चनाब की धार में सोबती का लोकतन्त्र :सन्तोष अर्श
युवा आलोचक सन्तोष अर्श का यह आलेख जितना कृष्णा सोबती पर है उतना ही आज के भारतीय लोकतंत्र पर भी. मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा का सवाल लोकतंत्र का मूल...
युवा आलोचक सन्तोष अर्श का यह आलेख जितना कृष्णा सोबती पर है उतना ही आज के भारतीय लोकतंत्र पर भी. मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा का सवाल लोकतंत्र का मूल...
साहित्यकार वैसे ही अपने अंदर चल रहे अंतहीन मुक़दमों के वादी-प्रतिवादी की भूमिका में रहते हैं. पर कभी-कभी उन्हें बाहर की कचहरी के भी चक्कर लगाने पड़ते हैं. ज़ाहिर है...
आलोचना ही ऐसा क्षेत्र है जिसमें हिंदी साहित्य के शिक्षकों ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि से नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय तक होती...
वरिष्ठ कथाकार ओमा शर्मा की समालोचन में प्रकाशित कहानी ‘पुत्री का प्रेमी’ ने साहित्य जगत के मानस को मथ दिया है. बड़ी संख्या में आ रही प्रतिक्रियाओं में समकालीन लेखक...
स्वाधीनता संग्राम के दौरान असंख्य लोगों ने वर्षों तक इसकी निराई गुड़ाई करके इसे इस लायक बनाया था कि इसपर आधुनिक भारत की फ़सलें लहलहा सकें. यह गांधी की ज़मीन...
एक भाषा की कविता को दूसरी भाषा में लिखते हुए जो हम करते हैं वह अनुवाद है कि पुनर्रचना, वह कितना मूल है और कितना मौलिक. ऐसे सवाल उठते रहे...
पराधीन भारत में जनता की दशा-दिशा को समझने के लिए गांधी जी 1915 में हरिद्वार के कुम्भ मेले में शामिल हुए थे. सौरव कुमार राय उस समागम को याद करते...
शायरी का ख़ुदा कहे जाने वाले मीर तक़ी मीर (1723-1810) की कविताओं की मार्मिकता दिल में बस जाती है. प्रेम और विरह का उनसे बड़ा शायर अभी विश्व ने नहीं...
‘2024 : इस साल किताबें’ का यह तीसरा हिस्सा है. इसके पहले हिस्से में आपने महत्वपूर्ण रचनाकारों मृदुला गर्ग, हरीश त्रिवेदी, मदन सोनी, ज्योतिष जोशी, चंद्रभूषण, मुसाफ़िर बैठा और शुभनीत...
इस साल क्या रहा किताबों का हाल-चाल? क्यों ने सीधे प्रकाशकों से पूछा जाये. हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशकों की इस वर्ष की लोकप्रिय पुस्तकों की यह सूची दिलचस्प है....
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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