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Home » चंदन किवाड़ : प्रभात रंजन

चंदन किवाड़ : प्रभात रंजन

प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अवधी, ब्रज, भोजपुरी, काशिका और बुन्देलखड़ी बोलियों के गीतों को देश-प्रदेश में अपने मोहक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. इस प्रक्रिया में अर्जित उनके रोचक अनुभवों को ‘चंदन किवाड़’ में संजोया गया है. जिसे ‘वाणी’ ने प्रकाशित किया है. इसकी चर्चा कर रहे हैं कथाकार और संपादक प्रभात रंजन.

by arun dev
March 6, 2025
in समीक्षा
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चंदन किवाड़ : प्रभात रंजन
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गीतों की खोई हुई कॉपी और ‘चंदन किवाड़
प्रभात रंजन

प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी की पुस्तक ‘चन्दन किवाड़’ को पढ़ते हुए बहुत कुछ याद आया. मुझे अपनी दादी याद आईं जो जीवन-जगत के किसी भी प्रसंग की बात करते हुए कोई ना कोई गीत सुनाती थीं. बहुत दिनों तक हमारे घर में गीतों की एक कॉपी होती थी- कजरी, नचारी, सोहर, बटगमनी, जनेऊ, विवाह आदि-आदि अवसरों पर गये जाने वाले गीत. बहुत दिनों तक माँ उसी कॉपी से शादी-ब्याह में गीत गाती रहीं. धीरे धीरे गीत गाने का चलन हुआ और फिर वह कॉपी न जाने कहाँ गुम हो गई!

इस बात पर ध्यान गाया कि हम ऐसे युग में आ गये हैं जिसमें स्थानीय विविधताओं का लोप होता जा रहा है. विस्थापन के इस दौर में एक जैसा समाज बनता जा रहा है. लेखक पिको एयर ने बहुत पहले एक निबंध लिखा था ‘द नोव्हेयर मैन’. जिसमें उन्होंने यह लिखा था कि दुनिया में ऐसे लोगों की आबादी बढ़ती जा रही है जो कहीं के नागरिक नहीं हैं. उनकी कोई जड़ अगर है भी तो उनको इसके बारे में ठीक से पता नहीं है. ऐसे में मालिनी अवस्थी की यह किताब ‘चंदन किवाड़’ हमारा ध्यान लोक गीतों की स्थानीय लेकिन समृद्ध परंपरा की ओर ले जाती है.

इन गीतों में सभ्यता के विकास का इतिहास छिपा है, वह उल्लास छिपा जो भौतिकता से आक्रांत नहीं रहा. पुस्तक की भूमिका में लेखिका ने लिखा है,

‘मैं ऐसी गायिका हूँ जिसने लोक से भक्ति की है. लोक से प्रेम किया है, लोक में जीवन के रहस्य ढूँढे हैं, लोक से जीवन जीने का मन्त्र सीखा है. मैंने लोक कलाओं में अपनी अभिव्यक्ति पाई है. लोक-कलाओं में अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के रूप में पाया है.’

जब हम अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति को औपनिवेशिक नज़रिए से अलग हटकर देखने लगते हैं तभी हमें लोक का मतलब समझ में आता है. यही बात तो मालिनी जी कहना चाह रही हैं.

एक और बात है जिसकी ओर मैं विशेष रूप से ध्यान दिलाना चाहता हूँ. आज तक मैंने जितने लोक कलाकारों को सुना-पढ़ा उनके अंदर यह पीड़ा या आकांक्षा ज़रूर देखी कि उनको शास्त्रीय कलाकारों में नहीं गिना गया या उनको भी शास्त्रीय कलाकारों सा दर्जा नहीं दिया जाता. बड़े से बड़े लोक गायकों में में यह भाव दिखता रहा है. शास्त्रसम्मत होने की आकांक्षा बहुत प्रबल रही है. उसी तरह से जिस तरह से हिन्दी के लोकप्रिय लेखकों में यह आकांक्षा दबे छिपे या मुखर रूप में रहती है कि उनको भी साहित्यिक लेखकों जैसी स्वीकृति मिले, स्वीकार मिले. कारण यह कि उनकी कला का संबंध सीधे-सीधे आम जन की संवेदना से होता है. लोक गीतों में आम जन के मन की अभिव्यक्ति होती है.

