा जिसने सूरज की रौशनी को भी धुंधला दिया. पत्थर टूट कर सड़क पर गिरे तो एक ऐसी आवाज़ आई जैसे किसी ने ख़ामोशी की छाती चीर दी हो.

पहला वार उन पुरानी क़ब्रों पर हुआ जिनके वारिस अब शहर की भीड़ में खो चुके थे. जब्बार ने देखा कि मिट्टी की तहें उलट रही थीं. बरसों से जमी हुई हड्डियाँ, कफ़न के पुराने टुकड़े और वो मिट्टी जो अब इंसान बन चुकी थी, सब लाशों के ढेर में बदल रहे थे.

जब शाम ढली, तो धूल बैठ चुकी थी, पर हवा का बोझ बढ़ गया था.

अगली सुबह, शहर के सबसे व्यस्त हाईवे के बीचों-बीच, जहाँ से फ्लाई-ओवर के खंभों को गुज़रना था, ट्रैफिक की रफ़्तार अचानक रुक गई. गाड़ियों के हॉर्न बजना बंद हो गए. एक बस ड्राइवर ने हैरानी से बाहर झाँका तो उसके हाथ स्टीयरिंग पर जम गए.

सड़क के बिल्कुल बीचों बीच, सफ़ेद कफ़नों में लिपटे कुछ साये बड़े आराम से बैठे थे. उन्हें इंसान नहीं कहा जा सकता था, हाँ उन्हें ‘इंसान जैसा’ कहने में कोई बुराई नहीं थी. वो हिल नहीं रहे थे, वो बोल नहीं रहे थे, वो तो बस मौजूद थे. उनके वजूद से मिट्टी की वो सौंधी सुगंध उठ रही थी जो सिर्फ़ गहरी ज़मीन के अंदर पाई जाती है. उनकी आँखें खुली थीं, पर उनमें कोई ज्योति नहीं थी, सिर्फ़ एक हमेशा रहने वाला ठहराव था.

पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती हुई पहुँची. एक इंस्पेक्टर जीप से उतर कर ग़ुस्से से चिल्लाया,

“चलो भाई! हटो यहाँ से! ये धरने का वक़्त नहीं है.”

उसने जैसे ही पास खड़े एक साये के कंधे पर हाथ रखा, उसकी उंगलियों में एक ऐसी बर्फ़ीली ठंडक उतरी कि वो घबरा कर पीछे हट गया. वो साया कोई ज़िंदा इंसान नहीं था कि उसमें जीवन की तपिश होती, वो तो मिट्टी का हिस्सा था जिसे कल शाम मशीन ने बाहर निकाल फेंका था.

अब्दुल जब्बार दूर खड़ा ये सब देख रहा था. उसने अपने हाथों को देखा जिन पर अब भी उसी क़ब्रिस्तान की मिट्टी लगी थी. उसने महसूस किया कि शहर अब एक ऐसे पलायन का गवाह बन रहा है जिसका ज़िक्र किसी इतिहास की किताब में नहीं था.

धीरे-धीरे, शहर के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी ही ख़बरें आने लगीं. बैंक की सीढ़ियों पर, सरकारी स्कूल के बरामदे में, और सबसे ज़्यादा उस अधूरे फ्लाई-ओवर के नीचे, वो ‘बेघर’ अपनी ख़ामोशी के साथ जम चुके थे.

यातायात कबतक रुका रहता, दोबारा शुरू हो गया, पर अब वो डरावना नहीं रहा. एक मोटर-साइकिल सवार ने अपने पहिये को उस कफ़नपोश वजूद से बचाते हुए रास्ता निकाला. किसी ने उसे छूने की कोशिश नहीं की. ज़िंदगी और मौत अब एक ही फुटपाथ पर साथ-साथ चल रहे थे.

अब्दुल जब्बार ने अपनी कुदाल उठाई और सड़क के उस ओर चलने लगा जहाँ एक बूढ़ा मुर्दा अपनी टूटी हुई क़ब्र का शिलालेख सीने से लगाए बैठा था. जब्बार ने उस शिलालेख पर लिखी इबारत को पढ़ा; वो नाम अब मिट चुका था, पर उसकी मौजूदगी सड़क के डामर पर एक वज़नी मुहर की तरह दर्ज थी.

नगर प्रशासन के लिए ये एक ऐसी ‘टेक्निकल इमरजेंसी’ थी जिसका हल किसी भी क़ानूनी किताब में मौजूद नहीं था. डिप्टी कमिश्नर के दफ़्तर में होने वाली आकस्मिक बैठक में ख़ामोशी इतनी बोझल थी कि एयर कंडीशनर की आवाज़ भी किसी चीख़ जैसी लग रही थी.

“हम उन्हें हटाएंगे कैसे?”

एक जवान आईपीएस अफ़सर ने परेशानी में माथे का पसीना पोंछा.

“हमने वॉटर कैनन  इस्तेमाल किए, पर पानी की धार ने सिर्फ़ उनके कफ़न की मिट्टी धोयी और वो ज़्यादा सफ़ेद नज़र आने लगे. हमने आँसू गैस छोड़ी, मगर जिनके फेफड़ों में अब सिर्फ़ मिट्टी भरी हो, उनका दम क्या घुटेगा?”

शहर के चौराहों पर अब तमाशा ख़त्म हो चुका था और उसकी जगह एक भयानक गंभीरता छा गई थी. वो मुर्दे अपनी जगहों से एक इंच नहीं हिले थे. वो फ्लाई-ओवर के खंभों के चारों ओर घेरा बना कर बैठे थे, जैसे वो कंक्रीट के इस निर्माण का गला अपनी चुप्पी से घोंट रहे हों.

कॉरपोरेट सेक्टर में भूचाल आ चुका था. ‘स्मार्ट सिटी’ के शेयर गिर रहे थे. कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक दिल्ली तक दौड़ लगा रहे थे कि किसी तरह इन ‘ग़ैर-क़ानूनी प्रदर्शनकारियों’ को हटाया जाए क्योंकि उनकी मौजूदगी में मशीनें चलाना नामुमकिन था. मज़दूरों ने काम करना छोड़ दिया था; वो मशीनों से नहीं डरते थे, लेकिन उन ठंडे वजूदों की निकटता ने उनके अंदर के ‘ईश्वर के भय’ को जगा दिया था.
तीसरे दिन, प्रशासनने ‘बातचीत’ का ड्रामा रचाया.

एक बड़ा सरकारी दल, जिसके साथ शहर के कुछ ‘सरकारी मौलवी’ और सामाजिक लीडर भी थे, हाईवे के उस स्थान पर पहुँचा जहाँ सबसे बड़ा ‘धरना’ जारी था. उन्होंने लाउडस्पीकर पर पुकारा:

“आप लोगों की जो भी माँगें हैं, वो लिखित रूप में पेश करें. हम आपके लिए एक अलग ‘कॉलोनी’ (क़ब्रिस्तान) शहर से बाहर अलॉट करने को तैयार हैं. आप यहाँ से हट जाएँ, विकास कार्य में बाधा न बनें.”

अब्दुल जब्बार, जो एक पुराने खंभे के साये में बैठा ये सब देख रहा था, उसके होंठों पर एक सर्द मुस्कुराहट तैर गई. उसने देखा कि सामने बैठा वो ‘मुर्दा’, जिसके कफ़न पर अभी तक उसकी क़ब्र की मिट्टी के ताज़ा निशान थे, उसने एक खंभे को खुरचना शुरू कर दिया. ख़ामोशी का वो पहाड़ इतना वज़नी था कि सरकारी दल के शब्द हवा में ही बिखर गए.

जब ज़िंदों ने देखा कि मुर्दे पीछे हटने को तैयार नहीं, तो उनके अंदर जमी हुई बर्फ़ भी पिघलने लगी. वो लोग, जो वर्षों से अपने घरों, अपनी दुकानों और अपनी पहचान के छीने जाने पर ख़ामोश थे, अब धीरे-धीरे इन ‘मुर्दों’ के साथ आकर बैठने लगे.

पहले एक बूढ़ी औरत, जिसका घर पिछले महीने ‘अतिक्रमण’ के नाम पर गिरा दिया गया था, एक ख़ामोश लाश के बराबर में बैठ गई. फिर एक बेरोज़गार नौजवान, फिर एक दुकानदार. देखते-देखते सड़क सफ़ेद कफ़नों और रंगीन लिबासों का एक ऐसा संग्रह बन गई जहाँ ज़िंदगी और मौत के बीच की लकीर मिट गई.

“ये हमारा धरना है…” एक ज़िंदा व्यक्ति ने दूसरे से कहा. “अगर ये मुर्दे अपने बिस्तर के लिए लड़ सकते हैं, तो हम अपनी छत के लिए क्यों नहीं?”

यह घटना अब शहर की हदों से निकल चुकीथी. बीबीसी, अल-जज़ीरा और सीएनएन के कैमरे इन ‘ख़ामोश प्रदर्शनकारियों’ को पूरी दुनिया में दिखा रहे थे. पेरिस, लंदन और न्यूयॉर्क के मानवाधिकार समूहों ने इस ‘महान वापसी’  को मानव इतिहास का सबसे अनोखा विरोध प्रदर्शन क़रार दिया. पूरी दुनिया से संदेश आने लगे:

“अगर ज़मीन ज़िंदों को जगह नहीं देगी, तो मुर्दे इसे ख़ाली करवा लेंगे.”

सत्ता बौखला गई थी. एक आपातकालीन प्रेस वार्ता में गृह मंत्री ने इसे ‘विदेशी फ़ंडेड मुर्दा जिहाद’ क़रार देने की कोशिश की, पर जब एक पत्रकार ने पूछा कि “क्या आप इनपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाएंगे?” तो पूरा हॉल ठहाका मार कर हँस पड़ा; एक ऐसी हँसी जिसने सिस्टम के मुखौटे को तार-तार कर दिया.

अब्दुल जब्बार ने अपनी कुदाल उठाई और उस मिट्टी को छुआ जो अब सड़क के किनारे ढेर की शक्ल में पड़ी थी. उसे महसूस हुआ कि मिट्टी में एक गरमाहट लौट आई है. ये गरमाहट उन मुर्दों की नहीं थी, बल्कि उन ज़िंदों की थी जो उनके साथ बैठकर अपनी ‘खोई हुई आवाज़’ ढूँढ रहे थे.

हाईवे की वो स्मार्ट लाइट्स इन सफ़ेद सायों के चेहरों पर पड़ रही थीं, और अब्दुल जब्बार को लगा कि अब इस शहर में कोई ‘अब्दुल’ अकेला नहीं है. मिट्टी ने अपने तमाम बेटों को एक ही क़तार में खड़ा कर दिया था.

शहर के भूगोल पर अब एक नया नक़्शा उभर आया था. सरकार ने इस पूरे इलाक़े को ‘रेड ज़ोन’ घोषित कर वहाँ मोबाइल इंटरनेट और आवाजाही पर पाबंदी लगा दी थी, पर ख़ामोशी का वो वायरस हवा में इस क़दर फैल चुका था कि उसे किसी ‘सॉफ्टवेयर’ से डिलीट करना मुमकिन नहीं रहा था.

सबसे ज़्यादा हास्यास्पद नज़ारा तब देखने में आया जब सरकार ने एक ‘हाई पावर आइडेंटिफिकेशन कमेटी’ बनाई, जिसका काम इन धरना देने वाले मुर्दों की पहचान करना और उनके ‘काग़ज़ी सबूत’  तलाश करना था.

अब्दुल जब्बार को ज़बरदस्ती एक सरकारी गाड़ी में बिठाकर चौराहे पर लाया गया. उसके सामने बायोमेट्रिक मशीनें और हाई-रेज़ोल्यूशन कैमरे लगे थे, लेकिन जब एक टेक्नीशियन ने एक कफ़नपोश साये की उँगली मशीन पर रखने की कोशिश की, तो स्क्रीन पर एक काले धब्बे के अलावा कुछ नहीं उभरा.

“इनका रिकॉर्ड कहाँ है जब्बार? ये कौन लोग हैं? क्या ये वाक़ई इसी देश के नागरिक हैं?”

एक सीनियर अफ़सर ने ग़ुस्से से पूछा. उसके पास वो पुरानी फ़ाइल थी जिसमें ‘एनआरसी’ की कटी-फटी लिस्ट मौजूद थी.

अब्दुल जब्बार ने इन मशीनों को देखा और फिर उस ख़ामोश भीड़ को. उसके होंठों पर एक ऐसी हँसी आई जो किसी छुरी की धार जैसी थी.

“साहब! ये बायोमेट्रिक मशीनें ज़िंदों के लिए होती हैं. जिनकी पोरों को मिट्टी ने चाट लिया हो, उनका अँगूठा आपके किसी सिस्टम में फ़िट नहीं आएगा. इनके पास कोई आधार कार्ड नहीं है, सिर्फ़ ये मिट्टी है जिसमें से इन्हें जबरन निकाला गया है. क्या आपके पास कोई ऐसी मशीन है जो मुर्दों की देशभक्ति चेक कर सके?”

अफ़सर तिलमिला कर रह गया. उसने आदेश दिया कि इन सबकी ‘डिजिटल मैपिंग’ की जाए, लेकिन कैमरे के लेंस में सिर्फ़ एक सफ़ेद ख़ालीपन  नज़र आ रहा था. वो ‘मुर्दे’ कैमरे की पकड़ में नहीं आ रहे थे, वो सिर्फ़ इंसानी आँख को नज़र आते थे; एक ऐसी हक़ीक़त जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था, पर जिसकी तस्वीर नहीं ली जा सकती थी.

इसी बीच, कॉरपोरेट दफ़्तरों में एक नई तरह की बौखलाहट सवार थी. वो फ्लाई-ओवर, जिसकी हर ईंट पर मुनाफ़े की तारीख़ें लिखी थीं, अब एक ‘मुर्दा प्रोजेक्ट’ बन चुका था. अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों ने हाथ खींचने शुरू कर दिए. वो डर रहे थे कि अगर ये ‘मुर्दा विरोध’ दूसरे शहरों तक फैल गया, तो कंक्रीट का ये पूरा साम्राज्य ढह जाएगा.

शहर की सड़कों पर अब एक विचित्र ऐका शुरू हो गया था. ज़िंदों ने अब मुर्दों से डरना छोड़ दिया था. वो उनके चारों ओर घेरा बना कर बैठते, अपनी कहानियाँ सुनाते, कविताएँ पढ़ते, और कभी-कभी उनके पुराने कफ़नों पर पड़ी हुई धूल को अपने आँसुओं से साफ़ करते.

“देखो! ये मेरी नानी है…” एक जवान लड़की ने एक कोने में बैठी शांत औरत की ओर इशारा किया, जिसके चेहरे पर मिट्टी की ऐसी तहें थीं जैसे वो कोई पुरानी शिलालेख हो. “इन्हें तुमने बीस साल पहले मिट्टी में दबाया था, आज ये अपनी मिट्टी की गवाही देने आई हैं. क्या अब तुम इनसे इनका ‘जन्म प्रमाणपत्र’ माँगोगे?”

मीडिया का तमाशा अपने चरम पर था. वही एंकर, जो अपनी चीख़ों से रातों को लहूलुहान करता था, अब हक्का-बक्का था. वो स्क्रीन पर ख़ामोशी दिखाने पर मजबूर हो गया था, क्योंकि शोर के सभी औज़ार इन ‘मुर्दों’ की चुप्पी के सामने बेकार हो चुके थे.

अब्दुल जब्बार ने देखा कि अब स्कूलों के बच्चे भी इस धरने का हिस्सा बन रहे थे. वो इन मुर्दों के चारों तरफ़ ‘इंसानी ज़ंजीर’ बना कर खड़े थे, उनके हाथों में वही प्ले-कार्ड्स थे जो किसी भी ज़िंदा विरोध प्रदर्शन में होते हैं, पर उनपर कुछ लिखा नहीं था; वो प्ले-कार्ड्स सफ़ेद थे, बिल्कुल उन कफ़नों की तरह.

