अनामिका की कविताएँ
वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की कविताओं में परम्परा और लोक के तत्व मार्मिकता के उत्स रहे हैं. एक घायल पुकार जब तब उठती रहती है. यह विदीर्ण स्त्री की आवाज़ है...
वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की कविताओं में परम्परा और लोक के तत्व मार्मिकता के उत्स रहे हैं. एक घायल पुकार जब तब उठती रहती है. यह विदीर्ण स्त्री की आवाज़ है...
अश्विनी कुमार टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर हैं. वर्तमान में वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंडियानापोलिस में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं. पिछले वर्ष अंग्रेज़ी में उनका कविता-संग्रह ‘मैप ऑफ़ मेमोरीज़’ प्रकाशित...
सत्तर के क़रीब पहुँच गए वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज का आज जन्मदिन है. स्वस्थ और सक्रिय जीवन की हार्दिक शुभकामनाएँ. जैसा समय और जिस तरह की क्रूरताओं में हमारा संसार...
वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह की नई कविताएँ युद्ध की पृष्ठभूमि में सत्ता, परिवार और प्रकृति के जुड़े जटिल तथा परस्पर गुथे अस्तित्वगत संकटों को स्त्री-दृष्टि की तीक्ष्णता से भी देखती...
पूजा तिवारी की कुछ कविताएँ देखिए, ख़ासकर ‘बुर्क़े वाली लड़कियाँ’. बड़ी संलग्नता के साथ लिखा गया है. जो है, जैसा है—उसी में जो कुछ बेहतर हो रहा है, उसकी ओर...
सोमेश शुक्ल गहरे उतरने वाले कवि हैं. उनके यहाँ अकेलापन कोई स्थिर स्थिति नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है, जहाँ यथार्थ, स्मृति और पहचान एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं. उनकी...
इतिहास में ऐसे नायकों की कोई कमी नहीं, जो अपनी ही विजय से पराजित हो जाते हैं. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर उन्हीं में से एक थे. जहाँ जीत के साथ ही...
वरिष्ठ कवि अनिल गंगल की कविताएँ समकालीन जीवन के यथार्थ से टकराती हुई उस संवेदनात्मक आंच में तप्त होती हैं, जिसकी एक धारा प्रतिरोध की है. अपने जीवन के आठवें...
सृष्टिगत सौंदर्य का एक बोध भाषा भी कराती है. वरिष्ठ कवि सत्यपाल सहगल की कविताएँ धूप और अँधेरे की तरह हैं. हज़ार कोणों से स्वयं को अभिव्यक्त करती हुईं. उकसाती...
दीप्ति कुशवाह की ‘रंगों के पार्श्व में’ लिखी गई ये कविताएँ रंगों को उनके स्थिर, पारंपरिक अर्थों से मुक्त करके उन्हें सांस्कृतिक विस्तार प्रदान करती हैं. संकेत, स्मृति और अनुभूति...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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