सिद्ध पुरुष: प्रवीण कुमार
'छबीला रंगबाज़ का शहर' प्रवीण कुमार का चर्चित कथा संग्रह है. प्रस्तुत कहानी ‘सिद्ध-पुरुष’ का नायक अवकाश प्राप्त शिक्षक है जिसे कैमरों में दर्ज़ होने और समय में वापस लौटने...
'छबीला रंगबाज़ का शहर' प्रवीण कुमार का चर्चित कथा संग्रह है. प्रस्तुत कहानी ‘सिद्ध-पुरुष’ का नायक अवकाश प्राप्त शिक्षक है जिसे कैमरों में दर्ज़ होने और समय में वापस लौटने...
वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि ने ‘दिनमान’ से पत्रकारिता की शुरुआत की थी, फिर सृजनात्मक लेखन की तरफ मुड गए. अब तक चार कहानी संग्रह, एक उपन्यास और दो निबंध संकलन...
अम्बर पाण्डेय की नई कहानी ‘पातकी रूढ़ि’ पृष्ठभूमि, विषय और भाषा तीनों स्तरों पर विस्मित करती है. अम्बर आख्यान अतीत से उठाते हैं, उसपर शोध करते हैं और फिर अपनी...
वरिष्ठ कथाकार जया जादवानी की कहानी ‘वह दूसरा’ प्रस्तुत है. जया अपनी कहानियों में अस्तित्वगत प्रश्नों को उठाती रहीं हैं. यह कहानी खुद को आईने में देखने जैसा है....
डॉ. स्कन्द शुक्ल (MBBS, MD, DM : Rheumatologist, Immunologist) हिंदी के पाठकों के सुपरिचित लेखक हैं. रोगों की जटिलता, बचाव और निदान को सृजनात्मक भाषा में जिस तरह से वो...
चर्चित कथाकार पंकज मित्र की कहानी ‘कोरोना से ऐन पहले’ पांच कथाओं का समुच्चय है जिसे क्वॉरेंटाइन, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजर, आइसोलेशन और लॉकडाउन शीर्षकों के अंतर्गत बुना गया है. हालाँकि...
यह फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म शताब्दी वर्ष है, उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘पहलवान की ढोलक’ हालांकि बदलते भारत में देसी कलाकारों के लगातार अप्रासंगिक होते जाने की कथा है पर इसमें...
कहानियाँ झूठी होती हैं, पर सच से कम सच भी नहीं होतीं, यही इनकी ताकत है. हिंदी की युवा पीढ़ी के महत्वपूर्ण लेखक प्रचण्ड प्रवीर जिन्होंने अपने शास्त्रीय ज्ञान से...
( Philosopher ludwig wittgenstein portrait by Renée Jorgensen)आदित्य कहानियाँ लिख रहें हैं. उनकी कहानियों पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष काफ्काई प्रभाव देखा जा सकता है, इस कहानी में अस्तित्वगत बेचैनी किसी दार्शनिक प्रणाली का...
भुवनेश्वर का जन्म शाहजहाँपुर में हुआ था, उनके व्यक्तित्व की ही तरह उनका जन्म-मृत्यु वर्ष भी विवादग्रस्त है. जन्म के लिए १९१०, १९१२ तथा १९१४ तथा मृत्यु के लिए १९५७...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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