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Home » मुहावरे की मौत : पवन करण

मुहावरे की मौत : पवन करण

अनुराग अनंत के कहानी-संग्रह ‘मुहावरे की मौत’ की चर्चा कवि-लेखक पवन करण कर रहे हैं. यह संग्रह लोकभारती से प्रकाशित हुआ है.

by arun dev
January 23, 2026
in समीक्षा
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मुहावरे की मौत : पवन करण
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अपराध की दुनिया के नागरिक
पवन करण

 

दुनिया में हर कोई बेमेल जोड़ी चप्पलें पहने घूम रहा है. एक पैर में कोई चप्पल है और दूसरे में कोई और चप्पल. किसी की इच्छाएं पूरी नहीं हैं. कोई तृप्त नहीं हैं. सब अधूरे हैं. सब बेमेल हैं. सब बेढंगे हैं.

यदि मुझे अनुराग अनंत के कहानी संग्रह ‘मुहावरे की मौत’ की सभी कहानियों में से किसी एक चरित्र को नायक के तौर पर चुनने को कहा जाये तो मैं कहानियों में से किसी व्यक्ति के स्थान पर कहानियों की विषयवस्तु को नायक या नायिका के तौर पर ‘अपराध’ को चुनूंगा. अनुराग अनंत की कहानियाँ हिंदी कहानी का नया आस्वाद है जिनमें ‘अपराध’ इतने स्वभाविक और स्थायी रूप में मौजूद है कि आप उसे स्वीकार करने में देरी तो कर सकते हैं मगर उसे अस्वीकार नहीं कर सकते. आपके पास समाज, परिवार और मनुष्य के मानस में गुथे इस अस्वभाविक अपराध वैविध्य को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं. कभी अनुराग से मुलाकात हुई तो पूछूंगा. क्या तुम अपनी कहानियों की इस आपराधिक दुनिया के नागरिक हो. तब कमाल है कि तुम इसे इतनी जबरदस्त उत्तेजना के साथ कहानी की शक्ल में इसे कागज पर उतार भी देते हो. तब तो अपनी कहानियों के नायक भी तुम ही हुए. यदि नहीं हो तो फिर इसके भीतर इतनी आवा-जाही कैसे कर लेते हो. ये बिना खास किस्म का दिमाग पाये संभव नहीं.

अनुराग अनंत

जैसा कि मैनें कहा ये हिंदी कहानी की अलग दुनिया है मगर उसकी इस पहचान के पकड़ में आते जाने के बावजूद इसे अपराध कथाओं की परिष्कृत श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. जद्दोजहद ये है कि इसे कहानीकार की निरंतर उर्जस्वित कल्पना और प्रयुक्त भाषा का समृद्ध ज्ञान अपनी सीमा में बनाये रखता है. यहाँ अनुराग के खास विशेषण का पूरे उत्साह से उल्लेख करना चाहूंगा और वह यह कि वे अपनी भाषा में बस कहानी ही नहीं लिखते बल्कि वे अपनी भाषा को भी अपनी कहानी का हिस्सा बना लेते हैं और उनकी कल्पना के आकाश में तो उनकी भाषा की उड़ान देखते बनती है. उनकी कहानियों की भाषा और कल्पना को भी मैं उनकी कहानियों में अपराध के सहपात्र के रूप में देखता हूं. संभव है कि उनके कहानी संग्रह ‘मुहावरे की मौत’ की कहानियों को पढ़ने के दौरान आप मेरी इस बात से सहमत हों और उनकी कल्पना के हाथों कथ्य की आंच पर किसी धातु की तरह उनकी भाषा का तुड़ना-मुड़ना देखें.

