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समालोचन

Home » क्या है झोला पुस्तकालय आंदोलन? अजय कुमार

क्या है झोला पुस्तकालय आंदोलन? अजय कुमार

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल राजनीतिक मुक्ति का अभियान नहीं था; वह भारतीय समाज की आत्मा को पुनर्गठित करने का भी एक विराट प्रयत्न था. औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के समानांतर एक और संघर्ष चल रहा था- सामाजिक न्याय, तर्कशीलता और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का. इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में अम्बेडकरवाद एक निर्णायक वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में उभरता है. उसने न केवल दलित समुदाय को आत्मसम्मान का बोध कराया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की बौद्धिक आधारभूमि को भी गहराई से प्रभावित किया. उसका प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं से परे, अखिल भारतीय था. इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में विविध भारतीय भाषाओं के लेखकों और चिंतकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. हिंदी क्षेत्र में बुद्ध शरण हंस का नाम विशेष उल्लेखनीय है. वे केवल एक लेखक या कार्यकर्ता भर नहीं थे; वे विचार को जन-जीवन की ठोस जमीन पर उतारने वाले कर्मशील बौद्धिक थे. उनका झोला पुस्तकालय प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी था. पुस्तक को संस्थान से निकालकर जन के हाथों तक पहुँचाने का प्रयास. उन्होंने अम्बेडकरवादी चिंतन को बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक प्रसार की ठोस रणनीति से जोड़ा. उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि विचार तभी जीवित रहता है जब वह लोगों के बीच संप्रेषित होता है, प्रश्न पैदा करता है और संवाद को जन्म देता है. अजय कुमार का यह लेख इसी आंदोलन और बुद्ध शरण हंस के योगदान का विश्लेषण करता है. प्रस्तुत है.

by arun dev
February 12, 2026
in समाज
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क्या है झोला पुस्तकालय आंदोलन? अजय कुमार
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झोला पुस्तकालय आंदोलन और बुद्ध शरण हंस की दलित पत्रकारिता

अजय कुमार

पत्रकारिता केवल समाचार प्रसारण का माध्यम नहीं यह सामाजिक चेतना, सत्ता को सचेत करने के लिए विरोध और निष्पक्षता के मूल्यों का संरक्षक भी है. अंबेडकरवादी पत्रकारिता एक वैचारिक पत्रकारिता है जो जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक असमानता और दलित-बहुजन उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाती है. इसी परंपरा के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक हैं बुद्ध शरण हंस.

बिहार के गया जिले में स्थित वजीरगंज अंचल के ग्राम तिलोरा में 8 अप्रैल 1942 को जन्में बुद्ध शरण हंस बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे है. बाद में वह भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रोन्नति प्राप्तकर सेवानिवृत हुए. सेवानिवृत के बाद वर्ष 2001 से हाईकोर्ट पटना में अधिवक्ता के पेशे में कार्यरत रहे. प्रारंभ में उनका नाम दलित प्रसाद था. कुछ लोगों के अनुसार उन्होंने अपना नाम दलित पासवान भी रखा था पर बाद में उन्होंने अपने जीवन के उद्देश्य और धर्मांतरण के पश्चात बुद्ध शरण हंस नाम अपनाया. शिक्षा में उच्च अध्ययन के दौरान उन्होंने अंबेडकर के विचारों का अध्ययन किया, विशेष रूप से जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और धर्मांतरण तथा धार्मिक आलोचना जैसे विषयों पर. यहीं से उनकी पत्रकारिता और वैचारिक सक्रियता आरंभ हुई. बुद्ध शरण हंस बिहार में अंबेडकरवादी पत्रकारिता के उन महत्त्वपूर्ण स्तम्भों में गिने जाते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को केवल सूचना-प्रेषण का माध्यम न मानकर सामाजिक न्याय, दलित अस्मिता और लोकतांत्रिक चेतना के सशक्त औज़ार के रूप में विकसित किया. उनका लेखन और संपादकीय दृष्टि डॉ.भीमराव अंबेडकर के विचार शिक्षा, संगठन और संघर्ष की वैचारिक परम्परा से गहराई से जुड़ी रही. 84 वर्ष की आयु में उनका परिनिर्वाण पटना में दिनांक 22 जनवरी 2006 को हुआ.

