विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास
जादुई यथार्थ या यथार्थ में जादू बसंत त्रिपाठी |
‘खिलेगा तो देखेंगे’ के एक प्रसंग में विनोद कुमार शुक्ल यही कहते हैं कि ज्ञान सुख की समझ देता था पर सुख नहीं. सुख न देने का कारण यह था कि ज्ञान द्वारा अर्जित समझ के अनुरूप जीवन जीने के अवसर लगातार कम हो रहे थे. ऐसे अवसरों के लगातार कम होने और उसके कारण होने वाली मुश्किलों को विनोद कुमार शुक्ल ने अपने अनोखे अंदाज़ में उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ और ‘महाविद्यालय’ की कहानियों में रख चुके थे. जिसे हम जादुई तो नहीं लेकिन और लोगों के कहने के अंदाज से अलग ज़रूर कह सकते हैं. ‘नौकर की कमीज’ का पूरा वितान शहरी निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की मुश्किलों और जीवन के संघर्षों को निहायत संयत भाषा में रखने का शिल्प है. लेकिन अपने बाद के उपन्यासों– ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘हरी घास की छप्पर वाली झोंपड़ी और बौना पहाड़’ में उन्होंने कहने का जो ढंग तलाशा है वह चमत्कृत करता है.
सभ्यता के मौजूदा स्वरूप में जीते हुए जो समझ हम अर्जित करते हैं उसमें कार्य-कारण संबंध के प्रति हमारा एक विशेष प्रकार का दृष्टिकोण बन जाता है. हमारी यह समझ देश और काल के दो मज़बूत आयामों के बीच विकसित होती है. ये आयाम जितने दृढ़ होते हैं हमारा विवेक उतना ही यथार्थपरक और तार्किक होता है. साहित्य और कलाएँ इन्हीं दोनों आयामों के भीतर मानवीय संबंधों और संघर्षों को परिभाषित और व्याख्यायित करती हैं.
काल और देश की हमारी समझ का एक ऐतिहासिक स्वरूप होता है और भविष्य की योजनाएँ भी इसी के भीतर कार्य करती हैं. जाहिर है कि अतीत और भविष्य पर नज़र डालने का हमारा तरीका हमारे वर्तमान के अनुभवों पर निर्भर करता है और वर्तमान के हमारे प्रत्यक्ष अनुभव काल और देश यानी टाइम और स्पेस के बीच अवस्थित होते हैं. लेकिन कई बार ऐसा होता है कि कार्य और कारण के पारस्परिक संबंध इतने उलझ जाते हैं, इतने जटिल हो जाते हैं कि यथार्थ की सपाट अभिव्यक्ति से उसे समझा पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में रचनाकार भिन्न परिपाटी अपनाता है.
भिन्नता कई बार इतनी होती है कि पाठ से अपना निश्चित संबंध बनाने वाला पाठक ऐसे पाठ से गुजरते हुए चौंकता है, कई बार झल्लाता भी है. लेकिन यदि वह पाठ के भिन्न-भिन्न आस्वाद से गुजरने के लिए तैयार है और उसे अपने रचनाकार पर भरोसा है तो धीरे-धीरे वह ऐसे पाठ का आदी होने लगता है बल्कि पाठ के भीतर छुपे अंतर-पाठों को खोजने के लिए भी वह अपने को तैयार पाता है. विनोद जी के बाद के तीनों उपन्यास इसी तरह के उपन्यास हैं.
यहीं ठहर कर हम जादू की संकल्पना पर भी नज़र डालें. जादू दरअसल कार्य और कारण की हमारी अर्जित समझ में अवरोध से उत्पन्न होता है. एक बड़े से बक्से में काग़ज़ की कतरनें डालकर उसे उलटें तो उससे कतरनें ही गिरेंगी, यह सामान्य समझ है और तार्किक समझ है. यदि उसे उलटने पर एक कबूतर फड़फड़ा कर उड़ जाए तो यह अविश्वसनीय होगा और इसीलिए इसे जादू कहा जाएगा.
