
पिताजी, माँ की मृत्यु का पूर्वाभ्यास मैंने कितनी बार कितनी कितनी बार अपने दुस्वप्नों में किया था. भय जैसे नाटक निर्देशक था जो प्रत्येक निर्बल क्षण में उनकी मृत्यु का पूर्वप्रयोग लेकर आ जाता था. इस घटना की मेरे भीतर इतनी आवृत्तियाँ थी कि उनकी यथार्थ मृत्यु केवल एक आवृत्ति ही होगी. गोबरगौरी की मृत्यु का कोई पूर्व प्रयोग मेरे निकट नहीं था. समय जो घटनाओं की फाँक पर फाँक रखता जाता और हमारे कन्धे जिसके भार से झुकते जाते है गोबरगौरी की मृत्यु से वह सभी फाँकें बिखर गई. मेरा कालबोध नष्ट हो गया. नवीन और अनुभवहीन लेखक अक्सर चमत्कार दिखाने के लिए कालक्रम को अव्यवस्थित कर देते है. मेरा ऐसा कोई उद्देश्य नहीं. मेरे लिए मेरे परिजनों की मृत्यु के अर्थ को एक बार में, सतत आख्यान में ग्रहण करना मेरे लिए सम्भव नहीं. कथा ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ मृत्यु यदि है तो पुनस्र्ज्जीवन भी उतना सम्भव है. मैं केवल इसलिए ही लिखता हूँ क्योंकि जानता हूँ कागज के अलावा मृत्यु का अर्थ मुझे कहीं प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि केवल कागज पर मृत्यु शब्द लिख देने से मृत्यु भी उतनी ही वायवीय लगती है जितना लिखा हुआ प्रेम या पवन.
मृत्यु केवल स्थायी अनुपस्थिति नहीं है. यह उससे भी बढ़कर होती है और इसका अनुभव इतना तीव्र इतना तीक्ष्ण होता है कि हमारी सभी धारणाएँ इसके सम्मुख ध्वस्त हो जाती है. मृत्यु इंद्रियों का विषय है उनके लिए जो पीछे बच जाते है. मृत्यु का सबसे उज्ज्वल सूचक मृत व्यक्ति का सर्वथा निस्संग होना नहीं है और यह भी नहीं कि वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देता बल्कि मृत्यु का सबसे उज्जवल सूचक शव का सड़ना है. यही कारण है कि गोबरगौरी के मरते ही उसके अंतिम संस्कार की तैयारियाँ आरम्भ हो गई थी. शव पृथ्वी पर सबसे अधिक स्थान घेरता है. यदि अन्तिम संस्कार जल्दी न किया जाए तो हो सकता है शव पूरे ब्रह्माण्ड को घेर ले, ब्रह्माण्ड की भाँति यह भी निरन्तर बड़ा होता जाता है. गोबरगौरी के लिए मेरा शोक शव के दाह संस्कार के बाद में आरम्भ हुआ था. उससे पूर्व उसके अन्तिम संस्कार करने को लेकर विकलता ही सबमें थी.
भले उनकी मृत्यु के अनेक पूर्वाभ्यास मेरे मन में घट चुके हो पिताजी की मृत्यु उन सभी आवृत्तियों से भिन्न थी. उन्हें और बुआ को अस्पताल में भर्ती किया गया और यह गोबरगौरी की मृत्यु के लगभग आठ मास पश्चात् हुआ. रोगी की मृत्यु होने पर अस्पताल की दीवार पर एक पहिया बना दिया जाता था. दीवार पहियों से अँटी पड़ी थी. अंतिम संस्कार के लिए घंटों प्रतीक्षा करना होती थी. परिजन का शरीर जो इतना प्रिय होता है उसके निपटारे के लिए लोग लड़ते झगड़ते और अपनी बारी पहले लगाने का यत्न करते. गोबर के उपले, जलावन बॉम्बे में उस वर्ष इतने महँगे हो गए कि दरिद्र लोग कोतवालों के छुपकर शव समुद्र में बहा आते. शव से कैसे छुटकारा हो यह व्यावहारिक जीवन की समस्या है. बॉम्बे के १८९६-९७ के प्लेग साहित्य में आप इसके अनेक विवरण पा सकते है.
मृत्यु की गरिमा की रक्षा बहुवचन में नहीं हो सकती और न मृत्यु की गरिमा की रक्षा मृतक को दयनीय चित्रित करने में है. पंचांग, पॉकेटघड़ी या घंटाघर का अनुभव तो हमें वायु की भाँति निरंतर नहीं होता. किसी के जीवित रहने और मृत होने में जो अतीत और वर्तमान का भेद है उसे पाटने की युक्ति मैं वर्षों तक खोजता रहा. जो मृत है उसे अनुपस्थित मात्र मानकर जीते चले जाना क्यों सम्भव नहीं? हम जीवित है ऐसा हम कैसे मानते है? यह हमारा स्वयं से छल भी तो हो सकता है. गोबरगौरी को मैं जीवित मानता था और स्वयं से कहता रहता था कि वह अपने पिता के घर गई है. पिताजी नाटक कम्पनी चाकरी बजाने गए है. भविष्य के बारे में स्वयं की धोखा देना सरल था कि वे आते होंगे किन्तु अतीत के विषय में नहीं. उनसे पुनः भेंट होगी यह मान पाता था किन्तु अतीत में उनके शव अग्नि में झोंक आया हूँ इसकी स्मृति नष्ट करना सम्भव न था.
मृत्यु इतनी अनस्तित्व है कि इसके विषय में हमारे शास्त्र, हमारा सहस्र वर्षों से विकसित दर्शन इसके समक्ष सब निःशेष हो जाता है. उन्हीं दिनों खोदादाद कोतवाल शोक प्रकट करने आया तो उसके हाथ में एक पुस्तक थी. मैंने पढ़ने को माँग ली. पुस्तकालय जाना सम्भव न था. मेरे रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में शोकावधि में घर छोड़कर विचरण करना निषिद्ध था. उस पुस्तक में अवधि को ऊन बताया गया था जो एक चरखी से उतरकर दूसरी चरखी पर चढ़ती जाती है इस प्रकार हमारी आयु कम होती जाती है किन्तु हमारा स्मृति बढ़ती जाती है. चेतना सघन होती जाती है. ऊन का जो भाग समय या आयु की चरखी से स्मृति की चरखी पर चढ़ गया है उसे उतारकर पुनः समय की चरखी पर यदि मैं चढ़ा दूँ तो मुझे पुनः गोबरगौरी और पिताजी मिल जाएँगे. यदि मैं अच्छा लिखने में समर्थ होता तो शायद इसे और अच्छे से समझा पाता. गोबरगौरी और मेरे पिताजी मृत नहीं थे वे केवल समय की चरखी से उतरकर स्मृति की चरखी पर चढ़ गए. मैं इसे बार बार लिखना चाहता हूँ इसलिए नहीं कि मुझे आपकी समझ पर सन्देह है बल्कि इसलिए कि मुझे अपने लेखन पर सन्देह है. मैं इसे बार बार लिखकर अपनी बुद्धि पर अंकित कर लेना चाहता हूँ. मुझे उनके जीवित रहने की अवधि को स्मृति से चरखी से उतारकर पुनः समय की, वर्तमान चेतना की चरखी पर चढ़ा देना था, मैं उन्हें पुनर्जीवित करने के कितने निकट था.
खोदादाद कोतवाल उस पुस्तक को लेने पुनः न आ सका. उसके पुत्र की हैजे के कारण रातोंरात मृत्यु हो गई. उस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात मृत्यु उतनी अशुभ अनुभव नहीं होती थी. मृत्यु कभी घटती भी है यह भी सन्देहास्पद है. मैं इतना तो जानता हूँ कि मृत्यु कभी वर्तमान में नहीं घट सकती. गोबरगौरी मर रही है यह वाक्य दर्शनशास्त्र के अनुसार ही नहीं व्यावहारिक दृष्टि से भी असत्य है क्योंकि मर रही है इसका अर्थ है वह जीवित है और पिताजी मर चुके है यह भी अतीत में घटी मृत्यु की ओर इंगित करता है. मृत्यु कभी वर्तमान में सम्भव ही नहीं वह या तो अतीत में घटती है या भविष्य में उसके घटने की हम कल्पना करते है.
