| लोकतंत्र, जनता और राज्य की कसौटी पर गणराज्य
कुँवर प्रांजल सिंह |
रंजीत गुहा को समर्पित पार्थ चटर्जी की किताब फॉर द जस्ट रिपब्लिक समकालीन भारतीय राजनीति और राष्ट्र–राज्य की वैचारिक संरचना पर एक गहरी और असहज करने वाली बहस प्रस्तुत करती है. यह किताब उस लंबे समय से स्वीकृत मान्यता को चुनौती देती है जिसमें राज्य, राष्ट्र और जनता को लगभग समानार्थी मान लिया गया है. चटर्जी स्पष्ट करते हैं कि राज्य और राष्ट्र का यह घालमेल केवल सैद्धांतिक त्रुटि नहीं, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक समस्या है, जिसका प्रभाव भारतीय लोकतंत्र, संघवाद और सामाजिक न्याय पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं.
वे दिखाते हैं कि अंग्रेज़ी में लिखे गए प्रचलित अकादमिक इतिहास भारतीय राष्ट्र को एक केंद्रीकृत राष्ट्र–राज्य की कथा तक सीमित कर देते हैं, जबकि जनता के रूप में राष्ट्र की कल्पना क्षेत्रीय भाषाओं, स्थानीय सांस्कृतिक अनुभवों और सामाजिक संघर्षों में बिखरी हुई है. इसी संदर्भ में यह किताब “विविधता में एकता” और बहुलतावादी धर्मनिरपेक्षता जैसे स्थापित सूत्रों की वैचारिक खोखलाहट को उजागर करती है. चटर्जी का तर्क है कि भाजपा के नेतृत्व में वर्तमान शासन ने केंद्रीकृत सत्ता के माध्यम से राष्ट्र की एक संकीर्ण, बहुसंख्यकवादी और सांस्कृतिक रूप से एकरूपीय कल्पना को पूरे समाज पर आरोपित करने का प्रयास किया है.
यह किताब केवल इस परियोजना की आलोचना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके बरक्स एक वैकल्पिक राजनीतिक कल्पना भी प्रस्तुत करती है. ऐसी संघीय राजनीति की कल्पना जो जनता की समान भागीदारी, क्षेत्रीय संस्कृतियों की स्वायत्तता और गठबंधन-आधारित शासन को भारत के लिए अधिक न्यायपूर्ण और व्यवहारिक भविष्य मानती है. कुल मिलाकर, किताब राष्ट्र, जनता और लोकतंत्र के नाम पर गढ़े गए वैचारिक दावों और शासन की वास्तविक कार्रवाइयों के बीच मौजूद विसंगतियों के विरुद्ध एक स्वतंत्र ज्ञानमीमांसा प्रस्तुत करती है. यह कोई सरल या एक रैखिक पाठ नहीं है. लेखक निष्कर्षों की जल्दबाज़ी के बजाय विचारों के उस विस्तृत भूगोल पर ध्यान केंद्रित करता है जहाँ लोकतंत्र के दावे और उसकी प्रथाएँ एक-दूसरे से टकराती हैं. इन टकरावों को चार मूलभूत विरोधाभासों के रूप में समझा जा सकता हैं.
पहला विरोधाभास
उदारवादी वादे और सत्तात्मक यथार्थ
भारतीय लोकतंत्र को यदि उदारवादी द्वंद्व के फ्रेम में देखा जाए जो इस किताब का केंद्रीय दावा है, तो इसकी अंतर्विरोधी संरचना अधिक स्पष्ट होती है. एक ओर विधिक-संवैधानिक उदारवाद के सार्वभौमिक आदर्श हैं जो क़ानून के समक्ष समानता, नागरिक अधिकार और संस्थागत तटस्थता के साथ गुथे हुए है; दूसरी ओर, सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ, जनसंख्या-प्रबंधन और सत्ता की व्यावहारिक रणनीतियाँ है. चटर्जी के अनुसार, आपातकाल के बाद उदारवादी गवर्नमेंटैलिटी का जो नया चरण उभरा, वह इसी द्वंद्व का परिणाम था. जहाँ शासक वर्गों ने यह समझ लिया कि न तो शुद्ध दमन से शासन संभव है और न ही कल्याणकारी नीतियों को बिना सहमति के लागू किया जा सकता है. इस संदर्भ में उदारवाद स्वतंत्र नागरिक की स्वायत्तता का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन की भौतिक परिस्थितियों को नियंत्रित करने वाली एक शासन-तकनीक के रूप में उभरती है, जिसमें सहमति स्वयं एक रणनीतिक संसाधन बन जाती है.
1990 के दशक के बाद यह द्वंद्व और स्पष्ट होता है, जब चटर्जी फ़ूको द्वारा विश्लेषित नवउदारवादी तर्क के माध्यम से भारतीय शासन-तंत्र का आकलन करते हैं. वे दिखाते हैं कि राज्य का बाज़ार से पीछे हटना केवल दिखावटी है; वास्तव में वह अपने हस्तक्षेप के तरीकों को पुनर्गठित करता है; कभी बाज़ार के माध्यम से, कभी लक्षित योजनाओं और ‘लाभार्थी जनसंख्या’ के निर्माण के ज़रिये. भारतीय संदर्भ में इसका एक चिंताजनक पक्ष यह है कि सरकारी लाभों को संवैधानिक अधिकार की बजाय सत्ता द्वारा दिए गए ‘एहसान’ के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. इसका परिणाम यह होता है कि नागरिक स्वयं को अधिकार-संपन्न नागरिक के बजाय एक फरियादी के रूप में देखने लगता हैं
दूसरा विरोधाभास
अवैध जीवन और वैध शासन
यह विरोधाभास राजनीतिक समाज की रोज़मर्रा की राजनीति से उपजता है. जहाँ अतिक्रमणकारी, अनौपचारिक मज़दूर और झुग्गीवासी क़ानून-पालक नागरिक की तरह नहीं बल्कि मात्र जनसमूह के रूप में पहचाने जाते हैं. वे अपने अपराध को नकारते नहीं, बल्कि उसे जीवन की अनिवार्यता के रूप में वैध ठहराते हैं. उदारवादी राज्य न तो इस स्थिति को पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न ही अस्वीकार; इसलिए वह ‘अपवाद के क्षेत्र’ का निर्माण करता है, जहाँ अवैध जीवन को प्रबंधित तो किया जाता है, लेकिन मान्यता नहीं दी जाती. इसलिए राजनीतिक समाज की यह राजनीति किसी वास्तविक लोकतांत्रिक परिवर्तन तक नहीं पहुँच पाती. उदारवादी गवर्नमेंटैलिटी प्रतिरोध को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है और उसे सीमित, तात्कालिक तथा लेन-देन आधारित बना देती है. संघर्ष अधिकारों के विस्तार की बजाय लाभों के वितरण तक सिमट जाता है. हालाँकि इस पक्ष पर किताब का दावा है कि यह व्यवस्था किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है. यूपीए शासन के दौरान भी, अधिकार–आधारित क़ानूनों और सामाजिक व्यय के बावजूद, उदारीकरण की परियोजना निर्बाध रूप से आगे बढ़ती रही. राज्य एक साथ कल्याणकारी भी बना रहता है और बाज़ार–परस्त भी. लेकिन जैसे ही वैश्विक पूँजी संकट गहराता है, यही सहमति टूटने लगती है और ‘सुधारों’ को और आक्रामक बनाने की माँग उठती है.
मोदी के उदय के साथ यह द्वंद्व एक नए रूप में सामने आता है. प्रारंभिक चरण में ‘सबका नेता’ की छवि धीरे-धीरे एक संप्रभु, लगभग राजसी सत्ता-छवि में बदल जाती है, जहाँ वैधता का स्रोत जनता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक और मिथकीय इतिहास बन जाते हैं. इस बिंदु पर लोकतंत्र शासन की तकनीक तक सिमट जाता है, जबकि सत्ता की वैधता लोकतांत्रिक सहमति से हटकर सांस्कृतिक प्रभुत्व पर टिकने लगती है.
तीसरा विरोधाभास
न्याय, स्वतंत्रता और समानता की सार्वभौमिकता
भारत में न्याय की स्थिति पर चटर्जी के बारह प्रतिपादनों से यह स्पष्ट होता है कि संकट केवल न्याय की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक संरचना का है. भारतीय राज्य न्याय को एक सार्वभौमिक और अमूर्त आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन गहरे विषम समाज में यह अमूर्त सार्वभौमिकता स्वयं अन्याय को जन्म देती है. जाति, धर्म, भाषा, लिंग और वर्ग से विभाजित समाज में “एक समान न्याय” की अवधारणा ऐतिहासिक असमानताओं को अदृश्य कर देती है. न्याय को संदर्भगत और व्यवहारिक रूप में न समझ पाने के कारण शासन की भाषा सामान्यीकरण की तकनीकों पर निर्भर हो जाती है. गरीबी रेखा, पात्रता सूचियाँ और लक्षित योजनाएँ न्याय के औज़ार कम और प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम अधिक बन जाते हैं. इसके साथ ही अपवाद का शासन भारतीय न्याय-प्रणाली का स्थायी तर्क बन चुका है, जहाँ न्याय अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की सहनशीलता और कृपा के रूप में अनुभव किया जाता है.
स्वतंत्रता और समानता जैसे अधिकार व्यवहार में संपत्ति, पूँजी और समुदाय द्वारा मध्यस्थित होते हैं, जिससे न्याय का प्रश्न अंततः नियंत्रण और संप्रभुता के प्रश्न में बदल जाता है. किताब में शामिल किए गए कश्मीर, आदिवासी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत के उदाहरणों इस बदलाव के गवाह है.
इन्हीं विमर्शों की पृष्ठभूमि में पार्थ चटर्जी ने न्याय की अवधारणा के एक ऐसे निर्णायक सैद्धांतिक आयाम की ओर ध्यान खींचते हैं, जो इस किताब के शीर्षक को केवल एक नैतिक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक कठोर बौद्धिक चुनौती में बदल देता है. इस क्रम में वे अंबेडकर के सिद्धांत की आलोचनात्मक जाँच करते हुए यह रेखांकित करते हैं कि भारतीय गणराज्य में न्याय की कल्पना को समझने के लिए अंबेडकर का विचार-संसार आज भी अपरिहार्य है, लेकिन उसी के भीतर कुछ ऐसी सैद्धांतिक रिक्तियाँ भी मौजूद हैं, जिनसे मुठभेड़ किए बिना “जस्ट रिपब्लिक” की परिकल्पना अधूरी रह जाती है. पार्थ का केंद्रीय हस्तक्षेप यह है कि अंबेडकर का सिद्धांत, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा के प्रश्न पर जितना सशक्त और मौलिक है, उतना ही वह अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर मौजूद असमानताओं और पदानुक्रमों के सवाल पर अपेक्षाकृत मौन दिखाई देता है.
असमानता का एक स्पष्ट रूप संपत्ति के स्वामित्व, संपदा के संकेन्द्रण और आय के असमान वितरण में निहित है. ऐसा नहीं है कि अंबेडकर इस समस्या से अनजान थे; राजनीतिक लोकतंत्र को निरर्थक ठहराने वाली इस आर्थिक असमानता को वे समानता की स्थापना में एक मूलभूत बाधा मानते थे और इसी कारण उन्होंने आर्थिक लोकतंत्र की ज़ोरदार वकालत की. किंतु जैसा कि पार्थ संकेत करते हैं, अंबेडकर का विवेचन इस बिंदु पर न तो पर्याप्त सैद्धांतिक विस्तार हासिल कर पाता है और न ही ऐसे ठोस वैचारिक औज़ार उपलब्ध कराता है, जिनके सहारे इन आंतरिक असमानताओं का समाधान सोचा जा सके.
चौथा विरोधाभास
स्त्री प्रश्न और आंतरिक असमानताएँ
इससे भी गहरे स्तर पर, चटर्जी पितृसत्ता द्वारा निर्मित उस संरचनात्मक असमानता की ओर ध्यान दिलाते हैं, जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों को भीतर से ग्रसित करती है. चटर्जी यहाँ अंबेडकर के सिद्धांत की एक रचनात्मक पुनर्व्याख्या का प्रस्ताव रखते हैं. यदि महिलाएँ स्वयं को पितृसत्तात्मक उत्पीड़न से ग्रस्त एक राजनीतिक समूह के रूप में संगठित करें, तो वे भी अल्पसंख्यक के रूप में विशेष प्रतिनिधित्व और संवैधानिक संरक्षण की माँग कर सकती हैं. किंतु यह तर्क नई जटिलताएँ भी पैदा करता है क्योंकि जाति, वर्ग और क्षेत्र के विभाजन स्त्री अनुभव को भी विभाजित करते हैं. यहीं समीक्षित किताब का सैद्धांतिक महत्व स्पष्ट होता है.
चटर्जी न तो अंबेडकर को अस्वीकार करते हैं और न ही उन्हें अंतिम सत्य मानते हैं. वे उनके विचारों को एक जीवित परंपरा के रूप में पढ़ते हैं, जिसे आंतरिक असमानताओं, पितृसत्ता और बहुस्तरीय दमन के संदर्भ में आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है. “जस्ट रिपब्लिक” की परिकल्पना इसी अधूरेपन से संवाद करते हुए ही संभव हो सकती है.
अंदाज़-ए-बयाँ …..
अब तक हमने इस किताब की सैद्धांतिक बनावट और प्रचलित सिद्धांतों के प्रति लेखक के रुख़ का एक समग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया है. जहाँ हम एक हद तक इसके मूल तर्क और वैचारिक संरचना से परिचित हो चुके हैं, तो इसकी कुछ अंतर्दृष्टियों, मान्यताओं और प्रमुख बिंदुओं पर अलग से विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है.
किताब भारतीय लोकतंत्र की वैचारिक संरचना पर एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक हस्तक्षेप प्रस्तुत करती है, किंतु इसकी सैद्धांतिक तीक्ष्णता के साथ कुछ सीमाएँ भी जुड़ी हुई हैं. सबसे पहली सीमा किताब की पद्धति से जुड़ी है. चटर्जी व्यापक वैचारिक ढाँचा तो प्रस्तुत करते हैं, लेकिन कई निर्णायक स्थलों पर अनुभवजन्य उदाहरणों की अनुपस्थिति उनके तर्कों को अपेक्षाकृत अमूर्त बना देती है. विशेष रूप से नवउदारवादी शासन-तंत्र, ‘लाभार्थी जनसंख्या’ और राज्य के परिवर्तित हस्तक्षेप के संदर्भ में तर्क अधिक ठोस हो सकता था, यदि इन्हें विशिष्ट नीतियों, कार्यक्रमों या क्षेत्रीय अध्ययनों से जोड़ा जाता.
दूसरी महत्वपूर्ण सीमा यह है कि राजनीतिक समाज की अवधारणा जो चटर्जी के विचार का केंद्रीय स्तंभ रही है, इस किताब में एक प्रकार की स्थिर श्रेणी के रूप में सामने आती है. राजनीतिक समाज के भीतर मौजूद आंतरिक अंतर्विरोध, मसलन जातिगत, लैंगिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विभाजन का विश्लेषण अपेक्षाकृत सीमित रह जाता है. परिणामस्वरूप, राजनीतिक समाज कभी-कभी एक एकरूप इकाई की तरह दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता में वह गहरे असमान और परस्पर टकराते हितों से बना हुआ है. इसी से जुड़ा एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या चटर्जी की उदारवादी द्वंद्व की संकल्पना प्रतिरोध की संभावनाओं को कुछ हद तक कम करके देखती है? जहाँ वे यह दिखाते हैं कि उदारवादी गवर्नमेंटैलिटी प्रतिरोध को अपने भीतर समाहित कर लेती है, वहीं यह प्रश्न खुला रह जाता है कि क्या सभी प्रकार के प्रतिरोध अनिवार्य रूप से उसी शासन-तर्क में विलीन हो जाते हैं? समकालीन आंदोलनों विशेषकर स्त्रीवादी, आदिवासी और पर्यावरणीय संघर्षों में उभर रही वैकल्पिक राजनीतिक भाषाओं को किताब अपेक्षाकृत कम स्थान देती है.
अंबेडकर के सिद्धांत पर चटर्जी की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या किताब का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है, लेकिन यहाँ भी कुछ सीमाएँ दिखाई देती हैं. अंबेडकर के विचार में आंतरिक असमानताओं और आर्थिक लोकतंत्र की अपर्याप्त सैद्धांतिक विस्तार की ओर संकेत करते हुए चटर्जी स्वयं उस रिक्तता को भरने के लिए कोई स्पष्ट वैकल्पिक ढाँचा प्रस्तुत नहीं करते. “जस्ट रिपब्लिक” की परिकल्पना एक बौद्धिक चुनौती के रूप में तो उभरती है, लेकिन वह किसी ठोस राजनीतिक परियोजना या संस्थागत खाके में रूपांतरित होती नहीं दिखती. स्त्री प्रश्न के संदर्भ में भी किताब एक महत्त्वपूर्ण संभावना खोलती है, किंतु उस संभावना के व्यावहारिक निहितार्थों पर विस्तार से विचार नहीं करती. यदि महिलाओं को एक अल्पसंख्यक राजनीतिक समूह के रूप में देखा जाए, तो प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और निर्णय-प्रक्रिया के प्रश्न किस रूप में सामने आएँगे, इन सवालों पर किताब अपेक्षाकृत मौन रहती है.
इन सीमाओं के बावजूद, समीक्षित इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह भारतीय लोकतंत्र को किसी स्थिर संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत अस्थिर और संघर्षशील प्रक्रिया के रूप में समझने का आग्रह करती है. यह किताब समाधान देने से अधिक प्रश्न खड़े करती है और यही इसकी बौद्धिक ईमानदारी और शक्ति दोनों है. चटर्जी हमें यह सोचने के लिए बाध्य करते हैं कि न्यायपूर्ण गणराज्य कोई पहले से तय गंतव्य नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संघर्षों, असहमति और वैचारिक पुनर्विचार की निरंतर प्रक्रिया है.
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और
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| कुँवर प्रांजल सिंह सहायक प्रोफ़ेसर (राजनीति विज्ञान विभाग ) दिल्ली विश्वविद्यालय पार्थ चटर्जी की अनूदित पुस्तक ‘शासितों की राजनीति’ प्रकाशित. pranjal695@gmail.com |




पुस्तक की समीक्षा भाषा स्तरीय है। ऐसा देखने को कम ही मिलता है। अवधारणाओं को बेहद स्पष्ट ढंग से रखा है प्रांजल जी ने। ब्यौरों को भी दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यह किताब सच में समाज विज्ञान और साहित्य में रुचि लेने वालों के लिए उपयोगी है।
Behatarin lekh ke liye badhai
सारगर्भित समीक्षा के लिए लेखक को बधाई , समीक्षक ने एक गंभीर किताब की सहज समीक्षा कर के शोधार्थी और विधार्थी को किताब को समझने में जो सुविधा प्रदान की है उसके लिए लेखक का साधुवाद ।
बहुत मूल्यवान और विचारप्रखर समीक्षा. किन्तु पश्री चटर्जी ने जो सवाल उठाए हैं, वे अपने प्रस्थान में ही हमें आन्दोलित करते हैंं.
आपको बधाई.