मच्छरदानी में मच्छरों का एक जोड़ा घुस आया था. उनकी भनभन सुनकर शब्द का पीछा करते हुए गोबरगौरी तालियाँ बजा बजाकर उन्हें मारने को पलंग पर उछल रही थी. यह पलंग एक व्यक्ति के सोने के लिए ही उचित था किन्तु इसपर गोबरगौरी, यज्ञदत्त और मैं जैसे तैसे सोते थे. उसपर मच्छरदानी बाँधने से पलंग और छोटा लगता था. यह पलंग बिस्तरे समेत गोबरगौरी के पिता पण्डित नटेश्वरचन्द्र बटेश्वरचन्द्र नागर ने मुझे दहेज में दिया था. शीशम का नक्काशीदार और मजबूत, हम दोनों के गृहस्थ जीवन का साक्षी यह पलंग कितनी मुश्किलों से इस इमारत के दूसरे माले तक पहुँचाया गया था. पिताजी जी जब इसे कुमुद के कमरे में रखवाने लगे जो कुमुद के जाने के बाद से मेरा कमरा बन गया था तब मुझे कितना संकोच हुआ था. गोबरगौरी लज्जा से भूमि में गड़ी जा रही थी.
इसी पलंग पर जब मैंने गोबरगौरी का एक बार हाथ पकड़ा था वह मूर्च्छित हो गई थी और मैं पसीना पसीना हो गया था. उसके बाद इसी पलंग पर हम दोनों ने एक दूसरे से परम निर्लज्ज खेल किए थे. इसी पलंग पर यज्ञदत्त का जन्म हुआ था जिसके बाद इस पलंग के नीचे अजवायन और अगरु जलाए जाते थे. इसी पलंग पर दुलाई में छुपकर गोबरगौरी मुझे अपने जापे का लड्डू चुपचाप खाने को कहती थी क्योंकि उससे वह लड्डू खाए न जाते थे. मुझसे गुस्सा होकर इसी पलंग को त्यागकर कितनी बार गोबरगौरी भूमि पर सोती थी और उसे मनाने के लिए मैं भी उसके साथ भूमि पर लेट जाता था. इसी पलंग पर १७ सितम्बर को मेरी गर्भवती पत्नी अन्नपूर्णा उर्फ़ गोबरगौरी ने प्राण त्याग दिए थे.
“कौन ताली पीट रहा है आधी रात को! हल्लागुल्ला कर रहे है इतने बड़े ढींगरे हो गए. बच्चे के बाँ और बाप हो गए बचपन्ना नहीं छूटता” गोबरगौरी की मच्छरमार तालियाँ सुनकर बुआ चिल्लाई, “मेरा गंगाशंकर बेचारा दिनभर खपकर दो घड़ी नींद निकाल ले मगर नहीं- नाच-गाना, ताली-मंजीरे, रासलीला सब अभी होगी. गृहस्थी में तीन तीन गुरुजन है उनका न संकोच न गोद के गोपाल के आगे लज्जा. मैं कहती हूँ मलाई खाओ मगर कम्बल ओढ़कर चुपाई मारकर मलाई खाओ” बुआ बड़बड़ाती जा रही थी. पिताजी मेरे ब्याह के बाद से ही बैठक में सोते थे बुआ वहीं भूमि पर गद्दा डालकर पड़ी रहती थी सो बुआ की बड़बड सुनकर पिताजी कुनमुनाए. “गधेड़ा भी दिनभर का बोझा ढोते थककर सो जाता है मगर ये अनूठे धनी-लुगाई हुए है ढोर-डाँगर की जाँगर पाई है जानो. बड़ी धन्नासेठ की चोदी है भोर होते है चाकर-दासियों की रेजीमेंट लगी है इसके वास्ते” बुआ बोलती ही जा रही थी. गोबरगौरी श्वास भरना रोककर चित्रलिखित सी बिस्तर पर बैठी थी. इतनी भयभीत थी कि लेट भी नहीं पा रही थी कि कोई आवाज न हो. “मैं डोकरी-जान दो घड़ी का विश्राम मुझको यहाँ मुहाल कर रखा है” बुआ ने आगे कहा ही था कि पिताजी चिल्लाए, “कौन बड़बड कर रहा है आधे घण्टे से! सोने नहीं देता” पिताजी बुआ का मान रखते थे बड़ी बहन को सीधे एक शब्द नहीं कहते थे.