फिर मृत्यु शरीर की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन है जैसे शैशव से कैशोर्य, कैशोर्य से युवावस्था और फिर प्रौढ़ होकर वृद्ध होना और सबसे अन्त में शव हो जाना. शव भी मेरी पत्नी ही है और इस प्रकार उसका दाह संस्कार एक बर्बर परम्परा है. यह तो हत्या ही है. खोदादाद कोतवाल के पारसी धर्म में दूसरे धर्मों की भाँति शव को नष्ट नहीं किया जाता है. उसे तब तक रखा जाता है जब तक कि वह प्राकृतिक रूप से नष्ट न हो जाए और शव तब अन्य जीवों का भोजन, दुर्गंध, कीटाणुओं का ढेर, जल और खाद आदि में परिवर्तित हो जाता है. यदि भ्रूण से शैशव से कैशोर्य से वृद्धावस्था तक प्रत्येक बदलती अवस्था में मैं गोबरगौरी को अपनी पत्नी और अपने पिता को पिता मानता था तो क्या कारण है कि अब उन्हें शव और फिर अन्य जीवों का भोजन, दुर्गंध, कीटाणुओं का ढेर, जल और खाद आदि में बदल जाने पर मैं उसे पत्नी और उन्हें पिता न मानूँ! उनके शवों को किसी वाटिका में रखकर उन्हें एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित होते भी मैं उन्हें उतने ही प्रेम से देख सकता हूँ जितने प्रेम से मैंने गोबरगौरी को किशोर से युवा या पिताजी को युवा से प्रौढ़ होते देखा था.
मृत्यु और रोग और दरिद्रता इसलिए बुरे नहीं होते क्योंकि वे हमें जीवन, स्वास्थ्य या जीने के ज़रूरी वस्तुओं से वंचित कर देते है. वह इसलिए बुरे है क्योंकि वे हमें छोटा बना देते है. शोक ने माँ को कितना छोटा बना दिया था. शारीरिक रूप से भी मुझे लगता वह दिन प्रतिदिन छोटी होती जा रही थी. उसके कन्धे सिकुड़ गए थे और हाथ इतने पतले हो गए थे कि कंकण कोहनी के ऊपर बाँह तक चला जाता था. मृत्यु के पश्चात् जो पीछे जीवित रह जाते है उनके ऊपर मृत्यु के सबसे गहरे चिह्न होते है. शोक किसी प्राचीन कुण्ड के जल जैसा है- हरा, शीतल और अत्यन्त पुराना. शोक माँ और मुझमें ऐसे भर गया था जैसे इससे हमारा परिचय जन्म से ही हो या यह हमारी आत्मा का ही एक तत्त्व हो जैसे शरीर का रक्त होता है. यदि ऐसा था तो हमें इतने दिनों तक इसका आभास क्यों नहीं था. हम इतने क्षीण हो गए थे इतने नष्टप्राय: किन्तु तब भी हमारा जीवित होना हमारे जीवट का नहीं बल्कि हमारे दयनीय होने का प्रतीक था जैसे मृत्यु ने भी हमें अपने योग्य नहीं माना था.
इतने वर्षों पश्चात आज भी मैं इस अवस्था का अर्थ नहीं पा सका कि प्रियजन की मृत्यु के बाद मैं क्या रह गया था. मैं क्या इतना शोक इसलिए मना रहा था क्योंकि अधिभौतिक संसार में मैं अब कभी पिताजी और गोबरगौरी से नहीं मिल पाऊँगा किन्तु प्रेम तो अधिभौतिक संसार का विषय नहीं. यह तो पूर्णरूपेण मन में घटता है. जो संसार से मन में प्रवेश पाता है उसे ही हम प्रेम करते है तब उसका संसार में होना या न होना क्या महत्व रखता है. यदि गोबरगौरी और पिताजी मेरे मन के नागरिक है तो उनकी इस सांसारिक प्रपंच में अनुपस्थिति शोक का कारण कैसे हो सकती है! किन्तु फिर भी इस अवस्था को स्वीकार करना इतना कठिन क्यों था? यदि मैं अपने चिन्तन को विशुद्धतर करता जाऊँ तो सम्भवतः उस अवस्था को पा लूँ जहाँ मन का विषय ही इतना प्रगाढ़ हो कि उसे संसार के आश्रय की आवश्यकता ही न पड़े किन्तु ऐसा कभी नहीं होता. शोक मुझे बताता था कि मैं उतना मानसिक जीव नहीं हूँ जितना मैं ख़ुद को मानता था.