मालिनी अवस्थी की यह संस्मरण पुस्तक इस मायने में अनूठी है कि इसमें उन्होंने लोक में अपनी गहरी और अकुंठ आस्था को व्यक्त किया है. इस किताब में लोक का वैभव दिखाई देता है, और उसकी अटूट परंपरा का सहज स्वीकार भी.

‘चंदन किवाड़’ में यह बात बहुत प्रभावित करती है कि लेखिका शास्त्रीयता को बंधन की तरह देखती हैं और लोक को मन की सच्ची उड़ान के रूप में. उन्होंने किताब में यह बताया है कि लोक कलाएँ असल में जीवन को अभिव्यक्त कर रही होती हैं. अपने समाज को उसकी परंपराओं को, उसके सुख-दुख को समझना हो तो लोक गीतों के विराट संसार में झांकना चाहिए. इसलिए उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखने के दौरान ही लोक की दिशा में उन्मुख होने का निश्चय किया. लोक गीत गायन उनके लिए महज़ सुनने वालों का मनोरंजन नहीं है बल्कि अपने समाज की समृद्ध कला परंपरा को लोगों तक पहुँचा पाने का उपक्रम है. उसको समकालीन समाज से जोड़ने का उपक्रम है. फिर याद दिलाना चाहता हूँ कि ऐसे दौर में जब घर-घर गीतों की कॉपी गुम होती जा रही है लोक कला को लेकर ऐसा विश्वास बहुत मायने रखता है.

पूरब के जिन गीतों को मालिनी अवस्थी गाती हैं उस समाज ने विस्थापन का दंश सबसे अधिक झेला है. मालिनी अवस्थी ने अपने गीतों से उस समाज को जोड़ने का काम किया है. उसको याद दिलाने का काम किया है कि यह तुम्हारी बहुत बड़ी थाती है और इसको सम्भाल कर रखना है, इसको याद रखना है. अकारण नहीं है कि भिलाई में जब वह देवी गीत गा रही होती हैं तो एक बालक भागता हुआ मंच पर आता है और उनको वह सिक्का सौंप जाता है जो वह मंदिर में चढ़ाने के लिए ले जा रहा होता है. या फ़्लोरिडा में जब वह पितृपक्ष के पहले दिन न्योता गीत गा रही होती हैं तो सभागार में उपस्थित सभी लोगों की आँखों से आँसू झरने लगते हैं. लोकगीत वह तार है जो परंपरा को समकालीनता से जोड़ने का काम करता है. इन प्रसंगों से यही बात समझ में आती है.

यह किताब लोकगीतों के बारे में तो है ही, उनके प्रभाव के बारे में भी और सबसे बढ़कर उनके बारे में लोकगीतों में जिनका स्मरण किया जाता है. वे अनाम, गुमनाम लोग जो स्मृतियों के संचित कोष लोकगीतों में अमर हैं. न तो इनके कवियों के बारे में कुछ पता है न यह कि इन गीतों को कब से गाया जा रहा है. लेकिन ये गीत अपने समाज के अनिवार्य तत्व की तरह से हैं. इन गीतों में लोक नायकों की गाथा है, विरहनियों की पीड़ा है, तड़प है. सबका बहुत सुंदर बखान मालिनी जी ने अपनी इस किताब में किया है.

प्रसिद्ध दादरा

‘गंगा रेती पे बंगला छवा द मोरे राजा
आवे लहर जमुने की’

जिस तरह से उन्होंने व्याख्या की है वह बहुत प्रभावकारी है. वह पूछती हैं कि आख़िर नायिका अपने प्रिय से रेत पर बंगला बनाने के लिये क्यों कह रही है? रेत पर तो कुछ टिकता ही नहीं. रेत पर जो भी बनता है वह क्षणभंगुर ही होता है उसकी कोई निशानी नहीं रह जाती. रेत पर जो भी बनता है सब पल में मिट जाता है. वह लिखती हैं कि कहीं न कहीं नायिका यही तो कह रही है कि सब मिट जाएगा बस प्रेम अमर है. जिसको जमुना की लहर भी नहीं मिटा सकती है. प्रेम का तार जीवन में सबसे मज़बूत तार होता है. वही बचा रह जाता है. एक लोकगीत के माध्यम से प्रेम की कितनी गहरी व्याख्या है यह! इसी तरह से अनेक गीतों के साथ हमारी संवेदना का तादात्मय करवाने का बड़ा संवेदनशील प्रयास इस किताब में दिखाई देता है.

जैसे ‘रेलिया बैरन पिया को लिए जाये रे…’ गीत की जिस तरह से उन्होंने व्याख्या की है वह मन को छू लेने वाला है. वह लिखती हैं कि यह गीत सुनने में भले विरहिन नायिका की पुकार लगती हो लेकिन यह गीत कहीं न कहीं अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध आक्रोश का प्रतीक भी है. रेल संभावनाओं का ही नहीं शोषण का भी प्रतीक था, जिस पर बिठाकर गोरी सरकार उन विरहिणों के पतियों को कोलकाता ले जाती थी और फिर छल से त्रिनिदाद, सूरीनाम, मारिशस जैसे देशों में बंधुआ मज़दूर बनाकर भेज देती थी. बेचारी घर में बैठी अपने पिया की बात जोहती रह जाती थीं. यह कविता उस अनंत विरह की भी कहानी तो है. त्रिलोचन की कविता की चम्पा याद आई जो अपने प्रिय के लिए कहती है-

कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी
कलकत्ते पर बजर गिरे

ऐसा नहीं है कि किताब में सिर्फ़ परंपरा की बातें हैं और उनका गौरव गान है. बल्कि उससे विनम्र विद्रोह भी है. समय के साथ उनके बदलाव की बात भी है.  जैसे जब उनका ध्यान इस बात पर गया कि बच्चे के जन्म पर गाये जाने वाले सोहर गीतों में पुत्रों की ही आस है. उनमें कहीं भी बिटिया के जन्म की मंगलकामना नहीं दिखती है. तब उन्होंने सोहर की रचना की जिसमें बेटी के जन्म की बधाई है-

‘सुनयना को हरस अपार
सिया को जनम भयो
मिथिला मगन भई आज
सिया को जनम भयो..’

यह अपने आपमें बहुत क्रांतिकारी बात है. कलाकार यही तो करता है. अपनी कला के माध्यम से शांत झील में पत्थर फेंककर हलचल पैदा कर देता है.

इसी तरह एक और मीराबाई के पद ‘मत जा, मत जा जोगी’ को याद करते हुए उन्होंने राज भर्तृहरि के वैराग्य और जोगियों की परंपरा का बहुत गहरा विश्लेषण किया है. मुझे याद आया कि बिहार-नेपाल सीमा पर अवस्थित अपने गाँव में जब रहता था तो कनफटे जोगी आते थे जो सारंगी बजाते हुए राजा भरथरी की कहानियाँ सुनाते थे, उनके गीत गाते थे. इस किताब में उन्होंने इस बात की याद दिलाई है कि उनके त्याग को उत्तर भारत के बहुत बड़े हिस्से में आज भी इसी तरह के पदों और राजा भरथरी के गीतों के माध्यम से याद रखा गया है. एक राजा के त्याग को लोकगीतों ने अमर बना दिया.

इस तरह के अनेक उदाहरण हैं इस किताब में और यह इस किताब की विशिष्टता है. लेखिका बात तो शास्त्र के बंधन से मुक्ति और लोक की अनंतता की करती हैं लेकिन उन्होंने लोक के शास्त्र को समझने-समझाने का भी अच्छा प्रयास किया है. आमतौर पर आधुनिक शिक्षा, संभ्रांत परिवेश हमें यह सिखाता है कि परंपरा की बात करना असल में पिछड़ापन है और अंग्रेजियत वाली आधुनिकता ही असल में सबसे बड़ा मूल्य है. यह किताब इसके विपरीत हमें यह सिखाता है कि हमें परंपरा की अपनी थाती को संजो कर रखना चाहिए.

इसे लोकगीतों के ऐतिहासिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी पढ़ा जा सकता है. लोकगीतों के इतिहास को ट्रेस करने की श्रमसाध्य कोशिश भी इस किताब में दिखाई देती है.

उन्होंने नकटे गीतों के बारे में लिखते हुए यह याद दिलाया है कि लोकगीतों की परंपरा में स्त्री-शक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है. आज की तरह नहीं कि स्त्रियों को यह याद दिलाना पड़ता है कि वे सशक्त हैं तथा अपने अधिकारों को समझें. नकटे गीत यानी स्त्रियों के स्वाँग की अभिव्यक्ति के बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है कि किस तरह बारात के जाने के बाद स्त्रियाँ उन्मुक्त होकर अपने भावों को अभिव्यक्त करने का स्वाँग रचती आई हैं. किस तरह से इन गीतों के माध्यम से उन्होंने अपनी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया.

वास्तव में, लोग गायकी की परंपरा में मालिनी अवस्थी की उपस्थिति भी सबसे अलग है. वह शास्त्रसिद्ध हैं, विदुषी हैं, ऐसे संभ्रांत समाज से आती हैं जिस समाज ने लोक से एक दूरी का रिश्ता बनाए रखा. लेकिन मालिनी जी लोक गीतों में रम गईं और देश विदेश में पूरब के गीतों को गाकर उनकी परंपरा की अटूट मज़बूती का एहसास करवाया है.

उन्होंने लोक बनाम शास्त्रीय की बात तो की लेकिन शास्त्र के सम्मोहन से मुक्त रहीं. उनके गायन का मक़सद शायद यह कभी नहीं रहा कि लोकगीतों के गायन के माध्यम से लोकप्रियता हासिल की जाए. मुझे ऐसा लगता है कि उन्होंने लोकगीतों को अपनी परंपरा में देखने का प्रयास किया. वह परंपरा जो शास्त्रीयता के बंधन से पूरी तरह मुक्त रही है. चन्दन किवाड़ में मालिनी जी यही तो कहना चाह रही हैं कि लोक गायकी की अपनी समृद्ध परंपरा रही है. बस हुआ यह है कि समय के साथ हम उसके महत्व को भूल गए हैं. उन गीतों के संदर्भों को समझने बिना उसको पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखते रहने के आदी हो गए हैं. हमें उन आयातित चश्मों से मुक्त होकर इस सुदीर्घ परंपरा को समझने की आवश्यकता है.

निश्चित रूप से नई पीढ़ी के लिए उन्होंने जैसे लोक गायकी का पुनराविष्कार किया है. अकारण नहीं है कि वह अकुंठ भाव से देश विदेश में लोकगीतों के गायन का प्रदर्शन करती हैं. समकलीनता को लोक से जोड़ने का उनका एक विनम्र उपक्रम ही है यह. मालिनी अवस्थी की किताब चन्दन किवाड़ को पढ़ते हुए यह बात बार-बार याद आई.

आवश्यकता पड़ने पर परम्परा से विनम्र विद्रोह करने वाली मालिनी अवस्थी ने अपनी गायकी से लोक गायकी की अपनी परंपरा भी बनाई है. अवधी, भोजपूरी गीतों के गायन के माध्यम से इन्होंने इन गीतों को बड़ा मुक़ाम दिया है. जिन गीतों को अश्लील, या अशिष्ट कहकर दरकिनार किया जाता रहा है. मालिनी जी ने इस किताब में यह दिखाया है लोकगीतों को उनके संदर्भों के साथ सुनने से उनका महत्व अधिक उजागर होता है. यह किताब बहुत जीवंत ढंग से इस धारणा को पुष्ट करती है, उसको मज़बूत बनाती है. बदलते समय के साथ परंपराओं में, व्याख्याओं में बदलाव आता है तो यह उसकी जीवंतता का ही प्रमाण है. चन्दन किवाड़ यही तो बताती है. वह हमारे घरों से खोड़ हुई गीतों की कॉपी की याद दिलाती है.

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें.

प्रभात रंजन

जन्म 3 नवम्बर, 1970 को बिहार के सीतामढ़ी जिले में.

तीन कहानी संग्रह और एक उपन्यास ‘कोठागोई तथा ‘हिंदी मीडियम टाइट’ पुस्तक प्रकाशित. अंग्रेज़ी से हिन्दी में 25 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद. ‘सहारा समय कथा सम्मान’, ‘प्रेमचंद कथा सम्मान’, ‘कृष्ण बलदेव फेलोशिप’, ‘द्वारका प्रसाद अग्रवाल उदीयमान लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित.
जानकीपुल नामक प्रसिद्ध वेबसाइट के  संपादक हैं.
prabhatranja@gmail.com

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Comments 3

  1. M P Haridev says:
    4 months ago

    समालोचन का अंक महत्वपूर्ण है । कम वाक्यों में समाहित है सो पढ़ लिया । आलोचक महोदय ने लोकगीतों पर अपना मत प्रकट किया । यह पुस्तक के मूल पाठ से जुड़ा है । आधुनिकता ने लोकगीतों और परंपराओं को लील लिया है ।
    हम छोटे शहर में रहते हैं । मगर हमारा पुश्तैनी घर नगर के अंदरूनी इलाक़े में है । देश के विभाजन के बाद हमारे पूर्वज तब के पश्चिमी पंजाब [अब पाकिस्तान के पंजाब के मुलतान ज़िले से] आये थे । इस घर में रहकर महसूस किया कि यह जगह शानदार है । पड़ोस में पंडित नेकी राम शर्मा का मंदिर है । पहले के वर्षों में मंदिर में ही घर बना होता । हमारे घर के आसपास तीन मंदिरों में से एक ऊपर लिखा । हम जब बच्चे थे तो नेकी राम जी दंपति के पुत्र पंडित सत्यनारायण जी को धोती कुर्ता पहने देखा ।
    इस घर में एक कुआँ है । किसी परिवार में शिशु के जन्म के छठे दिन कुआँ पूजन के रिवाज का पालन होता है । शिशु की माँ, रिश्तेदार और आसपास की महिलाएँ एवं लड़कियाँ लोकगीत गाते हुए निकलती हैं । हम पंजाबी हैं तो भाषा और वह भी लोकगीत, समझ नहीं आती । मगर ख़ुशी मिलती है । समाज इसलिये ज़िन्दा है कि लोक परम्पराएँ जीवित हैं । एक जीवन अगले जीवन को जन्म देता है ।
    इस मंदिर से थोड़ी दूर दिल्ली दरवाज़े के बाहर पंचायती रामलीला ग्राउंड [रजि॰] कमेटी का मैदान । इसके विकास होने से पहले मैदान में रामलीला का मंचन होता था । कच्चे मैदान में तीन जगहों पर लकड़ी के तख़्त रखे होते थे । यह रामलीला संध्या से पहले शुरू होती । एक तख़्त के पात्रों को दूसरे तख़्ते पर पात्रों से मिलन, विवाह और राज तिलक से पहले राम-रावण युद्ध होता । पुरानी तरह के वाद्ययंत्र बजाते थे । इस रामलीला को देखने हमारे घर के बाईं तरफ़ दूर दराज़ से महिलाएँ, बच्चे और पुरुष आते । तब का उल्लास और उत्साह यहाँ से गुज़रते लोगों में देखा करते ।
    अभी यहीं तक ।

    Reply
  2. चंद्रेश्वर says:
    4 months ago

    सुप्रसिद्ध लोकगायिका मालिनी अवस्थी की पुस्तक ‘चंदन किवाड़’ पर प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार प्रभात रंजन ने बहुत ही सुसंगत तरीके से और बेहतरीन लिखा है। हमारी बधाई एवं शुभकामनाएं,आप दोनों के लिए।

    Reply
  3. Ravindra Vyas says:
    4 months ago

    Utanaa hee saral sahaj saras jitnaa ki malini jee gaya koi geet.

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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