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Home » शैलजा पाठक की प्रेम कविताएँ

शैलजा पाठक की प्रेम कविताएँ

मीर-जी ज़र्द होते जाते हो/क्या कहीं तुमने भी किया है इश्क़?’. “I love you as certain dark things are to be loved, in secret, between the shadow and the soul.” __________ मीर से लेकर पाब्लो तक प्रेम यातना का भी ज़रिया रहा है. प्रेम में दो लोग जुड़ तो जाते हैं, पर इन दो अजनबी दुनियाओं को जोड़ने वाला यह पुल अस्थिर और नाज़ुक बना रहता है. शैलजा पाठक की इन प्रेम कविताओं में यह पूरा अनुभव खतरनाक ढंग से डोलता है. आकर्षण, स्मृति, असुरक्षा, स्वामित्व और बेवफ़ाई के रंग एक-दूसरे में घुलते-मिलते जाते हैं. यहाँ प्रेम निजी अनुभव से निकलकर सामाजिक संरचना में रूपांतरित होता चलता है. भाषा आत्मसमर्पण से आगे बढ़कर आत्मसम्मान और प्रतिरोध की मुद्रा ग्रहण कर लेती है. इन कविताओं में प्रेम देह से गुज़रता तो है, पर देह तक सीमित नहीं रहता. वह भरोसे, स्मृति, स्वतंत्रता और रीढ़ सीधी रखकर जीने की जिद में बदल जाता है. इन कविताओं से गुज़रना इसलिए भी एक अनुभव है कि वे प्रेम-कविताओं की बार-बार दुहराई जाने वाली एकरसता को तोड़ती हैं. प्रेम-कविताएँ लिखना जितना आसान है, उतना ही कठिन भी. और आज प्रेम-दिवस पर इन्हें पढ़ने से बेहतर और क्या हो सकता है. यह विशेष अंक प्रस्तुत है.

by arun dev
February 14, 2026
in कविता
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शैलजा पाठक की प्रेम कविताएँ
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शैलजा पाठक की प्रेम कविताएँ

 

1.
मैं चाहता हूँ
तुम्हें क़ैद करूँ अपने कैमरे में
तुम्हारे बैकग्राउंड में हज़ार परिंदे उन्मुक्त उड़ान भर रहे हों.

 

 

2.
तुम्हारे होंठों पर कम
तुम्हारी छाती पर ज़्यादा बुझता है नमक
मुझे जीने के लिए
होंठों से ज़्यादा तुम्हारी छाती आश्वस्त करती है.

 

३.
तुम्हारी नाभि के गिर्द कितने ही देश की धड़कनें काँपती होंगी
पर उसे मैं अपनी हथेली से ढाँपे रहता हूँ

मुझे इन धड़कनों से रश्क है.

 

4.
मुझसे प्रेम करते हुए
उसने अपने पुराने प्रेम की तारीफ़ की

तुम जानते हो प्रेम के मायने
मैंने कहा

 

5.
देर तक देखती हो
मेरी ओर
देर तक ठहरी रहती है तुम्हारी नज़र

मैं तुम्हारी नज़र पहन
कब से घूम रहा हूँ
इस शहर में.

 

6.
पुकारता हूँ तुम्हारा नाम
उकेरता हूँ तुम्हारा चेहरा
सीने में दबा रखता हूँ तुम्हारी याद

तुम मेरे हिस्से का साँस लेती रहना मेरी जान.

 

७.
एक थका हुआ दिन
एक उदास-सी शाम
और एक चुप्पे रात से बना हूँ मैं

मेरी मिट्टी में तितली अपने हिस्से का फूल खोजती है.

 

8.
तुम नहीं हो ऐसी जिस पर कोई गीत लिखे
किसी कहानी की बड़ी पलकें झुकाती कोई नायिका भी नहीं

तुम अछूती हो
जंगली मुलायम घास-सी
जिसके उल्लास भरी धरती पर बेनाम फूल खिलते हैं.

 

९.
प्रेम में मैं रहूँ
तुम रहना
हमारी देह को अनावृत करती हवा को हाय लगे मेरी

मुझसे पहले हर बार तुम्हें चूम लेने का अवसर उसके पास ही होता है.