हमारा जन्म ही संसार में होता है. मुझे अपने मन से पूर्व अपने संसार की स्मृति है. समृद्ध मानसिक जीवन संसार के अभाव में विकसित नहीं होता बल्कि यह संसार का ही विस्तार है. मन से अनुपस्थित व्यक्ति मेरे संसार से चला जाए सब यह चाहते है और मन का नागरिक यदि हमारे संसार से अनुपस्थित हो जाए तब इसका विषाद का विषय होना क्या यह नहीं बताता कि संसार के बिना हमारा होना ही सम्भव नहीं है. जब मैंने इस बात का अनुभव किया था तब शोक ने मेरे ऊपर अपना सबसे घातक आक्रमण किया क्योंकि तब ही मैंने यह अनुभव किया कि जिस तरह मैं संसार के बिना नहीं हो सकता उसी प्रकार पिताजी और गोबरगौरी की मृत्यु के बाद उनका संसार भी नहीं होगा.
पिताजी का संसार उनकी मृत्यु के साथ ही नष्ट हो गया. क्या हमारा शोक उस नष्ट हो चुके संसार के लिए नहीं होता. जिस प्रकार उनके साथ मैं शाक-भाजी ख़रीदने जाता था, उनका सफेद थैला, उनके जूतों की चर्र चर्र और रास्ते भर आते जाते जान-पहचानवालों से उनकी बातचीत सब नष्ट हो चुकी. यह इमारतें वही है किन्तु यह उनके संसार की इमारतें नहीं है. यह सब्ज़ी के ठेलेवाले भी उनके संसार के नहीं है न कि परचून की दुकानवाला जिनसे हम बरसों से किराना ख़रीदते रहे है वह भी पिताजी के संसार का पंसारी नहीं है. उनके संसार में मैं अब कभी पुनः नहीं जा सकूँगा. वह पिताजी के साथ ही नष्ट हो गया. जिस संसार को मैं इतने वर्षों तक अपना संसार मानता आया वह मेरा संसार नहीं था. यदि होता तो पिताजी के जाते ही वह यों सर्वथा नष्ट नहीं हो जाता. अरबी के पत्तों का जो पातरा माँ पिताजी के संसार में बनाती थी वह अब कभी खाने को नहीं मिलेगा न बाबुलनाथ मंदिर के निकट पिताजी के साथ मैं जो दहीबड़ा खाता था वह कभी खा पाऊँगा. वह हलवाई की दुकान अब भी वहीं है किन्तु वह मेरे संसार की दुकान है. पिताजी के संसार की विलीन हो गई.
और पिताजी के संसार की वह नाटक कम्पनियाँ, टिकट लेने को लगी लम्बी लाइनें जिसके अंतिम छोर पर खिड़की में पिताजी बैठे रहते थे वह सब अपनी अपनी जगहों पर रहते हुए भी तो नष्ट हो गई. उसी इमारत में अभिनेताओं की सज्जा के वह दृश्य जिससे पिताजी हमें भरसक दूर रखते थे. उनके संसार में वे हमें कभी नाटक दिखाने नहीं ले गए और उन्हीं के संसार में मैंने कितने नाटक चोरी-छिपे देखे. पिताजी के संसार में चाय और तम्बाकू निषिद्ध थी और उन्हीं के संसार में चोरी-छिपे इन्हें हम पीते थे. दोनों ही दशाएँ नष्ट हो गई.