 

झोला पुस्तकालय: मुहल्ले-मुहल्ले, गाँव-गाँव झोला पुस्तकालय[1]           

बुद्ध शरण हंस कहते थे कि भारत के गाँवों में पुस्तकालय नहीं है. हाँ, हर गाँव में एक दो मन्दिर जरूर हैं. गाँव का मन्दिर बच्चों को अशिक्षित रखता है. मन्दिर में बच्चे भजन गाकर भजनची बनते हैं, ढोलक बजाकर ढोलबजवा बनते हैं, नाचकर नचनियां बनते हैं. मन्दिर में जानेवाले बच्चे मास्टर, मैनेजर डॉक्टर, इंजिनियर, एस.पी. कलक्टर तो बन ही नहीं सकते. विद्वान बनते हैं स्कूल, कॉलेज, पुस्तकालय में जानेवाले बच्चे. हर गाँव में, गाँव के टोले में माता सावित्रिबाई के नाम पर झोला पुस्तकालय बनाइये. माता सावित्रिबाई भारत देश की पहली महिला शिक्षिका हैं और जोतिबा पहले शिक्षक हैं, जिन्होंने पूना में गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए पहला स्कूल वर्ष 1848 में खोला था. हमें उनका ऋणी होना चाहिए.

 

झोला पुस्तकालय खोलने चलाने का तरीका

नीले रंग के सूती कपड़ा में कन्धे में लटकाने वाला झोला बनवायें. नीला झोला पर उजला पेन्ट से लिखें- ‘माता सावितत्रीबाई झोला पुस्तकालय’. इस झोला में महानायक राहूल सांस्कृत्यायन, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक महाकवि रविदास, कबीर दास, ज्योतिबा, माता सावित्रीबाई, बाबासाहब अम्बेडकर, रामासामी नायकर, संत गाडगे, साहूजी महाराज, ललई सिंह यादव, के.आर. नारायणन, शहीद जगदेव प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर, माता रमाबाई, माता शेख फातिमा, बिरसा मुण्डा, शहीद उद्यम सिंह, शहीद भगत सिंह, रामस्वरूप वर्मा ऐसे महानायकों का जीवन और मिशन की किताबें झोला में रखें. झोला में एक कापी और कलम भी रखें.

 

झोला पुस्तकालय का संचालन

सबकी सहमति से किसी महिला या पुरूष, शिक्षित लड़की या लड़का को झोला पुस्तकालय का संचालक बना दें, जिनका काम रहेगा समय पर कन्धा में किताब भरा झोला लटकाकर मुहल्ले के लोगों के घर जाना और एक सप्ताह के लिए पढ़ने के लिए किताब देना. जरूरत के अनुसार आपसी बैठक करके दस पांच रुपये चंदा करके अन्य किताबें कहीं से खरीदना और मुहल्ले के लोगों को पढ़ाना. जन जागृति के लिए झोला पुस्तकालय उपयोगी है. अम्बेडकर मिशन पटना से 1500/ रू. में झोला सहित पुस्तकें ले सकते हैं.

 

सामाजिक परिवर्तन हर कोई करे

1.सामाजिक परिवर्तन का मतलब होता है समाज के लोगों के दिमाग में सुशिक्षा की भूख जगाना, वैज्ञानिक सोच जगाना. सामाजिक परिवर्तन का मतलब होता है समाज के लोगों के दिमाग से पाखण्ड, अन्धविश्वास हटाना, मिटाना. समाज का हर बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा सच्चे मन से करे.

2.समाजिक परिवर्तन का मतलब होता है समाज का हर व्यक्ति सदाचार से रहे, सद्व्यवहार से रहे. सदाचार से रहना और सद्व्यवहार से रहना तथा अपने सम्पर्क के लोगों को सद्व्यवहार और सदाचार से रहने देने में सहयोग करना सामाजिक परिवर्तन है. हर कोई ऐसा करे.

3.सामाजिक परिवर्तन का मतलब होता है कोई किसी का शोषण न करे, कोई किसी असहाय अनजान को ठगे नहीं, लूटे नहीं. किसी को किसी तरह का शोषण नहीं करना और किसी को किसी के द्वारा शोषण करने से बचाना बहुत ही उत्तम सामाजिक परिवर्तन है. हर कोई ऐसा करे.