बुआ को अनिद्रारोग था. चोरों का खटका उन्हें लगा रहता था. चूहों से गृहस्थी की रक्षा करना वे अपना बिल्ली से बढ़कर कर्तव्य समझती थी. इमारत के अन्य लोगों के रात्रिकालीन आवागमन की जासूसी करना उनका परम धर्म था. थोड़ी भी आवाज होने पर वे तुरन्त उठ जाती और अपनी लाठी उठाकर घरभर का चक्कर लगाती, कभी कभी अधिक उत्तेजित होने पर लाठी भाँजने लगती थी. इमारत का कौन मानुष कितनी बजे पाखाने गया, किसे क़ब्ज़ है किसे संग्रहणी उन्हें सबका समाचार रहता था. गोबरगौरी को कभी असमय हाजत निपटाना होती तो बुआ संग जाती और पाखाने के आगे लाठी भाँजती रहती. पूरी इमारत को पता लग जाता आज गोबरगौरी दो बार गई है.
रसोइया महाराज और मैं चौदह जुलाई को नॉवल्टी नाटकगृह में सिनेमा नामक नाटक देखने जाएँगे इसका समाचार बुआ ने ही पिताजी को दिया था, “गंगाशंकर, इससे तो अच्छा है बाईजी का नाच देखने चला जाए अपना गोवर्धन. इसमें तो हाड़ माँस की असली फ़िरंगी नारियाँ अधनंगी होकर नाचेंगी”. पिताजी ने मुझे बुलाया और फटकारने लगे, “नाटक कम्पनी की नौकरी मैंने घर पालने को पकड़ी थी. यह नाटक-नौटंकी सज्जनों का दिवालिया निकालने की तरकीबें है. सुनते है सिनेमा तो घर उजाड़ने का साधन है. सिनेमा का कुटेव लगाना है तो अपनी गृहस्थी न्यारी कर लो”. उधर गोबरगौरी रूष्ट हो गई थी कि निवस्त्र फ़िरंगी नारियाँ देखने की मेरी योजना थी और बुआ जी की सर्वज्ञ दृष्टि के कारण उसकी गृहस्थी की रक्षा हुई. गोबरगौरी को कष्ट देने के कारण माँ भी मुझसे चिढ़ गई, “क्या तुमने बचपन से देखा नहीं तुम्हारे पिताजी का व्यवहार मुझसे कैसा रहा अब क्या गोबरगौरी का मन दुखाकर वंशपरम्परा का निर्वाह करने की ठानी है”.
दूसरे दिन इतवार की दोपहर जब बारिस्टर गाँधी के कमरे में एडमंड बुर्क का ग्रंथ Reflections on the Revolution in France पढ़ रहा था महाराज आ गया. पोटली में तम्बाकू, सिनेमा के समाचार और विज्ञापनों से भरा द बॉम्बे समाचार अख़बार और चायपत्ती का पूड़ा लिए हुए. “सिनेमा जाने पर पिताजी घर से निकाल देंगे. जाना सम्भव न होगा” मैंने घोषणा की. महाराज के मस्तक पर एक बल न पड़ा जैसे उसे पहले से ही पता हो कि हम जा नहीं पाएँगे. देर तक तम्बाकू के ढेर से कचरा बीनता रहा फिर उसने कहा, “महँगा भी बहुत था टिकट. पूरे एक रूपिया” फिर तम्बाकू को अख़बार में बाँधकर परे रख दिया. मैं सिगरेट के लिए अधीर हो रहा था, “क्या बात है आज सिगरेट नहीं लपेट रहे?” वह मुस्कुराया और अख़बार के कागज की भोंगली बनाकर उसमें तम्बाकू भरने लगा. उसकी आँखों में पानी चमक रहा था. हाथ पैर ढीले हो रहे है. “क्या तुम्हें ज्वर है महाराज?” मैंने पूछा तो उसने हाथ आगे कर दिया. छूने पर तापमान था. उसने कहा, “आज यही सो जाऊँ क्या? घर तक चलकर न जा पाऊँगा”.