पिताजी का संसार बहुत बड़ा, बहुत सारे जनों से भरा और किसी चित्रकार द्वारा बनाया गया था जिसमें संगीतकार ही संगीतकार रहते थे, ठौर ठौर पर संतरे की गोलियाँ, बिस्कुट और ग़ुब्बारे मिलते थे. उनकी मृत्यु के बाद मुझे पता लगा मेरा संसार कितना छोटा है, इसका आकाश कितना नीचे है जैसे खोलियों में छत होती है. जगह जगह से चूता हुआ, टूटा-फूटा और काई-फफूँद से भरा. ऐसा नहीं है कि पिताजी के संसार में सब कुछ ज्योतिर्मय ही था. माँ के साथ पिताजी का कटु व्यवहार और अपशब्द के लिए उन्हें मैं क्षमा न कर सकूँगा किन्तु हम लोगों ने जैसे उनका यह कटु व्यवहार स्वीकारकर संसार की समस्त कटुताओं से अपनी रक्षा कर ली थी. अब ऐसा नहीं था. हम अपने संसार में धकेल दिए गए थे. हम दोनों को यह भी पता था कि अपने इन संसारों में भी हम जी लेंगे किन्तु हमारा मन बार बार पिताजी के संसार में जाता था जो जल चुका था. जीवनभर लिख लिखकर मैं मृतकों के इन्हीं संसारों का पुनर्निर्माण करना चाहता हूँ. इसमें इतनी शान्ति, इतना शोक, इतनी सान्त्वना है कि इसके बदले में अपना संसार दे देना घाटे का व्यापार नहीं होगा.
अम्बर पांडेय की कई कहानियाँ मैने समलोचन पर पढ़ी हैं। उनकी कहानियों की ख़ास बात उनकी लय बद्ध और सरस भाषा होती है। इतिहास और दर्शन का भी उन्हें ज्ञान है। विषय वस्तु अक्सर उच्च कुल के किसी पुरुष के जीवन की कोई घटना होती है और वही कहानी का सूत्रधार भी होता है। कहानी हम उसी के नज़रिए से देखते हैं । स्त्री पात्र अक्सर माँ या पत्नी के रूप में ही आते हैं और ज़्यादातर कहानी के अंत तक मर चुकी होती हैं। कहानी में उनकी भूमिका भोजन बनाने, परोसने, पति को रति सुख देने, बच्चा पैदा करने के अलावा कुछ ख़ास नहीं है। ऐतिहासिक किरदार, जैसे गांधी, सावरकर अक्सर इन कहानियों में विचारते दिखते हैं। हालाँकि कहानी की विषय वस्तु से उनका कोई ख़ास लेना देना होता नहीं है। वे किसी अलंकार की तरह यहाँ -वहाँ झूलते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह है कि यदि इन किरदारों को इन कहानियों से निकाल दिया जाए तो क्या कहानी मूल रूप से बदल जाएगी?
उनकी कहानियों में भाषा के अलावा मुझे कुछ ख़ास कभी नहीं मिलता। वे एक ही शैली में एक तरह की कहानियाँ लिखते हैं।
Vijaya Singh मुझे लगता है कि सावरकर और गांधी अलंकार नहीं काल की घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलते हैं। यह झूलना दृश्य और परिदृश्य दोनों रचता है। मुझे लगता है जैसी कहानियाँ उसके भीतर से इन दिनों आस रहीं, यह शैली उसी के ताप से है।हर रचनाकार अपनी शैली के भीतर कथ्य के अनुसार एक नयी शैली विकसित करता है। यही उम्मीद अम्बर से भी है।
एक रूपरेखा बनाकर किसी तरह शेक्सपियर की रचनाओं को भी एक दायरे में समेट सकते हैं। साहित्य के इतिहास में ऐसा करते भी हैं। पर उसको मूल्यांकन का आधार नहीं बनाते। उदाहरण के लिए हम यह नहीं कहते कि शेक्सपियर के दुखांत नाटकों मे निम्नलिखित तत्त्व काॅमन हैं, इसलिए उनका विशेष मूल्य नहीं है। मूल्यांकन के लिए हम दूसरे मानदंड इस्तेमाल करते हैं।
तथ्यात्मक रूप से भी आपका सामान्यीकरण इतना सही नहीं है। गांधी जिन टुकड़ों में आये हैं वे एक आने वाले उपन्यास के अंश हैं। अभी हम कैसे कह सकते हैं कि गांधी कथा में यों ही आ गये हैं। सावरकर वाली कहानी को फिर पढ़कर देखिए। सावरकर का चरित्र केन्द्रीय है। उस पर मेरा एक छोटा नोट भी है। दोनों समालोचन पर मिल जायेंगे।
फिर भी मुझे मानना पड़ेगा कि अबूझ भाषा में तारीफ करने वालों/वालियों की तुलना में आपकी नजर साफ और तीखी है।
जबरदस्त। अगर ये किसी उपन्यास के अंश हैं तो मेरी इच्छा इस कृति को समग्रता में एक जगह पढ़ने की है। इस हिस्से में मृत्यु, शोक, शव, मृत्यु पश्चात संसार आदि पर बहुत अर्थगर्भी और अनुभूत बातें हैं। लेखकों की आयु उनकी शारीरिक उम्र से नहीं, उनके सोचे, जिए और लिखे की व्यापकता और गहनता से समझी जानी चाहिए। अम्बर को पढ़ कर और अम्बर से मिल कर बार बार विस्मित होना पड़ता है कि वास्तविकता में गल्पस्वरूप है कौन ? जिसे हम जानते हैं वह यह सब कब देख सुन जी आया, और जो हमसे ओझल रहा , क्या हम उसी से परिचय के मुग़ालते में रहते रहे ?
