आलेख

तेग़ अली का बनारस :  शुभनीत कौशिक

तेग़ अली का बनारस : शुभनीत कौशिक

क्या आप तेग़ अली को जानते हैं? वे भोजपुरी भाषा के पहले साहिब-ए-दीवान हैं. उनका ग़ज़लों का संग्रह ‘बदमाशदर्पण’ उन्नीसवीं सदी के अंत में प्रकाशित हो गया था. यह संग्रह...

उदाहरण होने से बचकर : अशोक वाजपेयी

उदाहरण होने से बचकर : अशोक वाजपेयी

समालोचन पर ही आपने विनोद कुमार शुक्ल की अंतिम कविता पढ़ी, ‘कृति’ में पहली बार प्रकाशित उनकी कविताएँ भी. यह उन पर लिखा गया पहला आलोचनात्मक आलेख है. ‘पूर्वग्रह’ के...

आपत्ति : रवि रंजन

आपत्ति : रवि रंजन

हरि भटनागर के हालिया प्रकाशित कहानी-संग्रह की चर्चा के बहाने आलोचक रवि रंजन ने समकालीन आलोचनात्मक विमर्शों की कसौटी पर इसकी कुछ चुनिंदा कहानियों को परखा है. यह आलेख न...

विनोद कुमार शुक्ल और उनकी अंतिम कविता : सुदीप ठाकुर

विनोद कुमार शुक्ल और उनकी अंतिम कविता : सुदीप ठाकुर

विनोद कुमार शुक्ल के सहज, लगभग निर्विकार जीवन को वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुदीप ठाकुर ने निकट से देखा है. लेखन की अंतर्ध्वनियों के साक्षी रहे हैं. अब जब अवसान...

परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी

परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी

“ऋषि जा चुके थे. मनुष्यों ने देवताओं से पूछा, अब हमारा ऋषि कौन होगा? देवताओं का उत्तर था. अब तर्क तुम्हारा ऋषि होगा. यास्क इस कथा के अंत में जोड़ते...

पहल के संग-साथ : रविभूषण

पहल के संग-साथ : रविभूषण

1973 से 2021 के बीच प्रकाशित पहल के 125 अंक ज्ञानरंजन की प्रतिबद्धता, संकल्प और ऊर्जा के दस्तावेज़ हैं. साहित्यिक पत्रकारिता का यह एक ऐसा आलोक-स्तम्भ है, जिसने पाँच दशकों...

लफ़्फ़ाज़: व्यूह-रचना और आलोचनात्मक विवेक :  नरेश गोस्वामी

लफ़्फ़ाज़: व्यूह-रचना और आलोचनात्मक विवेक : नरेश गोस्वामी

कहानी के तत्वों की अधिकतम रक्षा करते हुए, किसी कथा का अपने समय की राजनीति पर ठोस और बहुस्तरीय टिप्पणी में रूपांतरित हो जाना एक जटिल प्रक्रिया है; योगेन्द्र आहूजा...

भारतीय अकादमिक स्वतंत्रता और फ्रेंचेस्का ओर्सिनी : त्रिभुवन

भारतीय अकादमिक स्वतंत्रता और फ्रेंचेस्का ओर्सिनी : त्रिभुवन

सदियों से भारत जिज्ञासाओं का घर रहा है. अध्येता दूर देशों से दुर्गम यात्राएँ कर यहाँ आते रहे हैं. उनकी यह दीर्घ और अटूट परम्परा आज भी हमारे बौद्धिक जीवन...

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