 

10.
पीठ चिक्कन तुम्हारी
मैं उस पर अपनी ज़िंदगी का नक्शा बनाता हूँ

तुम दिल को कम धड़कने दो
मेरी बनाई नदियाँ
तुम्हारी पीठ पर सारे बाँध तोड़ देंगी.

 

 

René Magritte, The Lovers IV, 1928,

11.

तेरे शहर की गहरी झील के बीच
पल भर को नाव रोककर जब मल्लाह ने बताया
ठीक इस जगह कोई ज़मीन नहीं
है अनंत गहराई

मैं डूब जाऊँगी यहाँ तेरे लिए
मुहब्बत में डूबे को कौन झील डुबा सकती है पागल

 

 

12.

कॉफी के प्याले पर बना दिल हिला
और टूट गया.

इसका भी दुख?
हाँ. मैं इसे टूटने के पहले गटक जाना चाहती थी.
तुम खुद को कितना आलोड़ित करती हो
हम कॉफी पी रहे हैं, यार.

यह जगह बहुत शांत है
यहाँ देर तक रुका जा सकता है
सुनो! पाउट बनाना आता है? एक सेल्फी लेते हैं

क्या मूर्खता कर रही हो?
हम वेटर से बोल ढंग की तस्वीर ले लेंगे

वो मेरे पास अपना होना दर्ज कर रहा था
रात के साढ़े नौ बजे
मेरे फोन में उसके साथ की एक मुस्कराती फोटो.

ये तारीख जब-जब गुज़रेगी
मैं तुम्हें याद करूँगी

वो बोलता कम
गुम ज़्यादा रहता
तुम्हें पता है हम दोनों ने अनजाने ही एक रंग के कपड़े पहने
मरून जैकेट नीली शर्ट और जीन्स
हम देर तक मुस्कराए

वो एकदम से अपने घर के बारे में बताने लगा
अपनी नौकरी.
अतीत से झाँकती कोई याद उसका मन दुखा रही थी

क्या हुआ? तुम ठीक हो?
प्यार क्या ही ख़ूबसूरत शै है
हाँ है तो

“तुम बहुत सुंदर हो.”

हम्म… ये चौथी बार कहा तुमने

आज मैं इस जगह और इस कॉफी की ज़्यादा से ज़्यादा कीमत दे सकता हूँ
वो आँख मूँदकर बोल रहा था

पता है
हम सबसे दिलकश और प्यारी बात यूँ अचानक ही बोल देते हैं

मैं नाखून से उसकी जीन्स पर पता नहीं क्या-क्या लिख रही थी.

“तुम बहुत सुंदर हो.”

हाँ, पर ये मत भूलो तुमने कॉफी पी है, शराब नहीं

अब चलो, ग्यारह बज गए
इस शाम को यूँ नहीं जाना चाहिए
इसे रुकना चाहिए
हम और कॉफी पी सकते हैं

मैंने उसकी फोटो ज़ूम करके देखी
वो नीम नशे में था

उठने और चलने की जगह हम घिसट रहे थे
हमें और साथ होना है
सीढ़ियाँ उतरते मैं उससे सटकर चल रही थी
देर से जकड़े हाथ का खून रुक गया था

ये हाथ छूटते मैं भूल जाऊँगी मुझे कहाँ जाना है.
मैं अँधेरे से डरूँगी
मुझे दवाइयों की ज़रूरत होगी
मैं ये सब नहीं कह सकती इससे

छाती की अजब धड़कन थी
तुम बेहद अच्छे लगे मुझे
पर तुमने मेरा हाथ घंटे भर से जकड़ रखा है

ओह! बोला क्यों नहीं
मन नहीं किया

तुम्हें गले लगाना किसी खरगोश को सहलाने-सा है

हम उस दृश्य में जमे अलग हो चुके हैं.
तेज़ छाती की आवाज़ से परेशान मन उसे आवाज़ लगाना चाहता है.

हम जा चुके हैं
कॉफी हाउस की फोटो उदास है
मेरे नाखून उसकी जाँघ पर हैं

मैं उसे ज़ोर से चुभो देना चाहती हूँ.

 

 

13.
प्यार में थी
तो बातों के पतंग उड़ाया करती
कमबख़्त नदियों से कहती कि ठहर जाएँ
पार हो जाने दें मन्नत के दिए

हवा को बरज दिया कि शोख लटों को यूँ न बिखराए मेरे माथे
पानी को थिर रहने कहा

पर सरकारी ट्रैफिक की हरी बत्तियाँ न बुझा सकी
लाल बत्ती के कितने सज्दे करती

हम एक चौराहे से छूट
लाखों की भीड़ में खो गए थे

सुना था
कोई अजनबी उस रात वायलिन पर कोई उदास धुन बजाता रहा
हमारे बिछड़ने का दुख मनाता रहा.

 

14.
उसने कहा
मेरे शहर आ
मैं गई
फिर कहा
मोहल्ले में आ
मैं वहाँ भी गई

उसने इसरार किया
मेरे घर के पीछे की गली में आ जा
मैं वहाँ भी गई
मैंने तर्क नहीं किए न वजह पूछी

उसकी गली में
वह अपने बेटे की पतंग कस रहा था
खोज रहा था हवा की सही दिशा
बेटे के हाथ में आसमान थमाता पिता मुझे प्रेमी से ज़्यादा सुंदर लगा

मैं उसकी गली
उसके मोहल्ले और
उसके शहर के आसमान को उड़ान की दुआ देती लौट आई हूँ.

 

१५.
इसके घुँघराले बाल
उसकी उलझनें हैं
मेरी उँगलियाँ
सुलझाती हैं उन्हें

उससे दूर होते ही
उलझ जाती हैं मेरी उँगलियाँ
और उसकी उलझनें
मेरे सर चढ़ जाती हैं.

 

Krishna Combs Radha’s Hair c. 1820 courtesy byronsmuse

१६.
तेरी याद में नहीं करूँगी रतजगे.
न सुनूँगी कोई गीत

अपनी साँसें गिनूँगी
अपने होने को जानूँगी

प्यार में कहाँ चढ़ती है रात
याद की तितलियाँ छाती पर तैरती हैं.

पता है तुम्हें?

 

 

17.
एक दस्तक पर खोल दूँगी दरवाज़ा
आहट पर धड़कनों को आहिस्ता रखूँगी

चाय आधी-आधी पिएँगे तुम्हारे साथ
भूख और प्यास भी

पर पूरा जीऊँगी.

 

 

18.
रात के तीसरे पहर
पुरुष अपने स्वर में सबसे कोमल होता है
इतना कि आहिस्ता से सरका दे अँधेरे के कपड़े
इतना कि उजालों को बंदी बना ले अपने होंठों में
इतना कि नर्म उँगलियों से देह के हर तिल पर ठहर जाए
इतना कि पैरों के तलवों को सज्दे-सा चूम ले
इतना कि तरंगित कर दे देह का संगीत

कितना ख़ौफ़नाक है इस मोहक आडंबर को प्यार समझ लेना
कितना जटिल है पुरुष का प्यार में ईमानदार होना

कितना आसान
चढ़ती रात किवाड़ की चिटखनी चढ़ाना

ये समय के सीने में मुँह छुपाकर रोने का समय है
जब तुम्हारी देह से लगा पुरुष
किसी और नाम की फुसफुसाहट से चूमता है
कमर का कोई स्याह उभरा तिल.

 

pinterest से आभार सहित

19.
जब तुम उस स्त्री को प्यार करना जो पहले प्रेम में छली गई थी
तो पहले ये जान लेना ये देह एक यातना-घर होगा

ये समझ लेना कि बरसों से बारिश से नहीं भीगी होगी उसकी देह
न उठती होगी कोई महक लोबान की
कि तुम अकुलाहट से बेसब्र कहीं से उतार दो उसके कपड़े

तुम समझना कि उसने काली दीवारों के पार कितने ही वक़्त को काटा होगा.
उसके हिस्से की सुबहें
उसकी शामों का सूरज उसकी नाभि के गड्ढे में गुम पड़ा है

क्या तुम एहतियात बरत सकते हो
उसे प्यार करने का?
अगर नहीं तो मुड़ जाओ किसी रास्ते

अगर हाँ
तो अपनी हथेलियों को दूब से धोकर उनकी कोमलता और रंग लाना
अपने कंधे को स्थिर सीधा रखना
कि वो उसकी ओट से देख सके आँख भर उजाला

अपनी आँख में भर लेना तमाम नदियों का जल
उसकी कहानी को सुनने का कलेजा रखना
अपनी छाती में किसी पिता की तरह सुकून वाली धड़कनें उतार लेना
कि वो सुन सके इंसान को और कर सके यक़ीन
प्रेम में छली औरत को प्यार करना
आग से जले को फिर आग के सम्मुख रखना है

उसे भरोसे की कहानी मत सुनाना
उसकी सुनना
उसकी हाथ की तपिश में आज भी गर्म है कोई आँच

किसी ने उन हथेलियों से होंठ लगाकर अपनी प्यास बुझाई थी
किसी ने उसके सिरहाने गुलाबी पंखुरियाँ बिछाई थीं
किसी रात के प्रेमी ने देह की सभी हदें तोड़ते उसके गाल चूमे थे
कान की लौ पर दाँत धँसाते किसी ने कहा था
“तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत हो.”
पर दुनिया और भी खूबसूरत औरतों से भरी है.
उसकी लस्त देह से उस प्रेमी ने खींच ली थी अपनी शर्ट

उसके बाद और उसके भी बाद उस विक्षिप्त प्रेमिका ने न जाने कितने गरम झरनों में नहाकर
साफ की अपनी देह
अपनी आँखों को अंतहीन गड्ढों के सुपुर्द कर दिया
अपनी कलाई पर फेरती रही
कोई धारदार चाकू

पुरानी कहानी में बेतरह छली गई प्रेमिकाएँ गीली लकड़ी की तरह होती हैं

 

 

20.
तुम्हारी देह पर उगे उसके नाखून के निशान से एक दिन वो इनकार कर देगा
एक दिन ख़ारिज कर देगा तुम्हें इस बात से कि वही है पहला पुरुष

देह की सभी गिरहें खोलकर उकताया पुरुष
तुम्हें अलग हो जाने के तमाम रास्ते दिखाएगा
सारी रात तुम्हारे रोने को एक झटके में टालता हुआ
वो तुम्हारे हाथ थमाएगा कुछ नींद की गोलियाँ
किसी मनोचिकित्सक के नाम की पर्ची

पर तुम प्रेम का जो पुख़्ता घर बनाने चली थी
उस यक़ीन की चारों दीवारें वो एक ठोकर से गिरा देगा
ये कुछ दिन जो तुम समर्पित रही हो
ये सिर्फ़ तुम थी
तुम किसी शाम के बदले कुछ नहीं माँग सकती

तुम शिकायत से पहले
अपने खुले कपड़े संभाल लो
बिखरे बाल समेटो
जाँघ के दर्द को नकार अपनी देह को उस दरवाज़े से बाहर करो
उस मन से तुम कब की बाहर हो चुकी हो

हथेली में रखी उन चार गोलियों से तुम्हारे पास दो रात की नींद है
उस पुर्ज़े में  तुम्हारे रुदन का इलाज
वो कोई नई सिगरेट सुलगाते हुए किसी और नंबर पर बातें करता
तुमसे पूरी तरह अजनबी है

दरवाज़े तक भी साथ नहीं है
तुम निकलो वहाँ से
और भूल जाओ जाँघों की जकड़न

नाखून की चुभन को ज़िंदा रखना अपनी देह पर
कि प्रेम कहते-सुनते तुम एक टीस से भर जाओ

तुम खाली दिमाग की औरतें
प्रेम के नाम पर कितना सिर पटकोगी.

 

 

21.
आशिकों के दरवाज़े हमेशा उस वक़्त बंद रहे
जब प्रेमिकाएँ दुख से बेज़ार
ज़िंदगी से हारी और मन से टूटी हुई गईं.

प्रेमिकाओं को हर हाल खूबसूरती का पाठ पढ़ते रहना,
प्रेमियों को खुश रखने वाली किताब कंठस्थ करना
और धुले, भीगे बालों के साथ
कान तक फैली मुस्कान की आभा में डूबे रहना चाहिए सदैव

कमर पर हाथ रखते मांसल प्रेमिकाओं को वज़न कम करने की ताकीद दी गई

ये प्रेमिकाएँ बाज़ार में ज्यूँ बड़े रौशनी का बल्ब हो वैसी ही चाही गईं.
नींद और ख़्वाब में आशिकों ने इन्हें अपनी मनपसंद आदर्श स्त्रियों संग तोला

प्रेम की रील को रिवाइंड करते हुए
मैं उस आशिक को हमेशा के लिए छोड़ आई
जिसने मुझे रोते देख कहा

साला सारी ज़िंदगी रोती ही रहोगी
कुछ और तो जैसे आता ही नहीं.
मुझे नफ़रत से ज़्यादा जो हो सकता है उतनी नफ़रत है

लड़कियाँ संगमरमर-सा बदन लिए ठीक तुम्हारे हिसाब से
ठीक तुम्हारी डिमांड जितना तुम्हारे पास बनी रहें

प्रेम से गुज़रते हुए मैंने प्रेम की असल परिभाषा जानी
आशिक की जेब में नहीं रखनी चाहिए वो रूमाल
जिसे समय पर निकाल तुम्हारे आँसू को लाख-लाख के एक मोती की तरह सहेज ले

जब ऐसे आशिक तुम्हें
“पार्लर जाओ”, “वैक्सिंग करा लो”
“ज़रा वज़न पर ध्यान दो”
जैसी घटिया बातें कहे

फ़ौरन से पेशतर इन्हें इनके हाल पर छोड़ दूर चली जाना
उन दरवाज़ों पर गुलाब का फूल मत रखना मेरी जान
जो मीटर की मशीन लिए तुम्हें नापता हो और एहसान कर गले लगाता हो
प्रेम में रीढ़ की हड्डी सीधी रखो
और इन दरवाज़ों को हमेशा के लिए भूल जाओ.

 

22.
क्या देह से गुज़रे बिना संभव था प्यार करना?

हाँ, क्यों नहीं
प्यार एहसास की परतों में धड़कता है
आँख की कोर पर पढ़ी जा सकती है नींद की बेचैन लहरों-सी सलवटों की व्यथा
हथेली के उभार के रूखेपन पर घिसे जाते हैं पूजा के चंदन

“उँगलियाँ मोहब्बत से भरी हैं तुम्हारी,”
उसने कहा था एक दिन
किसी दिन की ख़ातिर कोई दिन प्रतीक्षा में चूक गया था

पीठ के टेक लिए शाम से संवाद किया जा सकता है
किसी चौराहे से उठाई जा सकती है मुस्कुराहट

बालों को खोलकर बाँधता प्रेमी कहता है बादलों को इतने नज़दीक से पहली बार देखा

और जानती हो
तुम्हारे साथ चलना दुनिया का सुंदरतम सुख है

मेरी नज़र चूम लेती है तुम्हारी मायूसी
मेरी छाती में साँस लेती है गौरैया की धड़कन

बरगद-सी पुरानी जड़ों-सा लगता हूँ तुमसे गले
तुम ही से सोखता हूँ जीवन की संजीवनी

तुमसे प्यार करते हुए जाना
देह से नहीं उठानी होती कोई दहकती छुवन
न चुंबन न आलिंगन

बस मिट्टी में रोपनी होती हैं उँगलियाँ
प्यार दूब की तरह पसरा होता है मेरे आस-पास
मैं उस पर देर तक आँखें मूँद तुम्हें महसूस करता हूँ

मैं सुख से भरा हूँ
तू उदास मत हुआ कर मेरी दोस्त.

 

 

शैलजा पाठक

शैलजा पाठक 29 जुलाई को स्याल्दे, अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में जन्मीं. मूलतः बनारस की रहनेवाली हैं. शुरुआती पढ़ाई से लेकर स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई उन्होंने वहीं से की है. उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘मैं एक देह हूँ फिर देहरी’, ‘जहाँ चुप्पी टूटती है’, ‘कमाल की औरतें’ (कविता संग्रह); ‘पूरब की बेटियाँ’ (कथेतर).

आजकल मुम्बई में रहती हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं.
ई-मेल : pndpinki2@gmail.com

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