इसे बार बार पढ़ना होगा, हमेशा की तरह। कविता हो या कहानी, प्रचलित जल्दबाज़, इकहरे सरल पाठ की आदतों को अम्बर की रचनाएँ अक्सर ठेस पहुंचाती हैं।
फिर कहूँगा : इस कृति को एक साथ पढ़ने की ललक बढ़ गई है।
अम्बर की कहानी तो मुझे दूसरे लोक में ले गई जहाँ मैं अपने प्रियजनों से मिल, उनकी स्मृतियों के साथ रोती, कभी चुप लगा उन्हें सुनने का प्रयत्न करती रही… यह उपन्यास का अंश है, ऐसा लगा नहीं.. उपन्यास है तो इसने बुरी तरह बेचैन कर दिया है पहले के अधूरे उपन्यास माँमुनी की तरह…. इंतज़ार बहुत मुश्किल हो गया है… अम्बर अपना स्थान बना चुके हैं… माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे🙏💕
सोने से पहले इस गद्य को पढ़ जाना सच में ख़तरनाक सिद्ध हो सकता है. अपने घनघोर और घटाटोप obsessions को खेलना-लिखना इस लेखक को हर बार नए सिरे से करना पड़ता होगा.. मुझे नहीं लगता अम्बर जोकि भाषा का अद्भुत धनी है उसे अपनी रची हुई ऐश्वर्यशाली दुनिया में एक पल की आश्वस्ति भी महसूस होती होगी. तलवार की धार पर हर वाक्य दम साधे स्वयं को शिल्पित करता है. कभी-कभी तो अम्बर के ध्वन्य्लोक में नाद के लावा बाकी हर तत्त्व धूमिल पड़ जाता है. इसलिए एक ही बैठक में कम से कम दो बार पढने को जी चाहता है.
मुझे अम्बर की दोएक कहानियों के लेकर जिस असहजता ने आ घेरा था यहाँ बिलकुल भी महसूस नहीं हुई. वहाँ भी दृष्टि-दोष मेरा स्वयं का हो सकता है. मुझे बहुत आनंद आया इस पाठ का अम्बर. आभार, कि तुम हो, और हिन्दी के उन दिनों में प्रकट हुए जब बीच-बीच में बेहद कमतरी का एहसास होने लगा था.
यह एक बड़े आख्यान का अंश है। पिछले अंश की तुलना में कथ्य अधिक palpable और quantifiable है।
भारत और यूरोप के इतिहास पर की गयी टिप्पणी ने क़ायल कर दिया। मृत्यु के प्रसंग और उसकी उत्तरकथा का काव्य विह्वल करता है। पूरे की प्रतीक्षा !
कहानी में लेखक अपने आत्मीय जनों की मृत्यु के बाद भी उनका जीवन और संसार में पुनर्निर्माण करना चाहता है। ये बड़ा ही रोचक है। सच है मृत्यु के बाद ही मृतक ही एक अदृश्य दुनिया हमारे साथ चलती रहती है। बस संवाद् नहीं होता।