जब कहानियों के केंद्र में समाज में कहीं चहलकदमी करता और कहीं तेजी से भागता अपराध हो तो कोई कथाकार उसमें रात के विस्मयकारी रहस्य भरे अंधेरे, अस्वीकार्य टोनों-टोटकों और जीवनघाती-कर्मकांड को अपनी कहानियों में आने से कैसे रोक सकता है. उस देखे-समझे-सुने को कैसे अदेखा और विस्मृत कर सकता है. घरों के भीतर चाहे-अनचाहे पलने वाले और दिखाकर या छुपाकर किये जाने वाले वे आपराधिक तांत्रिक-कार्यों को जो दंड-विधान और दंड-प्रक्रिया तक नहीं पहुंचते को रोक पाने में कथाकार भी खुद को असमर्थ पाता है. शायद यही वजह है कि वह स्वयं के स्तर पर अपने भीतर उसके थमने-बदलने की ऐसी कल्पना करता है जिसे वह लिखता नहीं मगर उसके कारण को उजागर जरूर करता है. संग्रह की अंतिम कहानी ‘रजस्वला’ उसका अत्यंत आपराधिक, पीड़ादायी और मर्मभेदी उदाहरण है. दुखद यह है कि उसके कारक के रूप में यहाँ भी एक कुख्यात पिता-पुत्र और पुरुष के मित्र की शक्ल में पहचाना पुरुष मौजूद है और उसकी ‘आज्ञा’ का आनंद उठाती हुई, अपनी सी स्त्रियों को डसते जाते हुए, सदियों से से उसका अनुशरण करती जातीं स्त्रियाँ. पितृसता के हाथों में स्त्रियाँ उस घातक टूल्स (औजार) की तरह हैं जिन पर धार चढ़ाकर वह उन जैसी स्त्रियों की हत्या करती और अपने हाथों के औजारों को, अपने हाथों में नचाकर जश्न मनाती है.

कल्पना और मनोविज्ञान क्या दोनों एक ही दशाएं हैं. शायद नहीं. मगर अनुराग अनंत की कहानियों में हम उन्हें आपस में रगड़ खाते हुए चलता देख सकते हैं. चलते हुए उनके कंधे इतने नजदीक होते हैं कि वे आपस में घुले-घुले नजर आते हैं. संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मुहावरे की मौत’ के पात्रों की मनोदशा के विषय में तब आप क्या कहेंगे. जब कहानी के मुख्य पात्र एक खास तरह के मनोविज्ञान से ग्रस्त होकर लेखक की कल्पना का रोचक हिस्सा हों. केंद्र में रहकर एक ‘दिललूट’ अभिनेत्री का चुंबक कथा को अपनी ओर खीचता हो और जिसमें कोई नमक सा घुलकर कोई पानी-पानी और कोई धुआं-धुआं होकर अपने अंतिम अदृश्य में समाहित होता हो. मगर इस एक कहानी में से दूसरी कहानी का फूटना. एक अंत के बावजूद उस अंत में से एक और अंत का उभर आना आश्चर्य से भरता है. मगर जैसा कि मैनें प्रारंभ में कहा. बदले से भरे सिने-दृश्यों की तरह गोलियों-गालियों के बौछार में अल्प अवधि के लिए नायक-नायिका को जन्म देता अपराध और उसका विश्वास-अविश्वास दिलाता अपराध यहाँ भी मौजूद है. दृश्य खुद को दोहराता है. बस उसके पात्र बदलते हैं.

स्त्रियों को लेकर पुरुषों की यौनहिंसा, यौन आक्रामकता के प्रतिकार के रूप सर्वप्रथम, बचने के लिए किए जाने के दौरान पीड़िता की स्वभाविक चीखें और पराजय के पश्चात आंखों से झरते आंसू और कही जाती व्यथा सामने आती है. मगर अनुराग की कहानियों की स्त्रियाँ रोती- बिसूरतीं नायिकाओं नहीं. बल्कि वे स्वयं के लिए सक्रिय स्त्रियाँ हैं. वे पुरुष नामक ठिये पर खूटे की तरह गड़ी स्त्रियाँ नहीं हैं बल्कि वे चलायमान हैं उनके पैरों में चप्पलें हैं भले ही वे बेमेल क्यों न हों. जिन्हें पहनकर चला जा सकता है. गर्मी से पिघलती और सर्दी से बर्फाती सड़क पर यात्रा की जा सकती है. किसी कहानी में तो अपनी यौन-आवश्यकता की पूर्ती के लिए उन्हें अपराधियों जैसा दिखने से कोई परहेज नहीं. चाहे ग्रांड इवेंट कहानी के नायक की मां हो, गैर जरूरी कहानी में व्यापारी की पत्नी अथवा मीरा पिताजी और मासूम पेंटर की मीरा. तीनों कहानियों में तीनों स्त्रियों की काम-आकांक्षा आपराधिक है. इन स्त्रियों को देने के लिए परंपरागत संबोधन भोंथरे होगें. इनके लिए नये शब्द गढ़ने होंगे.

मगर अनुराग अनंत की कहानियों में किसी स्त्री के साथ कोई बलात्कार दर्ज न होकर भले ही उनकी मृत्यु दर्ज हों मगर पुरुषों के साथ अप्राकृतिक मैथुन की अमानवीय घटनाओं से उनकी कहानियों का रोजनामचा भरा है. ताकतवर पुरुष-सत्ता की यह विकृति, जिस पर बात हो कि वह काम के हिंसक आनंद से भरा दंड देने के लिए स्त्री की योनि और पुरुष की गुदा को चुनती है. इन कहानियों में यह सामान्य है. यह होता है इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है. मगर अनुराग की कहानियों में यह मुख्य रूप से होता है. ‘सुधा चंदर आर बरेली के झुमके’ के नायक के साथ यह होता है तो ग्रांड इवेंट में तो ब्याज बसूली के लिए दंड देने के लिए लिंग को डंडे में बदल लिया जाता है. फिर इसी कहानी का रेखा की चाकरी करके लौटा एक और पात्र तो ऐसा खुले आम है.

‘मीरा, पिता और मासूम पेंटर’ कहानी का मासूम पेंटर या एक जरूरी कहानी के आर एस बंजारा की ‘वहाँ’ से निकलती चीखें पाठक को जुगुप्सा से भर देने के लिए बहुत हैं. लगता हैं जैसे की अप्राकृतिक दंड सहन करतीं मनुष्य देह भी ने अपनी अमानवीय असहनीय पीड़ा को व्यक्त के लिए चीखना सीख लिया है. फिर यही बात जो मैं इन कहानियों को लेखक से पूछना चाहूंगा आखिर ये क्या है भाई. आखिर तुम्हारी कहानियों की दुनिया इतनी बुरी कठिन और नग्न कैसे है. पीठ के बल हो जाने के क्रम में हारते पुरुष इतने अपमानित और विवश कैसे हैं. अपनी यौन आवश्यकताओं को अपराध की हद तक ले जातीं, उनके लिए शर्मिंदा न होने और खुद को गलत न मानने को तैयार तुम्हारी कहानियों की स्त्रियाँ इतनीं कठिन कैसे हैं? क्या वे कहीं भी इसके लिए शर्मिंदा नहीं होतीं. अकेले में भी नहीं. अपने आगे भी नहीं. फिर अपराध तो अपराध है स्त्री का किया जाता हो अथवा पुरूष का. उस पर बात हो होगी ही. क्यों हम पुरूषों ने स्त्री को उसकी यौन आवश्यकताओं की पूर्ती के लिये इस हद तक पहुंचा दिया है कि वे हम पुरूषों की ही नकल करने लगी हैं और इसके लिए उनके मन में कोई झिझक अथवा पश्चाताप नहीं है. कहानियों की स्त्रियाँ मेरी स्मृति में ठीक पुरूषों की तरह बेशर्म हंसी हंस रही हैं. मुझे इस पर भरोसा करने में कोई संकोच नहीं कि ये समाज में मौजूद वे स्त्रियाँ जो इन कहानियों में चलकर आ गई हैं.

‘त्रासदी का सिद्धांत’ और ‘सुधा चंदर और बरेली का झुमका’ कहानी में कुछ राहत मिलती है तो संवेदना सतह पर उभर आती हैं. आंख कुछ गीली होती मिलती है. आखिर प्रेम और अपराध के द्वंद्व में प्रेम हमेशा ही पराजित हो यह आवश्यक नहीं मगर यहाँ भी इन कहानियों का अंत कोई सुखद नहीं. मर्म यहाँ भी बिंधता चला जाता है. जहाँ ‘त्रासदी का सिद्धांत’ कहानी में एक वाक्य अपराधी की तरह सामने आ खड़ा होता है तो ‘झुमका’ में कहानी का अंत पीड़ा का आख्यान बन जाता है. उल्लेखनीय यह है कि संग्रह की अन्य कहानियों की तरह इन कहानियों में से कोई अन्य कहानी या कहानियाँ नहीं फूटतीं. किसी रास्ते की तरह विस्तार में से नव विस्तार नहीं निकलता तो संवेदना का प्रवाह प्रारंभ से अंत तक बना रहता है . जबकि अन्य कहानियों में संवेदना के बहाव को खेत में पानी के लिए नहर को काट लेने के लिए की तरह काट लिया जाता है. जो कथावस्तु के मूलप्रवाह को वाधित करता है.

फिल्मों का दैनिक इतिहास लिखने वाले सुप्रसिद्ध सिने समीक्षक जयप्रकाश चौकसे अपने नियमित स्तंभ में लिखते थे सिनेमा में सबसे बड़ा सितारा सेक्स होता है. वे जीवित होते तो अनुराग अनंत की कहानियाँ पढ़कर खुद को संशोधित करते और उसमें अपराध और जोड़ते. अनुराग अनंत की कहानियाँ दृश्य निर्माण में निपुण कहानियाँ हैं.

यदि हम इस कहानी संग्रह को सिनेमाहाल कहें तो हम इन कहानियों में तेजी से एक दृश्य से दूसरे दृश्य में प्रवेश करते हैं. इसकी सिनेमेटोग्राफी (भाषा) और सेट ( बिंब) कमाल के हैं. जो जमकर चौकाते और आश्चर्य में डुबाते हैं. हिरण की उछाल जैसा बिंब मिश्रित भाषा का उपयोग तो लगभग जादू जैसा है. किसी घटना व्यक्ति या वस्तु को नये तरह से देखे-लिखे-कहे जाने की उनकी विशेषता उल्लेखनीय है

कहानी संग्रह से कुछ पंक्तियाँ जिन्होंने मुझे रोका. पढ़ने के दौरान जिनसे आपकी मुलाकात होगी.

 

उस रात चाँद का अपहरण कर लिया गया था. सियारों के घर शायद कोई मर गया था. सबके सब रो-रोकर जान दे देना चाहते थे. तालाब का पानी काला और कुए का पानी खारा हो गया था
*
मुझे अतीत से चिढ़ है. घिन आती है मुझे अतीत से. अतीत मृत हो चुकी, बीत चुकी चीजों का एक गन्धाता हुआ अजायबघर की लाश
*
वह बचपन में जरूर तितलियों के पंख नोचकर मुस्कराता होगा. फूलों को मिलकर अपनी उंगलियाँ सूंघता होगा. अपने से छोटे बच्चों को तमाचा मारकर रुला दिया करता होगा और बड़ों को गाली देकर भाग जाता होगा.
*
उनके आंगन में हमेशा उदासी खेलती रही, कभी कोई बच्चा नहीं खेला. उन दोनों ने अपनी-अपनी उदासियों को अपने बच्चों की तरह प्यार किया.
*
दुनिया में कबाड़ की कमी नहीं थी.
*
उसने औरत को पहले बर्फ से पानी बनाया और एक रात भाप में बदल दिया. पक्षी तो वह उसे जब तब बनाता रहता. वे बर्फ पानी भाप खेलते रहते. वो उड़ती रहती और आकाश सा वह उसकी उड़ान अपने भीतर समेट लेता.
*
प्रेम में प्रतीक्षा का गुण होता है. प्रेम प्रतीक्षा करके मारता है. वह बरसों बरस घात लगाए रहता है और किसी रात हत्या कर देता है.
*
जनता ऐसे हंसी जैसे बंदूक गोली चलाते समय हंसती है.
*
किसी के होने से हम उसका होना नहीं समझते. किसी के न होने से हम उसका होना समझते हैं. जो हमारे पास नहीं होता बस वही हमारे पास होता है. जैसे पानी होने पर हमें पानी की कीमत पता नहीं चलती है. और पानी न होने पर हमें हर जगह पानी दिखने लगता है.
*
बारिश की बूंदों का अपहरण कर उन्हें ज़मीन के भीतर आग की छोटी कोठरियों में क़ैद कर दिया गया है.
वो बर्फ के खेत में आग बो रही है.
*
वह इतनी गैर-जरूरी ढंग से ख़ूबसूरत थी कि रात को उसका चेहरा देखने पर दोपहर का भ्रम होता था और भरी दोपहर में उसकी जुल्फें घनी रात कर सकती थीं. वो अपनी आंखों का काजल चांद के चेहरे पर लगा देती थी तो अमावस हो जाती थी. लोगों के सपने में आकर वह नींदें चुरा लिया करती थी.
*
मन की भाषा किसी शब्दकोश की मोहताज नहीं होती.

संग्रह यहाँ से प्राप्त करें.

पवन करण
(
 18 जून, 1964; ग्वालियर,म.प्र.) 

प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.
सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित.
pawankaran64@rediffmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाअनुराग अनंतपवन करणमुहावरे की मौत
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