4.वैज्ञानिक शिक्षा का प्रचार करना बहुत ही उत्तम सामाजिक परिवर्तन है. वैज्ञानिक सोच सबसे उत्तम सोच है. जो इंसान के दुखों को दूर करने में अपनी शक्ति भर साथ और सहयोग करता है, वह सबसे उत्तम वैज्ञानिक है. इसे सामाजिक वैज्ञानिक कहा जाता है. हर कोई ऐसा ही बनें.

5.ऐसा सामाजिक परिवर्तन हो, जहाँ किसी तरह का झगड़ा न हो, मार-पीट न हो, खून खराबा न हो, किसी तरह की चोरी डकैती न हो, रिश्वतखोरी न हो, घपला-घोटाला न हो, किसी बालिका का, स्त्री का बलत्कार, हत्या न हो, किसी तरह की नाशाखोरी न हो, लोग किसी बात के लिए झूठ न बोलें. समाज का हर व्यक्ति निर्मल हो, दोष रहित हो, सामाजिक परिवर्तन ऐसा हो तब क्या कहने. हम सब थोड़ा ही सही अपने सामर्थ्य भर सामाजिक परिवर्तन करते रहें- पहले अपने चरित्र में, तब अपने परिवार में, पड़ोस में तब और कहीं. कुछ करने से ही कुछ होता है. केवल बोलने से कुछ भी नहीं होता. हम सब सामाजिक परिवर्तन करने में लगे रहें.

 

बुद्ध शरण हंस और बिहार में अंबेडकरवादी पत्रकारिता             

बुद्ध शरण हंस की पत्रकारिता का आधार अंबेडकरवाद था, जिसमें जाति-व्यवस्था की आलोचना, संवैधानिक मूल्यों की स्थापना, और हाशियाकृत समुदायों के अधिकारों की मुखर पैरवी शामिल थी. वे मानते थे कि पत्रकारिता का मूल दायित्व सत्ता के साथ खड़े होना नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबकों की आवाज़ बनना है. बुद्ध शरण हंस की पत्रकारिता बिहार में अंबेडकरवादी चेतना के विस्तार की एक सशक्त कड़ी है. वे उन दलित आंगिक बुद्धिजीवियों में शामिल हैं जिन्होंने पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया से जोड़ा. उनके कार्य से यह स्पष्ट होता है कि अंबेडकरवादी पत्रकारिता न केवल प्रतिरोध की पत्रकारिता है, बल्कि नव-लोकतांत्रिक मूल्यों के निर्माण की पत्रकारिता भी है.

 

बुद्ध शरण हंस और अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना             

बुद्ध शरण हंस बचपन से ही कविता, कहानी, निबन्ध, रिपोर्ट, आलोचना, नाटक, एकांकी लिखने का कार्य करते रहे. कॉलेज जीवन में हस्तलिखित पत्रिका का लेखन और सम्पादन कर अपनी रचनाधर्मिता को आगे बढ़ाया. वर्ष 1975 से 1980 तक डा. अम्बेडकर विचार मंच नाम की अपनी संस्था बनाकर बाबासाहब अम्बेडकर के विचारो का प्रचार-प्रसार करते रहे.[2] वर्ष 1987 में पटना में अम्बेडकर मिशन तथा वर्ष 1989 में अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, छापाखाना की स्थापना कर साहित्य सृजन तथा प्रकाशन का कार्य शुरू किया. अपना लेखन, अपना प्रकाशन कर अपनी रचनाधर्मिता को विकसित करते रहना, तथा अन्य रचनाकारों को भी जागरूक करना और उनकी रचनाएं प्रकाशित तथा वितरित कर एक मिशाल कायम की है.

वह वर्ष 1994 से अम्बेडकर मिशन पत्रिका का नियमित प्रकाशन कर रहे थे. उनकी मुख्य प्रकाशित रचनाओं में गोहर (कविता संग्रह), देव साक्षी, तीन महाप्राणी (कहानी संग्रह), शोषितों की समस्या और उसका समाधान, मनुस्मृति काला कानून, नीति शिक्षा, अछूतोद्धार, डा. अम्बेडकर के विचार, बाबासाहब अम्बेडकर जीवन-कथा ब्राह्मणवाद से बचो, अम्बेडकर बाल पोथी, क्या हिन्दू होना गर्व की बात है?, बहुजन शक्ति, काश हम हिन्दू न होते!, ज्योतिराव फुले (जीवनी), दलितों को दुर्दशा, बहुजन चिन्तन, पथ प्रदर्शक (बाल साहित्य) है. ब्राह्मणवाद से बचो पुस्तक पर लखनऊ हाईकोर्ट द्वारा समन जारी किया गया और जप्ती का आदेश दिया गया.

