अच्युतानंद मिश्र की कविताएँ
युवा अच्युतानंद मिश्र की इन व्यस्क कविताओं में जीवन और आजीविका की यातना के स्वरों का आरोह- अवरोह है. समकालीन हिंदी कविता केवल स्वप्न और आकांक्षा की ही कविता नहीं...
युवा अच्युतानंद मिश्र की इन व्यस्क कविताओं में जीवन और आजीविका की यातना के स्वरों का आरोह- अवरोह है. समकालीन हिंदी कविता केवल स्वप्न और आकांक्षा की ही कविता नहीं...
क्यूं लिखना कविता का _____________________________________लिखने का आलम क्यूंआधी दुनिया या पूरी दुनिया केदु:ख के समन्दर में डूबने की प्रवृत्तिअन्दर निराशा भर लेने की प्रवृत्तिघुटने की प्रवृत्तिसंवेदनाओं में त्राहिमाम-त्राहिमामहोगा, कितनी तबाहियांफिर...
गिरिराज किराडू की कुछ नई कविताएँ पहली बात तो यह है कि गिरिराज की कविताओं का हिंदी में कोई पूर्वज नहीं हैं पर इन कविताओं में हिंदी उर्दू के पूर्वज...
सृजनशीलता रहस्यमय वस्तु समझी जाती है, खासकर कलाओं में - कविता के ‘उतरने; की बात कही जाती है किसी खास मनोदशा में कुछ घटित होता है- और रचना संभव हो...
शिरीष कुमार मौर्य की इन चारों कविताओं में एक युवा की नैतिक और सामाजिक जबाबदेही मुखर हुई है. ‘पूंजी के क्रूर प्रवाह’,‘ग़लत नीतियों’ और ‘राजनीति में विकल्पहीनता’ के जुनूनी दौर...
कविता में बारिश प्रेमचंद गांधी ऋतुएं हमारी काव्य-परम्परा के विषय और आलम्बन दोनों रहे हैं. कवि प्रेमचंद गांधी ने इन कविताओं में बारिश को अनके...
प्रांजल धर की कविता \'कुछ भी कहना खतरे से ख़ाली नहीं\' को इस वर्ष के प्रतिष्ठाप्राप्त भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से नवाज़ा गया है. इस वर्ष के निर्णायक आलोचक- विचारक...
हेमंत देवलेकर को भारत भवन में कविता पाठ करते सुना और विस्मित हुआ. रंगमंच से जुड़े होने के कारण उनकी कविताओं का वाचन बहुत ही प्रभावशाली था. उन्होंने एक कविता...
राहुल राजेश 9 दिसंबर, 1976 दुमका, झारखंड (अगोइयाबांध)युवा कवि और अंग्रेजी-हिंदी के परस्पर अनुवादकयात्रा-वृतांत, संस्मरण, कथा-रिपोतार्ज, समीक्षा एवं आलोचनात्मक निबंध लेखनसामाजिक सरोकारों और शिक्षा संबंधी विषयों से भी सक्रिय जुड़ावसभी...
आशुतोष दुबे की कविताओं में वर्तमान नैतिक संकट की पहचान है, उससे टकराने की एक शालीन सी कोशिश भी है. कवि के काव्य -पर्यावरण में वनस्पतियों और जंतुओं के लिए...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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