अपमान : कुमार अम्बुज
अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता...
अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता...
जनवरी की पहली तारीख़ विनोद कुमार शुक्ल के जन्म की भी तिथि है। तेईस वर्ष की अवस्था में उनकी कविताएँ पहली बार ‘कृति’ के सितंबर, 1960 अंक में प्रकाशित हुई...
सत्यव्रत रजक की कुछ नई कविताएँ प्रस्तुत हैं.
‘कंगले और चरित्रहीन होते हैं लेखक!’. ऐसी आत्मभर्त्सना केवल कविता ही अपने लिए लिख सकती है. देवेश पथ सारिया की इन कविताओं में युवा का वही पुराना दर्द है जो...
नेहा नरूका की कविताएँ सत्ता और सर्वसम्मति के समकालीन गठजोड़ को प्रश्नांकित करती हैं. उस नैतिक तनाव में आकार लेती हैं जहाँ व्यक्ति अपनी चुप्पी और बोलने की विवशता के...
शुभम नेगी के पास कहने के लिए बहुत कुछ है, और वे उसे तरह-तरह से कहते हैं. कहानियों से, फ़िल्मों से और कविताओं से. इन पाँच कविताओं में एक युवा...
रूटीन की निरर्थकता भी एक सामाजिक आत्महत्या ही है. आत्महत्या के विचार की सुरंग में प्रवेश करती बाबुषा कोहली की ये कविताएँ अंतत: स्मृति और स्पर्श के सहारे जीवन की...
कलाएँ निजी अनुभवों को सहजता से सामूहिक ठिकानों में रूपांतरित कर देती हैं. पीड़ा, विस्थापन और आकांक्षा एक बड़े सांस्कृतिक आख्यान का हिस्सा बन जाती है. यह उदात्तता ही उसे...
पुरबियों का निर्वासन एक ऐसी आपदा है जिसे गाने के लिए भिखारी ठाकुर को एक शैली ही विकसित करनी पड़ गई थी. श्रम की भट्ठी में वे स्वयं तो तपते...
अंचित की यह कविता अपने अँधेरे और आवेग के साथ समकालीन हिन्दी काव्य में प्रकट होने वाली वह आवाज़ है जो निजी विफलताओं, सामाजिक क्षरण और अस्तित्वगत रिक्तता को साध...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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