बुद्ध शरण हंस को भारतीय दलित साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार 1999 में, 2002 में बिहार सरकार द्वारा बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. जीवन के अंतिम समय तक वह बौद्ध धर्म प्रचारक के तौर पर बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के साथ बाबा साहब अम्बेडकर के मिशन को जन-जन तक पहुँचाने में तल्लीन रहे. बाबासाहब अम्बेडकर पुरस्कार 2002 में 1, 25, 000 रू. की मिली राशि से अम्बेडकर-बुद्ध मिशन स्कूल की स्थापना की गयी. अम्बेडकर मिशन स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को किताबे मुफ्त में दी जाती है. छात्रों को मुफ्त में दी जा रही किताब बुद्ध शरण हंस द्वारा लिखित तथा अम्बेडकर मिशन पटना द्वारा प्रकाशित है. बुद्ध शरण हंस द्वारा कथा मट्ठा नाम की एक कथा-रीति का प्रचलन किया गया है, जिसे गाँव-गाँव में आयोजन करने का प्रयास भी किया गया. जन-जन के बीच बाबासाहब अम्बेडकर का मिशन बौद्ध धम्म को लोकप्रिय करने का निरंतर प्रयास जारी रहा.

 

बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता का विकास: परंपरा, प्रयास और समकालीन हस्तक्षेप

बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता की आरंभिक संगठित पहल का श्रेय सामान्यतः वर्ष 1974 में प्रकाशित हरिजन बंधु पत्रिका को दिया जाता है. पटना के कंकड़बाग क्षेत्र से साहित्य-प्रेमी एवं सामाजिक चेतना से संपन्न गायत्री प्रसाद रजक के संपादन में प्रकाशित यह पत्रिका लगभग एक दशक तक निरंतर प्रकाशन में रही. हरिजन बंधु ने अपने वैचारिक केंद्र में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक-राजनीतिक विचारों को रखते हुए वंचित, उत्पीड़ित और बहिष्कृत वर्गों के सामाजिक-आर्थिक संघर्षों को मुखर अभिव्यक्ति प्रदान की. यह पत्रिका न केवल अम्बेडकरवादी चिंतन के प्रचार-प्रसार का माध्यम थी, बल्कि बिहार के सामाजिक यथार्थ में निहित जातिगत असमानताओं, भेदभाव और संरचनात्मक अन्याय को उजागर करने का एक वैकल्पिक मंच भी थी.

संपादक गायत्री प्रसाद रजक के निधन के पश्चात हरिजन बंधु का प्रकाशन बंद हो जाना अम्बेडकरी पत्रकारिता के इस आरंभिक चरण के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति सिद्ध हुआ. हरिजन बंधु से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े बुद्ध शरण हंस इस पत्रिका को एक सशक्त बहुजन पत्रिका के रूप में रेखांकित करते हैं. उनके अनुसार यह पत्रिका बहुजन समाज के जीवन-संघर्षों, आकांक्षाओं और प्रतिरोध की चेतना को स्वर देने के साथ-साथ बाबासाहेब अम्बेडकर के अधूरे सामाजिक सपनों को आगे बढ़ाने का एक वैचारिक प्रयास थी. इस दृष्टि से हरिजन बंधु बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता की वैचारिक नींव रखने वाली एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में समझी जा सकती है.

बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता को दीर्घकालिक, सुदृढ़ और वैचारिक आधार प्रदान करने वाली पत्रिकाओं में अम्बेडकर मिशन का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है. पटना से प्रकाशित यह 28-पृष्ठीय मासिक पत्रिका वर्ष 1993 में बुद्ध शरण हंस द्वारा प्रारंभ की गई. प्रारंभिक चरण में यह त्रैमासिक स्वरूप में प्रकाशित हुई, तत्पश्चात द्वैमासिक बनी और वर्ष 1995 से नियमित मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होने लगी. बिना किसी संस्थागत अथवा वाह्य आर्थिक सहयोग के, सीमित संसाधनों में इसका निरंतर प्रकाशन अम्बेडकरी पत्रकारिता की आत्मनिर्भर परंपरा का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है. संपादन, प्रकाशन और वितरण की संपूर्ण जिम्मेदारी लंबे समय तक स्वयं संपादक द्वारा वहन की जाती रही. प्रारंभ में 500 प्रतियों से शुरू हुई इस पत्रिका का प्रसार आज तीन हज़ार से अधिक प्रतियों तक पहुँच चुका है. उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इसका पाठक-वर्ग भारत तक सीमित न रहकर दुबई, कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों तक विस्तृत हुआ.[3]

अम्बेडकरी पत्रकारिता के विस्तार और वैचारिक सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से बुद्ध शरण हंस द्वारा अम्बेडकर प्रकाशन मिशन की स्थापना की गई, जिसके माध्यम से सैकड़ों पुस्तकों का प्रकाशन संभव हुआ. इस प्रकार पत्रिका और प्रकाशन, दोनों स्तरों पर अम्बेडकरी वैचारिकी के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया.

बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता के इतिहास में विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर अनेक प्रयास किए गए. वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारी संगठन, बिहार द्वारा अम्बेडकर-बिरसा संदेश पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया, जो लगभग तीन वर्षों तक नियमित रूप से प्रकाशित हुई. बाद में इसे वार्षिक स्मारिका के रूप में सीमित कर दिया गया. इसी क्रम में वर्ष 2008 में डॉ. आर.आर. कनौजिया के संपादन में पटना से हम दलित मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, जो वर्ष 2015 तक जारी रही. इसके अतिरिक्त बौद्ध विहार पत्रिका (संपादक: डॉ. करुणाकरण; कार्यकारी अध्यक्ष: बुद्ध शरण हंस) लगभग एक दशक तक प्रकाशित होती रही, किंतु संपादक के निधन के पश्चात इसका प्रकाशन बंद हो गया. दलित जागरण (2000), रविदास संदेश, हुंकार (आरा, 1990), तर्कशील आवाज (मोतिहारी, 1999) तथा बहुजन सप्ताह (बेतिया, 1993–1998) जैसी पत्रिकाएँ भी अम्बेडकरी और बहुजन चेतना की महत्वपूर्ण वाहक रहीं. हालांकि, आर्थिक संसाधनों की कमी और संगठनात्मक सीमाओं के कारण इनमें से अधिकांश प्रकाशन अल्पकालिक सिद्ध हुए.

समकालीन संदर्भ में बहुजन दर्पण (हाजीपुर, 2019 से) और दैनिक न्याय मार्ग (पटना, 2017 से) जैसे प्रकाशन इस परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं. इसी कड़ी में सितंबर 2019 में कटिहार से प्रकाशित मासिक पत्रिका हम बहुजन अम्बेडकरी पत्रकारिता के एक नवीन और सशक्त हस्तक्षेप के रूप में उभरकर सामने आई है. 94 पृष्ठों की इस पत्रिका में समकालीन भारतीय समाज, संवैधानिक अधिकारों, आरक्षण नीति तथा बहुजन समाज से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों पर गंभीर और वैचारिक विमर्श प्रस्तुत किया गया है. अरुंधती राय, उर्मिलेश, एस.एन. मालाकार, अली अनवर और अनिल चमड़िया जैसे प्रतिष्ठित लेखकों के योगदान ने इसके वैचारिक स्तर को और अधिक सुदृढ़ किया है.[4]

अंततः बिहार में अम्बेडकरी पत्रकारिता की चर्चा दलित दस्तक के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाएगी. यद्यपि यह पत्रिका दिल्ली से प्रकाशित होती है, किंतु इसके संपादक अशोक दास बिहार के सारण ज़िले से हैं और पत्रिका में बिहार से संबंधित दलित-बहुजन प्रश्नों को निरंतर प्रमुखता प्रदान की जाती रही है. वर्ष 2012 से नियमित रूप से प्रकाशित दलित दस्तक ने हिंदी क्षेत्र में दलित-बहुजन मीडिया को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बिहार, अम्बेडकरी पत्रकारिता के वैचारिक निर्माण, निरंतरता और विस्तार में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरता है.