“पिताजी से पूछना होगा. कहीं मकान मालिक नाराज न हो जाए” मैंने उत्तर दिया. पिताजी तो देर रात को लौटते थे. मैं चाहता था महाराज अपने घर ही चला जाए. पड़ौसियों ने यदि मकान मालिक को समाचार दिया कि हम लोग कमरों का उपयोग करते है तो मकानमालिक लड़ेगा और पिताजी को क्लेश होगा. महाराज ने धीमे से गरदन हिलाई और हल्के से मुस्कुराया. मेघ गरजे और ढेरों कौएं आकर खिड़की पर बैठ गए, काँव काँव करने लगे. महाराज कम्बल ओढ़े था उसी में चुपचाप बैठा रहा. मैं उसे फ़्रांसीसी क्रान्ति के विषय में बताता रहा. सायंकाल होते ही कमरों में ताला लगाने का समय हो गया. इस बार महाराज कुछ न बोला चुपचाप उठके बाहर आ गया और मुझसे कुंजी लेकर ताले में घुमाने लगा. मैंने अधिक बात इस भय से नहीं की कि चलने में महाराज अपनी असमर्थता न बताने लगे. कुंजी अंगुलि में घुमाता घर आ गया.
भोजन में आम रस और पूड़ियाँ बन रही थी. चाय की व्यसनी बुआ भी हो गई थी मेरे आते ही फौरन पतीली सिगड़ी पर चढ़ा दी. मेरी माँ ने चाय मसाले का आविष्कार किया था भले इसे संसार स्वीकार न करे. चाय में सोंठ, कच्ची हल्दी, इलायची, दालचीनी, काली मिर्ची, गुड़ और केसर डालकर वे चायपत्ती का काढ़ा तैयार करती थी. पिताजी ने भी इसे पीना स्वीकार कर लिया यह समझकर कि यह जुकाम और ज्वर की औषधि थी. बुआ के अनुसार वर्षों पुरातन उनकी आधसीसी की वेदना का निवारण इसी चायपत्ती के काढ़े से हुआ था. इतने तत्त्व डालने पर कई बार चाय का दूध फट जाता था इसलिए दूध ऊपर से डालने की अंग्रेज़ी रीति अपनाई गई. मुश्किलों से महाराज ने हमारे घर के लिए पीतल की केतली की व्यवस्था की थी. सिगड़ी पर खौलती केतली की नाक से निकलती भाप देखकर मुझे सहसा महाराज का ध्यान हो आया. किस प्रकार इतनी वृष्टि, अँधेरे और ज्वर में वह घर पहुँचेगा?
अंदर कपड़े बदलकर आया तब तक मेज़ पर भोजन लग चुका था. चिमनी की ज्योति में थालियाँ जगमगा रही थी. माँ खिचड़ी से धुँधुआता पतीला आँचल से पकड़ी बाहर निकली. “आमरस और पूड़ी बनी थी न भोजन में फिर यह मूँग की दाल की खिचड़ी कैसे!” एक गगरी में आमरस पकड़े बुआ आई और चिमनी से दूर उसे रखने लगी. पूड़ियों का डब्बा लिए पीछे से गोबरगौरी भी आ गई. “अरे अपने जूतों चप्पलों की अलमारी है न बाहर उससे लगकर गाँधी बारिस्टर का रसोइया महाराज बुख़ार में तपता पड़ा है. उसी के लिए बनाई है खिचड़ी. आज घर न जा सकेगा बेचारा. अभी गद्दा चद्दर देकर आई हूँ” माँ ने जल्दी से कहा और खिचड़ी की गरम पतीली लिए दौड़ी.
