क्या है झोला पुस्तकालय आंदोलन? अजय कुमार
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल राजनीतिक मुक्ति का अभियान नहीं था; वह भारतीय समाज की आत्मा को पुनर्गठित करने का भी एक विराट प्रयत्न था. औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के...
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल राजनीतिक मुक्ति का अभियान नहीं था; वह भारतीय समाज की आत्मा को पुनर्गठित करने का भी एक विराट प्रयत्न था. औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के...
वर्तमान संकटों और चुनौतियों के बीच विचार की भूमिका केवल व्याख्याकार की नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व वहन करने वाली नैतिक चेतना की भी है. समय को समझने की अंतर्दृष्टि और उसे...
भारतीय लोक-वृत्त में प्रसारित कथाओं, पर्वों और अनुष्ठानों पर आलोचनात्मक चिंतन का सूत्रपात औपनिवेशिक भारत में हुआ, देशी और विदेशी लेखकों ने इनको न केवल सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पढ़ा, बल्कि...
गोविन्द निषाद जी.बी. पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में शोधार्थी हैं. यह आलेख जाति की बनावट और उसके बुनावट में होते रहे बदलावों की पड़ताल करते हुए विगत में हुए...
आज चौदह नवम्बर है. स्वतंत्र भारत के स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिन. इसे बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. शायद ही किसी अख़बार या किसी चैनल...
खेलों से जुड़ी लोकप्रियता का उपयोग सत्ताएँ करती रही हैं. तानाशाहों ने खेल को अपने होने के औचित्य के रूप में कई बार प्रस्तुत किया है, फुटबॉल इसका खास शिकार...
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के सवाल से भारत अपनी आज़ादी के संघर्ष से ही जूझता रहा है. इसका एक सिरा आत्म की खोज की तरफ जाता है तो दूसरा सिरा...
औपनिवेशिक भारत में स्तूपों की खुदाई, शिलालेखों और पांडुलिपियों के अध्ययन ने बुद्ध और उनके धर्म को भारत में पुनर्जीवित किया. बुद्ध के प्रति ज्ञान की स्थिति यह थी कि...
भारत जैसे देश में विडम्बनाओं का अंत नहीं, जिस संस्कृति ने प्रेम और दाम्पत्य का अद्भुत ग्रन्थ ‘कामसूत्र’ दिया हो, जिसके मन्दिरों में प्रेमरत युगल अंकित हों जिसके देवता प्रेम...
भारतीय ज्ञान परम्परा से संवाद का प्रतिफल है प्रसिद्ध राजनीतिक शास्त्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर की पुस्तक ‘ज्ञान की राजनीति: समाज अध्ययन और भारतीय चिंतन’. मणीन्द्र नाथ ठाकुर के लेखन की...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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