कथा

मुर्दों का धरना : अशअर नज्मी

मुर्दों का धरना : अशअर नज्मी

कोई कहानी अपने समय का आईना कब बन जाती है, यह उसके शिल्प और दृष्टि, दोनों से तय होता है. अशअर नज्मी की कहानी ‘मुर्दों का धरना’ इस अर्थ में...

अपमान : कुमार अम्बुज

अपमान : कुमार अम्बुज

अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता...

कहानी : तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध : निधि अग्रवाल

कहानी : तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध : निधि अग्रवाल

अंधकार, नियति, छल और परिवर्तन के एज़्टेक देवता तेज़काटलिपोका (Tezcatlipoca) का अंतिम युद्ध सृष्टि-चक्र के आखिरी टकराव का प्रतीक माना जाता है. यह युद्ध प्रकाश और अंधकार के द्वंद्व से...

कहानी : बख़्शिश : एजाजुल हक

कहानी : बख़्शिश : एजाजुल हक

एजाजुल हक की कहानी ‘बख़्शिश’ उस यथार्थ की परतें उघाड़ती है, जो हमारे सामने होते हुए भी प्रायः अदृश्य बना रहता है और जिस पर अपेक्षाकृत लिखा भी कम ही...

विकल्प : अखिलेश सिंह

विकल्प : अखिलेश सिंह

अखिलेश सिंह के गद्य से आप सुपरिचित हैं. उनकी यह कहानी देखिए जहाँ आदमी अपनी भूख से ज़्यादा अपने भीतर की आवाज़ों से लड़ता है. एक मामूली-सी चोरी मनुष्यता की...

प्रभा नर्सिंग होम : जयशंकर

प्रभा नर्सिंग होम : जयशंकर

वरिष्ठ कथाकार जयशंकर कथा-साहित्य के साथ-साथ कथेतर गद्य में भी अपने आत्मान्वेषी और संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं, जहाँ स्मृति, अवसान और समय का बोध एक-दूसरे में घुलमिल...

प्रियंवद की नई कहानी : अबू आंद्रे की खुजली

प्रियंवद की नई कहानी : अबू आंद्रे की खुजली

दीपपर्व की शुभकामनाओं के साथ वरिष्ठ कथाकार प्रियंवद की नई कहानी, ‘अबू आंद्रे की खुजली’ ख़ास आपके लिए प्रस्तुत है. नगरीय जीवन की तलछट के नीम-उजाले, उघड़े-गोपन और मद्धिम-हलचल के...

रैगिंग : गोविन्द निषाद

रैगिंग : गोविन्द निषाद

वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने आयशा आरफ़ीन की कहानी ‘स्वाहा’ के संदर्भ में यह सवाल उठाया है कि ‘कहानीपन का निर्धारण करते समय कौतूहल को केंद्रीय स्थान दिया जाए या...

स्वाहा ! : आयशा आरफ़ीन

स्वाहा ! : आयशा आरफ़ीन

आयशा आरफ़ीन का कहानी-संग्रह ‘मिर्र’ इसी वर्ष राजकमल से प्रकाशित हुआ है. उनकी कहानियों में रहस्य का एक आवरण रहता है; घटनाएँ तेज़ी से घटती हैं और पाठक की दिलचस्पी...

रोज़ : अज्ञेय

रोज़ : अज्ञेय

1934 में अज्ञेय की कहानी ‘गैंग्रीन’ प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक बाद में स्वयं लेखक ने बदलकर ‘रोज़’ कर दिया. उस समय अज्ञेय मात्र 23 वर्ष के थे. हिंदी कथा-साहित्य में...

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