संस्मरण

मति का धीर : शमशेर बहादुर सिंह

मति का धीर : शमशेर बहादुर सिंह

अपने रचनाकारों को या तो हम उनकी रचनाओं से जानते हैं या फिर आलोचकों से. रचनाकार का जीवन और वह भी निरलंकार रोज़मर्रा का जीवन अलिखित रह जाता है और...

कश्मीर: भाषा सिंह

कश्मीर: भाषा सिंह

औपनिवेशिक शासन तंत्र से आज़ादी की मांग करते हुए भारत अपने आंतरिक उपनिवेश के प्रति भी सचेत था. उस बड़ी लड़ाई के अंदर तमाम तरह के जरूरी स्थानीय संघर्ष भी...

मति का धीर : आचार्य शिवपूजन सहाय

 “हिंदी की शक्ति और क्षमता का   देना तुम्हें प्रणाम.”   बच्चन फादर कामिल बुल्के ने कहीं लिखा है कि परलोक में जाकर जिससे मिलकर उन्हें अनिर्वचनीय खुशी होगी वह शिवपूजन सहाय...

देस-वीराना : देवरिया-३ : सुशील कृष्ण गोरे

कस्बों और नगरों की वैचारिकी है स्थानीय पत्रकारिता. उनके छोटे-बड़े सुख-दुःख का बेतरतीब सा कोलाज. देवरिया रूपक है. इस बार इसके इस पहलू का भाष्य सुशील कृष्ण गोरे ने किया...

देस-वीराना : देवरिया-२ : विवेक कुमार शुक्ल

(पेंटिंग : रामकुमार)एक उनींदा शहर भी एक मुकम्मल गाथा है. जीवन के रंगों से सराबोर. अपने नायकों४ और खलनायकों में मशगूल. अपने लोक-वृत्त में हज़ार कथाएं छुपाए हुए. नित्य घटते...

मति का धीर : उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’

उपेन्द्र नाथ अश्क : जन्म शताब्दी वर्ष पिता और पुत्र के सम्बंध जटिल हैं.जब ‘अश्क’ जैसा पिता हो तो यह जटिलता और बढ़ जाती है. नीलाभ ने पिता को याद...

देस – वीराना : देवरिया-१ : विवेक कुमार शुक्ल और परितोष मणि

जहाँ हम पले- बढ़े, उस नगर में हमारी यादों की स्थाई नागरिकता रहती है, चाहे हम दर- बदर हों या जिला-बदर. कभी फीकी नहीं पड़ती उन गलियों की चमक. ऐसी...

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