अब्दुल जब्बार ने अपनी कुदाल को छुआ. उसे महसूस हुआ कि अब उसे किसी नई क़ब्र की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. ये पूरा शहर अब एक ऐसी ‘साँझी बस्ती’ बन गया था जहाँ ज़िंदगी और मौत ने मिल कर सरकार के विरुद्ध एक नया मुक़दमा दर्ज कर दिया था. उसने सोचा कि क्या ये वही ‘ब्लैक होल’ है जिसे कोई मैकेनिक, कोई इंजीनियर और कोई तानाशाह भर नहीं सकता?

आख़िरी वार तब हुआ जब सरकार ने बल का प्रयोग करने का आख़िरी फ़ैसला किया. आधी रात को, जब शहर की बत्तियाँ गुल कर दी गईं, भारी-भरकम ट्रक और जेसीबी मशीनें दोबारा हरकत में आईं. उनका मक़सद इन ‘लाशों’ को ज़बरदस्ती उठाकर किसी अनजान जगह पर ठिकाने लगाना था.

लेकिन जैसे ही पहली मशाल जली, पूरा शहर दहल गया. वो पचास ‘मुर्दे’ अब पचास नहीं रहे थे, बल्कि उनकी तादाद हज़ारों में हो गई थी. वो सड़कों से निकल कर घरों की छतों पर, अस्पतालों के आईसीयू  में, यहाँ तक कि डिप्टी कमिश्नर के बेडरूम तक पहुँच चुके थे.

रात के इस आख़िरी पहर में, जब स्मार्ट सिटी की तमाम डिजिटल स्क्रीनें बौखलाहट में झिलमिला रही थीं, सरकार ने फिर एक चाल चली. एक सरकारी आदेश जारी हुआ जिसमें इस पूरी घटना को ‘नज़र का धोखा’  और ‘सामूहिक हिस्टीरिया’ घोषित कर दिया गया. आदेश दिया गया कि इस ‘अतिक्रमण’ को किसी भी क़ीमत पर ‘साफ़’ कर दिया जाए.

अब्दुल जब्बार ने देखा कि फ़ौज की बड़ी-बड़ी गाड़ियों में भारी-भरकम केमिकल टैंकर भर कर लाए गए हैं. ये वो घोल था जो आम तौर पर बदबू और छूत की बीमारियों को ख़त्म करने के लिए इस्तेमाल होता है. सरकार अब इन मुर्दों को एक ‘बीमारी’ समझ कर साफ़ करने निकली थी.

केमिकल की पहली बौछार उस चौराहे पर हुई जहाँ हकीम ज़मीरुद्दीन अपने कफ़न समेत बैठे थे. केमिकल की तेज़ धार उनके वजूद से टकराई, लेकिन मिट्टी का वो पुतला हिला तक नहीं. जैसे-जैसे वो घोल उन पर गिरा, उनके कफ़न की सफ़ेदी अधिक साफ़ होती गई, यहाँ तक कि वो रात के अंधेरे में किसी ‘दीप्तिमान बिंदु’ की तरह चमकने लगे.

बौखलाहट में ‘जेसीबी’ के पंजे दोबारा हरकत में आए. उनका मक़सद इन ‘सायों’ को जबरन उठाकर किसी अनजान खाई में फेंकना था. लेकिन जैसे ही लोहे का पहला पंजा उस बूढ़ी औरत के पास पहुँचा जो अपने घर के मलबे के पास बैठी थी, मशीन का इंजन एक ख़ौफ़नाक आवाज़ के साथ बंद हो गया. हाइड्रोलिक पाइप चटक गए और काला तेल सड़क के डामर पर फैलने लगा.
“तेल बह रहा है… बिल्कुल वैसे ही जैसे इनकी रगों में कभी ख़ून बहता होगा.”

अब्दुल जब्बार ने अपनी कुदाल के दस्ते पर पकड़ मज़बूत की. उसे महसूस हुआ कि सड़क की ज़मीन अब नरम हो रही है. वो डामर, वो कंक्रीट, वो लोहा; सब मिट्टी के सामने हथियार डाल रहे थे.

अचानक, वो तमाम ‘मुर्दे’ एक साथ खड़े हो गए. उनका एक साथ उठना किसी तूफ़ान की आहट नहीं था, बल्कि एक ऐसा गुरुत्वाकर्षण था जिसने पूरे शहर का संतुलन बिगाड़ दिया. वो हिल नहीं रहे थे, वो तो बस अपनी जगहों पर खड़े होकर आसमान की ओर देखने लगे. जो उनके साथ ज़िंदा बैठे थे, और वो भी जो आस-पास खड़े तमाशा देख रहे थे, सभी एक ऐसी ख़ामोश क़तार में शामिल हो गए जहाँ कोई जज, कोई पुलिस वाला और कोई लीडर दाख़िल नहीं हो सकता था. मुर्दों ने ज़िंदों को विरोध का वो पुराना सबक़ सिखा दिया था जिसे वो भूल गए थे.

सरकार ने पीछे हटने का फ़ैसला किया. सुबह के अख़बारों में एक छोटा सा ‘शुद्धि-पत्र’ छपा:

“तकनीकी वजहों से फ्लाई-ओवर का नक़्शा बदल दिया गया है. पुरानी बस्ती और क़ब्रिस्तान की हदों को ‘हेरिटेज ज़ोन’ क़रार देकर सुरक्षित रखा जाएगा.”

ये उस तथाकथित ‘विकास’ की पहली औपचारिक पराजय थी जिस पर किसी के दस्तख़त नहीं थे.

सूरज निकला तो शहर ने देखा कि वो सभी ‘मुर्दे’ अब सड़कों पर नहीं थे. वो वापस अपनी उजड़ी हुई क़ब्रों की ओर लौट चुके थे. लेकिन उनके जाने के बाद, सड़क के डामर पर उनके बैठने के निशान अब भी बाक़ी थे; सफ़ेद मिट्टी के वो दायरे जो किसी भी तेज़ाब या केमिकल से नहीं मिट रहे थे.

अब्दुल जब्बार ने क़ब्रिस्तान के टूटे हुए गेट पर खड़े होकर देखा. ‘जेसीबी’ मशीनें वहाँ से जा चुकी थीं, लेकिन पीछे मलबे का एक ऐसा ढेर छोड़ गई थीं जिसमें से अब हड्डियाँ नहीं, बल्कि ‘यादें’ झाँक रही थीं.

उसने एक शिलालेख उठाया जो सड़क पर पड़ा था. उस पर कोई नाम नहीं था, बस एक ‘लाल निशान’ था जिसे किसी ने मिटाने की कोशिश की थी. जब्बार ने उस पत्थर को उसी जगह दोबारा लगा दिया जहाँ से उसे उखाड़ा गया था.
___________

 

अशअर नज्मी उर्दू के सुपरिचित लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास उसने कहा था को उर्दू का पहला पोस्ट्माडर्न नॉवेल माना जाता है. उनके दो अन्य उपन्यास शून्य की तौहीन और काँग्रेस हाउस का हिन्दी अनुवाद ‘सेतु प्रकाशन’ और ‘राजपाल एण्ड संस’ छाप चुके हैं. इसके अतिरिक्त दो उर्दू लघुकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. पिछले दो दशकों तक भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिक लिखे. 2008 से उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक पद पर कार्यरत हैं. वो मुंबई में रहते हैं. asharnajmi2020@gmail.com रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी उर्दू के युवा लेखक,अनुवादक एवं स्तम्भकार हैं. आप उर्दू की बहुचर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘इस्बात’ के सह सम्पादक हैं. आपके द्वारा हिन्दी से उर्दू में अनूदित पुस्तक ‘एक फ़िक्शन निगार का सफ़र(शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी एवं उदयन वाजपेयी के बीच संवाद)’ उर्दू पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई. इसके साथ ही आपने अशअर नजमी के उपन्यासों “सिफ़र की तौहीन” एवं “कांग्रेस हाऊस” का भी हिन्दी अनुवाद किया है और डाॅ. नुसरत मेहदी काव्य संग्रह “रक़्सां है ज़िंदगी” का संचयन एवं संकलन भी कर चुके हैं.  आप दूरदर्शन मध्य प्रदेश में उर्दू समाचार वाचक भी हैं एवं उर्दू की सुप्रसिद्ध वेबसाइट rekhta.org के लिए स्वतन्त्र रूप से शायरों एवं साहित्यकारों का परिचय एवं ब्लॉग भी लिखते हैं.
Tags: 20262026 कहानीअशअर नज्मीमुर्दों का धरनारिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी
ShareTweetSend
Previous Post

जयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचार : राय कृष्णदास

Next Post

टोडरमल मार्ग : त्रिभुवन

Related Posts

प्रभात की नई कविताएँ
कविता

प्रभात की नई कविताएँ

इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज
फ़िल्म

इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज

भक्ति अगाध अनंत : एकता मंडल
समीक्षा

भक्ति अगाध अनंत : एकता मंडल

Comments 6

  1. Bipin Tiwari says:
    1 month ago

    बेहतरीन कहानी का बेहतरीन अनुवाद . धन्यवाद

    Reply
  2. शैफाली चौबे says:
    1 month ago

    समकाल का रोमांच।एक तरफ कबरबिज्जु की तरह मुर्दे खोदे जा रहे हैं। इधर जिन्दा मुर्दे धरना के लिये खुदबखुद निकल रहे हैं।

    Reply
  3. रोहिणी अग्रवाल says:
    1 month ago

    मुर्दों का धरना बहुव्यंजक अर्थध्वनियों से बुनी पैनी राजनीतिक कहानी है जो डिस्टोपिया के जरिए हमारे समय की नींव को खोखला करने वाली ताकतों को उजागर करती है।
    विकास हर सिविलिजेशन के उत्कर्ष का मूलमंत्र रहा है। पर विकास सामाजिक न्याय का प्रतिलोम कभी नहीं हो सकता। आज ऐसा इसलिए है कि सत्ता को काउंटर नैरेटिव रच कर प्रतिरोध को कुचलने का आसान नुस्खा मिल गया है। यह अपनी खाल बचाने की कोशिश तो है ही, आक्रोश को आंदोलन में ढलने से पहले ही कुचल देने की कूटनीतिक सूझ भी है।
    कहानी दो स्तरों पर व्यंग्य व आक्रोश के सहमेल से सवाल उठाती है कि इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने की प्रक्रिया में क्या हम जिंदगी को मौत और खौफ का कफन ही नहीं ओढ़ा रहे? कि सत्ता निर्माण का संकल्प है, या ओछी संगठित स्वार्थपरताओं का? वह कमिटमेंट और विजन जो पुल बन सकता था, वर्तमान और भविष्य के बीच, कब्रिस्तान के मुर्दों के अराजक फैलाव से नरक की ओर ले जाने वाली लिफ्ट बन गया है।
    दूसरे, कहानी सत्ता की उस महीन चाल को उद्घाटित करती हैं जहां प्रतिरोध को पुचकार कर सुलाने और अपनी छवि को संवारने के लिए आपदा को भी अवसर बना डालती है। कब्रिस्तान ( गौर करें, श्मशान नहीं) को नेस्तनाबूद कर देने की असहिष्णु हिंसा और असफल होने पर हेरिटेज/ संरक्षण जैसी घोषणा फासीवादी चरित्र के दो पहलू भर हैं।
    कहानी तटस्थता के साथ चलती है पर आवेग की लय में यथार्थ का विखंडन करने का भरपूर स्पेसभी मुहैया कराती है। यह राइटरली टेक्स्ट नहीं, रीडरली स्पेस है – यथार्थ के अनगिन कोनों को अपने- अपने हिसाब से पुनर्सृजित करने का विवेक देती।
    सशक्त कहानी के लिए लेखक, अनुवादक व समालोचन को साधुवाद।

    Reply
  4. पवन करण says:
    1 month ago

    शानदार कहानी है। अद्यतन।

    Reply
  5. रतन चंद 'रत्नेश' says:
    4 weeks ago

    काश, ऐसा होता!

    Reply
  6. दीपक वनकर says:
    3 weeks ago

    यथार्थ अपने आप को नई तरह व्यक्त कर ही देता है । वर्तमान , भूत , भविष्य और इंसान , सरकार व्यवस्था सब को नंगा के दिया है विकास ने ।
    उम्दा ।।। लिखते रहिए

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक