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Home » आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ

आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ

आमिर हमज़ा वर्षों से एक लगातार शोक गीत हैं. वह इसे लिखे जा रहे हैं. तरह-तरह से. यह शोक समय का है. एक खुला घाव है. असुविधाजनक चुप्पियाँ और रोज़मर्रा की हिंसा के सूखे हुए दाग़ हमारे आसपास फैले हैं. समुदाय और नागरिकता के सवाल उनकी कविता में ठुकी हुई कीलों की तरह हैं और यही उनकी काव्य-दृष्टि की केंद्रीय धुरी है. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ नई कविताएँ.

by arun dev
February 4, 2026
in कविता
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आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ
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कविताओं से पहले, बाद कविताओं के

 

मेरी माँ ने मेरे भीतर कविता को जन्म दिया. ज़िंदगी की उलझनों— उलाहनों— मुसीबतों— निस्बतों ने सड़क चलते उसे आवाज़ दी. सुबह से शाम की एक बारिश में मृत्यु के एक कवि ने उसे पहचाना. टूटी हुई चप्पलों पर घिसे जीवन के दुःख लिए मैं उसके दर पर पहुँचा और मत्था टेक आया. एक कवि मिला और उसने मेरे अपने बयान की सदाक़त को कभी गुम न होने देने की शिद्दत से दुआ दी. मैं दुआ को उसकी तावीज़ बनाकर निगल गया. कविताओं की राह चलते— मुझे बकायन की कड़वाहट के कम जामुनी, ज़्यादा सफ़ेद फूलों से मुहब्बत हुई. मैंने मार्च के सिंगार को गले लगाया. क़ब्रिस्तान के स्याह से मैंने देखने की रौशनाई आँखों में भरी. हिरोशिमा के बदन को मैंने आग में झुलसते देखा. ककशोटी जो हिमालय की रहवासी चिड़िया का एक नाम है मेरे ख़ाब की सबसे मज़बूत पासबान हुई. मैंने मैदान की स्मृतियों को मैदान हो जाते देखा, मैंने पहाड़ की स्मृतियों को पहाड़. मैंने ख़ुद की क़ब्र खोदी ख़ुद ही, मिट्टी डाली मुट्ठी भर-भर ख़ुद ही. क़ब्र पर, अपनी क़ब्र पर मैंने खरगोश से अपना घर बनाने की इल्तिजा की. मैंने इत्यादि के फूलों का बोसा लिया और जान पाया—मरने से नहीं रोने से मरता है दुःख!

मैं रोया
मैं ज़ार ज़ार रोया.

कि—
परों की थकन के वास्ते उसे ज़मीं पर लौट आना चाहिए
हुमा जो एक परिंदे का नाम है!

कि—
आग और राख और बारिश के वास्ते उसे मरना मुल्तवी कर देना चाहिए
उन्क़ा जो एक परिंदे का नाम है!

कि—
सच्चाई के वास्ते उसे ज़ालिम लश्करों पर पत्थरों की बौछार और तेज़ कर देनी चाहिए
अबाबील जो एक परिंदे का नाम है!

कि—
झुलसी ख़त्म होती जाती मासूमियत के वास्ते उसे बचे रहना चाहिए
गौरैया जो एक परिंदे का नाम है!

कि—
फ़िरदौसी तमन्नाओं के वास्ते उसे प्यार गीत गाने चाहिए
सुरख़ाब जो एक परिंदे का नाम है!

कि—
क़ब्रों में दफ़न मुर्दों के वास्ते उसे मक़बरों की पहरेदारी छोड़ देनी चाहिए
हज़ारदास्ताँ जो एक परिंदे का नाम है!

धरती रातभर झरे हरसिंगार का बिछावन हुई. सूरज की ज़ेबाइश सूरज से फिर राख हो गई. तितलियों का एक झुंड आया. उस झुंड ने मुझ पर खिले फूलों से अपने पंख को रंगा. तितलियों ने मुझे नहीं मुझ पर खिले फूलों को चूमा. जाँ वारी फूलों पर. मैं तो उजाड़ का दरख़्त भी नहीं! मुझ पर मेरे देखे कौओं की बैठकी भी जो न हुई कभी.

 

 

pinterest से आभार सहित

1.
मुसलमान बस्ती

मुसलमान बस्ती अपने मुसलमान होने भर से पहचानी जा सकती है
इसके लिए दूसरी मज़हबी बस्ती होने की ज़रूरत नहीं.

मुसलमान बस्ती में बिल्लियाँ पाली जाती हैं कुत्ते नहीं!
यह कुत्तों से नफ़रत नहीं बिल्लियों से प्यार है.

मुसलमान बस्ती में छते घरों की
कबूतरों की गुटर-गूँ से गुलज़ार होती हैं
यह नूह के ख़बर-रसाँ के कीचड़ सने पैर और
चोंच बीच दबे ज़ैतून की फिर फिर याद है.

मुसलमान बस्ती में रोज़-ए-जश्न-ए-आज़ादी माँएँ शीर बनाती हैं
बहने मेहंदी लगे हाथों को तिरंगानुमा चूड़ियाँ पहनाती हैं
आसमान ऊपर पतंगे पेंच लड़ाती हैं.

मुसलमान बस्ती में हर जुमेरात की शाम
बच्चे बच्चों को सिन्नी बाँटते हैं
बड़े बच्चों को प्यार.

बाँटना मुसलमान बस्ती का यक़ीन है!

मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आती नज़्म की आवाज़ के बीच
सिन्नी बाँटते बच्चे
डूबते सूरज की गवाही में मस्जिदों की इमदाद करते दौड़ते हैं
मुसलमान बस्ती से मुसलमान बस्ती में
फिर फिर एक आवाज़ आती है—

एक बच्चा है…..
इस बच्चे ने दस रुपए से मस्जिद की इमदाद की है. अल्लाह तबारक व त’आला क़ुबूल फ़रमाए. इस बच्चे की जायज़ मुरादों को पूरा फ़रमाए. बच्चे को पढ़ने-लिखने का शौक़ अता फ़रमाए. बच्चे को नेक और सालेह बनाए. बच्चे को सच्चे अच्छे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए. तमाम दुनियावी परेशानियों से बच्चे की हिफ़ाज़त फ़रमाए.
आमीन…!
सुम्मा आमीन…!

मुसलमान बस्ती एक तवील दास्तान है
सुनी देखे जाने की तलबगार!

मुसलमान बस्ती उर्दू को मुसलमान समझती है और
ज़िन्दगी को जिन्दगी बोलती है.
मुसलमान बस्ती हिंदी को हिन्दू समझती है और
अपने मुसलमान होने को जिये जाती है.

मुसलमान बस्ती में गली नुक्कड़ पर
उदारीकरण वैश्वीकरण बाज़ारीकरण
याने तमाम करण से अंजान
दिलबाग खाते लौंडे रातभर बैठते हैं
ज़माना उन्हें चोर समझता है.

मुसलमान बस्ती के हिस्से शहर के बदबू मारते नाले आते हैं
आप मुँह पर रुमाल रख सकते हैं!

मुसलमान बस्ती के हिस्से ढेर आता है कूड़े का
आप बच बच के चल सकते हैं!

मुसलमान बस्ती के हिस्से नफ़रती आँखें आती हैं सत्ता की
आप बातचीत का विषय बदल सकते हैं!

मुसलमान बस्ती में पानी का रंग पानी जैसा होता है
मुसलमान बस्ती में आसमान का रंग आसमान जैसा होता है
मुसलमान बस्ती में सब्ज़ियों का रंग सब्ज़ियों जैसा होता है
मुसलमान बस्ती में ख़ून का रंग ख़ून जैसा होता है

फिर भी मुसलमान बस्ती में चाँद पूर्णिमा का
खीर में अमृत नहीं चुआता
फिर भी मुसलमान बस्ती में दरख़्तों पर
चिड़ियाँ बसेरा नहीं करती.

मुसलमान बस्ती भरे मेले में गुमसुम हामिद का चिमटा है
मुसलमान बस्ती अबोध बच्चों के लबों पर तमन्ना बनकर आती इक़बाल की दुआ है
मुसलमान बस्ती जामा मस्जिद से तक़रीर करते मौलाना आज़ाद के उठे हुए हाथ हैं
मुसलमान बस्ती सियासतदानों के लिए एक उजला चिराग़ है जिसके तले अँधेरा है.

मुसलमान बस्ती पंचर की दुकान है.
मुसलमान बस्ती फलों का ठेला है.
मुसलमान बस्ती पान का खोखा है.
मुसलमान बस्ती सूत कातता चरखा है.
मुसलमान बस्ती तख्ता छीलता रंददा है.
मुसलमान बस्ती माल ढोता कंधा है.

मुसलमान बस्ती गोली गाली नहीं नज़र चाहती है!

मुसलमान बस्ती का मज़हब कहता है—
‘हुब्ब-उल-वतन मिनल ईमान’
वतन की मुहब्बत ईमान का हिस्सा है.

इसी से देस में ज़ुल्म-ओ-सितम कहीं भी हो
इसी से देस में आगजनी कहीं भी हो
इसी से देस में बम फूटता कहीं भी हो
इसी से देस में ख़ंजर चलता कहीं भी हो
इसी से देस में हत्या कहीं भी हो
मुसलमान बस्ती के दिल में नश्तर चुभता है!

यह इसी देस की बात है!

फिर भी आप चाहें तो
मुसलमान बस्ती से नफ़रत कर सकते हैं.

 

 

 

2.
बे-वक़्त मर गई माँ के नाम बग़ैर माँ के बेटे की चिट्ठी

प्यारी माँ!

अपनी सबसे उदास रातों में अपनी सबसे उदास जगह लौटकर
अब जहाँ तुम्हारी अनुपस्थिति के जाले लग गए हैं
अब जहाँ तुम्हारे हिस्से के फूल कभी नहीं खिलने वाले
मुझ बग़ैर माँ के बेटे को सबसे अधिक
तुम्हारी याद आती है.

तुम्हारा मरना मेरे पीछे तुम्हारी याद का ज़ख़्म छोड़ गया है
मैं यादों की कभी न ख़त्म होने वाली भूल-भुलैया में गुम गया हूँ
देह से कोढ़ की तरह चिपक गई है तुम्हारी याद.

अपनी सबसे उदास रातों में
अपनी सबसे उदास जगह लौटकर
मैं अपनी ज़ख़्मी आँखों और काँपते हाथों से तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ. वहाँ तुम अब भी बिलकुल उसी एक पल सी दीखती हो. मैं तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ तो तुम्हारे हाथों का स्पर्श चाहता अपने अकेलेपन में छटपटाने लगता हूँ. मैं तुम्हारी गोद का सुकून चाहता हूँ और अपने बाल नोचने लगता हूँ. मैं अपनी सबसे उदास रातों में चाहता हूँ कि तुम तस्वीर से बाहर आकर मेरा माथा चूम लो. जानता हूँ—माँओं के मर जाने के बाद मगर ऐसा कभी नहीं होता, कहीं भी नहीं.

बे-वक़्त मर गई प्यारी माँ!

ज़िन्दा रहते तुमने हमेशा अपने दुःख कम कहे, सुने अधिक
तुमने उजाला बाँटा (कम से कम ऐसा भरोसा पैदा किया)
और अँधेरा होती चली गईं.

तुम्हारी पीठ ग़ैर पीड़ाओं की इबारत के बोझ तले दब गई
तुम्हारी आँखों के नीचे ठीक गाल के ऊपर एक तालाब बना
जहाँ बगुलों ने तुम्हारे भीतर की मछलियों को निगल डाला

तुम्हारे भीतर का पानी बगुलों की चोंच से यों फिर ज़हर हुआ
और तुम एक दिन मर गईं.

प्यारी माँ!
गर तुम बे-वक़्त न मर गई होतीं तो मैं एक बग़ैर माँ का बेटा
तुमसे कभी न कहता

तुम थीं तो उन दिनों बहुत-बहुत कम ख़राब लगती थी दुनिया
तुम्हें मरे जितना वक़्त गुज़रा इन दिनों उतनी ज़्यादा ख़राब हो गई है दुनिया
मैं एक आख़िरी बार बहुत ज़ोर से तुम्हें गले लगाना चाहता हूँ
हर वक़्त के रोने से एक आख़िरी बार जी भर रोना चाहता हूँ.

प्यारी माँ!

मेरे आसपास दिन-ब-दिन अँधेरा गहराता जा रहा है
मैं अपनी रगों में दौड़ते ख़ून को महसूस करने लगा हूँ
मैं अपनी आत्मा के दुःख पर दिनभर खोखली हँसी मढ़े घूमता हूँ
मैं उदास बैठी चिड़िया को देख उदास होता हूँ
मैं पेड़ को मरते देखता हूँ तो रोने लगता हूँ
मैं गोद की गर्माहट को तड़पता हूँ
मैं हाथ के उस स्पर्श को जिनमें बचपन बीता.

तुम होतीं तो कहता
मेरी आँखें माँ की आँखें हैं!

मैं अक्सर भीड़ से घिरा रहता हूँ. मैं भीड़ से दूर एक पेड़ तलाशता भटकता हूँ. उसे गले भरता हूँ. उससे अपना दु:ख कहता हूँ. फिर भी कभी-कभी सबसे उदास रातों में मेरी देह जलने लगती है और कोई मलहम काम नहीं आता.

अब जीवन के जितने दिन बचे हैं उनसे
मैं एक सीढ़ी बना रहा हूँ
तुम तक पहुँचूँगा एक दिन
माथा चूमूँगा ख़ूब ख़ूब एक दिन
शिकायते करूँगा ख़ूब ख़ूब एक दिन
नाराज़ होऊँगा ख़ूब ख़ूब एक दिन
रोऊँगा ख़ूब ख़ूब गोद में सिर धरे एक दिन
क़िस्सा कहूँगा उन सभी फूलों का जो बे-मौत मारे गए.

प्यारी माँ!

मेरे दिल पर जाले लग गए हैं
मेरा कलेजा फटा जाता है
मेरी बीनाई का ज़ख़्म बढ़ता जा रहा है.

मैं एक कवि यह सब कविता में भला कब तक कहूँ
तुम्हीं कहो!

मैं तुम्हारे बे-वक़्त मरने पर अब तक रुका हुआ हूँ
तुम मेरा पहला दुःख हो!

(बग़ैर माँ का तुम्हारा ही बेटा)

 

 

3.
मृत्यु एक सुवास

मैं रोज़ एक परिंदे को डाल से उड़ता देखता हूँ
उड़ता बाज़ उसे रोज़ अपने शिकारी पंजों में दबोच लेता है
ख़ून की एक भी बूँद ज़मीन पर नहीं पहुँचती
महज़ पंख पहुँचते हैं.

लोग पंख देखते हैं
पंख का गिरना देखते हैं
आसमान में हुई हत्या किसी को नहीं दिखलाई पड़ती
जिहें दीखती है
वो गहरी चुप्पी के स्याह में चले जाते हैं.

मलाल के धब्बे मन के ज़ख़्म से कहीं ज़्यादा गहरे होते हैं
अफ़सोस की डोर का सिरा हाथों से फिसल जाता है
उलझन आँखों में काँटा बनकर चुभने लगती है
एक उम्र के बाद भूत के डर की जगह घूरती आँखें ले लेती हैं
सड़क पर चलता आदमी
अपने कंधे पर वज़्न महसूस करता है और
औंधे मुँह गिर जाता है.

मृत्यु के कई रंग होते हैं
क्या हताशा मृत्यु का पक्का रंग है!

 

 

4.
तमाम दुनिया-साज़ों से

हम कतई पानी में घिरे हुए लोग नहीं थे. जैसा एक कवि ने कहा था! हम न कोई हरा पत्ता ही, देह को जिसकी राह चलते यों ही बेमक़सद नोच लिया जाता. हम ना-मालूम शक्लों से घिरे हुए लोग थे. हम अपने में डूबते थे, उतराते थे अपने में. हम मधु की मक्खियों को फूलों पर मंडराते देखकर ख़ुश होने वाले लोग थे. हमें ख़ालिस मक्खियों से कोई गिला नहीं था…

वो आए और उन्होंने हमें
ख़ालिस मक्खियों को मारने के तमाम उपाय बताए
और मधु की मक्खियों के काटने से फैले ज़हर के क़िस्से.

उन्होंने कहा :
कविता बहुत बहुत ख़राब चीज़ है
दरअस्ल बर्बादी वक़्त की.
फिर लिखने से भला क्या फ़ायदा(?)
लो तुम हमारी ताज़ा कविताएँ पढ़ो!

हमने कविताएँ पढ़ी और उन्हें दाद दी!

हमने उनसे लोमड़ी के चालाक होने की कहानियाँ ख़ूब सुनी
और उन्हें लोमड़ी की चालाकियों को कहानी में नहीं जीवन में बरतते देखा.

तमाम वो बातें जो उनके पेट में दर्द की तरह पैदा होती थीं
उन्होंने हम पर हुक्म की तरह लागू करने की कोशिश की.

मैं कह रहा हूँ उनसे
मैं कह रहा हूँ तुमसे
सुनो मेरे दुनियासाज़

इससे पहले कि तुम्हारी चिढ़
किसी को आत्महत्या का न्यौता दे
तुम्हें मुहब्बत कर लेनी चाहिए!

इससे पहले कि तुम अपने भीतर बहुत कम बचे आदमी से
फ़िर’औन में तब्दील हो जाओ और
मिट्टी पानी आग तुम्हें ना-मंज़ूर कर दे

तुम्हें ख़ुदाई का भरम छोड़ देना चाहिए!

 

 

5.
कुल्लु नफ़्सिन ज़ाइक़त-उल-मौत

(हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है)

मेरी नंगी देह कफ़न में लिपटी होगी
मेरी देह पर इत्र की ख़ुशबू होगी
वहाँ घुप्प अँधेरी क़ब्र में साथ मेरे एक पेड़ होगा
तख्तों में ढला हुआ.

लोग बारी-बारी से आएँगे
बारी-बारी से मेरे ऊपर मुठ्ठी भर-भर मिट्टी डालेंगे
मुझे मिट्टी से ढँक दिया जाएगा जब पूरा-पूरा
लोग मेरी क़ब्र पर नज़र झुकाए फ़ातिहा पढ़ेंगे
‘अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन’ और लौट जाएँगे.

कुछ आँखों में बहती नदी होगी आँसुओं की
कुछ आँखों में अभिनय दु:ख का
मेरी मय्यत पर इकट्ठा लोगों को आवाज़ देता
फिर कोई एक ज़ोर-ज़ोर से बोलेगा
‘भाईयों खाना तैयार है खाकर जाना.’

मेरी क़ब्र खोदने वाले गोरकन को कोई एक
उसकी देह से बहे पसीने का मेहनताना देगा
वह अपने बच्चों के लिए मुस्कान को जेब में रख घर लौटेगा.

एक दिन मिट्टी मुझे गलाकर मिट्टी बना डालेगी
एक दिन मेरी क़ब्र ढह जाएगी
एक दिन वहाँ घास उगेगी
एक दिन वहाँ काँटे…!

मैं चाहता हूँ क़ब्र पर मेरी करंज के फूल झरें!
मैं चाहता हूँ क़ब्र पर मेरी खरगोश का घर बने!

तुम बस यों करना
मेरी क़ब्र ऊपर लिख आना
तुम कीचड़ हो गए होते तो शायद वहाँ कँवल खिलते!

मैं इंसानों से नहीं तितलियों से अपने दु:ख कहूँगा
मैं तितलियों की तरह तितली होकर जब मर जाऊँगा!

 

 

pinterest से आभार सहित

६.
प्रेम में पड़े लड़के

तितलियों भरे बाग़ीचे में
लड़कियों का इंतज़ार करते लड़के
दुनिया के सारे दरख़्तों से सारे के सारे फूल
लड़कियों के लिए चाहने लगते हैं
वो नहीं चाहते डाल से एक भी फूल झरे
झरकर ज़ाया हो जाए.

वो कोयल की कूक को बड़ी दिल्लगी से सुनते हैं
वो चुग्गा देती चिड़िया माँ को देख ममता से भर जाते हैं
वो खिलंदड़ी करती गिलहरियों को पकड़ने को आगे बढ़ते हैं
और अपने बढ़ने पर मुस्कुराते उधर-इधर टहलने लगते हैं.

क्यारी बनाते मालियों के हाथों और खुरपी के बीच
उन्हें नृत्य नज़र आता है!

माथा चूमने की चाह लिए
वो धीरे से कान के पास जाकर कहते हैं
‘तुम ख़ूब-ख़ूब सुंदर लग रही हो!’
बदले में शुक्रिया की झीनी सी चादर चाह को ढँक देती है.

वो चाहते हैं आज के दिन सूरज अपना लौटना स्थगित कर दे
वो चाहते हैं दुनिया की सारी घड़ियों को कोई चोर चुरा ले जाए
वो चाहते हैं कोई जादूगर अपनी पिटारी में कैलेण्डर को क़ैद कर
दिन सप्ताह माह और साल को फ़क़त इसी एक पल में तब्दील कर दे.

उनके मन में कई मन के दु:ख हैं
उनकी आँखों में विरह के जाले हैं

वो तुम्हें अब भी चाहते हैं
तुम आओ कहीं से भी आओ
कश्ती को समंदर में उतारने में उनकी मदद करो.

वो पार जाना चाहते हैं!

प्रेम में पड़े लड़के अफ़्साने होते हैं
जिन्हें नज़्म सी लड़कियाँ जब तब पढ़ लिया करती हैं.

 

 

7.
हरसिंगार

किसी के बोल में तुम शिउली हुए
किसी के बोल में पारिजात
किसी के बोल में तुमने सिंगार पाया
हुए तुम—हरसिंगार!

मैं फूलों की दुनिया से ख़ारिज पंक्ति का आख़िरी आदमी
दूर खड़ा तुम्हें देखता हूँ
पूछता हूँ दूर खड़ा

तुम न कभी किसी दरगाह का फूल हुए
तुम न कभी किसी साँवली लड़की के जूडे़ का फूल ही
तुम न पीर हुए पैग़म्बर ही
तुम न सूफ़ी हुए फ़कीर ही.

फिर भला क्यों रात ने तुममें रंग भरा!
सुबह सीने से क्यों लगाया मृत्यु ने!

तुम कौन हो?
क्या तुम धरती की रुलाई
क्या ठंड का पैरहन

क्या तुम किसी जोगी की बीनाई का अव्यक्त साज़ हो
किसी जोगन का पहला दुःख!

झरते
कुचलते
अबकी बचो तो कहना
अक्टूबर की सप्तपर्णी से इश्क़ तुम्हारा कैसा था?

 

आमिर हमज़ा
03 मई, साल 1994  (उत्तर-प्रदेश)
‘क्या फ़र्ज़ है कि सबको मिले एक सा जवाब’, ‘तोप की नली से दिखती ज़मीन’ तथा ‘नूह का कबूतर’ संपादित पुस्तकें प्रकाशित

 युद्ध विषयक हिन्दी-उर्दू कहानियों पर जेएनयू में शोधरत.

संपर्क : amirvid4@gmail.com

Tags: 20262026 कविताआमिर हमज़ा
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Comments 1

  1. बजरंग बिहारी says:
    1 hour ago

    अवसादग्रस्त बनातीं और विषाद से बाहर निकलने का रास्ता सुझातीं दिल-निचोड़ कविताएँ।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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