सूरदास के भ्रमरगीत प्रसंग का पाठ–पुनर्पाठ: माधव हाड़ा
कवि सूरदास के साहित्य में वात्सल्य और श्रृंगार के साथ-साथ सगुण और निर्गुण के द्वंद्व का तीखा बोध है, इसके साथ ही उनके काव्य-संसार में उनका समय भी बोलता है....
कवि सूरदास के साहित्य में वात्सल्य और श्रृंगार के साथ-साथ सगुण और निर्गुण के द्वंद्व का तीखा बोध है, इसके साथ ही उनके काव्य-संसार में उनका समय भी बोलता है....
हिंदी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परम्परा क्षीण ही रही, इस दिशा में डॉ. रामविलास शर्मा ने महत्वपूर्ण कार्य किया हालाँकि उनकी इस विषय पर कोई स्वतंत्र किताब नहीं है लेकिन...
कवि पंकज सिंह की कविताओं पर लिखते हुए आलोचक राजाराम भादू उन प्रसंगों को भी याद करते हैं जिनमें ये कविताएँ आकार ले रहीं थीं, आठवें दशक की जयपुर की...
आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय की भक्तिकाल की आलोचना दृष्टि पर यह आलेख प्रसिद्ध आलोचक विनोद शाही का है. उन्होंने गम्भीर सवाल खड़े किये हैं जो कि बड़े बहस को आमंत्रित...
भाष्य के अंतर्गत समालोचन महत्वपूर्ण रचनाओं का पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है, जिसमें आपने अब तक- निराला, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, आलोक धन्वा, नंद चतुर्वेदी, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल...
भक्तिकाल के कवियों का समूह विरक्त लोगों का नहीं था, धर्म के राजनीतिक आशय को वे लोग ख़ूब समझते थे. वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने सूरदास के काव्य में...
‘मैन अगेंस्ट मिथ’ के लेखक बैरो डनहैम का मानना है कि दर्शन को मानव-मुक्ति का साधन होना चाहिए. सामाजिक अर्थों में मानव-मुक्ति के लिए वस्तुपरकता की जरूरत होती है. आध्यात्मिकता...
‘स्त्री-दर्पण’ पत्रिका का प्रकाशन जून १९०९ में प्रयाग से शुरू था इसकी संपादिका रामेश्वरी देवी नेहरू और प्रबंधक कमला देवी नेहरू थीं. इसमें स्त्री मुद्दों पर सामाजिक राजनीतिक लेख छपते...
गोस्वामी तुलसीदास के इर्द-गिर्द भक्ति/धर्म/अस्मिता का ऐसा प्रभा मंडल तैयार किया गया है कि कवि तुलसी अलक्षित रह जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि उनका जीवन कवि का था...
आज प्रस्तुत है शमशेर बहादुर सिंह की हिंदी की ‘बड़ी’ प्रेम कविता ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ का स्त्रीवादी पाठ. सविता सिंह ख़ुद हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री हैं. शमशेर की ‘शमशेरियत’...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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