बुद्ध शरण हंस का रचना संसार बहुत व्यापक है उनके द्वारा उपलब्ध कराये गए झोले में निकले साहित्य और  वर्ष 2025 में पटना स्थिति उनके छापाखाना से एकत्रित सामग्री से एक सूची के अनुसार इसे देखा जा सकता है.

बुद्ध शरण हंस द्वारा स्थापित एवं संचालित अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना द्वारा अम्बेडकर मिशन प्रकाशन ग्रन्थमाला  के तहत प्रकाशित साहित्य का विवरण:

पुस्तक/पुस्तिका

पत्रिका का नाम

लेखक/अनुवादक प्रकाशक संस्करण/ प्रकाशन वर्ष कीमत
अंबेडकर मिशन पत्रिका बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1993 से लगातार प्रकाशित हो रही है रु.20/- कीमत पत्रिका में प्रकाशित पृष्ठों के अनुसार
शोषितों की समस्या और उसका समाधान बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.5/-
मनुस्मृति काला कानून बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.20/-
देव साक्षी है बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.10/-
नीति शिक्षा बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.5/-
अछुतोद्वार बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.10/-
डा.अम्बेडकर के विचार बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.25/-
बाबा साहब अम्बेडकर (जीवन कथा) बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2017 रु.100/-
भारत में जातियाँ बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन 2021 रु.10/-
ब्राह्मणवाद से बचो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2017 रु.20/-
जाति का विनाश बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2017 रु.50/-
अम्बेडकर बाल पोथी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.5/-
चिचा ब्राह्मणी-रास लीला बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.5/-
सरना दर्शन सुखदेव उरांव अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.8/-
भारत रत्न डा.अम्बेडकर गंगा  प्रसाद गंगेश अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.8/-
आदिवासी और चौद्ध धम्म सुखदेव उरांव अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.8/-
क्या हिन्दू होना गर्व की बात है बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.10/-
A Ravolutionary Reply to an Ambedkarite बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1977, 1990, 1996 रु.5/-
मूलनिवासी संस्कृति बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1977 रु.3/-
बहुजन शक्ति टी.वी. राजेश्वर, अनुवाद बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 1995 रु.4/-
ज्योतिबा फुले संक्षिप्त  जीवनी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.30/-
तीन महाप्राणी (ब्राह्मणवाद की मौत का वारंट) कहानी संग्रह बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.50/-
काश हम हिन्दू न होते बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2021 रु.10/-
हिन्दू मन्दिर ओर औरंगजेब के फरमान बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.10/-
धर्म शोषण का यंत्र बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.20/-
हिन्दू समाज व्यवस्था: इसकी

अनोखी विशेषताएँ

बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.15/-
ज्योतिबा फुले: संक्षिप्त जीवनी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.30/-
उजाले की ओर बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.15/-
हिन्दू समाज की विशेषताएं बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन, पटना 2015 रु.15/-
देव साक्षी है (कहानी संग्रह) बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.10/-
ब्राह्मणवाद से बचो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.6/-
खुनी पन्नों को जला दो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.20/-
धर्म शोषण के यंत्र बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.20/-
आकाश मेरे पास बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-
रामसामी नायकर जीवन दर्शन बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.30/-
जोतिबा की कहानी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.30/-
मुक्ति कौन पथे बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.30/-
क्रांति की राह पर बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.30/-
डॉ.अम्बेडकर के पदचिन्ह बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.30/-
दुबई की अंतर्कथा बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.30/-
पंचशील मिसाईल बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.30/-
ब्राह्मणवाद का जहर बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
महानायक साहू बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
सावित्री बाई बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
महाप्राण के.आर. नारायण बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
शासक बनो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
जातिवाद की शव यात्रा बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
भारत के वंश पर जाति का दंश बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.40/-
व्यवसायी बनो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
जाति का विनाश बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
को रक्षति वेद: कहानी संग्रह बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
क्रांतिकारी महानारी फूलन बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.50/-
तीन महाप्राणी (कहानी संग्रह) बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
गौतम बुद्ध और उनका धम्म बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
पिछड़ों की दशा और दिशा बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.50/-
सर्वव्यापी आरक्षण बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.60/-
गुलामगिरी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.60/-
हकमार बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.60/-
बहुजन चिंतन बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.75/-
टुकड़े-टुकड़े आईना भाग (1 से 5) बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.500/-
बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर जीवन कथा बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.40/-
डॉ.अम्बेडकर के विचार बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1995 रु.25/-
मनुस्मृति का खूनी कानून बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.100/-
21 सदीं में कोरेगांव बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.100/-
भारत का संविधान बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2020 रु.300/-
बुद्धत्व और हिन्दुत्व बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-
प्रबुद्ध भारत बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.25/-
माता फातिमा सामाजिक क्रांति की जननी बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-
मंदिर और औरंगजेब के फरमान विशम्भरनाथ पाण्डेय अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 1996, 2000, 2021 रु.10/-
सम्मान से बौद्ध बनो बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.15/-
दलित कौड़ी से करोड़पति बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2017 रु.100/-
बौद्ध आचार संहिता बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-
बुद्ध धम्म का भविष्य बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.5/-
गुलाम गिरी का भविष्य बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-
मान्यवर काशीराम बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.30/-
ब्राह्मणवाद का जहर बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2017 रु.40/-
A Revolutionary Reply बुद्ध शरण हंस अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.5/-
शासक बनों जया यशपाल अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.40/-
चार खूंटे: ब्राह्मण पुरोहित उनके शास्त्र उनके त्यौहार उनके तीर्थ इन्हें  उखाड़ फेकों अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना 2021 रु.10/-

 ## किताबों बुकलेट्स की यह सूची बुद्ध शरण हंस द्वारा दिए गए झोला पुस्तकालय के झोले और 2025 में अम्बेडकर मिशन प्रकाशन पटना के प्रेस में उपलब्ध सामग्री से बनाई गयी है.

बुद्ध शरण हंस नहीं रहे लेकिन उनका झोला रहेगा. दलित पत्रकारिता की जो बुनियाद ज्योतिराव फुले, स्वामी अछूतानंद, बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर आदि ने रखी थी वह आज भी अपनी प्रासंगिकता को संजोये हुए हैं. डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता ने दलित आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, वह सिलसिला आज भी आगे बढ़ रहा है. भारतीय मीडिया द्वारा दलितों को दरकिनार करने के बावजूद अपने बलबूते आज दलित पत्रकारिता व्यापक स्तर पर पहुंच चुकी है. देशभर में अम्बेडकरी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही है और मुख्यधारा की मीडिया को ललकारते खड़ी है. ज्योतिराव फुले, स्वामी अछूतानंद, बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सहित कई बहुजन नायकों ने समाचार पत्रों को निकालकर देश में व्याप्त ब्राह्मणवाद और जातिवाद के खिलाफ सामाजिक पत्रकारिता की शुरुआत की थी.[5]

बुद्ध शरण हंस ने अपने लेखन के माध्यम से दलित-बहुजन प्रश्नों को मुख्यधारा के सार्वजनिक विमर्श में लाने का सतत प्रयास किया और ब्राह्मणवादी-वर्चस्ववादी पत्रकारिता के एकांगी दृष्टिकोण का प्रतिपक्ष प्रस्तुत किया. उनका हस्तक्षेप केवल लेखन या संपादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अम्बेडकरवादी पत्रकारों की एक वैचारिक पीढ़ी को प्रेरित और तैयार किया. बिहार में दलित पत्रकारिता को वैचारिक धार प्रदान करने, उसे आंदोलनात्मक चेतना से जोड़ने तथा अकादमिक विमर्श के दायरे में लाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही है.

अम्बेडकरी पत्रकारिता के प्रभावस्वरूप आज देशभर में दलित दस्तक, दलित अस्मिता, अम्बेडकर मिशन, दलित टुडे, अम्बेडकर इन इंडिया, आदिवासी सत्ता, वंचित जनता, जन मीडिया, अपेक्षा, सोशल ब्रेनवाश, दलित-आदिवासी दुनिया, भीम पत्रिका जैसी अनेक पत्र-पत्रिकाएँ सक्रिय हैं. बिहार इस व्यापक परिघटना से अछूता नहीं रहा है, यद्यपि यहाँ से प्रकाशित अम्बेडकरी पत्रिकाओं की संख्या अपेक्षाकृत सीमित रही. इसके बावजूद वैचारिक संघर्ष और पत्रकारिता की परंपरा सतत जारी रही है.दलित पत्रकारिता की वह बुनियाद, जिसे ज्योतिराव फुले, स्वामी अछूतानंद और बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी में रखा था, आज भी अपनी ऐतिहासिक और समकालीन प्रासंगिकता बनाए हुए है.

डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता ने दलित आंदोलन को वैचारिक दिशा देने, राजनीतिक चेतना विकसित करने और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध खड़ा करने में निर्णायक भूमिका निभाई. उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाएँ केवल समाचार माध्यम नहीं थीं, बल्कि वे दलित-बहुजन समाज की आवाज़, प्रश्न और आकांक्षाओं के मंच के रूप में कार्य करती थीं. यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि भारतीय मुख्यधारा का मीडिया लंबे समय तक दलित प्रश्नों को हाशिये पर रखता रहा है. इसके बावजूद दलित पत्रकारिता ने अपने संसाधनों, संघर्षों और वैकल्पिक नेटवर्कों के सहारे आज व्यापक सामाजिक विस्तार प्राप्त किया है. देश के विभिन्न हिस्सों से प्रकाशित अंबेडकरी पत्र-पत्रिकाएँ न केवल दलित यथार्थ को दर्ज कर रही हैं, बल्कि मुख्यधारा मीडिया के वर्चस्ववादी विमर्श को वैचारिक चुनौती भी प्रस्तुत कर रही हैं. वास्तव में, ज्योतिराव फुले, स्वामी अछूतानंद और बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अनेक बहुजन नायकों ने समाचार पत्रों को सामाजिक परिवर्तन के औज़ार के रूप में अपनाकर ब्राह्मणवाद और जातिवाद के विरुद्ध एक सशक्त सामाजिक पत्रकारिता की परंपरा की नींव रखी. बुद्ध शरण हंस उसी परंपरा की निरंतरता थे-और उनकी अनुपस्थिति के बावजूद वह परंपरा आज भी जीवित और संघर्षशील है.

संदर्भ

[1]देखें बुद्ध शरण हंस (1998), शासक बनों पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर दिए गए परिचय को.
[2]बुद्ध शरण हंस के परिचय के लिए देखें अम्बेडकर मिशन ग्रंथमाला श्रंखला के तहत 2003 में प्रकाशित पुस्तिका “को रक्षति वेद ब्राह्मणवाद को नेस्तनाबूद करने वाली कहानियों के संग्रह” को.
[3]इसकी विस्तृत व्याख्या के लिए देखें संजय कुमार (2025), बिहार में अंबेडकरवादी पत्रकारिता, अशोक दास (सं) अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल, दास पब्लिकेशन, नई दिल्ली.
[4]संजय कुमार (2025), वही.
[5]संजय कुमार (2025), बिहार में अंबेडकरवादी पत्रकारिता, अशोक दास (सं) अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल, दास पब्लिकेशन, नई दिल्ली.

सन्दर्भ सूची:

  1. देखें बुद्ध शरण हंस (1998), शासक बनों पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर दिए गए परिचय को.
  2. बुद्ध शरण हंस के परिचय के लिए देखें अम्बेडकर मिशन ग्रंथमाला श्रंखला के तहत 2003 में प्रकाशित पुस्तिका “को रक्षति वेद ब्राह्मणवाद को नेस्तनाबूद करने वाली कहानियों के संग्रह” को.
  3. संजय कुमार (2025), बिहार में अंबेडकरवादी पत्रकारिता, अशोक दास (सं) अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल, दास पब्लिकेशन, नई दिल्ली.
    अजय कुमार
    असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
    समाजशात्र विभाग
    अम्बेडकर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ.
    इमेल :  ajaykbbau@gmail.com
Tags: 2026अजय कुमारक्या है झोला पुस्तकालय आंदोलनदलित पत्रकारिताबुद्ध शरण हंस
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