अलबत्ता, बातचीत की शुरुआत बड़े अनौपचारिक अंदाज में हुई. नामवर जी की साहित्य-यात्रा की शुरुआत कविताओं से हुई थी. विद्यार्थी काल में ही वे बड़े सुंदर गीत लिखने लगे थे और उतने ही सधे हुए, सुमधुर कंठ से उन्हें गाते भी थे. यह चर्चा मैंने कई जगह पढ़ी-सुनी थी कि जाने-माने गीतकार शंभुनाथ सिंह के साथ अकसर वे कवि-सम्मेलनों में जाते थे, और वहाँ उनकी एक अलग पहचान थी. पर अब शायद उस बारे में सोच पाना ही कठिन था. कितना ही चाहें, नामवर जी की वह छवि मन में कहीं अँटती ही न थी.
उसी की ओर इंगित करते हुए मैंने पूछ लिया,
“नामवर जी, आपने एक कवि के रूप में अपनी यात्रा शुरू की, फिर आपने आलोचनाएँ लिखीं और अब हिंदी के शीर्षस्थ आलोचकों में आपकी गिनती होती है. कृपया बताएँ, जब आपने लिखना शुरू किया था, तब क्या आप जानते थे कि यहाँ तक पहुँचेंगे…?”
सवाल सुनकर नामवर जी एक क्षण के लिए चुप रहे. जैसे समय की धारा में तेजी आगे-पीछे जा रहे हों. फिर एकाएक उनकी अविरल वाग्धारा जैसे फूट पड़ी. मेरी उँगली पकड़कर, कई दशकों पहले के अतीत में मुझे अपने साथ ले जाते हुए वे बोले—
“ऐसा है प्रकाश जी, कोई योजना बनाकर कभी कोई काम मैंने जीवन में नहीं किया. कविता से शुरू किया, कविता लिखना अच्छा लगता था तो लिखने लगा. ..उस समय प्रारंभिक दिनों में, कम से कम आलोचना लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं था. सन् 1951 में मेरा कविता-संग्रह प्रेस में छपने के लिए गया, तब मैंने एम.ए. कर लिया था. कविता-संग्रह का नाम ‘नीम के फूल’ रखा था. …यह संयोग ही है कि ‘बकलम खुद’ जो मेरा निबंधों का संग्रह है और ‘नीम के फूल’ एक साथ छपने के लिए गए. उन दिनों ‘साहित्य सहकार’ नाम से एक नया प्रकाशन जगदीश भारती ने शुरू किया था. वही छाप रहे थे. …तो ‘बकलम खुद’ की तो—जिसमें व्यक्ति-व्यंग्य तथा ललित निबंध ही थे, करीब दो सौ किताबें छप गई थीं और ‘नीम के फूल’ प्रूफ के लैविल पर ही था. तभी मकान मालिक से जगदीश भारती के कुछ झंझटों के कारण ‘साहित्य सहकार’ प्रकाशन बंद हो गया और ‘नीम के फूल’ मेरा पहला कविता-संग्रह कभी छपा ही नहीं. ”
पर क्या यह महज एक संयोग ही था? अगर नामवर जी का कविता-संग्रह ‘नीम के फूल’ उस समय छप जाता तो क्या वे आलोचना पथ के बजाय कविता की राह पर चल पड़ते? पता नहीं क्यों, मेरा मन यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था.
मन में गहरी जिज्ञासा और उत्सुकता थी कि स्वयं नामवर जी से ही यह बात पूछनी चाहिए. पर मैं पूछ पाता, इससे पहले ही उनका एकदम सधा हुआ जवाब सामने आ गया. उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा कि ऐसा नहीं कि वह संग्रह छप जाता तो वे आगे कविताएँ ही लिखते. इसलिए कि गद्य लिखने की ओर उनका रुझान काफी बढ़ गया था. ‘बकलम खुद’ में व्यंग्यात्मक निबंध ही ज्यादा थे. तो गद्य लिखने में उस समय उनकी दिलचस्पी तो जरूर थी, पर आलोचना में नहीं थी.
फिर आलोचना की ओर वे कैसे आए? इस बारे में भी उन्होंने बताया और इसका श्रेय प्रगतिशील लेखक संघ की विचारोत्तेजक गोष्ठियों को दिया. उन दिनों नामवर जी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे और काशी शाखा के सचिव थे. वहाँ काफी अच्छी और तेजतर्रार साहित्यिक गोष्ठियाँ हुआ करती थीं. बहुत से नए-पुराने लेखक उनसे जुड़े हुए थे, जो काफी पढ़ते भी थे. तो स्वभावतः गोष्ठियों में रचना-पाठ के साथ-साथ साहित्य के प्रश्नों पर गहन विचार भी होता था. इन गोष्ठियों से ही प्रेरित, प्रभावित, उत्तेजित होकर नामवर जी ने कुछ आलोचनात्मक लेख लिखे. यों आलोचना की ओर उनका रुझान हुआ जो आगे बढ़ता ही गया.
इनमें से दो लेखों की नामवर जी ने खासकर चर्चा की. पहला ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण’ और दूसरा ‘साहित्य में कलात्मक सौंदर्य की समस्या’. इनमें पहला निबंध शिवदानसिंह चौहान के कहने से लिखा गया और उसे उन्होंने ‘आलोचना’ के ‘इतिहास अंक’ में छापा. दूसरा लेखक ‘कल्पना’ के संपादक बदरीविशाल पित्ती के आग्रह पर लिखा गया था, जो संभवत: अक्टूबर 1952 की ‘कल्पना’ में छपा था. ये दोनों लेख नामवर जी की पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना’ में सकलित हैं. खुद नामवर जी के शब्द दोहराऊँ तो इन लेखों पर “मार्क्सवाद से नए-नए परिचय का प्रभाव स्पष्ट है. ” इसके बाद आलोचना लिखने का सिलसिला शुरू हो गया.
पर केवल यही एक कारण न था. आलोचनात्मक लेख लिखने का एक कारण और नामवर जी ने बताया. और वह यह कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. करने के बाद नामवर जी वहीं प्राध्यापक हो गए थे. अब अपने विषय को प्रभावी ढंग से छात्रों को समझाने के लिए भी इस तरह के लेखों की दरकार थी. नामवर जी ने बताया,
“तो उन दिनों अध्यापक होने के नाते- आप तो अध्यापक रहे हैं, इसलिए जानते ही होंगे- अपने विषय को बेहतर ढंग से विद्यार्थियों के आगे रखने और व्याख्यायित करने के लिए आलोचना की जरूरत पड़ती ही है. शायद यह पहला अवसर है जब सोचने पर मुझे लगता है कि मेरे आलोचना-कर्म में प्रवृत्त होने में मार्क्सवाद और अध्यापन-कर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका है. ”
नामवर जी की आलोचना की पहली पुस्तक ‘छायावाद’ है, जो सन् 1954 में छपी थी. भला इस पुस्तक को लिखने की जरूरत उन्हें क्यों पड़ी? इसका जवाब भी नामवर जी ने दिया. छायावाद की यह विडंबना है कि अकसर उसे रहस्य से मंडित करके कुछ और दुर्बोध बना दिया जाता है. तो इस बड़ी धुँधली-धुँधली और दुर्बोध लगने वाली काव्याधारा को सीधी, सहज भाषा में यथार्थ की भूमि पर रखकर प्रस्तुत किया जाए, इस विचार ने ही उन्हें ‘छायावाद’ पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया.
“छायावादी कविताएँ जितनी मुश्किल नहीं है, उससे ज्यादा तो मुश्किल उनकी आलोचना थी, मुश्किल भी और उबाऊ भी. लगता था, इससे ये सीधे कविताएँ पढ़ लेना ही बेहतर है…!”
नामवर जी ने थोड़ी खिन्नता के साथ कहा.
“जैसे डॉ. नगेंद्र की ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’- निहायत रूखी किताब..?” मैं कहता हूँ.
नामवर जी हाँ में सिर हिलाते हैं. फिर कहते हैं, “और भी आलोचकों ने छायावाद के साथ बिल्कुल इसी ढंग का बर्ताव किया है! या तो विद्वत्ता और पांडित्यपूर्ण लंबी-लंबी टीकाएँ या फिर समीक्षा के नाम पर भावपूर्ण उद्गार, ‘अरे-अरे’, ‘ओह-ओह’, ‘वाह-वाह’ आदि. ..तो सरल भाषा में और ऐसे ढंग से जिससे उन कविताओं का अर्थ और शक्ति उद्घाटित हो, छायावाद पर लिखने का विचार मेरे मन में आया. यह छायावाद पर कुछ इस तरह की समीक्षा थी, जिसे आजकल ‘क्रिएटिव समीक्षा’ कहा जाता है. ”
मुझे याद आया कि नामवर जी ने पुस्तक में अध्यायों के शीर्षक भी कुछ अलग ढंग के दिए हैं. उनमें प्रायः सुप्रसिद्ध छायावादी कवियों की कविताओं की पंक्तियों को ही अध्यायों का शीर्षक बनाया गया है. इससे एक अलग तरह का प्रभाव तो आता ही है. मैंने इस ओर इशारा किया तो नामवर जी बोले—
“हाँ, इसके पीछे कारण जो था और जो मंथन मेरे भीतर चल रहा था, वह यह कि छायावाद के विरोधी और समर्थक दोनों ही छायावाद को ठीक से समझे नहीं, या दोनों ही ठीक से छायावाद की व्याख्या नहीं कर पा रहे हैं. और यह काव्य एक चुनौती तो था ही, जिसे नकारना आसान न था. ..तो इस तरह छायावाद पर किताब लिखी गई. फिर कुछ और आलोचनात्मक लेख लिखे और मैं तेजी से आलोचना की ओर बढ़ता गया..!”
एक सवाल मेरे मन में बार-बार उठ रहा था. आलोचना की बात चली तो मैंने पूछ लिया, “डॉक्टर साहब, अगर इस बिंदु पर खड़े होकर आप अपनी पिछली सारी यात्रा पर निगाह डालें, तो एक आलोचक के रूप में अपनी भूमिका या अपने काम से आपको कितना संतोष है-कितना अवसाद?”
इस पर नामवर जी कुछ गंभीर होकर बोले,
“प्रकाश जी, अपने आलोचना कार्य से संतोष मुझे कभी नहीं रहा, बल्कि आप कह सकते हैं, जो कुछ मैंने लिखा, उसे लेकर एक तीव्र असंतोष का भाव मन में रहा है-अब भी है. ”
सुनकर मैं एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गया. एकदम अवाक. नामवर जी सरीखा हिंदी का मूर्धन्य आलोचक यह कहे, मेरे लिए यह सचमुच बड़े अचरज की बात थी. बल्कि अकल्पनीय.
“इस असंतोष का कारण..?” मैंने जानना चाहा. फिर कहा, “यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूँ, क्योंकि आप तो हिंदी के बहु-प्रशंसित आलोचकों में से हैं?”
सवाल सुनकर नामवर जी ने एक तरह के आत्म-स्वीकार या कनफेशन के साथ जो कुछ कहा, वह और भी हैरान करने वाला था. उन्होंने बताया कि,
“असंतोष का एक मुख्य कारण तो यह है कि मेरा जितना भी लेखन है, वह एक तरह से फरमाइशी है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने आलोचनात्मक लेखों को फरमाइशी कहा करते थे. बहरहाल, ऐसे लेखन में कुछ न कुछ अधूरापन रह ही जाता है जो मुझे बुरी तरह सालता रहता है. …”
फिर अपनी बात को कुछ और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, कि जो कुछ भी उन्होंने लिखा, वह तुरंत छप गया. उन्हें प्रकाशकों के पीछे भागने की कभी जरूरत नहीं पड़ी. बल्कि प्रकाशक ही उनके पास आए. लिहाजा उनका असंतोष न छपने को लेकर नहीं है, बल्कि जो वे लिख सकते थे, या जैसी पूर्णता के साथ लिख सकते थे, वैसा न लिख पाने का असंतोष ही उन्हें सालता है. मन की एक गहरी टीस के साथ उन्होंने कहा-
“लेकिन जब चीजें छप गईं तो मैंने, आपको सच बताऊँ, उन्हें कभी ढंग से पलटकर नहीं देखा. पीछे लौटकर देखना मेरी आदत नहीं रही..जो लिख लिया, उसे छोड़कर आगे बढ़ा. लेकिन इस सारी प्रक्रिया में यह तकलीफ तो है ही कि जो लिख सकता था- या जो कहीं बेहतर था, नहीं लिखा गया. .और काफी कुछ अधूरा छूट गया!…या बहुत-सा महत्त्वपूर्ण इसमें अनलिखा रह गया. समय-समय पर लेख लिखे गए, पुस्तक बन गई, पर बहुत-सा असंतोष भी मन में इसलिए रहा कि व्यवस्थित ढंग से जो करना चाहता था, नहीं हुआ. ”
एक बड़े आलोचक का इतना खरा और ईमानदार कनफेशन मेरे लिए एक बड़ी और लगभग असंभव सी बात थी.
“लेकिन ‘कविता के नए प्रतिमान’…?” मैंने पूछा, “डॉक्टर साहब, ‘कविता के लिए प्रतिमान’ में तो ऐसा नहीं लगता कि यह फरमाइशी लेखन है या कहें कि तात्कालिकता के दबाव में लिखी गई कोई चीज हो?…इसके पीछे तो गहरे दबाव और बड़ी तैयारी लगती है—नहीं?”
नामवर जी बोले,
“हाँ, आपकी यह बात सही है कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ ऐसे सवालों को लेकर लिखी गई जो मुझे बहुत अरसे से परेशान कर रहे थे. मेरी और पुस्तकों की तुलना में यह कहीं ज्यादा समय में और ज्यादा बँधे हुए ढंग से लिखी गई. लेकिन इस पुस्तक में भी बहुत कुछ छूट गया..बहुत कुछ अधूरा ही रह गया, जिसे इसलिए रहने दिया गया कि चलिए, यहाँ इतना ही काफी है, अब आगे किसी और पुस्तक में देखेंगे..!”
नामवर जी ने एक आलोचक के रूप में अपने असंतोष को बहुत साफ शब्दों में मेरे आगे रख दिया था. पर मुझे लगता है कि यह तो आलोचना की नियति है ही. उसे रचनाओं के पीछे-पीछे ही चलना है. रचनाएँ आगे निकलती जाएँगी, आलोचना को उसकी तुलना में पिछड़ना ही है. यहाँ बड़े से बड़ा आलोचक भी शायद कुछ विवश और असमर्थ है.
साहित्य में आलोचना की इस दोयम स्थिति की ओर इशारा करते हुए मैंने पूछा, “लेकिन डॉक्साब, आप एक और तरह से इस बात को देखें, मेरा कहना है कि आलोचना में यह तो होगा ही. रचना की तुलना में आलोचना में एक तरह का अधूरापन लगेगा ही. यह आलोचना की नियति है कि उसमें रचना की तरह का पूरापन कभी नहीं होगा और यही अतृप्ति या असंतोष शायद आगे के काम के लिए प्रस्थान-बिंदु भी बनता है. ..नहीं?”
नामवर जी ने मेरी बात से सहमति जताई. बोले, “जी!…आपकी यह बात बिल्कुल सही है और मैं इसे बिल्कुल ठीक मानता हूँ..लेकिन ज्यादा बड़ा असंतोष तो इस कारण है कि ज्यादा बड़े काम जो सचमुच बड़े काम हैं- और मुझे करने ही थे, जिन्हें कोई दूसरा नहीं कर रहा, छूटे जा रहे हैं!”
आगे उन्होंने बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी कुछ विवशताओं की ओर भी संकेत किया, जिनके कारण न चाहते हुए भी उनके पसंदीदा काम पीछे छूटते चले गए. नामवर जी ने बताया कि प्रारंभ में ही, जब वे आलोचना में आए थे, तभी तय किया था कि उन्हें कुछ काम करने हैं. लेकिन वे बीस वर्षों तक जिस विश्वविद्यालय में रहे, वहाँ अध्यापन की व्यस्तताएँ, और फिर महानगर की आपाधापी, इसमें वे काम एक ओर ही रह गए.
“प्रकाश जी, ये आधे किए हुए काम मुझे बहुत सालते, बहुत दुख देते हैं. मेरे असंतोष का मूल कारण ही यही है. मुझे मालूम है कि ये बड़े काम हैं और होने ही चाहिए. लेकिन तात्कालिक दबावों में ये छूटते जाते हैं और असंतोष और गहरा हो जाता है. ”
अपनी बात को पूरा करते हुए नामवर जी ने कहा.
इसी सिलसिले में नामवर जी ने बताया कि उनकी अधूरी आकांक्षाओं में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखना भी शामिल है. और यह आकांक्षा एक आलोचक के रूप में उनकी रचना-यात्रा के प्रारंभ से ही निरंतर उनका पीछा कर रही है. इसकी कुछ और विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा—
“उदाहरण के लिए मेरी यह शुरू से आकांक्षा रही है कि मैं हिंदी साहित्य का इतिहास फिर से लिखूँ, यानी हिंदी साहित्य के इतिहास का बिल्कुल नई दृष्टि से पुनर्लेखन किया जाए. आप मेरा पहला आलोचनात्मक लेख देखेंगे तो उसका शीर्षक है, ‘इतिहास और आलोचना’. ये दो चीजें हैं जो शुरू से मेरी चिंता कि केंद्र में रही हैं. इतिहास के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि और फिर इस इतिहास का आलोचना के प्रतिमान की तरह प्रयोग. ..”
नामवर जी हिंदी साहित्य का इतिहास लिखें तो यह कैसी अद्भुत बात होगी! मेरे लिए यह कल्पना ही खासी रोमांचक थी. और केवल मेरे लिए ही क्यों, अगर नामवर जी का यह इतिहास सामने आता तो पूरे साहित्य जगत के लिए यह एक सुखद विस्मयकारी बात होती. नामवर जी का साहित्य इतिहास लिखना शायद खुद ही एक इतिहास बन जाता.
मैं अपनी भावनात्मक दुनिया में गुम था, तभी नामवर जी का स्वर सुनाई दिया. वे कुछ सोचते हुए से आगे की अपनी योजनाओं के बारे में बता रहे थे. बोले, “इसी तरह मेरी एक इच्छा यह भी है कि मैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर एक पूरी पुस्तक लिखूँ. उसके लिए सामग्री मैंने इकट्ठी कर ली है. उन्नीसवीं शती के पुनर्जागरण पर भी पूरी एक पुस्तक की सामग्री तैयार है. …”
मेरे लिए ये किस कदर आनंद के क्षण थे, क्या मैं बता पाऊँगा? शायद इसे व्यक्त करने के लिए सही शब्द मेरे पास नहीं हैं. इसलिए कि मुझ जैसा मामूली लेखक नामवर जी सरीखे दिग्गज आलोचक की रचना-यात्रा, और यहाँ तक कि उनकी भविष्य की योजनाओं का भी साक्षी बन रहा था.
क्या जब मैं उनसे बात करने घर से चला था, तो इस बात की जरा भी कल्पना कर सकता था? नामवर जी ने अपने बड़प्पन से मेरे मामूलीपन को ढक लिया था. एक इंटरव्यूकार के रूप में ऐसे खुशी के क्षण कभी-कभार ही मिल पाते हैं.
नामवर जी को याद करना हिंदी साहित्य के एक दौर को याद करना है।
बहुत सुंदर. प्रिय अरुण देव जी, आप बहुत ही सार्थक और गंभीर साहित्यिक कार्य कर रहे हैं. मैं नियमित पढ़ता रहता हूँ. नामवर सिंह से संबंधित मेरे अनुभव बिल्कुल अलग तरह के हैं. उनको संचित कर रहा हूँ. समालोचन का कोई सानी नहीं. बधाई हो.
बहुत सार्थक बातचीत है,,लगभग हर पहलू पर,,साधुवाद
प्रकाश जी का नामवर सिंह जी पर केन्द्रित ख़ास तौर से उनके जन्मदिन पर जो लेखांकित संस्मरण है उसमें नामवरसिंह को लेकर उनका सम्मानीय दृष्टिकोण के
साथ-साथ कुछ अनसुलझे,अनछुये पहलुओं को भी रेखांकित किया है. गौरेतारीफ़ है.
नामवर सिंह से मेरी मुलाक़ात ( खड़े-खड़े ) राठीजी ने करायी,जेएनयू का परिसर था.उनकी कँटीली मुस्कान और कटाक्ष आज भी याद है ‘ महाकवि जा रहे हैं ‘ कवि का नाम विस्मृत हो गया लेकिन लहजा याद है.बहरहाल
अशोकजी का ‘फ़िलहाल ‘ सहित कई आलोचनात्मक किताबें आई, और साहित्य में छाये घनघोर रजत-श्याम बादलों से आच्छादित आकाश को, विस्तीर्ण धुन्ध को साफ़ किया है.
प्रकाश जी ने बेबाक़ी के साथ जो उल्लेख किये हैं, वे सच के साथ नामवर जी को आत्मसात् करते हैं. रामविलास जी को उद्धृत करते हुए उनके मन को खंगालना, दुर्भावना नहीं बल्कि सहजता थी.
प्रकाश जी को पढ़ते हुए उनसे बातचीत करना अच्छा लगता है.
वंशी माहेश्वरी.
नामवर सिंह ने एक साक्षात्कार में अपने आलोचना कर्म के बारे में कहा था कि मैं गया तो था कविता के मंदिर में पूजा का थाल लेकर लेकिन मंदिर की गन्दगी देख झाड़ू उठा लिया और बुहारने लगा। आलोचक की वही भूमिका होती है जो सेना में ‘सैपर्स एंड माइनर्स’ की होती है।सेना को मार्ग दिखाते, पुल-पुलिया बनाते वही आगे आगे चलता है और सबसे पहले मारा भी वही जाता है। यह भी कहा था कि आलोचक न्यायाधीश नहीं, मुकदमे के बचाव पक्ष (डिफेंस) का वकील होता है और वह भी इतना ईमानदार वकील कि मुव्वकिल से केस के संबंध में कुछ छुपाता नहीं। साफ साफ बता देता है कि तुम्हारा केस कमजोर है। फिरभी, जिरह करेंगे जीतने के लिए।वह साहित्य का सहचर है। प्रकाश मनु और नामवर सिंह के बीच का यह विशद संवाद ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए।इसमें कई महत्वपूर्ण बातें उभरकर आती हैं।उन्हें एवं समालोचन को बधाई !
आभारी हूँ भाई अरुण जी।
नामवर जी पिछले कोई पैंतालीस बरसों से मेरे मन और चेतना पर छाए हुए हैं। उन्हें खूब पढ़ा। उनके लिखे एक-एक शब्द को लेकर खुद से और अपने भीतर बैठे नामवर जी की छवि से अंतहीन बहसें कीं, यह एक अंनंत सिलसिला है।
लेकिन साथ ही मैंने उन्हें अपने गुरु के आसन पर बैठाया। ऐसा गुरु, जो शिष्य से यह नहीं कहता कि जो मैं कहता हूँ, वह मान लो। इसके बरक्स वे मेरे ऐसे गुरु थे, जो शिष्य को बहस के लिए न्योतते थे।
वे यह नहीं चाहते थे कि शिष्य ‘जी…जी’ करता उनके पास आए, बल्कि वे इस बात के लिए उत्तेजित करते थे कि आप उनके पास सवाल लेकर जाएँ। और सवालों के उस कठघरे में बैठकर जवाब देना उन्हें प्रिय था। एक चुनौती की तरह वे प्रसन्नता से सवालों का सामना करते थे।
शायद इसीलिए मेरे मन में उनके लिए इतना आदर और इतनी ऊँची जगह है, जहाँ कोई दूसरा नहीं आ सका।
और इससे भी बड़ी बात थी, उनका आत्म-स्वीकार या कनफेशन, जहाँ वे खुद अपने काम से असंतोष जताते हैं, और मानो एक तीखी आत्मग्लानि के साथ कहते हैं कि वे इससे कुछ बेहतर कर सकते थे, या कि उन्हें करना चाहिए था।
नामवर जी की इस ईमानदारी ने मुझे उनका सबसे ज्यादा मुरीद बनाया। कम से कम मैंने अपनी निसफ सदी की साहित्य यात्रा में ऐसा कोई दूसरा लेखक या आलोचक नहीं देखा, जिसने अपने काम से इस कदर असंतोष जताया हो या इतनी ईमानदारी से कनफेशन किया हो।
इसीलिए आत्मकथा लिखते हुए नामवर जी पर लिखना मेरे लिए सबसे ज्यादा चुनौती भरा था। वह लिखा गया, और ‘समालोचन’ के जरिए मेरे बहुत सारे मित्रों और सहृदय पाठकों तक पहुँचा। इसके लिए भाई अरुण जी और ‘समालोचन’ का साधुवाद।
सस्नेह,
प्रकाश मनु
नामवरजी को या तो बहुत प्रशंसा भाव से देखा गया (उनके आगे-पीछे उनके शिष्यों की एक बड़ी जमात थी ) या फिर अपने पूर्वाग्रहों के कारण अति निंदाभाव से। लेकिन उनकी साहित्यि समारोहों में उपस्थिति अनिवार्य थी। ।वे एक कद्दावर व्यक्ति थे और प्रखर वक्त थे। उन्हें सुनना स्वयं को समृद्ध करना था मेरे लिए।