विनोद जी के उपन्यासों में ऐसी ही अविश्वसनीय घटनाएँ हैं. मसलन लकड़ी की बंदूक से धाँय की आवाज़ कहने पर गोली का निकलना या दीवार की खिड़की से जिस दुनिया में जाया जाता है, घर के इर्दगिर्द उसकी भौतिक अनुपस्थिति या महुआ और पीपल के पेड़ का जिवराखन से विमुख हो जाना या फिर मुन्ना और मुन्नी का पहाड़ी को ठेलने की घटना. ऐसी घटनाएँ लंबे और मुग्धकारी विवरणों के साथ उनके उपन्यासों में उपस्थित हैं. क्या विनोद जी नहीं जानते हैं कि घर की खिड़की से निकलकर जिस दृश्य में रघुवर प्रसाद और उसकी पत्नी रमते हैं उसकी भौतिक उपस्थिति भी होनी चाहिए? क्या वे नहीं जानते कि कोई भी पहाड़ी को ठेलकर उन्हें मिला नहीं सकता या लकड़ी की बंदूक से न तो गोली निकलती है और न ही उससे कोई घायल या मर सकता है? फिर इस तरह के विवरणों का औचित्य क्या है?
औचित्य… हाँ इसी जगह पर आकर ठहर जाना पड़ता है कि क्या औचित्य ही कलाओं को परिभाषित करने का एकमात्र आधार है? और क्या औचित्य को हमेशा कार्य-कारण के निश्चित चौखटे के भीतर परखा और स्वीकृत किया जाएगा? अक्सर हिंदी के पाठक और आलोचक ऐसी अविश्वसनीय घटनाओं को प्रतीक की तरह पढ़कर उसे खोलने की जद्दोजहद करते दिखाई पड़ते हैं.
शमशेर की कविता में एक आदमी कुहनियों से दो पहाड़ों को ठेलता है और इसमें पाठक को कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन गद्य में एक बच्चा दो पहाड़ियों को ठेलकर मिला दे तो मुश्किल हो सकती है. दरअसल कथात्मक गद्य को पढ़ने के हमारे तरीके पर कार्य-कारण का द्वित्व हावी रहा है. यदि उसे द्वित्व न मिले तो वह इसे प्रतीक में समेटने की कोशिश करता है. इसका एक ऐतिहासिक कारण है.
दरअसल भारत का इतिहास व उसकी परंपरा मिथकीय कथाओं और लोककथाओं एवं लोक स्मृतियों में समाहित है. इतिहास को हासिल करने के लिए उसे इन तमाम कथाओं को डिमिस्टीफाई करना पड़ता है. परिणामस्वरूप वह कथाओं को विराट प्रतीक की तरह देखने लगता है. यह तरीका विनोद जी के उपन्यासों पर लागू करने का नतीजा क्या होगा यह कहना तो कठिन है लेकिन इसे अनिवार्यतः प्रतीक की तरह पढ़ना घातक हो सकता है. विनोद जी कार्य-कारण द्वित्व के पार्श्व में देश और काल यानी स्पेस और टाईम के दोनों आयामों को बदल देते हैं. और यदि पाठक इस बदले हुए आयामों में नए बने हुए कार्य-कारण संबंध को स्वीकार करने के लिए तैयार है तो उसे कोई मुश्किल नहीं होती.
विनोद जी की कथाओं का जादुई संसार चाहे जो हो, मुख्य बात तो इन जादुई से लगने वाली कथाओं के भीतर अर्जित अनुभवों का कल्पनात्मक विस्तार है. विनोद जी उपन्यास लिखते नहीं हैं बल्कि उपन्यास कहते हैं. कहने में जो सादगी और कल्पनात्मक उड़ान हो सकती है वह उनके उपन्यासों में दिखाई पड़ता है. इस कहने में कथावाचक का चिंतन और विश्लेषण भी मिल जाता है. उनका उपन्यास कहना कोई भाषण देना या वृतांत उपस्थित करना नहीं होता इसलिए बहकने की तमाम गुंजाइशों को वे सहजता से खँगालते चले जाते हैं. अन्विति को कथा का मुख्य सूत्र मानकर पढ़ने वाले पाठकों के लिए विनोद कुमार शुक्ल के तीनों उपन्यास कठिनाई पैदा कर सकते हैं.
यदि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास के पाठ को देखें तो वे विशेष पैटर्न में लिखे हुए दिखाई पड़ते हैं. वह पैटर्न है उपन्यास की मूल कथा से जुड़ी हुई कोई घटना और घटनाओं के बीच के अंतराल को अपनी सोच और चिंतन से भरना. इस भरने में भुक्त अनुभव भी होते हैं और नई संभावनाएँ भी. भोगे हुए अनुभव और अनुभवों की संभावनाओं के रखने के क्रम में धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ का जातीय स्वरूप उभरने लगता है. यद्यपि ‘खिलेगा तो देखेंगे’ में वे कहते हैं –
“भविष्य के बारे में बुरा सोच सकने की कोई रोकटोक अपना विवेक नहीं करता पर अच्छा सोचने की स्वतंत्रता में बहुत रुकावट होती है.”
(पृष्ठ-18)
विनोद जी इस रुकावट से पार पा लेते हैं. इसलिए अच्छा और बुरा दोनों पर ही वे धाराप्रवाह सोचते हैं. इस सोचने के क्रम में जो सूत्र वे हासिल करते हैं उसे बहुत सादगी से अपने पाठकों को सौंपते हैं. इसे उनके उपन्यासों का हासिल कहा जा सकता है. यहाँ मैं उनके द्वारा दिए गए कुछ सूत्रों का जिक्र करना चाहता हूँ –
“कानून की किताबें सहज सरल होतीं तो धार्मिक होतीं. दोहे चौपाई में होतीं तो और अच्छा था.
(पृष्ठ-70, खिलेगा तो देखेंगे)
“किसान आदिवासी जहाँ सैकड़ों सालों से रह रहे थे वहीं के शरणार्थी हो गए थे.
(पृष्ठ-165, खिलेगा तो देखेंगे)
“कपड़ा पहने हुए आदमी भूखा मर सकता था. औरतें कपड़ा उतारकर पेट भर लेती थीं.
(पृष्ठ-171, खिलेगा तो देखेंगे)
“गुरुजी ईश्वर को अंतिम अनुसंधान का विषय मानते थे. वे हँसते थे कि विज्ञान ईश्वर का विरोध करता है पर बहुत से वैज्ञानिक ईश्वर का विरोध नहीं कर पाते.
(पृष्ठ-180, खिलेगा तो देखेंगे)
“हर बार नया देखने में उसे छूटा हुआ नया दिखता था. क्या देख लिया है यह पता नहीं चलता था. क्या देखना है यह भी नहीं मालूम था. देखने में इतना ही मालूम होता होगा कि यह नहीं देखा था.”
(पृष्ठ-31, खिलेगा तो देखेंगे)
“अपने बस में करने और अपना खरीदा गुलाम बनाने के तरीके बदल गए थे. सड़क के किनारे कोई आदमी थका हुआ सुस्ताने खड़ा रहेगा तो एक रौबदार आदमी आएगा और समझाते हुए कहेगा कि यह तुम्हारे खड़े होने लायक जगह नहीं है.”
(पृष्ठ-54, नौकर की कमीज)
घटनाओं के भीतर से संचित अनुभवों के सहारे उभरकर आए ये सूत्र उनकी चिंतन प्रक्रिया की कुछ बानगी है. यदि यथार्थवादी शिल्प में कथासूत्र और उसकी अन्विति का कठोर पालन करते हुए ये उपन्यास लिखे गए होते तो उसमें ऐसे सूत्रों के लिए कोई जगह नहीं थी.
विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास क्रूरतम होती जा रही सभ्यता का प्रतिपक्ष रचने के उपन्यास हैं. इसी प्रतिपक्ष में उनका जादुई होना अंतर्भुक्त है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि किसी महाविद्यालय का गणित का प्राध्यापक महाविद्यालय जाने के लिए हाथी की सवारी का उपयोग कर सकता है? या स्कूल की छप्पर के ढह जाने के कारण कोई उजाड़ पड़े थाने में अस्थायी तौर पर रहने लगेगा? निश्चित तौर पर ऐसी अनगिनत घटनाएँ अविश्वसनीय और जादुई लगती हैं. लेकिन इनके पीछे अपने समय के निश्छल बोध को पकड़ने की कोशिश है.
अपने उपन्यासों में वे जिस साधारणता को रचते हैं वह लगातार भव्य और अपनी भव्यता में आक्रामक होती जा रही दुनिया का प्रतिसंसार है. यह प्रतिसंसार ही दरअसल उनका वास्तविक संसार है. इसमें जो न्यूनताएँ और अभाव हैं वे किसी हीनताबोध से नहीं जन्मे हैं. यद्यपि ‘नौकर की कमीज’ में अभाव के कारण हीनता का एहसास है लेकिन बाद के अपने तीनों उपन्यासों में वे साहचर्य और एकाकार होने के रास्ते तलाशते जाते हैं. साहचर्य का आलम तो यह है कि ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में गाँव का सूदखोर बनिया जिवराखन साहू भी क्रूर नहीं लगता. और ‘खिलेगा तो देखेंगे’ में निहायत गणीतीय लगता हुआ विभागाध्यक्ष भी सहज और संयत दिखाई पड़ता है.
कई बार ऐसा लगता है कि सभ्यताओं की क्रूरताओं से ऊबकर वे उस जीवन की खोज और उसे स्थापित करते हैं जो आक्रामक निजता और अविश्वसनीय भव्यता से पहले की थी. इसलिए उनका रचनात्मक बोध जादुई लगता है. किंतु यह कहना होगा उनकी जादुई-सी लगती इन कल्पनाओं में यथार्थ की धारा ही बह रही है. यह पलायन नहीं है. यदि पलायन होता तो वास्तविक जीवन के अनुभव जब तब नहीं झलकते.
वस्तुतः विनोद कुमार शुक्ल ऐसे दांपत्य, पारिवारिक और मानवीय संबंधों को रचते हैं जो मौजूदा दौर में लगभग अविश्सनीय-सा लगता है. इसमें मनुष्यता की आत्मीयता और गरिमा है. इस आत्मीयता और गरिमा को समझने के लिए गुरूजी और उनकी पत्नी तथा दोनों बच्चों के साथ जिवराखन, कोटवार, डेरहिन के आपसी रिश्ते, रघुवर प्रसाद, उसकी पत्नी सोनसी और भाई छोटू तथा रघुवर प्रसाद के माता पिता, साधू, हाथी, विभागाध्यक्ष, या बोलू, कूना, भैरा, गुरुजी, छोटू के आपसी रिश्तों को देखना होगा. इन मानवीय रिश्तों को व्यापक ऊँचाई देती प्रकृति की भूमिका को भी समझना होगा. कहना होगा कि विनोद जी के उपन्यासों के सारे पात्र हमारे समय के ही हैं लेकिन उनका व्यवहार और अपने परिवेश से उनकी संलग्नता सृष्टि के क्रूर होने से पहले की संलग्नता है. इनमें मनुष्य से कम दर्जे के मनुष्य भी हैं जैसे थानेदार या बजरंग. लेकिन उनके मनुष्यता से कम दर्जे की क्रूरता को विनोद जी खासे निराले अंदाज़ में रखते हैं.
कह सकते हैं कि उनके उपन्यास में भी प्रति-मनुष्य हैं लेकिन वे सोचने में चाहे जितने वीभत्स हों, चित्रण में उतने वीभत्स नहीं जान पड़ते. इस कारण भी उनके पात्र जादुई से लगते हैं. जादुई लगने का एक मुख्य कारण उनके बोलने की सहजता भी है. उनके उपन्यासों के पात्र जिस सहजता से आपसी संवाद करते हैं उसमें मानवीय क्रूरताओं का प्रतिपक्ष स्पष्ट रूप में झलकता है. खासकर दांपत्य जीवन की प्रेममय बातचीत में तो यह प्रतिपक्ष विचार की तरह दिखाई पड़ता है. यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में रघुवर प्रसाद की माँ केवल एक बार सोनसी पर झल्लाती है जब सोनसी सोने के कड़े का बार-बार हवाला देती है.
विनोद जी के दोनों उपन्यासों– ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में सहज दांपत्य प्रेम की जितनी गरिमामयी ऊष्मा है उसे देखते हुए हतप्रभ ही हुआ जा सकता है. जब प्रेम और देह के आपसी रिश्ते व संलग्नता के इतने सारे दृश्य हमारे इर्दगिर्द उपस्थित हैं और इतने सारे पाठ दुनिया के साहित्य में बिखरे पड़े हैं, विनोद जी कैसे इनसे बच पाते हैं? कितनी गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय देते हुए उन्होंने लिखा कि मुन्ना-मुन्नी के होने के बाद उनके होने के पहले वाले कमरे में पति-पत्नी अब कम ही जा पाते थे या एक कमरे के छोटे से मकान में चोरी से रघुवर प्रसाद और सोनसी दीवार की खिड़की से निकलकर तालाब की ओर चले गए.
दांपत्य जीवन का सहज प्रेम संबंध तब और ऊँचाई प्राप्त कर लेता है जब सोनसी के एक पाँव की पायल वहीं छूट जाती है और रघुवर प्रसाद की माँ चुपचाप उसे सोनसी को सौंप देती है. ऐसे प्रसंगों में वे जिस सांकेतिकता का परिचय देते हैं वह एकबारगी चकित कर देता है. यहाँ यह कह देना ज़रूरी है कि जिसने सहसा गाँव हुए शहर, कस्बे या गाँव का सहज जीवन न जिया हो या जिसे जिसे छत्तीसगढ़ी जीवन-शैली का अंदाज़ न हो उसे विनोद जी के उपन्यासों के प्रथम पाठ में दिक्कत हो सकती है.
अब अंतिम बात, विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का प्रथम पाठ चकित करता है. सोचने के लिए बाध्य करता है कि क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन दुबारा-तिबारा पढ़ने से यह समझ में आने लगता है उनका ज़ोर इस पर नहीं है कि ऐसा हुआ है या हुआ होगा. इस होने में जीवन की सहजता के प्रति जागरूक करना ही उनका अभीष्ट है. इस जादुई से लगने वाले आवरण के भीतर यथार्थ की ठोस उपस्थिति है. जिसे अपने मुलायम वाक्यों और प्रसंगों के माध्यम से वे इतना तरल बना देते हैं कि उसे ग्रहण करने में कतई दिक्कत नहीं होती.
इस लेख के शीर्षक में मैंने जोड़ा था कि ज्ञान सुख की समझ देता था लेकिन सुख नहीं. विनोद जी ज्ञान की तार्किकता और समय की कठोरता को अपनी हार्दिकता से कोमल बनाकर अपने पाठक को सौंप देते हैं. जैसे यह उनकी केवल लेखकीय जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी भी है.
![]() 25 मार्च, 1972, भिलाई नगर (छत्तीसगढ़) प्रकाशित कृतियाँ हैं- ‘मौजूदा हालात को देखते हुए’, ‘सहसा कुछ नहीं होता’, ‘उत्सव की समाप्ति के बाद’, ‘नागरिक समाज’, ‘घड़ी दो घड़ी’ (कविता-संग्रह); ‘शब्द’ (कहानी-संग्रह); ‘प्रसंगवश’ (आलोचना). ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’, ‘डॉ. रामविलास शर्मा : जनपक्षधरता की वैचारिकी’, ‘मीरांबाई’, ‘मुक्तिबोध’ (सम्पादन). उन्होंने क्रान्तिकारियों के जीवन-दर्शन पर केन्द्रित सात पुस्तिकाओं का सम्पादन भी किया है. हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद – 211002 |
विनोद कुमार शुक्ला की रचना धर्मिता पर अच्छी संक्षिप्त टिप्पणी
एक समालोचक विपक्ष की बातें करते हुए पक्ष में चीजों को कैसे बना लेता है यह बसंत त्रिपाठी के इस आलेख से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है ।
बसंत ने जहां इशारे में असहमति की बातें की , वहीं सहमति का भाव भी बनाया । निश्चय ही कोई लेखक या कि कोई पदार्थ ही अपने निष्पति में संपूर्ण नहीं होता ! लेकिन कोई उम्मीद तो कर ही सकता है ! यहां ऐन समय में बसंत ने विनोद कुमार शुक्ल के पक्ष को मजबूती दी है । लाजिम है।
संक्षिप्त और सारगर्भित।
कुछ नये पहलुओं को रेखांकित करता आलेख।
इस अवसर के लिए एकदम उपयुक्त।
बसंत जी का विवेचन विवेकसंपन्न और मर्म भेदी है।
विनोद जी के लेखन का सारतत्त्व खिंचता औचित्यपूर्ण बायोस्केच.
बसंत त्रिपाठी जी ने विनोद कुमार शुक्ल जी के उपन्यासों का अंतर्पाठ प्रस्तुत किया है और उसे सामान्य पाठक की समझ तक पहुँचने का रास्ता बनाया है । महत्वपूर्ण लेख
संक्षिप्त किंतु सुचिंतित और सुनियोजित। सहमति-असहमति अपनी जगह किंतु इस आलेख से कुछ चीजें स्पष्ट हुई हैं। इसमें दो राय नहीं कि विनोद कुमार शुक्ल हिंदी उपन्यास परंपरा में एक सार्थक और सृजनात्मक हस्तक्षेप के रूप में उपस्थित हैं। बसंत जी ने ठीक ही कहा है कि कथासाहित्य को पढ़ने की रुचि को बदले बगैर उनके उपन्यासों का आनंद नहीं उठाया जा सकता है। कदाचित यही कारण रहा होगा कि ‘नौकर की कमीज’ से उत्साहित होकर जब ‘खिलेगा तो देखेंगे’ पढ़ना शुरू किया तो उसे पूरा नहीं कर पाया।
श्री विनोद कुमार शुक्ल अपने कथन में हद दर्जे के अहिंसक शब्दों से बातें करते हैं । ख़ुद को समझाने के लिए नौकर की क़मीज़, दीवार में एक खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे पढ़ लेता हूँ । शब्द चुपचाप मस्तिष्क के झंझावात को शांत कर देते हैं ।
बसंत जी त्रिपाठी ने विनोद जी की पुस्तकों की शानदार विवेचना की है ।
यह आलेख विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों को पढ़ने- समझने के लिए एक संतुलित दृष्टि और विवेक, कुछ महत्वपूर्ण सूत्र देता है। बसंत भाई, बहुत बढ़िया लिखा है।
विनोद कुमार शुक्ल की रचना-प्रक्रिया के स्तरों को स्पष्ट करता यह लेख, उनके पाठकों के लिए ज़रूरी बन पड़ा है। जिन पाठकों की दृष्टि में विनोद जी की कथा भाषा अबूझ या जादुई है, उन्हें इसके माध्यम से अपने समय और यथार्थ को समझने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही जिस शिल्प में विनोद जी कथा सुनते हैं, उसे पारंपरिक ढंग से उद्घाटित कर पाना भी संभव नहीं। यही उनका हासिल है, और पाठक को इस हासिल तक पहुँचने के लिए व्यापक जीवन और उसके विविध आयामों की समझ ज़रूरी है। जिन्हें बसंत जी ने बड़ी सहजता से स्पष्ट किया है।
उन्हें लेख के लिए और अरुण जी को इसे प्रकाशित करने के लिए हार्दिक आभार!
कवि बसंत त्रिपाठी ने अब विनोद कुमार शुक्ल की कथा कहने की कला का रहस्य उद्घाटित कर दिया है. शमशेर की कविता की याद दिलाते हुए वे शुक्ल जी के यथार्थ दर्शन को जिस तरह व्याख्यायित करते हैं, उससे विनोद जी के अचकचाए हुए पाठकों को उन्हें ग्रहण कर सकने की एक राह तो शायद मिले.
इसमें तो कोई शक नहीं कि विनोद कुमार शुक्ल के लेखन में एक अलग ढंग का आस्वाद है जिसमें वस्तु वाद, चिंतन और उससे उपजती लेखकीय दृष्टि का सम्मिलित समायोजन है.और वह कल्पना व्योम जिसे हम अब तक पहचानने का सामर्थ्य सहज ही अर्जित कर सके थे, यहाँ नए प्रकार की कुलाँचे भर रहा है और यही सबसे बड़ी दिक्कत भी है और अप्रकट सौंदर्य रहस्य भी.
बसंत त्रिपाठी ने इसके रहस्यों का उद्घाटन कर इस कथाकार को समझने की एक राह तो खोल ही दी है.
उन्हें बधाई..
विनोद कुमार शुक्ल के कथासाहित्य के मर्म को उद्घाटित करने वाला यह आलेख पठनीय है। वर्तमान उपभोक्तावादी समय में विनोद कुमार शुक्ल का जीवन बोध और कथा शिल्प दोनों ही अबूझ लगता है, पर यह जीवन को देखने का वह आदिम राग है जिसकी मासूमियत अब भी बरकरार है। उनका शिल्प जादुई इसलिए भी है क्योंकि वे तमाम व्यावहारिकताओं से अनभिज्ञ रहते हुए अपने आसपास को बालकोचित जिज्ञासा और भोलेपन से देखते हैं। अनायास नहीं है कि बाल साहित्य के प्रति उनकी गहरी आसक्ति है। बसंत सर को बधाई।
एक उत्कृष्ट रचनाकार ,अपनी रचनाओं में विभिन्न पक्षों को जितना उकेरता है उससे कहीं अधिक वह छिपा लेता है, पाठक वर्ग और आलोचक वर्ग के लिए।
एक प्रगल्भ आलोचक का कार्य है उन छुपे हुए पक्षों को सामने लेकर आना ।
इस दायित्व का निर्वहन आदरणीय वसंत त्रिपाठी जी ने प्रगल्भता पूर्वक किया है।
बेहतरीन आलोचनात्मक समीक्षा
बसंत त्रिपाठी की यह बात सही है कि किसी खाली बक्सा में कागज की कतरने डालो और जब बक्सा को खोलो पलटो तो उसमें से कबूतर निकले तो उसे जादू कहते हैं।बसंत की इस बात से भला किसी को क्या इंकार हो सकता है।अपनी भी सहमति है।विनोदकुमार शुक्ल के तीनों उपन्यास को लेकर उनकी यह बात इस अर्थ में आई है।वह इसे नाम देते हैं “जादुई यथार्थ या यथार्थ में जादू”।
कोई जादू में कबूतर निकाले तो उसे क्या कहेंगे कि वह जादूगर की कला है।तो इस तरह का जादू क्या होता है तो वह साहित्य में कलावाद है।कलावादी है अर्थ आएगा।वसंत ने भले कहीं इस अर्थ में अपने लेख में न लिखा हो पर उसका अर्थ यही आता है कि वह किसी कलावादी लेखक ही किताबों पर बात कर रहा है।इसी तरह की खोज में यात्रा है।
कलावाद की मीमांसा भी एक कलावादी आलोचक के रूप में होगी तो उसमें जादुई यथार्थ या यथार्थ में जादू वाले रूप में ही बात सामने आएगी।
बसंत का आलेख अशोक वाजपेई के उपन्यासों पर एक अच्छा कलावादी आलेख है।इसमें कोई संदेह नहीं है।अभी तक इस समय मे विनोदकुमार शुक्ल पर लिखे पर जो आलेख नजर से गुजरे हैं उनमें यह आलेख निश्चित ही विनोदकुमार शुक्ल के लिखे पर सबसे ऊपर में प्रमुख आलेख है।
पर जो भी हो भले बसंत ने यह आलेख में विनोद कुमार शुक्ल को कलावादी कहकर कहीं कुछ नहीं कहा है।पर उसने यही मानकर तो लिखा है।जादू से कबूतर निकालने की बात इसकी ताइत भी करती है।और जादुई यथार्थ की भी बात जादू की बात इसलिए आती है।मीमांसा भी इसी रूप में गढ़ी हुई है।
हम भी तो यही कह रहे हैं विनोदकुमार शुक्ल अपनी सीमा में असीमा में एक कालावादी लेखक है।भाई आप इस तरह में कलावादी है बात करो तो ठीक और हमने वही बात अगर सीधे कह देंगे तो हम गलत कैसे।ऐसा नहीं होता है।बसंत के लिखें के अर्थ में यही बात है और हम जो कह रहे हैं उसमें भी कोई फर्क नहीं है।सिर्फ फर्क इतना है कि जादू को घुमावदार कर देना।
बसंत की इस लिखे की तारीफ है पर इसमें खामी यह है कि असीमित कोई नहीं होता है पर उनके आलेख में विनोदकुमार शुक्ल असीमित रूप में है और यह विभिन्न रूप के व्यवहारिक दबाव के कारण हो सकता है।पर जो भी स्पष्ट है उसमें यह बात अलग से कहने की जरूरत भी नहीं है।उसके कहे में यह स्पष्ट है।आलेख में एक तरह यह बात भी जैसे विनोद कुमार शुक्ल को संभालने वाली बात भी लक्ष्य में है
अधिकांशतः हिंदी के पाठक व लेखक वैचारिक धरातल में जक तरह के मानसिक फ्रेम में फिट हो चुके हैं, अब वो दूसरे तरह की वैचारिक शैली को अपने पाठ्य के विषय में अवरोध या गौण की दृष्टि रखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल के सम्बंध में यह बात समझी जा सकती है। यह बात किसी पाठक या लेखक का दोष नहीं है, वरन समय का एक वैचारिक आग्रह है। वहरहाल विनोद कुमार शुक्ल मानुष्यता के गहरे पैठ के अन्वेषक हैं।