मैंने पहले कटोरी भर आमरस पिया पीछे पूड़ियाँ और आम का अचार थाली में लिया. माँ अब तक न आई थी. गोबरगौरी अपनी थाली सजाए बैठी थी और माँ के आने की प्रतीक्षा कर रही थी. “गोबरधन गोबर गौरी” माँ ने आवाज लगाई. इससे पहले हम दोनों उठते बुआ दौड़ी. “क्या हुआ गंगा?” बुआ चिल्लाती जा रही थी वह माँ को पिताजी के नाम से पुकारती थी. मैं और गोबरगौरी वहाँ पहुँचे तो देखते है महाराज आधी नींद में कुछ बड़बड़ा रहा था. “बुखार बहुत तेज है. सन्निपात हुआ है. दूध की पट्टी रखना होगी” माँ ने कहा. मेरे नाना पोरबन्दर में वैद्य थे और माँ को आधि-व्याधि- औषध आदि के विषय में थोड़ा ज्ञान था. फिर परमाश्चर्य घटित हो गया. बुआ जो अपने दूध के लोटे को अपने प्राणों से अधिक प्रेम करती थी और सोने से पूर्व आधा मुझे और आधा पिताजी को देती थी; वह दौड़ी दौड़ी गई और दूध का अपना लोटा ले आई. “तुम लोग भोजन करो मैं पट्टी रखती हूँ” माँ ने निस्संकोच भाव से कहा.
मुझे अपेक्षा थी कि बुआ इसके विरुद्ध होंगी कि माँ पराए पुरुष वह भी एक रसोइए के माथे पर भरी इमारत के दालान में पट्टी रखे किन्तु बुआ राजी होकर भीतर आ गई. मैं वहीं फ़र्श पर माँ के निकट बैठ गया. “भोजन बीच में छोड़ना अच्छा नहीं. जल्दी खाकर यहाँ आ जा, गोबरधन” माँ ने लोटे के दूध से निकालकर पट्टी लोटे में निचोड़ी. मुझे माँ को यह कहते संकोच हुआ कि यहाँ इस प्रकार से रसोइए की परिचर्चा करना ठीक नहीं, इससे माँ में विषय में लोग बातें बना सकते है. मैंने पट्टी माँ के हाथ से लेना चाही तो उन्होंने मुझे आँख दिखाई. माँ का मान खोटा हो यह मुझे स्वीकार न था मैं वही अड़ा रहा. “अरे, तेरी घरनी दो जी से है. ध्यान कर और जल्दी आ गोबरगिरधारी. गोबरगौरी कब से थाल सजाए बैठी है” बुआ ने पुकारा. मन मारकर मैं उठा और मेज़ पर जाकर जैसे तैसे दो पूड़ियाँ मुँह में ठूँस ली.
पलटकर आया तो देखा माँ तन्मय और निष्कामभाव से रसोइए की सेवा कर रही थी. इस बार मैंने माँ के हाथ से लोटा छीना और महाराज के माथे से पट्टी उठाकर लोटे में पटक दी. महाराज को सचमुच तीव्र ज्वर था. तापमान ऐसा था कि हाथ रखने पर अंगुलि जलती थी. “इन्हें अंदर सुलाए क्या?” माँ ने कहा. माँ की बुद्धि में विकार उत्पन्न हुआ था. इस तम्बाकू-चायपत्ती लानेवाले रसोइए से ऐसी भी क्या माया. “अंदर कैसे सोएगा? बैठक में फ़र्श पर बुआ सोती है” मेरे स्वर में कटुता थी. “तब तो यहाँ टाट बाँधना होगा. वर्षा के छींटे पड़ रहे है जब तब यहाँ” माँ ने कहा और दालान से बाहर खिड़की में देखा. भयंकर वृष्टि हो रही थी. इतने में महाराज ने आँखें खोली और क्षीण स्वर में कहा, “भोर हो गई क्या भूलन?” वह सन्निपात में बड़बड़ा रहा था.
गोबरगौरी मृत्यु उपरान्त कितनी अपरूप हो गई थी. उसके केश ही केवल ऐसे लगते थे जैसे किसी जीवित स्त्री के हो. जन्म कितना नैसर्गिक लगता है किन्तु मृत्यु नहीं लगती. मृत्यु आकस्मिक ही नहीं होती बल्कि अप्राकृतिक भी लगती है. शवों का वर्णन पूर्व के साहित्य में निषिद्ध है; धूल का, दूषित जल का, मलिन आकाश का वर्णन निषिद्ध नहीं. शव संसार से उतना ही परे होता है जितना साहित्य और उतना ही संसार में बना हुआ. साहित्य में भी शव उतना ही आकस्मिक लगता है जितना संसार में और दोनों में मृत्यु की उपस्थिति कथारस को तात्कालिक और अनेक बार पूर्णकालिक रूप से स्थगित कर देती है.
अम्बर पांडेय की कई कहानियाँ मैने समलोचन पर पढ़ी हैं। उनकी कहानियों की ख़ास बात उनकी लय बद्ध और सरस भाषा होती है। इतिहास और दर्शन का भी उन्हें ज्ञान है। विषय वस्तु अक्सर उच्च कुल के किसी पुरुष के जीवन की कोई घटना होती है और वही कहानी का सूत्रधार भी होता है। कहानी हम उसी के नज़रिए से देखते हैं । स्त्री पात्र अक्सर माँ या पत्नी के रूप में ही आते हैं और ज़्यादातर कहानी के अंत तक मर चुकी होती हैं। कहानी में उनकी भूमिका भोजन बनाने, परोसने, पति को रति सुख देने, बच्चा पैदा करने के अलावा कुछ ख़ास नहीं है। ऐतिहासिक किरदार, जैसे गांधी, सावरकर अक्सर इन कहानियों में विचारते दिखते हैं। हालाँकि कहानी की विषय वस्तु से उनका कोई ख़ास लेना देना होता नहीं है। वे किसी अलंकार की तरह यहाँ -वहाँ झूलते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह है कि यदि इन किरदारों को इन कहानियों से निकाल दिया जाए तो क्या कहानी मूल रूप से बदल जाएगी?
उनकी कहानियों में भाषा के अलावा मुझे कुछ ख़ास कभी नहीं मिलता। वे एक ही शैली में एक तरह की कहानियाँ लिखते हैं।
Vijaya Singh मुझे लगता है कि सावरकर और गांधी अलंकार नहीं काल की घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलते हैं। यह झूलना दृश्य और परिदृश्य दोनों रचता है। मुझे लगता है जैसी कहानियाँ उसके भीतर से इन दिनों आस रहीं, यह शैली उसी के ताप से है।हर रचनाकार अपनी शैली के भीतर कथ्य के अनुसार एक नयी शैली विकसित करता है। यही उम्मीद अम्बर से भी है।
एक रूपरेखा बनाकर किसी तरह शेक्सपियर की रचनाओं को भी एक दायरे में समेट सकते हैं। साहित्य के इतिहास में ऐसा करते भी हैं। पर उसको मूल्यांकन का आधार नहीं बनाते। उदाहरण के लिए हम यह नहीं कहते कि शेक्सपियर के दुखांत नाटकों मे निम्नलिखित तत्त्व काॅमन हैं, इसलिए उनका विशेष मूल्य नहीं है। मूल्यांकन के लिए हम दूसरे मानदंड इस्तेमाल करते हैं।
तथ्यात्मक रूप से भी आपका सामान्यीकरण इतना सही नहीं है। गांधी जिन टुकड़ों में आये हैं वे एक आने वाले उपन्यास के अंश हैं। अभी हम कैसे कह सकते हैं कि गांधी कथा में यों ही आ गये हैं। सावरकर वाली कहानी को फिर पढ़कर देखिए। सावरकर का चरित्र केन्द्रीय है। उस पर मेरा एक छोटा नोट भी है। दोनों समालोचन पर मिल जायेंगे।
फिर भी मुझे मानना पड़ेगा कि अबूझ भाषा में तारीफ करने वालों/वालियों की तुलना में आपकी नजर साफ और तीखी है।
जबरदस्त। अगर ये किसी उपन्यास के अंश हैं तो मेरी इच्छा इस कृति को समग्रता में एक जगह पढ़ने की है। इस हिस्से में मृत्यु, शोक, शव, मृत्यु पश्चात संसार आदि पर बहुत अर्थगर्भी और अनुभूत बातें हैं। लेखकों की आयु उनकी शारीरिक उम्र से नहीं, उनके सोचे, जिए और लिखे की व्यापकता और गहनता से समझी जानी चाहिए। अम्बर को पढ़ कर और अम्बर से मिल कर बार बार विस्मित होना पड़ता है कि वास्तविकता में गल्पस्वरूप है कौन ? जिसे हम जानते हैं वह यह सब कब देख सुन जी आया, और जो हमसे ओझल रहा , क्या हम उसी से परिचय के मुग़ालते में रहते रहे ?
इसे बार बार पढ़ना होगा, हमेशा की तरह। कविता हो या कहानी, प्रचलित जल्दबाज़, इकहरे सरल पाठ की आदतों को अम्बर की रचनाएँ अक्सर ठेस पहुंचाती हैं।
फिर कहूँगा : इस कृति को एक साथ पढ़ने की ललक बढ़ गई है।
अम्बर की कहानी तो मुझे दूसरे लोक में ले गई जहाँ मैं अपने प्रियजनों से मिल, उनकी स्मृतियों के साथ रोती, कभी चुप लगा उन्हें सुनने का प्रयत्न करती रही… यह उपन्यास का अंश है, ऐसा लगा नहीं.. उपन्यास है तो इसने बुरी तरह बेचैन कर दिया है पहले के अधूरे उपन्यास माँमुनी की तरह…. इंतज़ार बहुत मुश्किल हो गया है… अम्बर अपना स्थान बना चुके हैं… माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे🙏💕
सोने से पहले इस गद्य को पढ़ जाना सच में ख़तरनाक सिद्ध हो सकता है. अपने घनघोर और घटाटोप obsessions को खेलना-लिखना इस लेखक को हर बार नए सिरे से करना पड़ता होगा.. मुझे नहीं लगता अम्बर जोकि भाषा का अद्भुत धनी है उसे अपनी रची हुई ऐश्वर्यशाली दुनिया में एक पल की आश्वस्ति भी महसूस होती होगी. तलवार की धार पर हर वाक्य दम साधे स्वयं को शिल्पित करता है. कभी-कभी तो अम्बर के ध्वन्य्लोक में नाद के लावा बाकी हर तत्त्व धूमिल पड़ जाता है. इसलिए एक ही बैठक में कम से कम दो बार पढने को जी चाहता है.
मुझे अम्बर की दोएक कहानियों के लेकर जिस असहजता ने आ घेरा था यहाँ बिलकुल भी महसूस नहीं हुई. वहाँ भी दृष्टि-दोष मेरा स्वयं का हो सकता है. मुझे बहुत आनंद आया इस पाठ का अम्बर. आभार, कि तुम हो, और हिन्दी के उन दिनों में प्रकट हुए जब बीच-बीच में बेहद कमतरी का एहसास होने लगा था.
यह एक बड़े आख्यान का अंश है। पिछले अंश की तुलना में कथ्य अधिक palpable और quantifiable है।
भारत और यूरोप के इतिहास पर की गयी टिप्पणी ने क़ायल कर दिया। मृत्यु के प्रसंग और उसकी उत्तरकथा का काव्य विह्वल करता है। पूरे की प्रतीक्षा !
कहानी में लेखक अपने आत्मीय जनों की मृत्यु के बाद भी उनका जीवन और संसार में पुनर्निर्माण करना चाहता है। ये बड़ा ही रोचक है। सच है मृत्यु के बाद ही मृतक ही एक अदृश्य दुनिया हमारे साथ चलती रहती है। बस संवाद् नहीं होता।