• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » कला का अर्थ : अरविन्द ओझा

कला का अर्थ : अरविन्द ओझा

महान कलाओं का स्थायी आकर्षण उनकी बहुस्तरीय संरचना में निहित होता है. वे न तो किसी एक क्षण में पूरी तरह खुलती हैं, न ही कभी स्वयं को सम्पूर्णतः प्रकट होने देती हैं. समय उनके अर्थों को स्थिर नहीं करता, बल्कि निरन्तर विस्तार देता है. उन्हें बौद्धिक रूप से समझा जाए या संवेदनात्मक रूप से अनुभूत किया जाए? यह द्वंद्व दशकों से कला-आलोचना के केन्द्र में रहा है. अरविंद ओझा इसी प्रश्न से जूझते हुए कला के अर्थ-क्षेत्र को टटोलने का प्रयास करते हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
February 6, 2026
in कला, पेंटिंग
A A
कला का अर्थ : अरविन्द ओझा
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
कला का अर्थ
अरविन्द ओझा

 

पिछले कई दशकों से भारतीय समकालीन कला जगत में एक आयातित विचार को असाधारण सहजता के साथ दोहराया जाता रहा है कि “कला समझने की नहीं, केवल देखने और महसूस करने की चीज़ है.” यह वाक्य सुनने में बेहद उदार, लोकतांत्रिक और मुक्तिदायी लगता है. इसमें कहीं न कहीं यह आश्वासन छिपा हुआ प्रतीत होता है कि कला किसी बौद्धिक परीक्षण की वस्तु नहीं है बल्कि सभी के लिए सुलभ और खुली किताब जैसी है. लेकिन असल समस्या इस वाक्य की भावात्मक उदारता में नहीं बल्कि उसके वैचारिक सरलीकरण में निहित है क्योंकि समय के साथ धीरे-धीरे यह कथन एक विचार नहीं वरन एक तरह का आदेश बनता गया जिससे न सिर्फ कला जगत में एक भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई बल्कि बहुसंख्यक कलाकार इस कथन को अपनी स्वच्छंद अभिव्यक्ति का एकमात्र प्रमाण भी मानने लगे. एक ऐसा आदेश जो कला को समझने की नैसर्गिक इच्छा को ही संदेहास्पद ठहराता है. इस विचार की जड़ में एक और विभ्रम काम करता है और वह यह कि सभी रचनात्मक माध्यमों की प्रकृति एक सी होती है. वैसे तो शब्द, दृश्य और संगीत ये तीनों कलात्मक अभिव्यक्ति के स्थापित माध्यम के रूप में स्वीकार्य हैं पर तीनों की आंतरिक संरचना, उनका व्याकरण, उनका सौंदर्य और उनका अर्थ-तंत्र बिल्कुल भिन्न है.

साहित्य में अर्थ जहाँ प्रत्यक्ष रूप से भाषा के साथ जुड़ा होता है और समझना जहाँ एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है वहीं संगीत और दृश्य-कला में यह अर्थ प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष रूप से अंतर्निहित होता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ अर्थ अनुपस्थित है.
कला माध्यमों के बीच अंतर्संबंध तो अवश्य है पर यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि शब्द के लिए जो कसौटियाँ निर्धारित की गई हैं वही दृश्य और ध्वनि पर भी यथावत लागू हो पाएँ. इस बुनियादी अंतर को न समझ पाने से ही यह निष्कर्ष निकाला गया कि जहाँ शब्द में अर्थ ज़रूरी है वहाँ कला में इसकी ज़रूरत नहीं है.

अक्सर इस संदर्भ में यूरोप के महान प्रभाववादी चित्रकार “क्लोद मोने” का प्रसिद्ध कथन उद्धृत किया जाता है जिसमें वे कहते हैं कि

“लोग मेरी कला को समझने का दिखावा करते हैं जैसे उसे समझना आवश्यक हो, जबकि आवश्यक केवल उससे प्रेम करना भर है.”

ठीक इसी तरह की बात पिकासो भी कहते हैं कि
“यदि पक्षियों से कोई यह सवाल नहीं पूछता कि वे क्या गा रहे हैं या सूरज से कोई नहीं पूछता कि वह क्यों चमक रहा है तो फिर मुझसे लोग मेरी पेंटिंग का अर्थ क्यों पूछते हैं?”

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भी लिखते हैं कि
“लोग अक्सर मुझसे मेरी चित्रकृतियों का अर्थ पूछते हैं. मैं मौन रहता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे मेरी चित्रकृतियाँ मौन रहती हैं. वे समझाने के लिए नहीं, स्वयं व्यक्त होने के लिए हैं.”

बाह्य तौर पर ये सारे कथन और दृष्टियाँ अपनी जगह निश्चित रूप से ही सुंदर हैं क्योंकि कला को समझने की जल्दबाज़ी अक्सर प्रेम की सहजता को नष्ट कर देती है. लेकिन आंतरिक तल पर अगर कला महज़ आँखों का सुख या रस ही बनी रह जाए तो फिर कला भोग बन जाती है, बोध नहीं. जैसे साहित्य अपने उत्कर्ष पर दर्शन बन जाता है ठीक वैसे ही प्रेम या अनुभव अपने विस्तार के अंतिम छोर पर एक गहन बोध, एक ज्ञानात्मक संवेदना बन जाता है. लेकिन इस कथन से यह निष्कर्ष निकाल लेना कि कला को समझना ही नहीं चाहिए दरअसल इन बड़े कलाकारों की बातों का सरलीकरण करना है.

प्रेम और समझ को परस्पर विरोधी मान लेना एक सुविधाजनक दृष्टि है पर अपने आप में पूर्ण नहीं. यदि प्रेम केवल तात्कालिक आकर्षण तक सीमित रह जाए तो वह भी उपभोग बन जाता है. वहीं प्रेम यदि गहरा है तो वह प्रश्न भी करता है और प्रश्न ही विचार का पहला रूप होता है.

मनुष्य के अंदर उपस्थित मूलभूत नैसर्गिक वृत्तियों में जिज्ञासा, प्रश्न और मनन बेहद महत्वपूर्ण पक्ष हैं जिनके प्रभाव से मनुष्य द्वारा सृजित कलाकृतियाँ भी अछूती नहीं हैं. मनुष्य की हर संवेदना अंततः ज्ञान बन जाना चाहती है और हर ज्ञान की नियति स्वयं में संवेदनात्मक होती है. इसीलिए कला को केवल प्रेम तक सीमित कर देना, दरअसल उसे उसके सबसे जीवंत विस्तार ‘अर्थ और विचार’ से वंचित कर देने जैसा है.

Guernica by Pablo Picasso

भारतीय कला-दृष्टि ने अपने लम्बे विमर्श में ‘देखना और समझना’ या फिर ‘भाव और अर्थ’ के द्वंद्व को कभी स्वीकार नहीं किया. हमारी कला परंपरा में ‘अर्थ-विचार’ को ‘प्रेम’ का शत्रु नहीं बल्कि उसका परिष्कार माना गया. भारतीय रस-सिद्धांत यह नहीं कहता कि सोचो मत, वह कहता है कि कला को पहले अनुभूति बनने दो. लेकिन वही हमारी परंपरा ध्वनि, अलंकार, प्रतीक, देश-काल और प्रयोजन के माध्यम से यह भी दिखाती है कि हर कला अभिव्यक्ति में अर्थ की विशेष परतें धीरे-धीरे खुलती हैं.

रूप (फॉर्म) कभी निरपेक्ष नहीं होता. जैसे ही कोई विन्यास, कोई संरचना, कोई चयन सामने आता है वह मनुष्य के अनुभव-संसार से जुड़ जाता है और उसी क्षण अर्थ की संभावना पैदा हो जाती है. दृश्य कला में एक रेखा भी तटस्थ नहीं रहती. वह दिशा का बोध कराती है, गति का संकेत देती है, भीतर किसी स्मृति या भाव को जगाती है. रंग केवल रंग नहीं रहता बल्कि वह ताप, दूरी, निकटता, उत्सव, शोक, आकाश, रक्त, धूप जैसी असंख्य अनुभूतियों को छूता है. यानी रूप का हर निर्णय पहले से ही मनुष्य के सांस्कृतिक, जैविक और ऐतिहासिक अनुभवों से भरा हुआ आता है. इसीलिए जहाँ रूप-विन्यास है वहाँ अर्थ से पूर्ण मुक्ति संभव नहीं. इसलिए भारतीय कला में प्रेम और विवेक, श्रद्धा और समीक्षा दोनों साथ-साथ चलते हैं.

अजंता-एलोरा के भित्ति-चित्र, खजुराहो के प्रस्तर शिल्प, नटराज की मूर्ति, तांत्रिक आकृतियाँ, राग-रागिनियाँ या पांडुलिपि-चित्र ये सब केवल देखे जाने की वस्तुएँ नहीं हैं. वे ज्ञानात्मक संवेदना के उत्कर्ष हैं जिनमें अनुभूति और विचार एक ही चेतना में निवास करते हैं. यह समझ केवल भारतीय परंपरा तक ही सीमित नहीं है बल्कि पश्चिमी आधुनिक कला में भी बड़े कलाकारों ने कला को मात्र दृश्य-अनुभव तक सीमित नहीं रहने दिया है.

अमूर्त कला के प्रवर्तक माने जाने वाले रूस के महान चित्रकार वासिली कांडिंस्की चित्र को ‘आत्मिक अनिवार्यता’ और ‘रूपों की एक आंतरिक भाषा’ मानते हैं. यह भाषा प्रेम में खुलती तो ज़रूर है लेकिन इसे हमें पढ़नी और समझनी भी पड़ती है. वहीं पॉल क्ली जैसे कलाकार कहते हैं कि कला दृश्य का नकल नहीं करती बल्कि वह दृश्य को दृश्य बनाती है. यह बनना-समझना एक सक्रिय प्रक्रिया ही तो है.

पिकासो के यहाँ तो रूप-भंग (डी कंस्ट्रक्शन) ही एक प्रकार का विचार है जो अपनी सहज कलात्मक अभिव्यक्ति में देखने वाले से माँग करता है कि वह वस्तु को फिर से सोचे, विचारे और फिर देखे. वैश्विक मंच पर भी दृश्य कला की महानतम रचनाएँ सदैव अर्थपूर्ण ही रही हैं.

इससे यह स्पष्ट होता है कि हर देखने की प्रक्रिया अपने भीतर एक बोध लिए होती है. कोई आकृति, रंग या ध्वनि अचानक ही चेतना को छूती है जिसका आंतरिक कंपन बोध कहलाता है. यह बोध जब हमारी स्मृति, समय और संवेदना से होकर गुजरता है तो अनुभव बन जाता है. और जब अनुभव आत्मचिंतन, सांस्कृतिक संदर्भ और संवाद से सहजता से जुड़ता है तब वह अर्थ में रूपांतरित हो जाता है. यह यात्रा हर बार पूरी ही हो, यह भी आवश्यक नहीं, पर यह कहना कि कला को इस यात्रा पर जाना ही नहीं चाहिए यह दृष्टि स्वयं मनुष्य की चेतना को सीमित करने जैसा है.

प्रसिद्ध कला समीक्षक जॉन बर्जर ने अपनी पुस्तक “द वे ऑफ़ सीइंग में” कहा – “देखना शब्द से पहले है.”

यह कथन इंद्रियगत स्तर पर तो सही है. शिशु पहले देखता है और बाद में बोलना सीखता है. लेकिन मनुष्य का देखना कभी भी शुद्ध जैविक क्रिया भर नहीं रहता बल्कि वह तुरंत ही एक पहचान, तुलना, स्मृति और व्याख्या में बदल जाता है. हम किसी आकृति को देखते ही उसे “चेहरा”, “पेड़”, “दरवाज़ा”, “छाया” कहने लगते हैं. यह नामकरण केवल भाषा का जोड़ मात्र नहीं है बल्कि हमारे देखने की ही एक अगली अवस्था है. इसलिए देखना और शब्द अंततः अलग-अलग द्वीप नहीं, एक ही महाद्वीप के दो तट बन जाते हैं. यदि दार्शनिक तल पर कहा जाए तो मनुष्य के लिए जगत हमेशा अर्थवान रूप में ही प्रकट होता आया है. हम कभी भी शुद्ध ‘वस्तु’ नहीं देखते बल्कि “किसी के लिए कुछ” देखते हैं. एक खाली कुर्सी भी हमारे लिए अनुपस्थिति, प्रतीक्षा या स्मृति का संकेत बन जाती है. यही कारण है कि दृश्य कलाएँ चाहे वे कितनी भी अमूर्त क्यों न हों, दर्शक के भीतर अर्थ की हलचल पैदा करती ही हैं.

अमूर्त चित्र में कोई पहचानी वस्तु न भी हो, तब भी वह तनाव, शांति, विस्तार, संकुचन, अंधकार या उजाले का अनुभव कराता है. यह अनुभव ही अर्थ का प्रारंभिक रूप है.

यदि इस विमर्श को हम थोड़ा और गहराई से समझें तो हम पाते हैं कि “आधुनिकता” जैसे वैचारिकी का जन्म भी अर्थ के दुरुपयोग के प्रतिरोध के रूप में ही हुआ था. जब राष्ट्र, धर्म और सत्ता ने कला को प्रचार का उपकरण बना लिया और जब कला अभिव्यक्तियों में ‘अर्थ’ को अंतिम निष्कर्ष के रूप में थोपा जाने लगा तब इसके प्रतिक्रिया में यह बात कही गयी कि कला को अर्थ से मुक्त करो.

इस संदर्भ में रोलाँ बार्थ अपनी पुस्तक “लेखक की मृत्यु (ऑथर इज़ डेड)” में कहते हैं कि
“लेखक क्या कहना चाहता है यह अप्रासंगिक है और वह अंतिम व्याख्या क्या करना चाहता है यह भी अस्वीकार्य है क्योंकि लेखक की मृत्यु (व्यक्तिगत वैचारिक अनुपस्थिति) से ही कृति का जन्म होता है.”

वहीं जाक देरिदा अपनी विचारधारा “विखंडनवाद (डी कंस्ट्रक्शन)” में अपने उत्तर आधुनिक विचारों को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि
“कला में कोई प्रतीक स्थायी नहीं, कोई रूप अंतिम नहीं, कोई व्याख्या पूर्ण नहीं.”

ये विद्वान कला को एक संवेदी यात्रा और संवाद का माध्यम मानते हुए एक सही अर्थ की जगह अनेक अस्थिर अर्थ को, कलाकार की सर्वोच्च उपस्थिति की जगह दर्शक की सक्रिय सहभागिता को और किसी भी अंतिम व्याख्या की जगह अस्थायी व्याख्या को निष्कर्ष के रूप में स्थापित करते हैं.

यदि इसकी सूक्ष्म आलोचना में जाएँ तो यह कह सकते हैं कि इनका इरादा इस संदर्भ में सही था कि अर्थ की तानाशाही को तोड़ दिया जाए. लेकिन इस प्रक्रिया में दो महत्वपूर्ण विसंगतियाँ उत्पन्न हुईं. एक तो यह कि कला की बहु केन्द्रित निष्पत्तियाँ मनुष्य के नवोन्मेष में कोई निर्णायक भूमिका सुनिश्चित नहीं कर सकती थीं और दूसरी विसंगति एक नए भ्रम के रूप में जन्मी और वह यह कि “अर्थ” स्वयं में ही एक समस्या है. धीरे-धीरे विचार की वैधता ही संदिग्ध होती चली गई. और इस कारण कला को केवल ‘अनुभूति’ तक सीमित कर दिया गया. संवाद की जगह “देखो और आगे बढ़ो” ने ले ली. अब कला जीवन की आलोचक नहीं रही बल्कि वह दीवार की सजावट बनती चली गई. ठीक इसी बिन्दु पर कला एक वस्तु में बदल दी गई. यह स्थिति राजनीतिक रूप से तो सुविधाजनक है क्योंकि केवल भाव के स्तर पर कला सहानुभूति तो जगाती है पर चेतना को चुनौती नहीं दे पाती. वह देखी जाती है, सराही जाती है और भुला भी दी जाती है क्योंकि यही वस्तु का गुण है. लेकिन जब कला अर्थ के तल पर प्रवेश करती है तब वह प्रश्न उठाती है, असुविधा पैदा करती है, व्यवस्था से टकराती है और मनुष्य को एक निश्चित स्थिति और अर्थ-संदर्भ लेने पर विवश करती है. तब कला दृश्य नहीं रहती बल्कि विचार बन जाती है. और विचार ही इतिहास का सृजन करता है, समाज को बदलता है और चेतना को पुनर्गठित करता है.

यदि हम भारतीय दृष्टि की बात करें तो वह यहाँ अधिक ईमानदार दिख पड़ती है. वह कहती है कि भाव और विचार कोई अलग-अलग निर्धारित खाँचे नहीं हैं. भाव बिना विचार के महज़ प्रतिक्रिया है और विचार बिना भाव के एक शुष्क संरचना. कला दोनों के संयोग से जन्म लेती है. इसलिए भारतीय कला-दृष्टि न तो अर्थ थोपती है, न उससे भागती है. वह अर्थ की संभावना को बस खुला और स्वतंत्र छोड़ देती है.

दृश्य कलाएँ अर्थ को समझाने के लिए बाध्य नहीं होतीं पर वे अर्थ की संभावना को सुरक्षित रखती हैं. वे किसी एक तय संदेश को थोपती नहीं बल्कि अर्थ की अनेक दिशाएँ खोलती हैं. इसीलिए उन्हें अर्थ से मुक्त कहना उतना ही असंभव है जितना भाषा को ध्वनि से मुक्त कहना. रूप उनका शरीर है, संवेदना उनका प्राण और अर्थ उनकी सतत खुलती हुई चेतना. अर्थ यहाँ कोई एक अंतिम निष्कर्ष नहीं है बल्कि एक गतिशील प्रक्रिया है. हर दर्शक अपने अनुभव, प्रेम और स्मृतियों के साथ कृति में प्रवेश करता है और एक नया अर्थ रचता है. इस प्रकार कला में अर्थ कैद नहीं होता वरन् जीवित रहता है. रूप उसे बाँधता नहीं, सम्भालता है, संरचना उसे रोकती नहीं, दिशा देती है. इसलिए दृश्य कलाएँ अर्थ से मुक्त नहीं हो सकतीं क्योंकि वे मनुष्य से जुड़ी हैं और मनुष्य बिना अर्थ के नहीं देख सकता.

कला का कार्य अर्थ को समाप्त करना हरगिज़ नहीं है बल्कि उसे संवेदना के सहारे विस्तृत और बहुवचन बनाना है. यही कारण है कि एक चित्र मौन रहते हुए भी बोलता है और उसका बोलना शब्दों से पहले नहीं तो शब्दों के पार तो अवश्य ही जाता है. दरअसल टैगोर भी कला को अर्थ से मुक्त नहीं बल्कि अर्थ के लिए स्वतंत्र रखना चाहते थे. उनका आशय यह हरगिज़ नहीं था कि “कला में अर्थ नहीं होता है” बल्कि यह था कि “कला एक ऐसी जीवंत प्रक्रिया है कि इसमें कोई एक अर्थ तय नहीं किया जा सकता” वे जानते थे कि कलाकार यदि अर्थ बता देता है तो दर्शक की अनुभूति तत्क्षण रुक जाती है और फिर कला महज़ एक निष्कर्ष बन जाती है.

आज जब कला के संदर्भ में यह कहा जाता है कि ‘इसे सिर्फ देखो, अर्थ न समझो’ तो यकीन मानिए अनजाने में ही हम कला की सामाजिक शक्ति और इसके सांस्कृतिक प्रभाव को कम कर देते हैं. दर्शक को एक उत्तरदायी चेतना से हटाकर एक सामान्य उपभोक्ता में बदल देते हैं. इसके ठीक विपरीत, अर्थ के पास पहुँची हुई कला केवल देखी ही नहीं जाती बल्कि वह अपने दर्शक और परिवेश से सीधा संवाद भी करती है, हस्तक्षेप करती है और जीवन की मूल्य-दृष्टि को कहीं न कहीं बदलती भी है.

प्रश्न यह नहीं है कि कला केवल महसूस की जाए या समझी जाए. प्रश्न यह है कि कला अपनी अभिव्यक्ति में क्या बनना चाहती है- वस्तु या विचार. वस्तु उपभोग का विषय है और विचार संवाद का. वस्तु समय के साथ घिसती है लेकिन विचार समय के साथ गहराता है. यदि कला केवल वस्तु है तो निश्चित रूप से वह संग्रहालय की संपत्ति बन सकती है लेकिन कला यदि विचार है तो वह अंततः सभ्यता की चेतना बन सकती है. इसलिए कला का लक्ष्य केवल महसूस कराया जाना नहीं होना चाहिए बल्कि मनुष्य को पुनर्भाषित और पुनर्गठित करने का एक सशक्त माध्यम भी होना चाहिए. और यह तभी संभव है जब कला भाव से जन्म लेकर अंततः अर्थ के संसार में हस्तक्षेप करे.

 

अरविन्द ओझा

लेखक और  चित्रकार
शिक्षा  दिल्ली विश्वविद्यालय और “निफ्ट” दिल्ली से.
पिछले दो दशकों से  कला, साहित्य, डिज़ाइन, सिनेमा और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

arvindojha189@gmail.com

Tags: 20262026 पेंटिंगअरविन्द ओझाकला का अर्थ
ShareTweetSend
Previous Post

आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ

Related Posts

आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ
कविता

आमिर हमज़ा की नयी कविताएँ

गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ
कविता

गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ

अरुण खोपकर : विद्वत्ता और लालित्य : चन्द्रकान्त पाटील
आलेख

अरुण खोपकर : विद्वत्ता और लालित्य : चन्द्रकान्त पाटील

Comments 2

  1. Akhilesh says:
    40 minutes ago

    बेहद सतही लेख। बिना देखे समझे लिखा गया। उम्मीद है कि शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय नहीं रहे अन्यथा विद्यार्थियों का क्या होगा यह समझा जा सकता है।

    Reply
  2. Jyotish Joshi says:
    23 minutes ago

    कला को देखने और उसे अनुभूत करने के प्रश्न पर अरविन्द ओझा का यह आलेख निःसंदेह विचारणीय है. कला को मात्र देखने, उससे प्रेम करने और उसे अनुभूत करने तक सीमित करने का तात्पर्य यह है कि हम उसे विचार, संदर्भ और उसके फलितार्थ को ही संकुचित कर देना चाहते हैं. यह निश्चित रूप से कला के भावन और उसके अभिग्रहण के साथ साथ कलाकारों को भी यह सुविधा देने जैसा है कि वे विचार निरपेक्ष होकर आस्वाद को ही कला का मूल्य बना दें. क्लोद माने, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, पॉल क्ली आदि को उल्लिखित कर उनके मूल संदर्भ से आशयों को अलगकर जब हम उसे प्रतिमान के रूप में रखते हैं तो इससे जाने अनजाने हमसे बड़ा अनर्थ होता है. अरविन्द ने यह बात स्पष्ट की है और भाव और विचार के स्तर पर भारतीय कला दृष्टि की समानुपातिक समझ को सामने रखा है. कला स्वयं को विसर्जित कर देने से पूर्णता प्राप्त करती है पर विसर्जन दृश्य, रूप या स्थिति को आंकने भर तक सीमित नहीं होता, वह एक गहरे विचार, विचारणीय प्रश्न और विमर्श के आसन्न बिदुओं तक विस्तृत होता है. स्पष्ट है कि कोई भी कला बड़े विचार और अपने समय के बड़े प्रश्नों से विरत रहकर स्मरणीय नहीं बनती, कविता, कहानी, उपन्यास ही नहीं, चित्रकला भी इससे परे नहीं है. पश्चिम को ही निकष मानने वाले लोग सिजाँ की इस उक्ति पर क्या कहेंगे जिसमें वे कहते हैं कि जो कला भाव या भावना से शुरू नहीं होती, वह कला नहीं हो सकती. कहना चाहिए कि यहाँ भाव या भावना का संबंध मात्र दृश्यता तक सीमित नहीं है, उस गहरे विचार तक विस्तृत है जिसके कारण भाव या भावना का प्राकट्य होता है.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक