• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » चंदायन : एक और अधूरी किताब : चंद्रभूषण

चंदायन : एक और अधूरी किताब : चंद्रभूषण

भोजपुरी क्षेत्र की मौखिक परम्परा की प्रसिद्ध लोकगाथा ‘लोरिकायन’ के लोरिक–चंदा प्रेम-प्रसंग की पुनर्रचना चौदहवीं सदी में मुल्ला दाउद ने ‘चंदायन’ के रूप में की, जो अवधी भाषा में रचित एक महत्त्वपूर्ण प्रेमाख्यान है. डॉ. अर्जुन दास केसरी के संपादन में अब लोरिकायन भी प्रकाशित हो चुकी है. यह आभीर (अहीर) समुदाय की जातीय कथा के रूप में लंबे समय तक विख्यात रही है. चंद्रभूषण ने चंदायन के महत्व को विस्तार से प्रतिपादित करते हुए बड़े दिलचस्प ढंग से इसकी कथा भी कह दी है. इसे पढ़ते हुए जहाँ एक अद्भुत प्रेमगाथा का रस मिलता है, वहीं इसके सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ भी क्रमशः खुलते चलते हैं और उसके समकालीन अर्थ का विस्तार करते हैं. प्रस्तुत है यह ख़ास आलेख.

by arun dev
March 9, 2026
in शोध
A A
चंदायन : एक और अधूरी किताब : चंद्रभूषण
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
चंदायन : एक और अधूरी किताब
प्रथम ‘प्रेमाख्यान’ के जरिये पूर्व-भक्तिकालीन समाज की खोजबीन


चंद्रभूषण

चौदहवीं सदी ईसवी की रचना चंदायन (या चाँदायन) कई मामलों में साहित्य की एक अनूठी धरोहर है. फिरोजशाह तुगलक के समय में लिखी गई यह किताब ‘प्रेमाख्यान’ की श्रेणी में आती है. लेकिन प्रेमाख्यानों में यह अकेली ही है, जिसकी कथा एक लोककाव्य पर आधारित है. जितनी यह प्रेम कहानी है, उतनी ही वीरगाथा भी है लेकिन वीरता का यश गाने से ज्यादा समाज में वीर की स्थिति से जुड़ी विडंबना के बीच उसे परखती है. भारत की चरित काव्य परंपरा में यह एकमात्र है. न कोई आगे न पीछे. जिसका नायक एक अहीर योद्धा है. इसे सूफी दायरे की चीज कहा जाता रहा है लेकिन इसके सांस्कृतिक परिदृश्य पर नाथपंथी योगियों का प्रभाव दिखता है. इसके अलावा इसकी भाषा, छंदविधान और किस्सागोई में काफी कुछ ऐसा है, जिससे पूर्व-भक्तिकालीन  परिवेश का खाका बनता है.

यह अवधी का ग्रंथ है, जिसमें इससे पहले कोई और किताब लिखी जाने की जानकारी नहीं है. पूर्वी अपभ्रंश में सिद्धों और नाथों के पद भी जब-तब अवधी-भोजपुरी के करीब जाते दिखते हैं, लेकिन इस सामग्री का स्वरूप फुटकर ही है, शुरू से अंत तक लिखे गए ग्रंथ जैसा नहीं. एक स्थानीय बोली को लिखित भाषा की तरह बरतने की पहली ही कोशिश में पूरा महाकाव्य खड़ा कर देना एक ऐसी उपलब्धि है, जो हिंदी क्षेत्र की बाकी समृद्ध बोलियों के हिस्से नहीं आई. इसके लिखे जाने के सवा सौ साल बाद अचानक किसी विस्फोट की तरह कुतुबन की ‘मिरगावती’ और जायसी के ‘पद्मावत’ से लेकर तुलसी के ‘रामचरितमानस’ तक के सिलसिले ने अवधी को महाकाव्यों की भाषा बना दिया. मैथिली में विद्यापति अपने पीछे ऐसा कोई क्रम नहीं बना पाए. अवधी में यह कैसे हुआ, सोचने की बात है.

 

२.

चंदायन में कवि द्वारा इसकी लिखाई पूरी होने का समय सन 1379 ई. के समतुल्य दर्ज किया गया है.

‘बरस सात सौ हतै इक्यासी
तिही आह कवि सरसेउ मासी.’

781 हिजरी, यानी ईसवी 1378 से 1380 के बीच एक साल का समय. लेकिन इसकी कुल सात प्राप्त पांडुलिपियों में छह का समय 1450 से 1550 ई. के बीच का ही है. (पांचों चित्रित पांडुलिपियों को अभी इनकी उपस्थिति की जगह से जाना जाता है. बनारस पांडुलिपि, मुंबई पांडुलिपि, लाहौर पांडुलिपि, बर्लिन पांडुलिपि और मैंचेस्टर पांडुलिपि. एक समय इनके नाम इनकी प्राप्ति की जगहों के आधार पर मनेरशरीफ (पटना) पांडुलिपि और पंजाब पांडुलिपि जैसे हुआ करते थे, मगर वे अब पीछे छूट गए हैं. प्राप्ति आधारित नाम अभी सिर्फ बीकानेर पांडुलिपि और भोपाल पांडुलिपि का बचा है, और दोनों ही चित्रित नहीं हैं.)

चित्रित पांडुलिपियों में सबसे पुरानी बर्लिन वाली है, जो 1450 से 1470 ई. के बीच उतारी गई है और सबसे बाद की मैंचेस्टर वाली, जो 1544 ई. की है. इसके आधार पर हम दो विपरीत निष्कर्षों तक पहुंच सकते हैं. एक यह कि लिखे जाने के 70-80 साल बाद, यानी पाठकों की तीन पीढ़ियाँ गुजर जाने पर किसी अनजान वजह से बाजार में इसकी मांग बहुत बढ़ गई. दूसरा, और अधिक तर्कसंगत निष्कर्ष यह कि इस अवधि में तैयार की गई इसकी सारी प्रतियाँ नष्ट हो गईं (या नष्ट कर दी गईं) और संयोगवश बची रह गई किसी एक प्रति ने ही वर्तमान समय तक इसकी निरंतरता सुनिश्चित की. एक शत्रुतापूर्ण संभावना इस ग्रंथ के अधूरेपन में भी झलकती है, लेकिन उसपर बाद में.

1556 से शुरू हुए अकबर के शासन को मुगलकाल की व्यवस्थित शुरुआत मानें तो इसके बाद उतारी गई चंदायन की एक ही प्रति अभी तक हाथ लग पाई है. यह है इस ग्रंथ की बीकानेर प्रति. वह अकेली प्रति, जिसे देवनागरी लिपि में प्राप्त किया जा सका है. इस प्रति की शुरुआत में ही किताब के लेखक का नाम ‘मौलाना दाऊद दलमइ’ और उतारे जाने का समय ‘विक्रम संवत 1673’ यानी (सन 1616 ई.) लिखा हुआ है-

‘स्वस्ति श्री सारदायनम. नुसख चंदायन गुफ्तार मौलाना दाऊद दलमइ॥
अत. श्री अथ संवत्सरेस्मिन् श्री नृप विक्रम संवतु 1673 वर्षे हिम रिनी महा ॥’

(दलमइ यानी कवि दाऊद के गृहनगर डलमऊ का बिगड़ा हुआ रूप.)

ब्रिटिश प्रशासन द्वारा उन्नीसवीं सदी में पांडुलिपियाँ खरीदने या अन्य तरीकों से उन्हें हासिल करने का जो अभियान शुरू किया गया, उसके तहत इस ग्रंथ की छह प्रतियाँ (या उनके हिस्से) जुटाई जा सकीं. बीकानेर प्रति बहुत बाद में, 1950 के दशक में किसी समय उजागर हुई. इसके अंत में दर्ज कुछ वाक्यों से किसी मध्यकालीन रईस द्वारा इसके उतरवाए जाने की बात पता चलती है.

‘श्री जुगिनपुरी से श्री साहि सलेम अदल राज्ये श्री मत्सु फत्यहपुर मध्ये श्री अलफ खान राज्ये ब्राह्मण गौडान्ये प्रधान महारसिया अमरू तत्पुत्र दुरगा लिखित पठनार्थे कथा चांदायन पठनार्थे महीराज वोशवाल महाराजा श्री राइस्यह तस्यपुत्र श्री सूर वास्तव्य बीकानेर मध्ये श्री सुभमस्तु मांगल ददातु.’

प्रतियाँ मिलने की सभी जगहों के नाम भी उजागर नहीं हो पाए हैं. इन जगहों में एक का जिक्र पटना शहर से थोड़ा पूरब मनेरशरीफ दरगाह के रूप में मिलता है. इससे पता चलता है कि यह किताब कभी खानकाहों में भी पढ़ी जाती होगी. बाकियों का सिर्फ इलाका पता चलता है, जिसमें बहुत धुंध है. मसलन, बर्लिन पांडुलिपि का प्राप्ति-स्थल दिल्ली-जौनपुर और मालवा बताया गया है. इस विस्तार में लगभग समूचा उत्तर-मध्य भारत शामिल है. जो भी हो, मध्यकाल में लिखी गई किताबों में एकाध ही होंगी, जिन्हें रईसों और सूफियों ने समान रुचि से पढ़ा. मनेर की खानकाह में और बीकानेर के हिंदू रईस के यहाँ चंदायन की उपस्थिति इसे ऐसी ही विरली किताब साबित करती है.

कुल सात पांडुलिपियों में से पाँच पर चित्र बने हुए हैं. दाएँ पन्ने पर हाथ की लिखाई और बाएँ पन्ने पर उससे संबंधित चित्र. दो पांडुलिपियाँ बिना चित्रों की हैं. बहुत साफ कलम में बनाए गए मिनिएचर शैली के ये चित्र चंदायन को संसार की सबसे पुरानी चित्रकथाओं (कॉमिक्स) की श्रेणी में भी शामिल कराते हैं. दो चित्रित पांडुलिपियाँ अभी बर्लिन और मैनचेस्टर में हैं और शोधकार्य में ज्यादातर वे ही काम आती हैं. भारत में इसकी अपेक्षाकृत पूरी प्रतियाँ मुंबई और बनारस में हैं जबकि देश विभाजन के समय लाहौर पांडुलिपि के तीन हिस्से करके एक को चंडीगढ़ और दो को लाहौर तथा कराची के संग्रहालयों में रखने की व्यवस्था की गई थी. मैंने इसके चंडीगढ़ वाले फोलियो ही देखे हैं.

 

३.
साहित्य के इतिहास में जगह

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जब ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिख रहे थे, तब इस किताब की जानकारी उन्हें बिल्कुल न रही हो, ऐसा मानना मुश्किल है. इसके प्रकाशन से सिर्फ एक साल पहले, 1928 ई. में ‘मिश्रबंधु विनोद’ में चंदायन का जिक्र आ चुका था, लेकिन वहाँ इसे अमीर खुसरो के समय की रचना और ‘नूरक-चंदा’ की प्रेमकथा कहा गया था. चंदायन की कोई प्रति खुद न देख पाने की बात मिश्र-बंधुओं ने वहाँ खुले मन से स्वीकार भी की थी. हकीकत यही है कि इस ग्रंथ का संपादन और देवनागरी लिपि में इसकी समझ में आ सकने लायक प्रस्तुति 1960 के दशक में ही हो पाई. प्रेमाख्यानों के लिए शुक्ल जी भक्तिकाल की निर्गुणधारा की प्रेममार्गी (सूफी) शाखा का विधान करते हैं और इसे कबीर आदि की ज्ञानमार्गी धारा के बाद प्रस्तुत करते हैं. लेकिन चंदायन का लेखन कबीर के जन्म से 19 साल पहले पूरा हो चुका था, लिहाजा या तो इसे प्रेमाख्यान न माना जाए, या इस कालक्रम में इसको न समेटा जाए.

‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के प्रकाशन वर्ष 1929 तक हिंदी के बौद्धिक दायरे में इस ग्रंथ को लेकर ज्यादा चर्चा नहीं थी, लेकिन दस साल बाद आए इसके दूसरे संस्करण में भी शुक्ल जी ने इसपर एक शब्द कहना जरूरी नहीं समझा तो शायद इसकी वजह यह रही हो कि सूचनाएँ तब भी नगण्य ही थीं. सन 1938 में डॉ. रामकुमार वर्मा ने अपने एक लेख में प्रेमाख्यानों पर बात करते हुए ‘चंदायन’ को इनका प्रथम सोपान माना था. बाद में यह लेख उनकी किताब ‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ का हिस्सा बनकर दूसरी बार प्रकाशित हुआ. वर्मा जी की यह प्रस्थापना आचार्य शुक्ल द्वारा निर्धारित ‘भक्तिकाल की निर्गुण प्रेममार्गी शाखा’ के प्रारंभ को कुतुबन की ‘मिरगावती’ (1503 ई.) से खींचकर सवा सौ साल पीछे ले जाती थी. लेकिन डॉ. वर्मा का यह उल्लेख भी ग्रंथ की विषयवस्तु के मामले में ढीला-पोला ही था. चंदायन का विचारणीय संपादन होना अभी बाकी था, सो वैसा दबाव नहीं बन पाया.

चंदायन की ज्यादातर पांडुलिपियाँ फारसी लिपि की नस्ख लिखावट में उतारी गई हैं और एक बनारस वाली प्रति अरबी लिपि में है. ऐसे में किताब को मूल अवधी में प्राप्त करना लोहे के चने चबाने जैसा ही था. काफी बाद में मिली बीकानेर प्रति के देवनागरी लिपि में होने से संपादन का काम थोड़ा आसान जरूर हुआ, लेकिन उस प्रति की अपनी समस्याएँ थीं. हाड़ौती भाषा का कोई लिपिक फारसी लिखावट में अवधी की किताब किसी से सुनकर उसे कितना सही उतार सकता है? खैर, जितना भी इसे पाया जा सका है, संपादकों के विशद कौशल के बावजूद उसका अर्थ लगाने में मशक्कत करनी पड़ती है. वह शत प्रतिशत सही होगा, ऐसा तो बड़े से बड़ा विद्वान भी नहीं कह सकता.

जिन दो विद्वान संपादकों ने सिर्फ तीन साल के अंतर से- इंग्लैंड में रहकर डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने 1964 में और भारत में मौजूद प्रतियों पर डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने 1967 में- इस ग्रंथ के संपादन का कार्य काम संपन्न किया, उनके श्रम और विद्वता का अंदाजा उनकी किताबें पढ़कर ही लगाया जा सकता है. इनमें पहले ने ‘मौलाना दाऊद दलमई कृत चंदायन’ में केवल शब्दार्थ देकर बसने लायक जमीन तैयार की, जबकि दूसरे ने ‘चाँदायन’ में व्याख्या का भी जोखिम उठाकर बस्ती सजा दी. दोनों में अर्थ-भिन्नता है और उनकी संपादन शैलियों पर आगे बात होती रहेगी.

हिंदी में इस ग्रंथ के पहले संपादक डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त इसे पढ़ने में आने वाली समस्या की सबसे बड़ी वजह लिपि का विकासमान होना बताते हैं. उनका कहना है कि अरबी और फारसी के अक्षरों में उस समय नुक्ते अलग-अलग जगह लगाए जाते थे. ऐसे में अलग-अलग पृष्ठभूमि के क़ातिब एक ही अक्षर को दूसरा पढ़ लेते थे. खराब पांडुलिपि की दूसरी वजह अवधी भाषा के प्रति क़ातिबों का अज्ञान लगती है. इसके चलते कोई शब्द अगर शुरू में गलत लिख दिया गया तो बाद की प्रतियों में सुधरने के बजाय वह पहले से भी ज्यादा गलत होता जाता है.

चंदायन की एक और खासियत है इसका अधूरापन. इसकी सारी प्राप्त पांडुलिपियाँ अलग-अलग भी अधूरी हैं और सबको मिलाकर भी यह अधूरापन रह ही जाता है. पुराने ग्रंथों के संपादन में एक पांडुलिपि का खोया हिस्सा किसी और पांडुलिपि में मिल जाने की उम्मीद की जाती है लेकिन चंदायन का आखिरी हिस्सा कहीं नहीं मिलता. भारतीय संस्कृति में बौद्ध ग्रंथों का संपूर्ण विलोप हमारा जाना-बूझा है. शैव पाशुपत मत के कुछ आधार ग्रंथ भी गायब हैं. अर्से से दोनों के लिए कुछ संदेह जताए जाते रहे हैं. लेकिन चंदायन के शुरुआती 75 वर्षों में उतारी हुई एक भी प्रति का न मिलना और ग्रंथ की सारी प्राप्त प्रतियों में अंत नदारद होना क्या बताता है? कौन इसके पीछे हो सकता है?

किस्से के जिस मुकाम पर पहुंचकर किताब अधूरी मिलती है, वह खीझ पैदा करता है. बल्कि बाद के कुछ कड़वक (पाँच चौपाई और एक दोहे का समुच्चय) कहीं भी न मिलते तो किताब को सुखांत मानकर संतोष किया जा सकता था. हालांकि एक बड़ी रचना के साथ यह न्याय न होता. किस्से में छूटी किरचें कहीं तो चुभनी चाहिए. लोरिक की लोककथा आज भी कुछ लोगों की जुबान पर है. वहाँ से किस्सा पूरा करने की रस्म निभाई जा सकती है. लेकिन यह काम का न होगा, क्योंकि चंदायन का कथाक्रम और इसके चरित्र कई मामलों में लोककथा ‘चनैनी’ से बहुत दूर हैं.

 

 

४.
मुल्ला,
मौलाना या मलिक?

किताब पर अकादमिक चर्चा को यहीं छोड़कर हम सीधे इसकी सामग्री पर आते हैं. उसपर चर्चा के दौरान ही विवादित मुद्दों पर भी बात होती चलेगी. यूँ भी हमारा मकसद चंदायन के संस्कृति-सभ्यता वाले पक्षों पर चर्चा करने का ही है. अकादमिक काम इसपर काफी हो चुका है, इसमें कोई नई चीज यहाँ नहीं जुड़ने वाली. काव्य परंपरा के अनुसार ग्रंथ का पहला कड़वक ईश वंदना का है, जिसमें एकेश्वरवाद अपनी अद्भुत छटाओं के साथ मौजूद है.

पहलै गाऊं सिरजनहारू l जिनि सिरज्या यह देस दियारू ll
सिरजसि धरती और अगासू l सिरजसि मेर मदर कबिलासू ll
सिरजसि चांद सुरुज उजियारा l सिरजसि सरग नखत की मारा ll
सिरजसि छांह सीव औ धूपा l सिरजसि किरतन और सरूपा ll
सिरजसि मेघु पवन अँधकारा l सिरजसि बीज करै चमकारा ll
जाकर सभै पिरथमी सिरजसि कह्यो एक सो गाइ ll
हिय गहवर मन हुल्हसै दूसर चित न समाइ॥ 1 l 1

(सबसे पहले उस सिरजनहार को गाता हूँ जिसने यह देश-दियारा रचा. धरती और आकाश रचे. मेरु, मंदराचल और कैलाश रचे. चांद, सूरज और उजाला सिरजा. स्वर्ग और नक्षत्रमालाएँ सिरजीं. छांह, शीत और धूप बनाई. कीर्तन और स्वरूप रचा. बादल, हवा और अंधकार बनाया. बिजली भी बनाई, जिसकी कौंध से सब चमक उठता है. जिसने पूरी पृथ्वी रची, उसी एक को गाता हूँ. उसे हृदय में रखने से मन हुलसता है, चित्त में कोई और नहीं समाता.)

ईश वंदना का सिलसिला पाँचवें कड़वक तक चलता है. दोहरा दूं कि चौपाई की पाँच अर्धालियों और एक दोहे से बनी, कुल सात पंक्तियों वाली एक इकाई को कड़वक कहते हैं. चंदायन की रचना के लगभग दो सौ साल बाद तुलसीदास के रामचरितमानस में यह इकाई चार चौपाइयों और एक दोहे की, यानी दस पंक्तियों हो जाती है.

कवि दाऊद इन पाँच कड़वकों में अच्छी-बुरी छवि वाले तरह-तरह के जीवों के नाम गिनाते हैं. सांप, जिसके काटने से लोग मर जाते हैं, और गारुड़ी, यानी जहर उतारने वाला गुनी, जो मौत के कगार पर खड़े लोगों को जिला देता है. इसमें रेशम के कीड़े और गुबरैले का जिक्र आता है तो रंग-बिरंगे फूलों के साथ ततैये की बात भी आती है. अंत में दाऊद कहते हैं कि पूरी दुनिया ईश्वर ने अकेले ही बनाई, इस काम में उसका साथ देने के लिए और कोई नहीं था.

छठें कड़वक में ईश्वर की ही सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में पैगंबर मोहम्मद की और सातवें में चार खलीफों अबू बक्र, उमर, उस्मान, और अली की वंदना है. इनमें से फिलहाल एक को ही लेकर उसका मोटा अर्थ हम निकालते हैं-

पुरिषु एकु सिरजसि उजियारा l नाउं मोहम्मदु जगतु पियारा ll
जिहि लग सबै पिरथमी सिरी l औ तिहि नाउं मोनदी फिरी ll
जिह जिहवा वहु नाउं न लीजा l वरु सिर काटि अगनि मुख दीजा ll
दूसर ठाउं दई जो कीन्हा l वचनु सुनाइ पंथु के दीन्हा ll
तिहि मारगि जौ चालि सिराई l दुहु महि गति पाइअहि बड़ाई ll
पाप पुन्न की तारी, कालि ज्यो बनै तुम्हारि ll
दई लिखा सभु मांगिहै, धरहर के हम भार॥ 1 l 6

(उसने एक प्रकाशवान पुरुष की सर्जना की, जिसका नाम मोहम्मद है और जो संसार का प्यारा है. जहाँ तक पृथ्वी फैली हुई है, वहाँ तक उसके नाम की मुनादी फिरी हुई है. जो जीभ उसका नाम नहीं लेती, अच्छा हो कि सिर सहित उसे काटकर आग में डाल दिया जाए. दूसरा स्थान ईश्वर ने उन्हें दिया जिन्होंने लोगों को पंथ के वचन सुनाए. इस रास्ते पर चलकर जो खुद को मिटा देता है, उसे दोनों लोकों में बड़ाई मिलती है. कल को तुम्हारी पाप-पुण्य की तालिका बनेगी और ईश्वर तुम्हारा सब लेखा-जोखा मांगेंगे, तो हमारा भार वे (मोहम्मद) ही संभालेंगे.)

छठे और सातवें कड़वकों में आई बातों से धर्म को लेकर किसी उदार नजरिये का परिचय नहीं मिलता. लेकिन इस आधार पर दाऊद को कमतर कवि और कट्टर धर्म प्रचारक मान लेना निहायत जल्दबाजी कही जाएगी. चंदायन को ‘मुल्ला दाऊद’ की रचना मानने की बात शायद ऐसी समझ के चलते ही रूढ़ हुई है. इस ग्रंथ की प्राप्त पांडुलिपियों में से एक के शुरुआती घुन खाए पृष्ठों में दाऊद से पहले मीम और लाम अक्षर पढ़े जाते हैं. इन्हें ‘मुल्ला’ शब्द का हिस्सा माना जा सकता है. लेकिन यह शब्द ‘मौलाना’ या ‘मलिक’ भी हो सकता है. मुल्ला का अर्थ ‘धर्म-प्रचारक’ और मौलवी-मौलाना का अर्थ विद्वान या ‘धर्माचार्य’ से लिया जाता है. किताब में दाऊद ने कहीं भी अपने लिए ‘मुल्ला’ शब्द इस्तेमाल नहीं किया है. एक जगह ‘मौलाना दाऊद’ और दो जगहों पर ‘कवि दाऊद’ का जुमला आजमाया है. किताब के ढांचे से इसे लिखने वाले व्यक्ति का मिजाज किस्सा सुनाने वाले का लगता है, धर्म-प्रचारकों जैसा नहीं.

ऊपर बीकानेर प्रति में उनका नाम हमने ‘मौलाना दाऊद’ लिखा हुआ देखा है, जिससे उनकी विद्वता जाहिर होती है. एक कम चर्चित विचार यह है कि अहीर बिरादरी के ज्यादातर लोगों ने धर्मांतरित होने के बाद खुद को ‘मलिक’ ही कहा और चंदायन काव्य का नायक भी एक अहीर योद्धा ही है. ऐसे में दाऊद को ‘मलिक दाऊद’ मानने से कई मसले हल हो जाएँगे. कुछ और बातें भी हैं जो दाऊद को बाप-दादा से नहीं, अपने जीवनकाल में ही धर्मांतरित हुआ व्यक्ति बताती हैं. एक तो यही कि सीखी हुई भाषा में महाकाव्य लिखना तो दूर, ऐसा सोचना भी संभव नहीं है. एक कवि में इतना आत्मविश्वास जड़ों के जुड़ाव से ही आ सकता है. मध्यकालीन शायर बड़े गर्व से खुद को ईरान-तूरान का बताते आए हैं. कवि दाऊद का खानदान यदि कहीं बाहर से आया होता तो वे भी इसे बताने का मौका न छोड़ते. लेकिन वे तो चंदायन के मंगलाचरण में अपने मुरशिद शेख जैनुद्दीन ‘अवधी’ के गुण इन शब्दों में गाते हैं-

सेख जैनदी हौं पथि लावा lधरम पंथु जिहि पापु गंवावा ll
पाप दीन्ह मैं गंग बहाई l धरम नाव हउं लीन्ह चढ़ाई ll
उघरे नैन हिये उजियारे l पायो लिखि नौ अक्खर कारे ll
पुनि मैं अक्खर की सुधि पाई l तुरकी लिखि लिखि हिदुकी गाई ll
ह्वै पइए जेइ सेख पसारा l पाप गए जस तसिकर मारा ll
त्यहु का घरु है निरमरा, जिह चितु रहा लुभाइ ll
सेख जैनदी सेवता, पाप निरंतरु जाइ॥ 1 l 9

‘शेख जैनुद्दीन मुझे रास्ते पर ले आए. उस धर्म के रास्ते पर, जो पापों को नष्ट कर देता है. अपने पाप मैंने गंगा में बहा दिए और खुद धर्म की नाव पर सवार हो गया. (कलमे के) नौ अक्षर लिखकर मेरी आंखें खुल गईं और हृदय में उजाला छा गया. फिर मुझे अक्षरों का ज्ञान हुआ और तुर्की में लिख-लिख कर मैंने हिंद की कहानियाँ गाईं. शेख की बातों का प्रसार हो जाए तो सारे पाप उसी तरह नष्ट हो जाएँगे, जैसे तस्कर खोज-खोजकर मारे जाते हैं. उनका घर (घराना) निर्मल है, जिसपर मेरा मन लुभा गया है. शेख जैनुद्दीन की सेवा करते रहूँगा तो पाप निरंतर नष्ट होते रहेंगे.’

आस्था का यह वर्णन नए-नए मुसलमान हुए, नई शिक्षा-दीक्षा से गुजरे व्यक्ति का जान पड़ता है, जिसे न केवल दो संस्कृतियों के बीच पुल जैसी अपनी भूमिका का अंदाजा है, बल्कि दोनों से प्रेम और उनपर अभिमान भी है. क्या पता, ऐसी एक कसक भी कि जिस संस्कृति से वे आए हैं उसमें पढ़ने-लिखने का अधिकार उन्हें नहीं प्राप्त होना था.

 

5.
चंदायन लिखने का समय

मलिक दाऊद के समय का एक सिरा तुगलक वंश से जुड़ता है. अमीर खुसरो ने भी ईसा की चौदहवीं सदी में कुछ महान रचनाएँ दीं, लेकिन उनका और निजामुद्दीन औलिया का दौर 1325 ईसवी में एक-दूसरे से थोड़े ही फासले पर खिलजी वंश के जाने और तुगलक वंश के जड़ पकड़ने के साथ समाप्त हो गया. तुगलक वंश के दूसरे और सबसे विवादित प्रतिनिधि मोहम्मद बिन तुगलक ने सिंहासन ग्रहण करते समय हिंदुस्तान की अवाम को संबोधित करते हुए जो सबसे चर्चित बात कही थी, उसका हिंदी रूप यही हो सकता है कि ‘रक्त और परंपरा से मैं आपके बीच का हूँ.’

इस बात के कई सारे मतलब हो सकते हैं लेकिन एक इतिहास-सम्मत अर्थ यह है कि मोहम्मद बिन तुगलक की दादी, तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक की मां पंजाब की एक जाट शहजादी थी. इस राजवंश के दरबारी इतिहासकारों ने ‘तुगलक’ शब्द को खुरासान से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन ‘तुगलकनामा’ में अमीर खुसरो साफ कहते हैं कि तुगलक कोई कुल-नाम न होकर व्यक्ति-नाम था. खिलजी सत्ता के आखिरी दावेदार खुसरो खां को मारकर राज संभालते हुए ‘गयासुद्दीन’ का लकब लेते समय तुगलक ने फारसी में खुद को ‘आवारा मर्द’ कहा था. यानी किसी वंश की पहचान उसके पीछे नहीं थी. जो भी शक्ति उसके पास थी, खुद की ही कमाई हुई थी.

उसके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक के बाद गद्दी संभालने वाले उसके चचेरे भाई, इस वंश के अंतिम प्रतापी प्रतिनिधि फिरोजशाह तुगलक की मां पंजाब की दीपालपुर रियासत की भट्टी राजपूत कन्या थी और दोनों राजाओं के राज में नंबर दो जैसी भूमिका निभाने वाला व्यक्ति खानजहाँ धर्मांतरण से पहले तैलंग (तेलंगाना का) ब्राह्मण था. चंदायन के मंगलाचरण में उसके भी खूब गुन गाए गए हैं-

‘खानजहाँ करि जुग-जुग खानी
अति नागर गुनवंत बिनानी. चतुर सुजान भाख सत जाना
रूपवंत मंतरी सुजाना.’

बहरहाल, किताब से ये गिनती के उदाहरण यह बताने के लिए नहीं दिए गए हैं कि तुगलक वंश भारतीय मूल का था, या भारत की स्थानीय आबादी के प्रति उसका रवैया बहुत नरम था.

इतिहासकारों के बीच फिरोजशाह तुगलक की चर्चा एक कट्टर इस्लामी शासक के रूप में होती है. इस तरह भी कि भारतीय इतिहास में ब्राह्मणों पर पहली बार नियमित कर लगाने वाला शासक वही था. मनुस्मृति में इस समुदाय को करमुक्त रखने की व्यवस्था थी. अपवादस्वरूप कहीं किसी राजा ने उनपर कर लगाया भी हो तो इसका रिकॉर्ड नहीं मिलता. अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार भारत में गैर-मुस्लिमों पर जज़िया और ख़िराज़ लगाने की घोषणा की तब भी ब्राह्मणों को इससे मुक्त रखा. और तो और, मोहम्मद बिन तुगलक ने भी बाकी हिंदू आबादी पर टैक्स बढ़ाने के बावजूद इस परंपरा को बरकरार रखा. लेकिन फिरोजशाह तुगलक ने ब्राह्मणों के साथ बिल्कुल नरमी नहीं बरती.

उसकी देखादेखी यह व्यवस्था और जगहों पर भी फैल गई और दिल्ली सल्तनत के अलावा गुजरात तथा कश्मीर के मुस्लिम शासकों ने जज़िया-खिराज़ का इस्तेमाल बाकायदा धर्म परिवर्तन के लिए किया. इस घोषणा के साथ कि अगर कोई व्यक्ति मुसलमान होने का फैसला लेता है तो न केवल उसपर ये टैक्स माफ कर दिए जाएँगे, बल्कि सरकार की ओर से उसको कुछ उपहार भी मिलेंगे. जाहिर है, इससे इतना अंदाजा तो मिलता है कि फिरोजशाह तुगलक भारत की वंशानुगत श्रेष्ठता को धेले भर का भी भाव नहीं देता था. लेकिन क्या इसका ऐसा कोई अर्थ भी निकलता है कि हिंदू समाज के अपेक्षाकृत कमजोर तबकों के प्रति उसका व्यवहार उतना बुरा नहीं था? जो भी हो, चंदायन के मंगलाचरण में इस ‘शाह-ए-वक्त’ सुल्तान के जलवे कुछ यूँ दिखाई पड़ते हैं-

साहि पिरोज ढिल्ली बड़ राजा l छात पाट औ टोपी साजा ll
हिंदू तुरुक दुहूँ सम राखै l सत जे होइ दुहुन्ह कहँ भाखै ll
येकु पडितु औ है पडिवाहा l दानि अपरिस सराहै काहा ll
नीर खीर निरमर करि छानै l छोटे बड़े बेवहारि न जानै ll
अति सिरिवतु अरु भागै भरा l मानिक जोति जानु परजरा ll
परग झार लंका लहु जाईI हनवतु सगु सइ रहै बुझाई ll
देइ असीस पिरथमी जसु पूरौ बरुवाह l
राजु करौ गढ़ि ढीलरी जुगि जुगि हम पइ छांह l 1 l 8

(फिरोजशाह दिल्ली का बड़ा राजा है. छत्र, सिंहासन और टोपी उसी पर सजती है. हिंदू और तुर्क दोनों को बराबर रखता है और जो श्रेष्ठ बात है, वही दोनों से कहता है. एक तो वह विद्वान है, दूसरे शत्रु को पीछे धकेलने वाला है. दानी इतना बड़ा है कि उसकी क्या सराहना की जाए. नीर-क्षीर विवेक में वह निर्मल है. छोटे-बड़े का व्यवहार जानता तक नहीं. अत्यंत श्रीमंत और भाग्यशाली है. माणिक्य की ज्योति सी उसमें जलती रहती है. उसके पैरों की धमक लंका तक जाती है, कुछ यूँ कि लगता है जैसे हनुमान उसके सगे हैं. पृथ्वी उसको आशीर्वाद देती है कि हे प्रतिवाह, तुम्हारा यश पूर्ण हो. दिल्ली गढ़ से तुम युगों-युगों तक राज करो और अपनी छाया मुझपर बनाए रखो.)

किताब की शुरुआत में ही मंगलाचरण के रूप में ईश्वर की, इष्टदेव की, राजा की, संरक्षक की, गुरु की और भूमि की वंदना मध्यकाल की काव्य-रीति हुआ करती थी. भारत के संस्कृत और अपभ्रंश कथा-काव्यों से लेकर फारस की मसनवियों तक इसमें फर्क खोजना मुश्किल है. संस्कृत रीति में मध्यकाल से सरस्वती और गणेश की जो स्तुति मिलने लगती है, उसकी जगह चंदायन के मंगलाचरण में ‘धर्म-पंथ’ पर लाने वाले मुरशिद शेख जैनुद्दीन विराजमान हैं. जाहिर है, प्रशंसा और स्तुति के इन पदों से मलिक दाऊद की वैचारिक प्रतिबद्धता आंकना उचित नहीं होगा.

कुल 17 कड़वकों के इस मंगलाचरण वाले हिस्से में पाँच अकेले फिरोजशाह के प्रधानमंत्री खानजहाँ (जौनाशाह) को समर्पित हैं, जिसके तैलंग ब्राह्मण से धर्मांतरित होने की बात ऊपर आ चुकी है. उसकी विद्वता की तुलना यहाँ वररुचि से की गई है, जो पाणिनि के व्याख्याकार और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक थे. इसके बाद वाले कड़वक में खानजहाँ को कर्ण से बड़ा दानी भी बताया गया है. ये उपमाएँ कवि के मिजाज का कुछ अंदाजा जरूर देती हैं. दो अंतिम कड़वकों में कवि ने अपने गृहनगर डलमऊ की शोभा बखानी है, साथ में नगर के शासक और शाही सेना के अफसर मलिक मुबारक तथा उसके पिता मलिक बयाँ की दानवीरता और पराक्रम का यश गाया है.

उत्तर भारत में ‘पूरब’ नाम की एक स्थानवाची पहचान भी इसी समय बननी शुरू हो रही थी, जिसकी औपचारिक शुरुआत चंदायन लिखे जाने के बारह-पंद्रह साल बाद ही जौनपुर में शर्की (पूर्वी) सल्तनत की नींव पड़ने के साथ हुई. इससे पहले मोहम्मद तुगलक के समय में बंगाल ने खुद को दिल्ली सल्तनत से पूरी तरह अलग कर लिया था. दक्षिण भारत में भी दिल्ली सल्तनत का जोर तभी खत्म हो गया था और बहमनी तथा विजयनगर साम्राज्यों की नींव पड़ चुकी थी. ऐसे में फिरोजशाह तुगलक ने अपनी शासन व्यवस्था को विकेंद्रित रखने की बुद्धिमानी दिखाई. इस संघीयता का नतीजा तुगलकवंशी शासन के आखिरी दौर में शर्की सल्तनत के उदय की शक्ल में सामने आया, जिसका शासन मौजूदा यूपी-बिहार के आधे-आधे हिस्से पर था. लेकिन उसका कुछ पूर्वाभास यहाँ भी दिखता है.

चंदायन में ‘सांस्कृतिक पूरब’ जैसी किसी चीज की झलक है. बाद में जो इलाका शर्की सल्तनत की आधार भूमि बना, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार, उसमें सूफियों के दो अलग-अलग खेमों का जोर था, हालांकि उनके बीच कोई कड़वाहट नहीं थी. अवध क्षेत्र के चिश्ती सूफी अपने नाम के साथ ‘अवधी’ जोड़ते थे, जबकि मगध में सुहरावर्दी सूफी हजरत मखदूम याह्या मनेरी की कोशिशों से इसी समय पुराने बौद्ध केंद्र (बख्तियार खिलजी के हमले में नष्ट हो चुके) ओदंतपुरी में विनाश के डेढ़ सौ साल बाद ‘बिहार शरीफ’ नाम से नई जान पड़ रही थी. फलसफे पर जाएँ तो चिश्तियों का जोर ‘फ़ना’ पर था, जिसमें बंदा इश्क़ में अपनी हस्ती मिटा देता है, जबकि सुहरावर्दियों में ‘बक़ा’ की धारणा प्रबल थी, जहाँ अस्तित्व समर्पित कर चुके उपासक को अपना अहं छोड़कर दुनिया में वापस लौटना होता है.

चंदायन में सूफी नजर कितनी है, कहना कठिन है, क्योंकि खुद को खो देने या पा लेने का कोई अतिरिक्त आग्रह इसके किसी पात्र में नहीं दिखता. आगे, किताब में घुसने से पहले एक आखिरी बात यहाँ खोजने को यह रह गई है कि चंदायन के लिखते समय डलमऊ और इसके आसपास का सामाजिक-धार्मिक परिवेश कैसा रहा होगा. किताब में किसी तरह की कटुता दूर-दूर तक नजर नहीं आती. न धर्म की, न जाति की. ब्राह्मणों को लेकर फिरोजशाह की जो भी राय रही हो, वे यहाँ ज्योतिषी, पुरोहित और कारोबारी कारवां का अगुआ बनकर इज्जत से आते हैं. धर्म में मलिक दाऊद की हैसियत जानने का कोई तरीका नहीं है लेकिन उन्हें चिश्तिया सूफी सिलसिले से जोड़ा जाता है.

उनके मुरशिद (आध्यात्मिक गुरु) जैनुद्दीन दिल्ली में चिश्तिया सिलसिले के अंतिम प्रतिनिधि हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी के शिष्य थे. चिराग़ देहलवी खुद को हज़रत निज़ामुद्दीन की सेवा में समर्पित करने से पहले अपना तख़ल्लुस ‘अवधी’ ही लिखते थे. मेवात के यदुवंशी राजा लखनपाल को इस्लाम में लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. ‘ख़ानज़ादा वंश परंपरा’ शुरू करने वाले इस स्थानीय शासक की वंशावली घोषित रूप से वासुदेव कृष्ण तक जाती थी, जिसमें लखनपाल का 94वां स्थान था. यह सूचना उस समय के लिए काफी विस्फोटक रही होगी. अहीर योद्धा लोरिक की ट्रैजिक महागाथा को ग्रंथ रूप देने का कोई सिरा क्या इस सूचना से भी जुड़ा हो सकता है?

 

 

६.
किस्से की शुरुआत : गोवर शहर का वर्णन

चंदायन की उपलब्ध प्रतियों में खंडों का बंटवारा नहीं है. स्तुति या मंगलाचरण वाला हिस्सा खत्म होने के साथ ही किस्से की शुरुआत होती है और यहाँ से हर कड़वक के ऊपर फारसी में एक शीर्षक लिखा हुआ मिलता है, जिसे ‘सुर्ख़ी’ कहते हैं (शायद इसलिए कि यह लाल स्याही से लिखा जाता है). यह फारस की किस्सागोई परंपरा में आने वाली ‘मसनवियों’ का अपना तरीका है. मौलाना दाऊद ने चंदायन को मसनवी मानकर लिखा, यह जानने का कोई तरीका नहीं है. अपने कड़वकों पर सुर्खियाँ भी उन्होंने खुद लगाईं या यह परंपरा इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियाँ बनाने के क्रम में निकल पड़ी, इस बारे में भी हम कुछ कह नहीं सकते. अलबत्ता इसके कुछ उदाहरण यहाँ जरूर दे सकते हैं- ‘सिफ़त चांदा जहेज गोयम’ (चांदा के दहेज के बारे में कहा), या फिर ‘सिफ़त हिसार गिर्द गोवर गोयम’ (गोवर को घेरने वाली प्राचीर के बारे में कहा). यहाँ ‘के बारे में कहा’ शीर्षक का हिस्सा नहीं, सिर्फ एक रीति है.

संपादन के दौरान डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने मूल ग्रंथ की इस शैली में कोई बदलाव नहीं किया है लेकिन डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने किताब को 27 खंडों में बांट दिया है (27वां अप्राप्य) और कड़वकों की सुर्खियाँ अपनी जगह पर दर्ज करने के बजाय कड़वक की सिर्फ क्रमसंख्या दी है और संबंधित सुर्खी को नीचे अर्थ सहित लिख दिया है. यहाँ मुझे दोनों ही संपादकों का काम उद्धृत करना पड़ा है सो जहाँ कोई कड़वक खंड सहित उद्धृत मिले उसे डॉ. माताप्रसाद गुप्त का उद्धरण समझा जाए और जहाँ यह नहीं, सिर्फ क्रमसंख्या हो, वहाँ डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त का.

किस्सा गोवर शहर की शोभा बखानने के साथ शुरू होता है. इससे पहले हमारा साबका कवि के अपने शहर डलमऊ के सौंदर्य वर्णन से भी पड़ चुका है, लेकिन यथार्थ रेखांकित करने जैसी वह चीज मंगलाचरण का हिस्सा है. किस्से में मामला बिल्कुल अलग है. मलिक दाऊद किस्से के पहले कड़वक से ही अंधेरी घनी छांह में पहुंचा देते हैं.

कहूँ कवितु मन भयो गियानू l कहत सुहावन सुनहु दै कानू II
गोवर कहो महर कर ठाऊ l कूवां बाइ बहुत अबराऊ II
नरियर गोवा के तहं रूखा l देखत रहे न लागे भूखा II
दायौ दाख वहुल लै लाई l नारिंग झारिंग कहे न जाईI l
कटहर तार भरे अबराना l जामिनि कैथ न कोई जाना II
बांस खिजूरि बर पीपरा अंबिली भई सैवार l
राइ महर की बारी द्योस होइ अंधियार॥ 2 l 18

(मन में ज्ञान होने पर कवित्त कह रहा हूँ. सुनने में सुहाना है, कान देकर सुनो. गोवर राजा महर का स्थान था. इसके कुएँ-बावड़ियाँ अभिराम थे. नारियल और गोवा (किसी फल का पुराना नाम) के पेड़ इतने कि उन्हें देखकर ही भूख चली जाती थी. दाड़िम (अनार) और दाख (अंगूर) बहुत सारे लाकर यहाँ लगाए गए थे और नारंगी-झारंगी तो इतनी हुआ करती थी कि कहने में भी नहीं आती थी. कटहल और ताड़ इफरात में थे और जामुन-कैथ वगैरह को तो लोग जानते भी नहीं थे. बांस, खजूर, बरगद, पीपल, इमली इतने कि राजा महर के बाग में दिन में ही अंधेरा छाया रहता.)

अगले कड़वक में इन पेड़ों पर बैठने वाली चिड़ियों और उनकी पुकारों का दिलचस्प वर्णन है. फिर बीसवें कड़वक में ही हमारा सामना शहर में खुदे ताल-पोखरों और कुंडों के किनारे खड़े मंदिरों और वहाँ सेवा पा रहे देवताओं से होता है. वहाँ कनफटे जोगी आते हैं, जिनके बीच में भगवान का वास रहता है. पाँच हजार जोगी वहाँ गाते हैं, सिंघा बजाते हैं, भस्म चढ़ाते हैं. वहाँ से उठने वाली डमरू, डफ और भेरी की मधुर ध्वनि इंद्र के भी मन को भाती है. गुणों के आगर सिद्ध पुरुष यह जगह देखकर लुभा जाते हैं और उनकी कहन-सुनन से लगता है जैसे दुनिया देख ली हो.

नारा पोखर कुंड खनाए l मँढ़इ देव जेहिं पोस उठाए II
कानफाट नित आवहिं तहाँ l औ भगवंत रहैं तिहँ महाँ II
भेरा डँवरू डाफ बजाए l सबद सुहाय इँदर मन भाए II
जोगी सहस पाँच एक गावहिं l सींगी पूरहिं भसम चढ़ावहिं Il
सिद्ध पुरुख गुन आगर, देखि लुभाने ठाउँ l
कहत सुनत अस जानै, दुनि चलि देखै जाउँ II 20

यह किस्से की मुख्य कथाभूमि गोवर में प्रवेश की भूमिका है, जिसका सामाजिक ढांचा तब से अब तक गुजरे साढ़े छह सौ वर्षों में भी ज्यादा बदला हुआ नहीं लगता. ब्राह्मण, खत्री, ग्वाला, गाहड़वाल, अग्रवाल, तिवारी, पंचम वर्ण, तेली, बनजारे, सुनार, सरावगी (जैन), रावत, चौहान और ढेरों प्रजा जातियाँ. भीड़ इतनी कि राह नहीं चली जाती!

बाभन खतरी बसहिं गुआरा l गहरवार औ आगरवारा II
बसहिं तिवारी औ पचवानां l घागर चूनी औ इजमानां II
बसहिं गँधाई औ बनजारा l जात सरावग औ बनवारा II
सोनी बसहिं सुनार बिनानी l राउत लोग बिसाती आनी II
ठाकुर बहुत बसहिं चौहानाँ l परजा पौनि गिनति को जानाँ II
बहुत जात दरमर अथइ, खोरिहिं हीउ न जाइ l
तैस देस बा गोवर, मानुस चलत भुलाइ II 26

इस तरह गोवर नगर के बाग-बगीचों, ताल-पोखरों, मठ-मंदिरों, हाट-बाजारों और जातियों के वर्णन से किस्सा शुरू होता है. जगह को किसी वास्तविक भूगोल में रखने का कोई आग्रह कवि का नहीं है लेकिन बीच-बीच में इशारे करता चलता है कि वह खुद वहाँ मौजूद था, सब कुछ अपनी आंखों से देख रखा है. फिर कवि की नजर शहर के बाहरी हिस्से की तरफ जाती है, जहाँ तीस पोरसा ऊंचा परकोटा और पचास पोरसा गहरी खाई है. ध्यान रहे, पोरसा ऊंचाई की एक मोटी इकाई हुआ करती है- हाथ उठाए हुए पुरुष की ऊंचाई, करीब सात फुट. सूर-तुलसी से दस पीढ़ी पहले की यह रचना मनोरंजन पर बतियाते हुए रामायण कथा और राधा-कृष्ण लीला का भी जिक्र करती है-

बरुवा राम रमाइनु कहहीं l गावहिं गीत नाच भल करहीं II
राधा कान्ह देस छद ल्यावहिं l मटकि मूंड़ मसि देह चरावहिं II 2.28

ऊपर माताप्रसाद गुप्त के संपादन में आई ये अर्धालियाँ परमेश्वरी लाल गुप्त के यहाँ भी कमोबेश ऐसी ही है लेकिन वहाँ इनके कुछ शब्द अलग हैं और 28वें के बजाय ये 29वें कड़वक में आई हैं-

परवा राम रमायन कहहीं l गावहिं कवित नाच भल करहीं II
रासै गावहिं भइ झटलावहिं l संग मूंद बिस देंह चढ़ावहिं II 29

सटीक अर्थ निकालना दोनों ही मामलों में नामुमकिन है. इतना लगता है कि बरुवा या परवा शब्द यहाँ ब्राह्मणों की मंडलियों के लिए आया है जो गांव-गांव जाकर रामायण की कथाएँ गाती हैं और राधा-कृष्ण की लीला प्रस्तुत करती हैं. यहाँ बताना जरूरी है कि दोनों विद्वान संपादकों के अलावा बीच-बीच में संदर्भ के लिए मुझे डॉ. श्याम मनोहर पांडेय द्वारा 1960 के ही दशक में कई लोकगायकों से पूरा-पूरा सुनकर संकलित किए गए लोककथा ‘चनैनी’ के विविध संस्करणों की भी मदद लेनी पड़ेगी. चनैनी और चंदायन के चरित्रों और कथाक्रम में काफी फर्क है, लेकिन बात समझने में इससे कुछ सहायता जरूर मिलेगी. चनैनी मेरे बचपन की सुनी हुई चीज है, सो एक लालच भी है.

 

७.
नायिका का जन्म और विवाह

आगे राजमहल का वर्णन आता है और राजा का जिक्र शुरू में केवल ‘महर’ पदनाम से किया जाता है. उनके नाम ‘सहदेव’ से हमारा परिचय कुछ हिस्सा गुजर जाने के बाद होता है. पीछे यह भी बताया गया है कि छत्तीस कुलों के राजपूत इस राज्य के अलग-अलग इलाकों से कर वसूलते हैं, जिससे खजाना भरा रहता है. गोवर नगर के वर्णन में बताए गए अपने शौर्य और प्रताप की बराबरी कर सकने वाला तो यह राजा नहीं ठहरता, लेकिन उसके किसी महाराजा या सम्राट के प्रति जवाबदेह होने का भी कोई जिक्र पूरे किस्से में कहीं नहीं आता. कुल मिलाकर, चंदायन का किस्सा छोटे राजाओं का ही है, उन्हें अनुशासित रखने वाला या उनके झगड़े छुड़ाने वाला यहाँ कोई नहीं है.

यहाँ एक और बात गौर करने लायक है कि लोककथा चनैनी में राजा सहदेव अहीर बिरादरी के ही बताए गए हैं लेकिन चंदायन के एक-दो प्रसंगों से ऐसा लगता है कि राजघराने के लोग समाज व्यवस्था में अहीरों को हीनतर और खुद को उनसे थोड़ा ऊपर मानते थे. आगे का किस्सा संक्षेप में बयान करें तो महर सहदेव को एक बेटी पैदा होती है. चंदा, चांद या चांदा (कथा में यह नाम तीनों तरह से मिलता है) जो इस रचना का केंद्रीय चरित्र है. ब्राह्मण (ज्योतिषी) उसकी राशियों की गणना करके और शरीर लक्षण देखकर उसके बुरे भविष्य की जानकारी देते हैं. बताते हैं कि ‘चांदा के ललाट में छठी का अक्षर दिख रहा है, यानी वह अपने ऊर्ध्व (प्रतिष्ठा के शीर्षकाल) में ही यमलोक जाएगी. साथ ही उसको अग्नि का पुटक भी लगा है, लिहाजा उसके शरीर को छुआ नहीं जा सकता. जैसा हाल उजाले में कीट-पतंगों का होता है, वैसे ही राजा इसकी तरफ उड़-उड़कर आएँगे और मरते चले जाएँगे.’

बाभन सभा आइ जो बइठी l काढ़ि पुरानु रासि गनि दीठी II
छठी क आखरु दीख लिलारा l उरधहि सो जाइहि जम बारा II
अगिनि पुरगु भा चांदहिं, औ कट छुई न जाय l
जस उजियारे फतिंगा, मरिहहिं राइ उड़ाय II (3 l 33)

लड़की दिन-दूनी रात चौगुनी न केवल बढ़ रही है, बल्कि सुंदर भी होती जा रही है. इस कदर कि उसके रूप की चर्चा देश-विदेश में फैल जाती है. ग्रंथ में द्वारसमुद्र (कर्नाटक), मावर (आंध्र प्रदेश), गुजरात, तिरहूत (मिथिला), अवध, बदायूँ आदि जगहों पर महर सहदेव की बेटी चंदा के चर्चे बताए गए हैं. फिर जैत नाम का एक राजा सहदेव को अपना जाति-भाई घोषित करते हुए उनके पास अपने बेटे के रिश्ते के लिए ब्राह्मण और नाई भेजता है. सहदेव इस रिश्ते से मना कर देते हैं. कहते हैं- कन्या राशि वाली लड़की और वृश्चिक राशि वाले लड़के का रिश्ता नहीं हो सकता. लेकिन ब्राह्मण अपनी प्रतिष्ठा का हवाला देकर उन्हें मना लेता है और 12 की उम्र में चंदा ब्याह दी जाती है.

जिस पुरुष से उसकी शादी होती है, उसका नाम चनैनी के विविध संस्करणों में थोड़ा-थोड़ा अलग-अलग दिखता है. कहीं सिउहर, कहीं शिवधर तो कहीं बावनवीर. चंदायन में उसका नाम बावन है और उसे गंदा, काना और नपुंसक दिखाया गया है. मेरे गांव में लुरखुर काका अपनी चनैनी में इस आदमी को मजे की चीज, कॉमिक एलीमेंट की तरह इस्तेमाल करते थे. आगे के किस्से में यह व्यक्ति वीर निकलता है, लेकिन स्त्री-संसर्ग में कभी उसकी कोई गति नहीं दिखती. ऐसा उसके नपुंसक होने के कारण है या वैचारिक स्थिति से वह ऐसा हो गया है, इसपर कोई बात नहीं है.

बरख दुआदस भएउ बियाहू l चांदा सरै सोक जस नाहू II
उनत जोबन भइ चांदा रानी l नांह छोट और अंखियौ कानी II
जाकहिं पिउहर बोलैं लोगू l सो वै चांद न दीन्हों भोगू II
हाथ पांउं मुख चाम न धोवा l औ तिहुं ऊपर संग न सोवा II
दइया कौन मैं कीन्ह बुराई l सरें कचोरें बूड़ेउं आई II
काच जेल, मन झुरवइ, ऊपह सास केरोइ l
चांद धौराहर ऊपर, बावन धरती सोइ II (45)

चनैनी की एक कहन बताती है कि बावनवीर ने कभी दूध पीकर दोना फेंक दिया था, जिसे शंकर जी ने चाट लिया तो इतने यौन-उन्मत्त हो गए कि पार्वती जी परेशान हो गईं. उसी खीझ में उन्होंने शाप दिया कि जिसका जूठा दोना चाटकर तुम्हारा यह हाल हो गया है, वह किसी स्त्री से रिश्ता बनाने लायक नहीं बचेगा. कहानी में वह तीन बार आता है. एक बार यूँ ही, दो बार धनुर्धर रूप में, जब अपनी कुंठा और शौर्य से वह चंदा का जीना हराम कर देता है.

बहरहाल, विवाह प्रकरण का अंत चंदा की इस समझ से होता है कि उसके पति की उसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं है.

‘पिउ अनतिइ नित सेज दुहेली
सो धनि कइसे जिअइ अकेली.’
(जिसका पति हमेशा कहीं और रहता हो, वह स्त्री अकेले कैसे जिए.)

बारह महीने ऐसे ही गुजर जाने के बाद एक दिन पूरी तरह निराश होकर वह अपनी सास से पति के अलग ही सोने की शिकायत करती है तो सास उलटे उसी पर चढ़ जाती है- ‘मेरा बेटा तो दूध का फाहा है, जहाँ जगह मिलती है वहीं सो जाता है. जब वह सयाना होगा तो तुझे ही ले आएगा या किसी और को लाएगा. ऐसी उभरैल औरत है तू कि जवानी तेरे मान की नहीं हो रही है तो अभी अपने मायके वालों को संदेसा भेजकर बुला और बिना देर किए वहीं चली जा. तेरे जैसी बिगड़ी हुई बेटी जिस देश से आई है, मैं तो उस देश को ही जला डालूं.’

जौ तूं जैहसि मैके, अबहीं पठहु सँदेस l
कहाँ केरि तूं बागरि बिटिया जारउं सोई देस II (47)

इस तरह ससुराल में साल बीतने से पहले ही चंदा अपने मायके से पंडित बुलाती है और उसे अपना दुख बताती है. महर सहदेव जैसे ही यह संदेश सुनते हैं, चंदा को ठाट-बाट से वापस लिवा लाने के यत्न करते हैं और पति का घर उसी दिन सदा के लिए छोड़कर वह अपने पैतृक घर, गोवर के महल में चली आती है. यहाँ सहेलियाँ ठिठोली करते हुए उससे ससुराल में किए गए लास-विलास के बारे में पूछती हैं तो वह निराशा से भरा एक बारहमासा सुना देती है.

बारहमासा एक काव्य शैली है, जिसमें विरहिणी नायिका साल के बारहों महीनों का हवाला देते हुए जोड़ीदार से अपने विछोह का वर्णन करती है और प्रायः होली बीतने के बाद, चैत के महीने में अपने प्रेमी को दोबारा प्राप्त करती है. लेकिन इस बारहमासे में पति चंदा के पास होकर भी नहीं था, सो यह एक तरह से यह उसके स्थायी दुर्भाग्य का

गीत बन जाता है. वह भी अधूरा क्योंकि इसके आठ पद (57 से 65 तक) किसी भी पांडुलिपि में नहीं मिल सके हैं.

 

८.
बाजिर या बाजुर कौन

किस्सों में भारतीय स्त्रियों के सामने परंपरा से उपस्थित होते आ रहे ब्लैकहोल जैसे इस सर्वग्रासी मोड़ से कहानी को बाहर निकालकर एक बड़े किस्से में समाहित करने के लिए यहाँ चंदायन में एक विचित्र पात्र का प्रवेश होता है. वैराग्य के गीत (बिहाऊ) गाते हुए नगर में घूमने वाले कुछ अलग मिजाज के इस साधूनुमा व्यक्ति के लिए चंदायन में कोई व्यक्तिवाची शब्द नहीं आया है. एक ही शब्द को डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने ‘बाजिर’ और डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने ‘बाजुर’ समझा है. माताप्रसाद के यहाँ उसकी आवक ग्रंथ के 54वें, जबकि परमेश्वरी लाल के यहाँ 66वें कड़वक में होती है. चौपाई एक ही है, सिर्फ उसके कुछ शब्द अलग तरह से लिखे गए हैं और अर्थ भी अलग लगाए गए हैं-

एक जगह-

बाजुरु एकु कतहुं हुत आवा. गोवर फिरइ बिहाऊ गावा II
और दूसरी जगह-
बाजिर एक कितहुंत आवा. गोवर फिरइ बिहाऊ गावा II

चौपाइयों में अंतर या त्रुटि, जाहिर है, किसी कातिब द्वारा ग्रंथ को उतारने के क्रम में आई है. इ और उ की मात्रा का घालमेल फारसी लिपि की पुरानी समस्या है, जो पहले कुछ ज्यादा ही थी. बाजिर को बाजुर लिख या पढ़ दिया जाना कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन माताप्रसाद जी ने सिर्फ उच्चारण साम्य के आधार पर ‘बाजुर’ का मतलब ‘कोई एक बाजा बजाकर मांगने-खाने वाला’ लगाया है, जबकि परमेश्वरी लाल जी ने वाजिर का अर्थ ‘वज्रयानी योगी’ लगाया है.

इस व्यक्ति के जीवन व्यवहार का और आगे उससे जुड़े घटनाक्रम का भी वर्णन मुझे डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त वाले अर्थ को ज्यादा सटीक मानने की ओर ले जा रहा है. इस व्यक्ति में वैराग्य और अनुराग, दोनों बहुत गहरे हैं. बस्तियों में फेरा लगाते हुए वह राजा और योगी भरथरी की परंपरा वाला गीत ‘चंद्रावल’ गाता है. बस इस बात का अंदाजा उसको नहीं है कि उसकी वर्णन कला किसी का कितना नुकसान कर सकती है. याद रहे, वज्रयानी साधु की छवि संसार के प्रति उदासीन लेकिन महामुद्रा के रूप में स्त्री को अपनी आराध्य मानने वाले व्यक्ति की रही है.

महायान पंथ के संस्कृत ग्रंथों में उनके लिए ‘मंत्रिन’ या ‘वज्रिन’ शब्द आता है. मंत्री अभी संस्कृत से होते हुए हिंदी का शब्द बन गया है और इसका उपयोग सदियों से फारसी शब्द वज़ीर के पर्याय की तरह किया जा रहा है. दूसरा शब्द ‘वज्री’ पाँच सौ साल जिन वज्रयानियों के लिए प्रयोग में था, 1100 ईसवी आते-आते वे हाशिये पर चले गए. ईसा की 13वीं सदी बीतने के साथ लोग वज्रयान समेत तमाम बौद्ध पंथों का नाम भी भूलने लगे तो यह शब्द भी उनके जेहन से मिट गया होगा, हालांकि तंत्र-मंत्र की दुनिया में उनकी याद दिलाता हुआ ‘वाजीकरण’ शब्द अभी बचा हुआ है. तो क्या वज्रयानी साधुओं के लिए आने वाला शब्द ‘वज्री’ बौद्ध विहारों के विलोप के दो सौ साल बाद अवधी में ‘वाजिर’ बनकर बचा रहा होगा? ऐसा हुआ हो तो इस विलुप्त भिक्षु-परंपरा के लिए एक ठेठ देसी शब्द भी हम यहीं पा लेंगे.

 

९.
रूपचंद की कठिनाई

किस्सा आगे यूँ बढ़ता है कि एक सुबह चंदा अपने पिता के महल धौराहर (जिसे डॉ. माताप्रसाद गुप्त ‘धवल-गृह’ बताते हैं) के झरोखे पर खड़ी होती है, तभी नगर में घूम रहा वाजिर उसे देख लेता है और वहीं के वहीं मूर्छित होकर ढह जाता है.

‘तिहि खिन बाजिर मूंड़ उचावा
देखी चांद तवारा छावा.’

खुद मुल्ला दाऊद वाजिर का जिक्र ऐसे करते हैं जैसे उनके पाठक को तो इसके बारे में सब पता ही है. जैसे ‘जोगी’, ‘कानफाट’, ‘सिउमंदिर, ‘राधा-कान्ह’ या ‘राम-रमाइन’, वैसे ही एक जानी-पहचानी चीज ‘वाजिर’ भी है. बैराग के गीत ‘बिहाऊ’ गाना उसकी सहज वृत्ति है, लेकिन झरोखे पर खड़ी एक सुंदर लड़की को देखते ही उतने ही सहज ढंग से वह बेहोश भी हो जाता है.

डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त के यहाँ वाजिर की मूर्छा के अलग वर्णन के साथ यह कड़वक इस प्रकार है-

वाजिर एक कितहुंत आवा l गोवर फिरइ बिहाऊ गावा II
घर-घर भुगुति मांग लै खाई l खिन-खिन राजदुआरिहं जाई II
दिन एक चांद धौरहर ठाढ़ी l झांकसि मांथ झरोखा काढ़ी II
तिह खन बाजिर मूंड़ उचावा l देखसि चांद झरोखें आवा II
देखतहिं जनु नौहारहिं लीन्हा l बिदका चांद झरोखा दीन्हा II
घरहुत जीउ न जानै कितगा, कया भई बिनु सांस l
नैन नीर दइ मुंह छिरकहिं, आय लोग तिहिं पास II 6/6

इसका एक मतलब यह हो सकता है कि भिक्षु के बैराग में ही कोई तिर्यक पक्ष है, और दूसरा यह कि चंदा सुंदरता के सारे प्रतिमानों के पार जा चुकी है, बाकी सुंदर लड़कियों में उसको गिना ही नहीं जा सकता. किस्सा बताता है कि वाजिर के गिरते ही शहर के लोग उसे घेर लेते हैं, उसको होश में लाने की कोशिश करते हैं और उसकी वेदना पूछते हैं- ‘कहु बाजिर तोर बेदन काहा/ लोग महाजन पूछत आहा.’ यह पूछताछ सवालों की झड़ी लगा देने जैसी है- ज्वर चढ़ गया है कि पेट में दर्द हो रहा है? कहीं सांप ने तो नहीं डंस लिया? खर धूप तो नहीं लग गई? किसी ने पान में कोई विस्मरण वाली चीज तो नहीं खिला दी? किसी अदृश्य शक्ति के दर्शन तो नहीं हो गए? और अंत में-

कै तिहं अरथ गंवाया, मार लीन्ह बटमार l
नाउं कहसि नहिं ताकै, बाजिर मुरुख गंवार II

जवाब में वाजिर ‘संझा भाषा’ में उन्हें गोलमोल सी कुछ बातें बताता है, जिसका अर्थ नहीं निकाला जा सकता.

बिरिख ऊंच फल लाग अकासा l हाथ चढ़ै कै नाहीं आसा II
गहि चूकत को बांह पसारे l तरुवर डार धरै को पारे II
रात दिवस राखहिं रखवारा l नैन जो दैखै जाइ सो मारा II
उरग डार फिरि देखेउं रूखा l कंवल फूल मोर हिरदै सूखा II
पियर पात जस बन जर, रहेउं कांपि कुम्हलाइ l
बिरह पवन जो डोलेउ, टूटि परेउं घहराइ II 68

थोड़ी देर में यह समझ कर कि इस शहर में ज्यादा देर रहने का मतलब है जान गंवाना, वह बाहर निकल जाता है और एक महीने से ज्यादा लंबी यात्रा के बाद सिंहद्वार पर पहरेदारों से राजपुर नगर में घुसने की चिरौरी करता है, जिसका राजा रूपचंद था और उसका मंत्री बांठ था. अब यह ‘बांठ’ नाम भी एक भारी समस्या है. इतना तो लग रहा है कि रूपचंद की तरह यह कोई व्यक्तिवाची नाम नहीं है, लेकिन यह किसके लिए आया है, यह भी स्पष्ट नहीं है.

आगे के किस्से से पता चलता है कि यह शब्द शायद ‘अपराजेय योद्धा’ जैसी किसी श्रेणी के लिए आता होगा. चनैनी लोककथा में भी बांठा या बंठा शब्द कमोबेश इसी अर्थ में आता है, लेकिन वहाँ यह एक व्यक्ति का नाम है, जिसकी पहचान उसके जातिनाम के साथ जुड़ी हुई है. लुरखुर काका अपने किस्से में उसे ‘बीरबंठा’ या ‘बँठवा चमार’ कहते थे. इस जाति का एक विरल विख्यात योद्धा. हमारे लिए उसकी छवि एक स्वतंत्र वीर की थी, किसी राजा के सेनानी की नहीं. खैर, राजपुर में नगर द्वार पर ही चादर बिछाने के बाद देर रात में वाजिर चंद्रावल की तान छेड़ता है तो पूरे नगर में सनसनी छा जाती है.

‘निसु ही राति सोहावनि बाजुर ठोका तार
गाइ गीत चँदरावलि नगर भएउ चमकार.’

चंद्रावल के बारे में बता दें कि इस लोकप्रिय किस्से को राजा भरथरी के भानजे गोपीचंद और उसकी बहन चंद्रावली से जोड़ा जाता है. उस किस्से में गोपीचंद बंगाल के राजा धर्मपाल के भाई मानिकचंद का बेटा है, जो पहले ही वैराग्य ले चुके हैं. उनकी पत्नी, रानी मैनावती ने राजकुमार गोपीचंद के योगी होने की भविष्यवाणी सुनकर उसे सांसारिक बनाने की सारी कोशिशें कर डाली हैं, फिर भी एक दिन सारा राजपाट छोड़कर वह चला ही जाता है.

खैर, गीत की वेदना से राजा रूपचंद पूरी रात सो नहीं पाता. दरबार में पहुंचते ही बांठा से कहता है कि ऐसा गाना किसने गाया, किसी तरह उसको बुलाओ तो मन को कल पड़े. थोड़ी देर में राजा के दूत वाजिर को पकड़कर ले आते हैं. राजा कहते हैं कि तुम्हारे कंठ में जादू है, यहीं रह जाओ, हमें अपने गीत सुनाते रहो और इस राज के सारे सुख भोगो. वाजिर उन्हें बताता है कि दूर की कहानी दूर की होती है, मैं तो अपनी आंखोंदेखी सुरों में उतार रहा हूँ-

सहदेव महर कइ धीया चांदा, चहूँ भवन उजियारि l
मानिक जोत जानु परजरही, नागरि, चतुरि अपारि II 6 l 62

आगे राजा इस लड़की के बारे में और-और जानना चाहता है और वाजिर चंदा का नख-शिख वर्णन करता चला जाता है. वैसे ही, जैसे डेढ़ सौ साल बाद लिखे गए ‘पद्मावत’ काव्य का सुग्गा. कुछ विद्वानों की राय है कि बाद की जिस अकेली रचना पर चंदायन का असर सबसे ज्यादा पड़ा, वह जायसी का पद्मावत ही है. अपने वर्णन की शुरुआत वाजिर चंदा की सिंदूर भरी मांग से करता है, फिर नीचे जाते हुए रसीली उपमाओं की झड़ी लगा देता है. सुनते-सुनते राजा का हाल ऐसा हुआ कि कभी हंसता है कभी रोता है. ऐसा बेबस कि अपने ही पैरों तक हाथ नहीं पहुंचा पा रहा.

चलत चांद चित लागा, मनहुत उतर न काउ l
पांयहि हाथ न पहुंचै, हंसि हंसि रोवइ राउ II

बाजिर की बात खत्म होने के साथ ही राजा रूपचंद हजारों घोड़े-हाथियों के साथ अपनी फौज को गोवर राज के खिलाफ कूच कर देने का आदेश जारी कर देता है. अपशकुनों की झड़ी लगी पड़ी है-

‘राहु-केतु घर ऊठे, दिसासूल भा आइ
सूंक सोह उतरापथ जोगिनि, बाहर सब लै जाइ.’

फिर भी राजा कहता है- ‘धोती पहनने वाला राजपुर का कोई भी मर्द घर में बैठा मिला, लड़ाई के लिए फेंटा बांधकर चलती हुई फौज में न दिखा तो उसी ठौर मारा जाएगा.’

 

 

१०
गोवर पर हमला और लोरिक का प्रवेश

मुल्ला दाऊद वीर रस के उस्ताद हैं, हालांकि लड़ाइयों का वर्णन वे रणनीतिक घेरेबंदी और पलटनों से पलटनें टकराने की तरह नहीं, एक-एक योद्धा के बीच होने वाले मरणांतक युद्ध के रूप में ही करते हैं. रूपचंद द्वारा गोवर की घेरेबंदी का उन्होंने अद्भुत चित्र खींचा है. जिस शहर को और उसके इर्दगिर्द के परिवेश को थोड़ी देर पहले उन्होंने इतनी सुंदर तस्वीर में ढाल दिया था, उसी की पान की बेलों को, फुलवारियों को, अमराइयों को, नारियल और सुपारी के पेड़ों को, खजूरों और जामुनों को एक बहुत बड़ी फौज के हाथों बड़ी बेदर्दी से काटे जाते, मठों और देवलों (मंदिरों) को ढहाए जाते, कूदती मछलियों वाले ताल-पोखर, बावड़ियों को पाटकर सुखाए जाते दिखाया है.

चहुं दिसि छेका गाढ़ फिरावा l खूंटहिं खूंट जोरि गर लावा II
तोरियहि पान बेलि पनवारी l कटियहि खेत रूख फुलवारी II
ढहियहि मढ देवर अबराई l पटियहि तारा पोखर बाई II
काटे चहू पास अबराऊ l तार खिजूरि जामु लखराऊ II
काटी बारी महर कइ लाई l नरियर गुवा अउर फुलवाई II
महर मदिर चढ़ि देखा, बहुल हस्ति असवार l
ओड़न फरी न सूझइ, खांड़हि होइ चमकार II 7 l 92

महर सहदेव अपने महल पर चढ़कर बाहर देखते हैं और कांप जाते हैं. घेरा डालने वाले राजा के पास समझौते के लिए अपने दूत भेजते हैं. ‘जो भी मांग हो, सब पूरी करने को तैयार हूँ. खजाना, घोड़ा-हाथी सब ले लीजिए, बस नगर को सुरक्षित छोड़ दीजिए.’ राजा रूपचंद की तरफ से बांठा जवाब देता है- दो लाख घोड़े एक आवाज पर तैयार कर देने वाले राजा को गोवर से क्या मिलेगा? बस, चंदा को खुशी-खुशी उसके स्वामी से ब्याह दें, फिर चैन से राज करें.’

‘लड़की विवाहित है, ऐसा पाप भला क्यों करना चाहते हैं’, ऐसे नैतिक आग्रह सुने जाने का तो कोई मामला ही नहीं है. कर वसूलने वाले छत्तीसो कुल के क्षत्रियों से राय पूछी जाती है तो उनमें कोई राजा को सलाह देता है, बेटी ब्याहकर कष्ट काटें, कोई यह कि झंझट छोड़ें कुछ दिन बाहर घूम आएँ. लेकिन कंवरू-धवरू नाम के दो वीर लड़ाई में जाने पर अड़ जाते हैं और बांठा को टक्कर देते हुए एक-एक करके दोनों मारे जाते हैं. यहाँ पहुंचकर महर सहदेव का एक भाट राजा को सलाह देता है कि बचाव के लिए वीर लोरिक को बुलाने के अलावा कोई चारा नहीं है.

लगता है, लोरिक का निवास शहर के बाहर है. (उसका नाम लोककथाओं में भी और चंदायन में भी कहीं ‘लोर’ तो कहीं सूरज के समानार्थी रूप में आता है.) राजा का भेजा हुआ भाट लोरिक के पास जाकर उसको सारी स्थिति बताता है. कहता है कि शहर पर घेरा पड़ा हुआ है, कंवरू-धवरू मारे जा चुके हैं, शहर लूटा जा सकता है. सहदेव महर से लोरिक का कुछ खास लगाव नहीं दिखता, फिर भी एक बड़ी प्रतिज्ञा करके वह लड़ने को राजी हो जाता है.

उठा लोरु सुनि नाखा परलै महर भया औसान l
आजु बांठु रन मारउं, देखउं राइ परान II

घर आकर तत्तारी (तातारी?) तलवार बांधकर घोड़े पर सवार होकर वह अपनी मां खोलिनि को सीस नवाता है. तब निकलने से पहले उसकी पत्नी मैनावती आ खड़ी होती है-

‘आगे आइ ठाढ़ि धनि मैना
नीर समुँद जस उलटै नैना.’

आंसू बहाते हुए कहती है, तुम्हें रण में जूझ मरने की इतनी ही चाहत है तो पहले मुझे तलवार से काटकर दो खंड कर दो, और जाना ही हो तो मेरा आशीष है कि बांठा को मारकर लौटना, जीतकर ही आना. फिर जैसे भविष्य का पूर्वाभास करते हुए बोलती है-

‘जाकरि नारि सो जुझइ न जाई
बावन सिखंडी रहा लुकाई.’

(खुद बावन तो शिखंडी बनकर छिपा हुआ है. उसकी पत्नी के लिए ही यह सब हो रहा है लेकिन वह लड़ाई में शामिल भी नहीं हो रहा.)

यहाँ से लोरिक अपने गुरु अजयी के पास जाता है. लोकगाथा चनैनी में अजयी का पूरा नाम ‘अजयी धोबी’ मिलता है लेकिन चंदायन में अजयी की जाति नहीं बताई जाती. बहरहाल, इस कैरेक्टर में एक मजेदार बात यह है कि वह बड़े-बड़े योद्धाओं को लड़ना सिखाता रहा है लेकिन खुद लड़ाई से बचने की कोई जुगत नहीं छोड़ता. यहाँ भी अजयी युद्धभूमि में न उतरने के लिए बीमारी का बहाना बनाकर अपने घर में ओठंगे हुए हैं. लोरिक उनसे कहते हैं कि अजयी गुरु आप तो पड़े ही पड़े मुझे लड़ाई के बारे में कुछ बता दो, आपसे मुझे सिद्धि मिल जाए, यही बहुत है.

चंदायन के वर्णन से पहली बार लगता है कि युद्ध कौशल में माहिर होने के अलावा गुरु अजयी को कोई सिद्धि भी प्राप्त है. वह कहता है कि सिद्धि का संचरण तो वह लोरिक की तरफ पहले ही कर चुका है-

‘मैं लोरिक तहिया सिधि दीन्ही
हाथ फरी तुम्ह जहिया लीन्हीं.’

(लोरिक, सिद्धि तो मैंने तुम्हें उसी दिन दे दी थी, जिस दिन तुमने हाथ में फरी (तलवार?) पकड़ी थी.) साथ ही गुरु अजयी लोरिक को यह सीख भी देता है कि पहले राजा से मिल लेना, उसका अभिवादन करना, उसके पीछे ही खुद युद्ध में उतरना-

‘पहिले जाय महर अरगायहु
फिर पाछे तुम जूझै जायहु.’

ऐसा ही होता है. राजा बीस कदम चलकर लोरिक तक आता है, उसकी तारीफ करता है, उसे तीस पान के बीड़े देता है, किसी तरह बांठा से निपट लेने को कहता है और किनारे पहुंच जाने पर (जीत होने पर) आधा राज देने की बात बोलता है- ‘हउ तुम्ह हुते तीर जउ पावउं/ आधे गोवर राज करावउं.’ लोरिक के आने भर से गोवर की सेना में उत्साह छा जाता है. कवि दाऊद अन्य योद्धाओं को भी वजन देते हुए इस युद्ध का बहुत आकर्षक वर्णन करते हैं.

पहली लड़ाई चेर और सिंगार नाम के दो वीरों की है. डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने चेर का अर्थ बेटा लगाया है. गोवर का यह योद्धा लड़ाई की शुरुआत में मारे गए वीर कंवरू का बेटा है. उसका सामना राजा रूपचंद के योद्धा सिंगार से होता है. गोवर के दो शुरुआती योद्धाओं कुंवरू और धवरू को लड़ाई में मारने वाले विपक्षी योद्धा सीह और सिंगार ही थे. सीह को तो चेर ने अपने हमले के वेग से शुरू में ही लड़ाई से बाहर खदेड़ दिया था, आगे सिंगार की बारी थी.

देखि सिंगार कोह परजरा l बांधि फरहरा आगे सरा II
दौरि किहेसि सिर खांड़इ घाऊ l टाटर टूटि काढ़ि गा पाऊ II
दूसर खांड़ लिहेसि पटतारी l फरी फाट धर गएउ उबारी II
दापि सिंगार चेर तस मारा l बिचला खांड़ टूटि गइ धारा II
पुनि जमदाढ़ पानि कर गही l बजर चोट सिर चेरइ सही II
बिनु हथियार भा राउत, परि गा थाकि सिंगार l
एक चोट दुइ कीतिसि, धर सेउ फाट कपार II 8 l 123

सिंगार को देखकर चेर का क्रोध भड़क उठा और वह फरहरा बांधकर आगे बढ़ा. माताप्रसाद गुप्त जी इस पद का जो अर्थ आगे बताते हैं उसमें ज्यादातर हमले सिंगार के ही हैं- ‘सिंगार ने दौड़कर चेर के सिर पर खांड़े का घाव किया जिससे उसका टाटर (शिरस्त्राण) टूट गया और नीचे का कपड़ा निकल आया. (मुझे पाऊ का अर्थ कपड़ा नहीं चप्पल लगता है.)  दूसरा वार उसने देख-भाल कर किया जिससे चेर की ढाल फट गई लेकिन धड़ बच गया. अब सिंगार ने दर्प में आकर चेर पर तीसरा वार किया, जिसमें तलवार बिछल गई और उसकी धार टूट गई. फिर उसने जमदाढ़ हाथ में पकड़ा लेकिन वह वज्र-आघात भी चेर ने झेल लिया. यहाँ पहुंचकर सिंगार थक गया और निहत्था भी हो गया. तब विपक्षी की एक चोट ने उसके दो टुकड़े कर डाले और धड़ के साथ ही उसका कपाल भी फट गया.’

ऐसे वर्णन रचना को सीधे वीरगाथा काल से जोड़ते हैं. आगे बहुत भीषण युद्ध है, जिसमें एक बार राजा सहदेव भी मुश्किल में पड़ जाते हैं. लेकिन फिर लोरिक के हाथों एक-एक करके राजा रूपचंद के सारे योद्धा मारे जाते हैं- और अंत में खुद हमलावर रूपचंद रणभूमि छोड़कर भाग जाता है. सबसे खतरनाक लड़ाई बांठा और लोरिक के बीच होती है. इस युद्ध में दोनों की तलवारें लगातार टकराने से उनके इर्दगिर्द चिनगारियों का आवरण छा जाता है, हालांकि इसका अंत लोरिक के हाथों बांठा की पराजय और उसका सिर काट लिए जाने के ही रूप में होता है-

धरेसि तारि तरवारि कंठ महिं, काटि चला लइ मुंड l
भागि चला दर राउ रूपचंद, देख परा धर रुंड II

इससे बड़ी और अपने आखिरी पलों में तकरीबन एकतरफा हो गई लड़ाई पूरे चंदायन में कोई और नहीं है, हालांकि लड़ाइयों का जिक्र इसमें आता रहता. इस युद्ध के बाद लोरिक का प्रेमी रूप ही हम ज्यादा देखते हैं. एक दुर्निवार आकर्षण से भीतर-भीतर कमजोर हो चुका, अपनी पत्नी से दगा करने की नैतिक पीड़ा से ग्रस्त एक प्रेमी. सबसे दुख की बात यह कि उसे महायोद्धा घोषित करने वाला राजा भी इस प्रेम के लिए उसे ‘कुजात’ तक कहने से नहीं चूकता!

किस्सा शुरू करने से पहले ही बात आ चुकी है कि एक स्वतंत्र अहीर योद्धा और उसके इलाके के अहीर शासक को लेकर बुनी हुई वीरगाथानुमा इस प्रेमकथा में गुत्थियाँ आती रहेंगी. जाति चेतना के आधार पर या जिस भी वजह से, योद्धा लोरिक तो महर सहदेव को अपनों में ही एक मानता है, लेकिन खुद राजा उसे लड़ाई तक ही अपनों में गिनता है, फिर गैर मान लेता है. चनैनी की बहुप्रचलित लोककथा में लोरिक और चांदा की मुलाकात पहले हो चुकी होती है, राजा सहदेव का प्रकरण किस्से के बीच में आता है. लेकिन दाऊद के चंदायन में किस्से की शुरुआत ही राजा से होती है, लोरिक का प्रवेश बाद में होता है और किस्से की शक्ल बदल जाती है. लोककथा के आदी कानों को यह कहानी शायद कुछ घट कर लगे, लेकिन काफी कुछ इसमें ऐसा भी है जो लोककथा में अंट ही नहीं सकता था.

 

11.
लोरिक और चंदा की भेंट

लड़ाई खत्म हो चुकी है, बैरी परास्त और बेइज्जत होकर भाग चुका है और गोवर शहर में लोरिक और अन्य बड़े योद्धाओं को हाथी पर बिठाकर विजय जुलूस निकाला जा रहा है. चंदा अपने महल के छज्जे से उसे श्रद्धाभाव में ही देखती है लेकिन देखकर बेहोश हो जाती है. उसकी धाय बिरस्पत (बृहस्पति?) उसे होश में लाती है, उसकी उद्विग्नता का कारण पूछती है तो वह लोरिक को एक बार फिर देखने की इच्छा जाहिर करती है.

बिरस्पत राजा को लोरिक के सम्मान में एक ज्यौनार आयोजित करने की सलाह देती है. बहुत सारे शाकाहारी व्यंजनों के साथ पत्तलों पर हुए इस ज्यौनार का भव्य वर्णन मलिक दाऊद ने चंदायन में किया है. कुछ ऐसी फुरसत से, जैसे कहानी को आगे बढ़ाने की कोई जल्दी उन्हें न हो. फिर यह धीरे से आगे बढ़ती है. लोरिक ने अबतक चंदा को देखा भी नहीं है. इस भोज में ही वह पहली बार उसे देखता है और एक विकट मूर्छा के साथ उसके दुर्भाग्य की शुरुआत हो जाती है. ध्यान रहे, लोककथा चनैनी में प्रेम की शक्ल अलग है, लिहाजा ऐसा कोई क्षण वहाँ नहीं आता.

भोज से लोरिक को चारपाई पर लादकर घर ले आया जाता है. इस हाल में उसे देखकर उसकी मां विलाप कर रही है कि उसके महावीर बेटे को यह किसने टोना मार दिया. इलाज के लिए पंडित और वैद्य बुलाए जाते हैं. वैद्यों की डायग्नोसिस भी ठेठ सिद्धों-नाथों जैसी ही है- शरीर की मुख्य नाड़ियों इड़ा और पिंगला को चांद-सूरज बताने वाली.

धरि नाटिका बैद अस कहहीं l चांद सुरिज दुइ निर्मल अहहीं II
बात न पित्त रगत नहीं सीऊ l ताप न जूड़ी चित्त सजीऊ II
देव न दानव छरगा होइय, ना सीयार विरार l
मलिन कामरस बेधा, तउ यह ररइ मरार II 10 l 154

नाड़ी पकड़कर वैद्यों ने कहा कि चांद और सूरज दोनों निर्मल हैं. वात और पित्त की समस्या नहीं है और खून भी ठंडा नहीं है. न बुखार है न जूड़ी चढ़ रही है, और चित्त भी सजीव है. किसी देव या दानव ने इसको छला नहीं है, न ही सियार या बिल्ली का कोई टोटका है. मलिन कामरस ने इसे बेध डाला है, तभी यह हंस कोई रट लगाए हुए है.

इस असाध्य बीमारी के सामने वे हाथ खड़े कर देते हैं और लोरिक इसमें घुलता चला जाता है. फिर चंदा की धाय बिरस्पत एक दिन कुछ सौदा-सुलफ करने बाजार जाती है और कहीं से कराहने की आवाज सुनकर लोरिक के घर में घुस जाती है. वहाँ लोरिक की मां खोलिनि को किसी तरह हटाकर चंदा का नाम लेते हुए उसका हाल पूछती है. लोरिक उसे सब बताता है, किसी तरह एक बार और दर्शन करा देने का निवेदन करता है तो कहती है कि उसका नाम अगर इस मामले में खुल गया तो राजा उसे कड़ाहे में छौंकवा देंगे. फिर भी एक बार चंदा का मुंह दिखा देने में वह कुछ मदद कर सकती है, लेकिन इसके लिए लोरिक को अपनी काया पर भभूत चढ़ाकर मंदिर में बैठना होगा.

लोरिक ऐसा ही करता है. कड़वक 164 में हम उसके योगी वेष का सुंदर वर्णन पढ़ते हैं. वर्णन लंबा है मगर इसकी शुरुआती दो पंक्तियाँ इस तरह हैं- ‘कानों में स्फटिक की मुद्रा, सिर में सेली, कंठ में जप-रुद्राक्ष की माला डाल ली. चक्र धारण किया, जोगियों वाला पट्टा डाल लिया और पैरों में खड़ाऊं पहनकर गोरख की राह पर चल पड़ा.’

सवन फटिक मुद्रा सिर सेली l कंठ जाप रुदराखइ मेली II
चकरु जोगौटा कोथी कथा l पाइ पावरी गोरख पथा II

पूरे एक साल भभूत पोते मंदिर में गुजार लेने के बाद लोरिक को चंदा के दर्शन का मौका मिलता है. बिरस्पत उसे दीवाली खेलने के लिए लिवाकर उस तरफ आती है, वहाँ उसका हार टूट जाता है तो सखियाँ मोती बीनने लगती हैं जबकि छांह के लिए वह खुद मंदिर में चली आती है. (दीवाली खेलने की बात अभी हमें अजीब ही लगेगी, लेकिन यहाँ अहीरों के शाक्तमत में दीवाली खेलने की प्रथा का जिक्र है, जिसमें बकरे की बलि भी दी जाती थी.) वहाँ बैठे ‘सिद्ध’ के पांवों में सीस नवाती है तो सिद्ध मूर्छित हो जाता है. चांदा वहाँ से चली जाती है, हालांकि उसके लिए यह बड़े आश्चर्य की बात है. उतना ही आश्चर्य बाद में लोरिक को भी होता है, जो इसे अपना एक सपना भर मान रहा है.

कुछ दिन बाद बिरस्पत मंदिर में बैठे योगी के ही लोरिक होने का इशारा देती है तो चांदा इसे मानने को राजी नहीं होती. उसे लगता है कि वह तो कोई भिखारी था. फिर बिरस्पत कहती है-

‘हस्ति चढ़ा देखरायउं, फुनि आयउ जेवनार
सोइ लोरु मढ़ि मुनिवरु, देखत गा बिसभार.’

हाथी पर चढ़ा हुआ दिखाया, फिर वही ज्यौनार में आया, मंदिर में वही लोरिक मुनिवर के रूप में था, उसी ने तुम्हें देखकर अपनी सुध-बुध खो दी. इस तरह दोनों को ही अलग-अलग यह समझने में काफी वक्त लगता है कि उन्होंने कोई विचित्र चीज नहीं, एक-दूसरे को ही देखा है. यकीन हो जाने पर चंदा बिरस्पत से लोरिक को समझाकर उसे मंदिर से उठा देने के लिए कहती है.

लोरिक मंदिर छोड़कर घर तो चला आया लेकिन यहाँ उसका जी नहीं लगता था. उसकी पत्नी मैना ने उसे अपना मन स्थिर करने के लिए बहुत समझाया लेकिन वह दिन भर जंगलों में भटकता रहता था और शाम को चंदा की एक झलक पाने के लिए गोवर शहर में उसके महल के पास चला आता था. उसकी यह दशा देखकर बिरस्पत से रहा नहीं गया और उसने महल पर चढ़कर चांदा से मिलने की सलाह उसे दी. यह प्रकरण भी बहुत अटपटा है. चंदा उससे मिलना भी चाहती है और अप्राप्य भी बने रहना चाहती है. कई कोशिशों के बाद लोरिक इसमें कामयाब होता है, हालांकि दूसरी बार सबको इसकी भनक मिल जाती है. उस समय चांदा द्वारा पलंग के नीचे छिपाया गया लोरिक इस भय से मरणासन्न हो जाता है कि अब तो उसको चोर की तरह पकड़कर किसी पेड़ से लटका दिया जाएगा.

सूरज डूबने पर चंदा जब उसे अमृत छिड़ककर जिलाती है तो वह कहता है- ‘अपनी मृत्यु आज मैंने अपनी ही आंखों से देख ली. मौत आई और मुझे पहचानकर वापस चली गई. उस क्षण मुझे लगा कि अगर मैं जीवित भी रह गया तो चंदा कुम्हला जाएगी. इस बात ने मुझे अवसन्न कर दिया. ईश्वर ने आज की रात अगर मुझे जीवित रखा तो मृत्यु जल्दी मेरे पास नहीं आएगी. तब चंदा ने उसके होंठ चूमकर उसका आलिंगन किया और उसके पैरों से लगकर अपनी बांहें फैला दीं. कहा- मन में कोई मलाल न रखो लोरिक, अब मैं तुम्हारी ब्याही जैसी हूँ और तुम मेरे पति हो.’

आपनि मीचु नैन मैं देखी l मीचु आइ फिरि गई बिसेषी II
हउं जौ जिया चांद कुबिलानी l अत अवसान भया तेहि वानी I
एहि परि रइनि जौ दई जियावइ l ताकहु मीचु न नियरे आवइ II
अधर चूबि भर दै अंकवारी l चांद पांय परि बांह पसारी II
सुनहु लोर एक बिनती अब तुम्ह काह मखाहु l
हउं तुम्हरइ जसि ब्याही तूं मोर ब्याहू नाहु॥

चंदा की युक्ति से लोरिक उस रात महल से निकलने में कामयाब हो जाता है, लेकिन गोवर शहर में यह बात फैलते देर नहीं लगती कि वीर लोरिक रात में छिप-छिपकर चंदा से मिलने जाता है. यह चर्चा फिर मैना तक पहुंचती है और अपनी सास से उसका एक बहुत दारुण संवाद होता है. फिर वह लोरिक को समझाती है कि चंदा से तो वह कई गुना सुंदर है. लोरिक समझ भी जाता है, लेकिन चांदा से प्रेम की लत ऐसी कि नजर हटते ही वापस उसी रास्ते पर चला जाता है. इस उलझाव का अगला चरण मंदिर पर चंदा और मैना की लड़ाई में दिखता है.

यह लड़ाई इतनी भीषण है कि दोनों एक-दूसरे के कपड़े फाड़ डालती हैं. लोरिक ही किसी तरह उनका झगड़ा छुड़ाता है. बेइज्जती दोनों की होती है, लेकिन चंदा अपनी ससुराल छोड़कर मायके में रह रही है और उसके लिए एक युद्ध भी हो चुका है तो  जाहिर है, यह वितंडा उसके लिए कहीं ज्यादा भारी पड़ने वाला है. लेकिन झगड़ा टूटने से पहले उसने मैना को बोल दिया है-

‘जाहि जोग हुत रावनु तासो भएउ मिराव
मोतिहिं हार महि घुंघुची, मैना होइ न पाव.’

(लोरिक जिसके रमण योग्य है, उससे वह मिल गया है. मोती के हार में ऐ मैना, तू घुंघुची नहीं बन पाएगी.)

चंदा का ओरहन (उलाहना) लेकर गोवर की रानी फूला महरी के पास गई मालिन उससे कहती है कि यह लड़की दोनों कुल डुबोने वाली, अकरणीय काम करने वाली है, यह सब करने से इस छिनाल को मना करें-

‘दुइ कुर बोरनि अकरनि, गोत लजावनि दारि
पायं लागि कह मालिनि, हरकिय आहि छिनारि.’

फूला महरी के लिए यह जीते जी मर जाने जैसा है. वह चंदा को ससुराल से बुलाने पर पछताती है और कहती है कि इसके घर वालों को क्या जवाब देंगे.

 

१२.
लोरिक-चंदा का गोवर छोड़ना

चंदा लोरिक के पास संदेश पर संदेश भेजती है कि वह उसे किसी तरह महल से और गोवर शहर से निकालकर कहीं ले जाए. लोरिक कुछ दिन आज-कल करता रहता है, लेकिन जब कोई चारा नहीं बचता तो एक दिन पंडित से मुहूर्त निकलवा कर पहले की ही तरह कमंद फेंककर महल पर चढ़ता है और वहाँ से चंदा को पुरुष-वेश में लेकर, काले कपड़ों में और सिर पर बांस का टोप चढ़ाए पूरब की तरफ हरदी नाम की जगह के लिए निकल पड़ता है. इस हरदी का हिसाब कहीं-कहीं ‘मुंगेर’ लगाया गया है लेकिन चंदायन पढ़कर ऐसा कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

दस कोस चले जाने पर लोरिक को याद आता है कि उसका भाई कुंअरू वहीं किसी बाजार में तलवार खरीदने आया है. अपने घर-परिवार में रमे रहने वाले लोरिक के मन में आता है कि कुंअरू से मिले बिना वह कहीं नहीं जाएगा. भागता हुआ वह आगे निकलता है, पीछे-पीछे चंदा आती है. कुंअरू और लोरिक मिल ही रहे हैं कि तभी चांदा के वहाँ पहुंच जाने का दृश्य देखने लायक बनता है-

‘पाछे हेरत चांदा आई, जिउ कुंअरू कर गएउ उड़ाईI
कहेसि लोर तुम भला न कीआ, कित लइ चले महर कइ धीआ II’

(पीछे से लोरिक को खोजती हुई चांदा आई तो कुंअरू की जान सूख गई. बोला, लोरिक तुमने यह अच्छा नहीं किया. यह राजा की लड़की को लिवाकर तुम कहाँ चले जा रहे हो?)

आगे वह लोरिक को समझाता है कि उसकी मां और पत्नी यह बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पाएँगी. लोरिक के प्रति उसके मन में प्रेम पहले जैसा ही है सो उसके गले लगकर रोता है लेकिन चंदा को मुंह में कालिख पोतकर कहीं निकल जाने की सलाह देता है. आगे उनकी भेंट बावन से होनी है, जिससे निराश होकर चंदा मायके लौट आई थी.

ज्यादा समय नहीं गुजरा है, लेकिन पत्नी की कोई परवाह न करने वाला, कभी हाथ-मुंह तक न धोने वाला, एक आंख वाला नगण्य इंसान बावनवीर इतने ही वक्फे में एक वीर की तरह प्रसिद्ध हो गया है. उसकी बहादुरी गोवर की लड़ाई में भी देखी जा सकती थी लेकिन वहाँ नजर ही नहीं आया. कह सकते हैं कि ज्यादातर मर्दों की तरह उसकी वीरता भी अपनी ब्याहता के ही सामने दिखने जा रही है. लोरिक और चंदा गंगा किनारे पहुंचते हैं और एक मल्लाह से उसकी नाव लेकर (या छीनकर) गंगा पार कर जाते हैं. तभी बावनवीर भी गंगातट पर पहुंचता है और केवट उसे बताता है कि उसकी नाव लेकर दोनों अभी-अभी उस पार गए हैं.

‘सांस मारि बावनु तस धावा
मारि पवांरउं जान न पावा. जस रे गोवारु चरावइ गाई
अपनी करइ सो धाइ पराई.’

(दम बांधकर बावन दौड़ा और कहा, ‘मारकर बहा दूंगा, जाने न पाएगा. जैसे यह ग्वाला अपनी गायें चराता है, उसी तरह अभी भागता चला जा रहा है.’)

नदी पार करके बावन उन्हें दस कोस और आगे जाकर पकड़ता है. वहाँ लोरिक जरा पीछे होकर किसी आड़ में चला जाता है और पति-पत्नी के मिलने का दृश्य जरा दूर से ही देखता है. कड़वक 291 में खींचा गया चित्र आज भी पुराना होने का नाम नहीं ले रहा. ‘चांदा ने देखा, बावन आ रहा है. उसकी बोलती बंद हो गई और दांत कड़कड़ाने लगे. फिर पीछे मुड़कर उसने लोरिक को खोजने की कोशिश की, तब तक बावन ने बाघ की तरह आकर उसको घेर लिया. तब चांदा ने मुंह फेरकर लोरिक से कहा कि अरे देखो तो, बावन चला आ रहा है. तभी बावन ने धनुष चढ़ाकर हाथ में ले लिया और बोला- ऐसा मारूंगा जैसे इसका शरीर कभी रहा ही न हो.’

चांदइ देखा बावनु आवा l वचनु न आवइ दांत कंपावा II
फिर जउ लोरिक पाछे हेरा l बावन आइ बाघ सम घेरा II
मुक्ख फेराइ लोर सेउ कहा l अइ देखु बावन आवत अहा II
धनुक चढ़ाइ बावन कर गहा l अस मारउं जस देह न रहा II

यहाँ धनुर्धर के रूप में बावन की अतुलनीय क्षमता दिखाई गई है, लेकिन साथ ही लोरिक का मनोबल भी अपनी सामाजिक स्थिति कमजोर जानकर कुछ गिरा हुआ दिखाया गया है. बावनवीर का पहला ही बाण लोरिक की ढाल और उसका कवच फोड़ता हुआ, उसकी बांह फाड़ता हुआ उसी वृक्ष में धंस जाता है, जिसकी छांह में वह बैठा था. तब चंदा ग्वालिन खुद को स्थिर करके अपने पति बावन के नैतिक-सामाजिक जोर का तोड़ खोजती हुई बोलती है-

सुनु बावन कह चांद गोवारी l काहि लाग तुम कीन्ह गोहारी II
माइ बाप जउ दीन्ह बियाही l बरिस दिवस हम तुम पहं आही II
पिरम कहानी कीन्ह न बाता l तइ नहिं देखेउ कार कि राता II
सवन मना हुत तुम्हरे ओनाइउ l तरसि मुइउ पर सेज न पाइउ II
जस आइउ तस मइके गइऊ l दइउ क लिक्खा सो मैं पइऊ II
बहुरि जाइ घर आपने, कहा सुनइ जउ मोर l
राव रूपचंद बांठा मारा, सो यहु कूकू लोर II 18 l 292

‘क्या गुहार लगा रहे हो बावन? मां-बाप ने ब्याह दिया तो सालोंसाल मैं तुम्हारे यहाँ रही. न तुमने प्रेम की कोई बात की, न यह देखा कि मैं काली हूँ या गोरी. कान और मन से तुम्हारे बोल सुनने को मैं ओनाती (आतुर) रही. तरस कर मर गई लेकिन तुम्हें सेज पर न पाया. जैसे गई थी वैसे ही मायके आ गई. जो भगवान ने लिखा था मुझे मिल गया. यह वही कुंकुम लोरिक है जिसने राजा रूपचंद और बांठा को मारा था, मेरी बात मानो तो सुरक्षित घर लौट जाओ.’

जवाब में बावन उसपर गालियों की बौछार कर देता है और कहता है-

‘कस लोरिक सेउ मोहिं डरावसि
तउ बड़बोलि जान जउ पावसि.’

क्या मैं तुझे मारूं और नाक-कान काटकर देश से क्या निकालूं. ऐ औरत, लोरिक से तू मुझे क्या डराती है? तेरे ये बड़े बोल तो तब काम आएँगे, जब यहाँ से जाने पाएगी. इतना कहकर लोरिक को ललकारता हुआ बावन दूसरा तीर छोड़ता है जो लोरिक को आड़ देने वाले पेड़ को चीरता हुआ निकल जाता है.

तब चंदा लोरिक को नदी किनारे मौजूद एक मंदिर में छिप जाने के लिए कहती है और बताती है कि बावन के पास कुल तीन ही बाण हैं, जिनमें दो चलाए जा चुके हैं. किसी तरह एक बाण और बचा ले जाओ, फिर यह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. प्रकरण का अंत इसी रूप में होता है. लोरिक अपनी छिदी हुई ढाल पेट पर रखे मंदिर में छिपा हुआ बैठा है. चंदा के पति के आखिरी बाण से पूरा मंदिर झनझना उठता है लेकिन लोरिक बच जाता है.

यहाँ से आगे हमारा सामना बतौर पति और बतौर योद्धा बावनवीर के दुख से होता है. अपनी डूबी हुई प्रतिष्ठा बचाने के लिए सुलह के लहजे में वह लोरिक से कहता है कि ‘यह स्त्री मुझसे बचपन की ब्याही हुई है, फिर भी तुम इसे लेकर अपने घर चले जाओ. मैं लोगों से कहूँगा, गंगा उठाकर (शपथ लेकर) मैंने इसको तुम्हें सौंप दिया. अपनी इस बात से मैं कभी पीछे हटूं तो कहना.’ लेकिन चंदा लोरिक से बावनवीर की बात पर यकीन न करने को कहती है-

चांद कहइ सो मूरुख, जो अइसे पतियाहि l
जाकरि बारि बियाही लीजै, सो होइहैं कस भाइ II

‘ऐसे विश्वास कर लेने वाला मूर्ख ही होगा. जिसकी बचपन की ब्याही स्त्री तुमने ले ली है, वह तुम्हारा भाई थोड़ी न हो जाएगा.’ बावनवीर उसी क्षण हमेशा के लिए धनुष छोड़ देने की बात कहता है. कटारी मारकर मर जाने की भी, हालांकि ऐसा वह करता है या नहीं, चंदायन इसपर खामोश है. फिर वह लोरिक और चंदा को श्राप देता है कि ‘मेरी बचपन की ब्याही, मां-बाप की दी हुई पत्नी ले जाओ लोरिक, तुमसे यमराज निपटेगा और चांदा को सांप खाएगा.’

जउ यह मोरी बारि बियाही, माइ दीन्ह अउ बाप l
राज करउ जम लोरिक, चांदहिं खाइहि सांप l

यह कहकर बावन गोवर की तरफ यानी पच्छिम लौटता है जबकि लोरिक-चांदा पूरब की तरफ बढ़ते हैं. वहाँ सबसे पहले उनका सामना करिंगा राय (चंदायन में उसे कलिंग का राजा बताया गया है, जिसका कोई औचित्य तभी होगा, जब हम बिहार के पश्चिमी हिस्से में छपरा के आसपास कलिंग नाम की कोई जगह सोच पाएँ) के चुंगी अधिकारी बोदिया से होता है. डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने इस व्यक्ति का नाम ‘विद्या दानी’ पढ़ा है लेकिन टैक्स के लिए ‘दान’ शब्द पर सहमति है. यह आदमी कर-स्वरूप लोरिक या चंदा, दोनों में से एक को वहीं छोड़कर आगे बढ़ने की शर्त रखता है. ऐसी शर्त का परिणाम युद्ध ही हो सकता था. वह हुआ. लोरिक ने तलवार और चंदा ने धनुष उठाया. चुंगी के सारे कर्मचारी मारे गए. सिर्फ बोदिया बचा जो अपना काला मुंह लिए, बाल नोचवाए करिंगा राय के पास पहुंचा.

राजा न्यायप्रिय निकला. उसने संदेशवाहक भेजकर लोरिक-चंदा को दरबार में बुलाया. लोरिक ने वहाँ चुंगी की विचित्र प्रथा के बारे में शिकायत की और कहा कि कर्मचारियों के साथ यह सब करने के सिवा कोई चारा उनके पास नहीं था, उन्होंने सिर्फ अपने साथ हो रहे अन्याय का विरोध किया है. यह भी कि अभी वे दोनों अपने हाल पर हैं, उनका साथ देने वाला कोई नहीं है, और अब उन्हें हरदीपाटन जाना है. राजा ने लोरिक की बात को सही माना, उससे वहीं रुककर राज्य की सेवा करने का आग्रह किया और न मानने पर उसको एक घोड़ा और एक हजार अशरफियाँ देकर, चंदा को पालकी (सुखासन) पर बिठाकर दस ब्राह्मणों के साथ हरदीपाटन के लिए रवाना किया.

वहाँ से विदाई की रात में ही उनकी समस्याओं के अगले दौर की शुरुआत हुई. जिस जगह उन्हें रात गुजारनी थी वहाँ रात के पहले पहर में ही फूलों की महक से आकर्षित होकर एक सांप आ गया और उसने चंदा को काट लिया. चंदा तत्काल निर्जीव होकर पड़ गई और लोरिक रोता रहा. पूरे इलाके में हल्ला मच गया. फिर कुछ गुणी लोग वहाँ पहुंचे और उनमें से एक ने चंदा के कान में हीरे की तरह तोलकर एक मंत्र बोला और वह जिंदा हो गई. माताप्रसाद गुप्त के यहाँ कड़वक 312 की आखिरी चौपाई है-

‘अलख निरंजनु जाहि जियावइ
दइअ क लिखा सो मानुस पावइ.’
(अलख निरंजन जिसे जिला देता है, उस मनुष्य को ईश्वर का लिखा हुआ भोगने का मौका मिल जाता है.)

लेकिन अभी लोरिक और चंदा के बड़े कष्ट बाकी हैं. वहाँ चंदा को जिलाने वाले गुणी को इनाम-एकराम देकर वे लोग आगे के लिए रवाना हुए. रात होने लगी तो पाकड़ के एक छतनार पेड़ के नीचे विश्राम किया. सुबह होने को ही थी तब तक एक और सांप आया और चांदा को काटकर छिप गया. जाहिर है, यह बावनवीर का अपनी पत्नी को दिया हुआ श्राप है, जो सांप की शक्ल में उसे दौड़ाए जा रहा है. इस आपदा से लोरिक अधीर हो जाता है और किसी दुःस्वप्न के दोहराव की तरह लगातार दूसरी रात भी गहरे पछतावे के साथ विलाप करता है-

‘कुकरमु करि संग लाग्यों तोरे
तू फुनि हाथ न लागहि मोरे.’

(कुकर्म करके मैं तुम्हारे साथ लग गया लेकिन तुम फिर भी मेरे हाथ नहीं लगीं.)

छांडे़उं भाइ बाप महतारी l तजेउं बियाही मैना नारी II
लोगु कुटुंबु घरु बारु बिसारे l देसु छांड़ि परदेस सिधारे II
गांउ ठांउ पोखर अंवराई l परिहरि निसरेउं कूआं बाई II
अरथ दरव कर लोभु न कीन्हेउं l चांद सनेहि देसंतरु लीन्हेउं II
विचि हउ वाट परी करतारा l ना धनु भएउ न मीतु पियारा II
यह रे बात सभ जानहि, चांद मोर होत परान l
जउ जिउ जाइ कया कस दीखइ, मैं का करबि अपान II 21 l  315

ऊपर के दोहे में ही नहीं, पूरी किताब में ‘मैं’ के लिए ‘मइ’ शब्द ही आया है, जो तब की अवधी भाषा में इस शब्द का उच्चारण रहा होगा. इस बार का विलाप बहुत लंबा है और इसमें रामायण का एक प्रसंग भी आया है. तरह-तरह से पछताते हुए, आशंकाएँ जताते हुए, तबतक के अपने सारे संघर्षों सारे दुखों को एक-एक कर याद करते हुए लोरिक कहता है- राम को सीता का वियोग सहना पड़ा तो उनकी सहायता के लिए हनुमान आ गए थे, आज मेरी मदद के लिए भी काश कहीं से कोई हनुमान आ जाते. इस तरह चंदा को गोद में लिए हताशा की दो रातें गुजार लेने के बाद लोरिक चिता चुनकर उसके साथ ही जल मरने के लिए बैठ गया तब जाकर उसे एक गुणी की शक्ल दिखाई पड़ी.

कवन लोग तुम्ह गारुरि पूछइ l नाउ कहउ अउ जातिहु बूझइ II
जाति ‘गुवार’ गोवरु मोर ठाऊं l धनि चांदा मोहिं लोरिक नाऊं II
गुनी कहा जिनि जीउ बुलावसि l धीरु ‘बांधि अब चांदहि पावसि II
बोलि’ मतरु छिरकेसि लइ पानी l उतरा बिसु चांदा अगिरानी II

सांप का जहर उतारने वालों के लिए गारुड़ि शब्द और जगहों पर भी मिलता है, जो शायद गरुड़ से बना है. यह गुणी व्यक्ति लोरिक से उसका नाम और जाति पूछता है. चांदा का और अपना नाम बताने से पहले वह अपनी जाति ग्वाल और जगह का नाम गोवर बताता है. गुणी कहता है, जी छोटा न करो, धैर्य रखो और चांदा को प्राप्त करो. यह कहकर मंत्र बोलकर जल छिड़कता है तो विष उतर जाता है और चांदा उठकर अंगड़ाई लेने लगती है.

पूरी किताब में शुरू के मंगलाचरण के बाद यह दूसरा मौका है जहाँ कवि दाऊद ने किस्से से बाहर किसी व्यक्ति का, एक श्रोता ‘नथन मलिक’ का नाम लिया है, जिन्होंने दुख की कोई बात उभार दी थी- ‘नथन मलिक दुख बात उभारी. सुनहु कान दइ बहु गुनियारी.’. इससे पहले मंदिर पर चंदा और मैना की लड़ाई वाले प्रसंग में किन्हीं ‘कवि सेराजुद्दीन’ का जिक्र आया है, जिनका एक छंद सुधार कर किस्से में शामिल कर लेने की बात दाऊद ने कही है.

बहरहाल, अभी वाला पूरा प्रसंग वाकई बहुत मार्मिक है और कवि को भी इसके अलौकिक महत्व का अंदाजा है-

‘धनि ते बोल धनि लेखनहारा
धनि ते अखिर धनि अरथु विचारा.’
(धन्य हैं वे जो इसे बोलते हैं और इसको लिखने वाला धन्य है. वे भी धन्य हैं जो इसके अक्षरों और अर्थों का विचार करते हैं.)

विरह प्रसंगों पर महान पंक्तियाँ लिखी गई हैं लेकिन समाज से बहिष्कृत होकर कहीं बसने के लिए जा रहे प्रेमी युगल का ऐसा दुख मन पर सीधे लगता है.

यहाँ से आगे डॉ. माताप्रसाद गुप्त का लिखा ग्रंथ डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त के ग्रंथ से काफी अलग हो जाता है और दोनों जगह कड़वकों की क्रम संख्या का फासला भी तेजी से बढ़ने लगता है. दरअसल, चंदायन की सातों प्राप्त प्रतियों में इस किताब में आए किस्से की कुल दो रीतियाँ दिखाई पड़ती हैं. एक रीत में सांप काटने की दूसरी घटना के बाद प्रेमीयुगल अपेक्षाकृत शांत स्थितियों में हरदीपाटन की ओर प्रस्थान कर जाता है, जबकि दूसरी रीत में उन्हें और भी कई दुखों का सामना करना पड़ता है. परमेश्वरीलाल गुप्त के यहाँ केवल सुर्खियों के रूप में इंगित कड़वकों में लोरिक सारंगपुर में राजा के साथ जुआ खेलता है, किसी वजह से (शायद जुए में चंदा को हार जाने के कारण) उसे दो योद्धाओं के साथ युद्ध लड़ने पड़ते हैं और चंदा को तीसरी बार भी सांप काटता है.

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण घटना में टूंटा जोगी नाम का एक चरित्र चंदा को सम्मोहित करके अपने साथ लिए जाता है और उसे इस कदर मुग्ध कर देता है कि लोरिक के बजाय वह उसी को अपना पति मानने लगती है. हाथ-पैर कटा एक जोगी किसी अत्यंत रूपवती स्त्री को अपने साथ लिए जा रहा है, यह बात देखने वालों को इतनी अजीब लगती है कि दोनों का पता लगाना लोरिक के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होता. लेकिन आंख निकालकर टूंटा जब उसपर झपटता है तो उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है. ऐसे में चंदा का देखा एक पुराना सपना लोरिक के काम आता है.

चंदा को तीसरे सर्पदंश से जब एक गुणी ने उबार लिया, तब होश आने पर उसने अचेतावस्था में देखे गए एक सपने के बारे में लोरिक को बताया था. उसमें एक सिद्ध लोरिक से कह रहा था-

‘लोरिक जो तुहं पीरा परई
चांद तोर जो टूंटा हरई. दई संवरि मोहिं संवरसि लोरा
ठाउं ठाउं मैं आउब तोरा.’

(तुम्हारी चंदा को टूंटा हर ले जाए तो ईश्वर का स्मरण करके मेरा भी स्मरण करना, तुम जहाँ भी होगे मैं वहीं पहुंच जाऊंगा.)

टूंटा को देखकर दहशत में आ जाने के बाद लोरिक उसी सिद्ध को याद करता है और वह तुरंत चला भी आता है. वह लोरिक की हिम्मत बंधाता है और लोगों को जुटाकर एक सभा से यह फैसला कराने का उपाय करता है कि चंदा किसकी पत्नी है. सभा के लिए भी यह फैसला करना आसान नहीं है, क्योंकि खुद चंदा कुछ बोलने को ही राजी नहीं है.

यहाँ एक बार फिर लोरिक से उसकी जात पूछी जाती है और उसके दावे की जांच के लिए इस तरह एक स्त्री को साथ लेकर निर्जन जगहों में भटकने की कैफियत मांगी जाती है-

‘काहि लाग तुहं निसरे, सांच कहउ यहु बात l
हम पुनि देख नियाउ निहारहिं, बूझ तुम्हारी जात l’

और फिर लोरिक का बार-बार दोहराया जाने वाला जवाब, जो यहाँ से शुरू होता है-

‘जात अहिर हम लोरक नाऊं l गोवर नगर हमार पुर ठाऊं l’

आगे इस मामले में सही  फैसला कैसे होता है, कुछ पता नहीं, क्योंकि परमेश्वरीलाल गुप्त के यहाँ इस जगह 383 से 388, कुल पाँच कड़वक गायब हैं.

 

13.
हरदीपाटन में मैना का संदेश

सबेरे-सबेरे चंदा की डोली और लोरिक का घोड़ा हरदीपाटन नगर में प्रवेश करते हैं. नगर का राजा छेतम राव उस समय अपने दल-बल के साथ शिकार पर निकला हुआ है. लोरिक झुककर उसको जोहार बोलता है, फिर अपने लोगों से पूछता है कि इस सुंदर, मदमस्त व्यक्ति को क्या कोई पहचानता है? उत्तर ‘नहीं’ में पाकर साथ चल रहे नाई को लोरिक-चंदा के पीछे रवाना करता है, इस आदेश के साथ कि इनके रहने की अच्छी व्यवस्था की जाए और पता लगाया जाए कि कौन हैं, कहाँ से आए हैं, इनके हरदीपाटन आने का प्रयोजन क्या है. बाद में शिकार से लौटकर दोनों के बारे में सारी जानकारी राजा को मिलती है और राजा रूपचंद को परास्त करने वाले योद्धा को अपने यहाँ पाकर उसे प्रसन्नता होती है-

‘भले लोर तुम्ह आएह इहवां राखहु चित्त हमार I
जो किछु आहि हमारे सो फुनि जानु तुम्हार॥’
(यहाँ आकर अच्छा किए. हमारा मन रख लिया. जो कुछ भी हमारा है, उसे अब अपना ही समझो.)

यहाँ एक साल और कुछ महीने का वक्त चंदा और लोरिक के जीवन में स्थिरता का है. इसे वे आमोद-प्रमोद में गुजारते हैं-

‘लोर चांद गोवर बिसारा कीते हरदी बास
बरिस देवस अउ केतिक मासा कीन्हा भोग बेलास.’
लेकिन तब तक यह सूचना गोवर पहुंच जाती है कि घर-परिवार रिश्ते तोड़कर वे हरदीपाटन में आनंद कर रहे हैं. लोरिक की पत्नी मैनावती के लिए यह समय बहुत बुरा गुजरा है. जिस स्त्री का पति बिना किसी कारण के उसको छोड़कर किसी और स्त्री के साथ चला गया हो, कोई हाल-पता भी न भेजा हो, उसके दुख की कल्पना ही की जा सकती है.

निसि दुख मैनहि रोइ बिहाए l सभ दिन रहइ नैन पथ लाए II
मकु लोरिक एहि मारग आवइ l कइ पहिया गइ आपु जनावइ II
निसि दिन झुरवइ आस पियासी l रोवइ खिन खिन होइ निरासी II
लोर लोर कहि दिन परि आवइ l अउर बचन हिरि मुखहि न आवइ II
तपतइ आछइ रइनि बिहाई l जसि मछरी बिनु नीर मुरुझाई II
बिरह सताई मैना एहि परि दिन अउ राति l
सहि लीन्हे दुख लोरिक केरा, बिरहा कीन्ह संघाति l 23 l 339

‘रातों के दुख मैना ने रोकर काटे और दिन भर आंखों को राह पर लगाए रखा. यह सोचकर कि शायद लोरिक उस रास्ते आ जाए या किसी पथिक से अपनी जानकारी भेज दे. इस आशा में ही प्यासी रहती हुई वह रात-दिन सूखती जाती थी और हमेशा रोती हुई निराश होती जाती थी. उसके मुंह से सदा लोरिक का नाम ही निकलता था, कोई और बात मुंह पर ही नहीं आती थी. तपती हालत में उसकी रात गुजरती थी, जैसे पानी बिना मछली मुरझा जाती है. इस तरह दिन-रात मैना को विरह सताता था और विरह को संगी बनाकर ही उसने लोरिक का दुख सहन कर लिया.’

इसी समय उसको पता चलता है कि पास में व्यापारियों का सात सौ खंडों वाला एक विशाल टांडा (कारवां) ठहरा हुआ है. मैना अपनी सास खोलिन से कहती है कि कारवां के अगुआ को बुला लाएँ. अगुआ को बुलाकर खोलिन उससे पूछती है कि आप लोग क्या सामान लादे हुए हैं, आपका क्या नाम है, कहाँ के रहने वाले हैं, कहाँ जा रहे हैं. वह बताता है कि उसका नाम सुरजन है और वह गोवर का ही ब्राह्मण है. दक्षिण से बहुत सारा सामान लादकर वे हरदीपाटन में उसे बेचने जा रहे हैं. सामानों की बहुत बड़ी सूची वह गिनाता है जिसमें तरह-तरह के मसाले, मेवे, और दूसरी चीजों के नाम हैं जो दस हजार बैलों पर लदी हुई हैं. साथ में घोड़ों और अन्य पशुओं का जिक्र आता है. सास-बहू उसका गंतव्य हरदीपाटन सुनकर ही विह्वल हो जाती हैं. मैना तो सुरजन के आगे हृदय उड़ेल देती है-

सुनि पाटनु खोलिनि तसु रोवा l नैन नीर मुख बूढ़िइ धोवा II
मैना दौरि पांय लइ परी l सुरिजन बइसु कहउ एक घरी II
नाह मोर हर बारि बियाही l लइ गइ चांदा पाटन ताही II
लोरिक नाउं सुरुज कइ करा l सो लइ चांदइ पाटन धरा II
मोहि तजि सुरिजु चांद लइ भागा l दूसर समउ आइ अब लागा II
सभ दिन नैन चुवहिं अउ, सभ निसि जागत जाइ l
मोर सदेसु लोरिकहिं कहियह, एहि परि रोइ बिहाइ II 23 l 342

मैना की नजर में चंदा और लोरिक, दोनों का दोष बराबर है- ‘मुझे बचपन में ही ब्याह कर लाए पति को चांदा पाटन लेती गई और यह लोरिक, जो सूरज की कला जैसा है, चांदा को लेकर पाटन चला गया.’ वह सूरज मुझे छोड़कर चंदा को लिवा भागा और मेरा दूसरा समय (अधेड़पन) लग गया. दिन भर मेरी आंखें टपकती हैं और रातें जागकर बिताती हूँ. मेरा यह संदेश लोरिक से इसी तरह रोकर कहना. फिर संदेशे की अगली कड़ी की तरह  मैना सुरजन को एक बारहमासा सुनाती है. याद रहे, पीछे एक बारहमासा चंदा ने भी ससुराल से लौटकर सखियों को सुनाया था.

विरह का संदेसा ले जा रहे पथिक का विह्वल हो जाना चंदायन से तीन सौ साल पहले लिखे गए अद्दहमाण के ‘सन्नेहरासअ’ (अब्दुल रहमान कृत संदेशरासक) और अन्य मध्यकालीन काव्यों में भी दिखता है लेकिन मैना और खोलिन की बातें सुनकर सुरजन का हाल इतना बुरा हो जाता है कि उसका प्रभाव गोवर से हरदीपाटन तक के रास्ते पर भी दिखाई पड़ने लगता है. पहले इस कारवां के व्यापारी उससे इस गहन दुख का कारण पूछते हैं, फिर जहाँ-जहाँ से वे गुजरते हैं, वहाँ की हरियाली सुरजन की व्यथा से काली पड़ने लगती है. चार महीने चलकर ये लोग हरदीपाटन पहुंचते हैं. व्यापारी वहाँ जाकर व्यापार में जुटते हैं लेकिन सुरजन लोरिक से मिलने का उपाय करता है.

कोई बड़े ज्योतिषी शहर में आए हुए हैं, यह बात लोरिक तक किसी के जरिये पहुंचाई जाती है. ज्योतिषी की बताई हुई बातों से लोरिक प्रभावित होता है. फिर बातों को बहुत घुमा-फिराकर सुरजन एक दोहा लोरिक से बोलता है-

राजपाट तुम्ह गोवरा आहे, मैना केर गोसाइं l
चांदा गगनि चढ़ाएहु, मैना धरती काइ II

यह सुनकर लोरिक चौंक पड़ता है कि मैना का नाम इसको कैसे पता है और चांदा के बारे में जानकारी इसको कहाँ से मिली. वह कहता है, ब्राह्मण तुम परदेसी नहीं हो, अपने ही देश के लग रहे हो, सच-सच बताओ, तुम्हें किसने भेजा है. जवाब में सुरजन अपना वास्तविक परिचय देता है, फिर गोवर का, लोरिक के घर का, मैना, खोलिन और कुअंरू का सारा किस्सा कह सुनाता है. लोरिक के लिए यह कोई भूली हुई कहानी याद आ जाने जैसा है. वह सुरजन की बड़ी अभ्यर्थना करता है और अगले ही दिन उसके साथ हरदीपाटन से गोवर निकल चलने की बात कहता है. घर आकर उतने ही उत्साह से चंदा को गोवर का सारा हाल सुनाकर उससे घर लौट चलने की तैयारी करने को कहता है तो खुश होना तो दूर, वह अन्न-पानी ही छोड़कर बैठ जाती है.

अगले दिन हरदीपाटन के राजा ने लोरिक को बुलाया. लोरिक ने बताया कि एक बनजारे से घर का हाल बुरा होने की बात पता चली है, तुरंत गोवर के लिए रवाना होना पड़ेगा. राजा ने लोरिक को सुरक्षित घर पहुंचाने के लिए दो सौ सैनिक उसके साथ कर दिए और चंदा के साथ इज्जत से उसे विदा किया. रास्ते में लोरिक और चांदा के बीच एक तकलीफदेह बातचीत हुई. चंदा ने कहा, उनका गोवर लौटना समुद्र का पानी उलटा बहकर गंगा में जाने जैसा है. फिर निवेदन किया कि वापस हरदीपाटन ही चलते हैं, दो-चार साल वहीं और बिताएँगे. जवाब में लोरिक टूट कर कहता है कि ऐ राजा की बेटी, अपनी इच्छा से ही तुम मुझसे रमण करती हो, आगे भी तुम्हारी इच्छा. ‘मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि में से किसी को पकड़ लो. या तो मुझ सूर्य को ले लो या बारह घरों (राशियों) में उतराओ.’

मंगरु बुद्धु बिरस्पति, सुकुरु सनीचरु काहु l
चांद सुरुज लइ अथवा, बारह घर उतिराहु II

इसके बाद कहने को क्या बचता है? बीस दिन का सफर तय करके लोरिक अपने राज्य की सीमा पर उतरता है तो बीस कोस दूर गोवर शहर तक हल्ला पहुंच जाता है कि कोई शक्तिशाली राजा नदी पार करके हमला करने चढ़ा चला आ रहा है. इधर मैना ने बहुत समय बाद रात में सुख का सपना देखा. आसपास की सारी महिलाएँ आक्रमण की चिंता में थीं लेकिन मैना प्रसन्न थी. तभी लोरिक का भेजा हुआ माली घर-घर जाकर फूल बांटने लगा. मैना ने माली से अपने दुख बताते हुए फूल लेने से मना कर दिया लेकिन उन फूलों में जब उसे लोरिक जैसी सुगंध आई तो रख लिए. माली ने कहा, तुम लोग अपना दूध-दही लेकर मेरे मालिक को बेचने आओ तो तुम्हारी अच्छी बिक्री होगी.

अगली सुबह पड़ोस की दस और औरतों को लेकर मैना लोरिक के खेमे में दूध-दही बेचने जाती है तो वहाँ सारा सामान बिक जाता है और मैना को उसके सामान के दस गुने पैसे मिलते हैं. लोरिक के कहे पर उसके साथ आई सभी स्त्रियों को चंदन लगाया जाता है और सिंदूर पहनाया जाता है. मैना इससे साफ मना कर देती है. यह कहते हुए कि उसका पति तो अभी चंदा के साथ हरदीपाटन में रह रहा है, ऐसे में वह मांग में सिंदूर कैसे भरा सकती है.

संक्षेप में यह कि थोड़ी देर में मामला खुल जाने के बाद चंदा और मैना के बीच एक बार फिर मंदिर जैसा ही युद्ध छिड़ जाने को है कि तभी लोरिक के दखल से झगड़ा शांत होता है और मैना वह रात लोरिक के साथ ही बिताकर घर लौटती है. बीच में एक सुंदर दोहा आता है-

‘चेरिनि सात पाँच कहि बोलिसि मैनहि जाउ संवारि
आज राति मैनइ घर जाऊं ओहिकी है अब बारि.’

इधर खोलिन को खबर मिलती है कि उनकी बहू रात बिताने के लिए किसी गैर मर्द के साथ रुक गई है तो वह जाकर गुरु अजयी को यह सूचना देती है. पूरे किस्से में हम पहली बार अजयी को घोड़े पर सवार होकर तलवार लिए युद्ध के लिए जाते देख रहे हैं. उनके खड्ग के झटके से लोरिक का शिरस्त्राण टूट जाता है तो लोरिक तुरंत पहचान में आ जाता है और अजयी घोड़े से उतरकर उसे अपनी बांहों में भर लेते हैं.

वहाँ से अजयी अपने शिष्य और उसकी दोनों पत्नियों को लिवाकर घर पहुंचते हैं, खोलिन से मिलवाते हैं. खोलिन दोनों बहुओं को लिवाकर घर जाती हैं, उनका सिंगार करती हैं, खाना खिलाती हैं और कोठे पर उनकी सेज लगवाती हैं. अगला दोहा वैसा ही है जैसा किस्सा खत्म होने पर आता है. हजारों साल राजा और रानी के खुशी-खुशी राज करने का. लेकिन दुखों का सागर जल्द ही फिर से उमड़ने लगता है. पहले वह दोहा-

चांद सुरुज अउ मैना, बरिस सहस भा राजु l
गावहु गीत सहेलिया, गोवर बधावा आजु II

फिर लोरिक अपनी मां से भाई कुंअरू के बारे में पूछता है और उसे एक बहुत तकलीफदेह कहानी सुनने को मिलती है. खोलिन बताती है कि ‘तुम्हारे जाने के बाद बावन यहाँ आया और बैना-मैना को घर से निकालकर ले जाने लगा. (बैना कौन है, किस्से में इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती.) तब मैं अजयी के पास गई और बावन से युद्ध करके उन्होंने बैना-मैना को छुड़ाया. तब महर (राजा सहदेव) ने माकर के पास संदेश भेजवाया कि जाकर लोरिक की गाएँ लूट लो, अकेला कुंअरू तुम्हारे सामने क्या है. (माकर कौन है, इस बारे में भी हम कुछ नहीं जानते.) माकर बड़े कटक के साथ था, कुंअरू क्या कर सकते थे. वह शिकायत के लिए राजा के पास जा रहे थे तभी कुटिल माकर ने उन्हें मरवा दिया. जिस नाई ने राजा को कुंअरू के मारे जाने की सूचना दी, राजा ने उसे नए वस्त्र पहनाए.’

चंदायन की किसी भी पांडुलिपि में यहाँ से आगे कुछ नहीं मिलता. डॉ. माताप्रसाद गुप्त के यहाँ अंतिम कड़वक की क्रम संख्या 393 और डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त के यहाँ 452 है. लेकिन दोनों संपादकों का मानना है कि किताब का यह स्वाभाविक अंत नहीं है, लिहाजा इससे आगे भी यह गई होगी. लोककथा चनैनी में यह किस्सा दो-तीन प्रकरण और आगे बढ़ता है लेकिन चंदायन के दोनों संपादक निष्कर्ष निकालते हैं कि किताब में कम से कम 18 या 20 कड़वक इसके आगे होने चाहिए. किस्सा पूरा करने के लिए इतर स्रोतों से प्रचुर सामग्री हमारे पास है. उसपर हम आगे बात करेंगे. लेकिन चंदायन को अभी  इतने तक ही सीमित मान लेने के सिवा कोई चारा हमारे पास नहीं है.

 

14.
चनैनी में लोरिक का अंत

मैंने अपने बचपन में जितनी चनैनी सुनी है उसमें मृत्यु के करीब ले जाने वाले हर मौके पर देवी दुर्गा लोरिक को बचा लेती हैं और अगर कभी उसकी मृत्यु भी हो जाए तो वापस जिला लेती हैं. लगता है, यह चरित्र कभी मरेगा ही नहीं. लेकिन श्याम मनोहर पांडेय द्वारा चनैनी लोकगायकों से बातचीत के आधार पर जुटाई गई सभी कहानियों में लोरिक मरता है. इतना ही नहीं, उनमें लोरिक के पापों के ब्यौरे आते हैं. अपनी ब्याहता पत्नी मंजरी (या मैना) के प्रति ही नहीं, किसी भी जीवनसंगिनी के प्रति वह कभी वफादार नहीं रहा. गर्भवती स्त्रियों की हत्या की. हरदीपाटन (या हल्दी) के जिस राजा ने शरण दी, उसका राज हड़प लिया और उसकी सारी संपत्ति लादकर अपने घर लेता आया.

कहानी के अंतिम हिस्से में परिवार की गायें लूटकर ले गए कोलों (विंध्य क्षेत्र के कोल आदिवासियों) को हराने का काम लोरिक का बेटा भोरिक करता है. इस लड़ाई में अपनी मुख्य भूमिका न देखकर लोरिक अपनी ताकत नापने के लिए दूध से भरे दो घड़े लेकर एक पेड़ से कूदता है. यह कहकर कि अब भी अगर उसमें कुछ दम हुआ तो जमीन पर पहुंचने के बाद दूध हिलेगा भी नहीं. लेकिन दूध छलक जाता है और लोरिक मान लेता है कि उसमें अब ताकत नहीं बची. एक कहानी में उसी समय वह चिता बनाता है और उसमें जलकर मर जाता है. दूसरी में बनारस जाता है और वहाँ गंगा किनारे करसी सीझ जाता है. यानी जलते उपलों के बीच बैठकर बैगन की तरह पक जाता है.

श्याम मनोहर पांडेय जी का यह काम अद्भुत है. इलाहाबाद, मिर्जापुर, बलिया, बनारस, पटना और कई जगहों के मशहूर लोरिकी गाने वालों से बात करके उन्होंने पूरी-पूरी चनैनी के दसियों संस्करण रिकॉर्ड किए, और उन्हें संपादित करके स्तरीय किताबों की शक्ल दी. इन सबमें कथाएँ थोड़ी-थोड़ी अलग हैं. कथा का कोई प्रकरण किसी के यहाँ लंबा है, किसी के यहाँ छोटा. कम महत्वपूर्ण चरित्रों और जगहों के नाम भी जहाँ-तहाँ बदल जाते हैं. हर जगह गायक का कहानी के साथ आत्मीय लगाव है और जगहों की पहचान वह अपने दस-बीस मील के दायरे में ही करता है. एक खास बात यह कि चनैनी के सारे गायक यादव हैं. सिर्फ एक ददई केवट उनमें गैर-यादव हैं, हालांकि उनके गुरु का नाम भी ददई यादव था. यानी लोरिकी-चनैनी की एक पहचान क्षेत्रीय-जातीय गौरव गाथा की भी है.

मुल्ला दाऊद का चंदायन यहीं लोरिकी-चनैनी से अलग होता है, और फिर अलगाव के बिंदु इतने ज्यादा होते जाते हैं कि एक स्तर पर लोककथा और महाकाव्य के बीच नाममात्र का ही रिश्ता रह जाता है. तुलना करके देखें तो चनैनी हर गायक के हिसाब से बदलती चलती है, लिहाजा उसमें देश-काल की कोई पक्की छाप खोजना व्यर्थ है. लेकिन चंदायन एक ही बार में लिखा जा चुका है, सो उसमें जो कुछ भी है वह हमेशा के लिए और हर जगह के लिए है.

एक आखिरी बात यह कि बर्मा का अराकान प्रांत, जहाँ के रहने वाले रोहिंगिया आज स्थायी उजाड़े के शिकार होकर अभी खामखा भारत भर में खलनायक बने फिर रहे हैं, वहाँ के सुल्तान ने सत्रहवीं सदी ईसवी में चंदायन की कहानी को फारसी अनुवाद से उठाकर अपनी भाषा में नए सिरे से पेश करने का हुकुम अपने राजकवि को दिया. जो शीर्षक राजकवि ने इस कहानी को दिया, उसे हिंदी में ‘सती-मैना’ कहा जा सकता है. यानी मुल्ला दाऊद ने भले अपना प्रेमाख्यान लोरिक की प्रेमिका चंदा के इर्दगिर्द गढ़ा हो, बर्मा में इसे पत्नी मैनावती के ही इर्दगिर्द पढ़ा गया!

इस ग्रंथ को लिखने के क्रम में ही अराकान के उस राजकवि की मृत्यु हो गई तो उसकी जगह लेने वाले दूसरे कवि ने उतने ही मनोयोग से उसे पूरा किया. दोहरा दें कि लोककथा में लोरिक की ब्याहता पत्नी का नाम मंजरी या मँजरी है, जबकि मुल्ला दाऊद के यहाँ शुरू से अंत तक वह ‘मैना’ ही रहती है. जाहिर है, हिंदी हार्टलैंड से इस किस्से का अराकान पहुंचना चनैनी नहीं, चंदायन के जरिये ही संभव हुआ है.

एक वीरगाथा को स्थानीयता और जातीय गौरव के आग्रहों से बाहर निकालकर उसे कहीं भी खड़ा होने लायक बना देना एक महाकवि के कौशल की मांग करता है.

____________________________

चंद्रभूषण
(
जन्म: 18 मई 1964)

‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ (यात्रा-राजनय-इतिहास) और ‘पच्छूं का घर’ (संस्मरणात्मक उपन्यास) से पहले दो कविता संग्रह ‘इतनी रात गए’ और ‘आता रहूँगा तुम्हारे पास’ प्रकाशित. इक्कीसवीं सदी में विज्ञान का ढांचा निर्धारित करने वाली खोजों पर केंद्रित किताब ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियाँ’, पर्यावरण चिंताओं को संबोधित किताब ‘कैसे जाएगा धरती का बुखार’, भारत से बौद्ध धर्म की विदाई से जुड़ी ऐतिहासिक जटिलताओं को लेकर ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’, ‘बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष’आदि  पुस्तकें प्रकाशित.

patrakarcb@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखचंदायनचंदायन : एक और अधूरी किताबचंद्रभूषण
ShareTweetSend
Previous Post

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

Related Posts

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ
कविता

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

प्रभात की नई कविताएँ
कविता

प्रभात की नई कविताएँ

इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज
फ़िल्म

इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक