अविनाश मिश्र की कविताएँ |
एक सलाह का एकांगीपन
वह चीज़ जिससे आपको पहचान मिलती है
ज़िंदगी भर आपका पीछा नहीं छोड़ती
इसलिए बेहतर है जहाँ तक संभव हो
मौलिक होने की कोशिश की जाए
मौलिक न हो पाने पर
कुछ न हो पाना भी मौलिक है
मत उड़ाओ दूर देश के किसी अपरिचित कवि की पंक्तियाँ
किसी फ़िल्मकार के दृश्य चुराने से बचो
उनके संवाद अलग हैं तुम्हारे संवादों से
उनके तूफ़ान अलग हैं तुम्हारे तूफ़ानों से
उनका वक़्त भी तुम्हारे वक़्त से अलग है
वे जो खाते हैं—रचना में—तुम्हें हज़्म नहीं होगा
भले ही तुम उसका नाम बदल दो
उनका काम अलग है तुम्हारे काम से
यह काम तुरंत करो तुम अपना काम बदल दो
विषय ही विषय हैं पास-पास
उनमें उतरोगे तो उन्हें कह भी लोगे
दूसरों के युद्ध तुम्हारे युद्ध नहीं हैं
तुमने अभी युद्ध देखा ही कहाँ है
निगाह-ए-ग़ैर से मंसूब होने की ज़रूरत क्या है
अपनी आज़ादी को देखो
ठीक से देखो
वह बची भी है या नहीं
क्योंकि जब तक चुनना नहीं पड़े
पता नहीं चलता ज़रूरी क्या है?
विवेक
सुंदर की अगर समझ हो
तब संकट में भी
सुंदर का स्मरण जाता नहीं है
व्यथा
विषाद
विलाप में भी
पुकार उठती है
खो चुकी सुंदरता
रहने पर नहीं
न रहने पर याद आता है
रहना
रहते चले जाना ही याद है.
ख़राब चीज़ें
ख़राब हुई चीज़ें भी एक रोज़
ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाती हैं
यहाँ-वहाँ सब तरफ़ जितनी भी चीज़ें थीं
सुबह से लेकर रात तक काम आने वाली
मानवीय अस्तित्व और व्यवहार को प्रकाशित करने वाली
वे जब चलते-चलते रुकने को हुईं
और ख़राब लगने लगीं
विस्मृति उन्हें पुकारने लगी
वे ठीक हो गईं
वे उस तरफ़ मुड़तीं जिधर ख़राबियाँ थीं
इससे पहले ही सही दिशा में चलने लगीं
और यह ख़ुद-ब-ख़ुद हुआ
चीज़ों के साथ ही नहीं
व्यक्तियों
संबंधों
स्थानों
और स्थितियों के साथ भी
यही हुआ
कविताओं के साथ भी…
आत्म-वक्तव्य
मैं घुसा ही यह सोचकर था
कि कुछ नया करूँगा
पर मैंने पाया :
नए को
सबसे ज़्यादा साफ़ अगर कुछ नज़र आता है—
वह बाहर का रास्ता है.
मुझे खदेड़ा जाएगा यह तय था
इसलिए मेरी सारी तैयारी
—शुरू से ही—
शहादत की थी.
शहादत से पहले
मैंने बहुत कुछ नया किया
जिसके बारे में मुझे शहादत के बाद पता चला
कि उसमें कुछ भी नया नहीं था.
सब कुछ ‘न’ और ‘या’ जितना पुराना था.
इस बीच मैं कभी प्रशंसा से घायल नहीं हुआ
क्योंकि बहुत कुछ मुझे झूठ लगता था.
मैं रह सकता
तब इस तरह नहीं रहता
रहता बोलने की कला जानने वालों की तरह.
मैं बह सकता
तब इस तरह नहीं बहता—
भावनाओं की तरह.
मैं कह सकता
तब इस तरह नहीं कहता.
|
अविनाश मिश्र के दो कविता संग्रह – ‘अज्ञातवास की कविताएं‘, ‘चौंसठ सूत्र, सोलह अभिमान’ और एक उपन्यास ‘नये शेखर की जीवनी’ प्रकाशित है, सदानीरा और हिन्दवी के संपादन से जुड़े हुए हैं.
darasaldelhi@gmail.com |




एक सलाह का एकांगीपन
हम ख़ुशनसीब हैं कि दूसरों जैसे नहीं हैं । प्रत्येक व्यक्ति अनूठा है । जैसे हमारी उँगलियों के निशान । हमारा चलना भी दूसरों के चलने से मेल नहीं खाता । यही हमारी सुंदरता है । इसे खोने मत देना । तुम दूसरों की नक़ल करके उन जैसे नहीं बन पाओगे । हम जैसे भी हैं ठीक हैं ।
मेरी नाक कुछ टेढ़ी है । और एक नथुना (नॉस्ट्रल) भीड़ा है । हमारे परिवार में भी किसी का नहीं है । यह मेरी अद्वितीय बनावट है । मैं अपने युद्ध स्वयं लड़ रहा हूँ । मेरा हर्ष और विषाद मेरा अपना है । आप ख़ुद में ख़ुश 🙂 रहें । मैं बाधा बनने वाला कौन होता हूँ । प्रोफ़ेसर अरुण देव जी; मैंने यह लिखने के लिये नहीं लिखा । मेरी प्राकृतिक बनावट ही ऐसी है ।
फिर से असद जी की बात याद करनी होगी कि अविनाश की कविता असली धातु की बनी है। अविनाश अपने हर साहित्यिक उपक्रम में दिलेरी और नफ़ासत से अपनी बात कहता है पर अपनी कविता में वह सबसे अधिक मार्मिक होता है।
सुंदर की अगर समझ हो
तब संकट में भी
सुंदर का स्मरण जाता नहीं है
…
हमारे अपने समय की – सुंदर कविताएं
अविनाश मिश्र की कविताओं में मैं अपना पुनर्जन्म देखता हूँ, जैसे यह
मैंने ही लिखी हों ।खराब चीज़ें अपने आप ठीक हो रही होंं यहाँ आकर।
अच्छी कविताएं । अविनाश गहरे उतर कर रचते हैं ।
विवेक
अफ्रीकी देशों में वहाँ के निवासियों के रंग भूरे से लेकर घने काले हैं । बालों की बनावट विशिष्ट है । इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे सुंदर नहीं हैं । दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के चलते यूरोप ने उनसे घृणा की । 1653 में डच व्यक्ति ने दक्षिण अफ़्रीका को अपना ग़ुलाम (दास) बनाया । कदाचित 2 शताब्दियाँ के बाद ब्रिटेन ने । दक्षिण अफ़्रीका 🇿🇦 अपनी आज़ादी के लिये लड़ता रहा था । वहाँ का दंश गांधी ने भी सहा और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़े ।
इसी में से नेल्सन मंडेला का उदय हुआ । अंततः देश स्वतंत्र हुआ और मंडेला को शांति का नोबेल पुरस्कार दिये गया ।
अफ़्रीका के लोग सुंदर हैं । सुंदरता देखने की दृष्टि चाहिये । हमारे आस-पास सुंदरता भरी हुई है । उसे देखें । स्मृतियों को बचाये रखें । ये यादें हमारा जीवन सँवारेंगी । नैरंतर्य प्रदान करेंगी ।
आओ इन सुखों और दुखों में जियें ।
हर अगली पंक्ति में अविनाश की कविता किसी अलग दिशा में सोच के एक नए सफ़र पर निकल जाती है। ये भावोद्रेक की कविताएं नहीं है। ये पाठक की सोचने और महसूस करने की सलाहियत को चुनौती देती कविताएं हैं। ये कविताएं उसे लगातार अपना ही पुनराविष्कार करने की ओर ले जाती हैं। ऐसी ही कविता आलोचक को नए काम के लिए उपजाऊ जमीन मुहैया कर पाती है। ज़ाहिर है,ऐसी कविता के लंबे सफ़र और लंबी उम्र की दुआ बनी रहती है।
ख़राब चीजें
अरे वाह । यह कविता स्वप्न नहीं दिखाती और न हि दिवास्वप्न । यह प्रतिदिन का अनुभव है । ख़राब चीज़ें दुरुस्त हो जाती हैं । यह अलग बात है कि हम हम धैर्य खो देते हैं । प्रकृति से सीखा जा सकता है । पतझड़ के मौसम के बाद वसंत आता है । कोंपलें फूट आती हैं । जीवन लौट आता है । वर्षाकाल में बहुमंज़िला इमारतों की धूल साफ़ हो जाती है ।
अविनाश मिश्र ने लिखा है ‘मानवीय अस्तित्व और व्यवहार को प्रकाशित करने वाली …वे ठीक हो गयीं । मेरी दृष्टि में यह जीवन की निरंतरता का प्रतीक है । निज को निराश नहीं करना चाहिये । अँधेरे में जुगनू की मद्धम रोशनी हमारी नाव की पतवार बन जाती है । पाल वाली नाव के लिये हवा का काम करती है ।
हिन्दी नवजागरणकालीन पत्रिकाओं को अगर आप उलट-पलट रहे हैं तो उसमें ‘हिन्दी साहित्य में डाकेजनी’ या ‘हिन्दी साहित्य में चोरी’ या ‘भावापहरण’ जैसे लेख दिखाई देंगे। अविनाश मिश्र की पहली कविता पढ़ते हुए इन लेखों की याद आती है। आखिर यह कब तक कहा जाएगा कि “चुराने से बचो।”
‘एक सलाह का एकांगीपन’ से युवाओं को सीख लेनी चाहिए। कान पकड़कर उठक बैठक करना चाहिए कि हम चोरी नहीं करेंगे। अपने अनुभव को पकाएँगे, तब लिखेंगे।
व्यथा
विषाद
विलाप में भी
पुकार उठती है
खो चुकी सुंदरता
रहने पर नहीं
न रहने पर याद आता है
रहना
रहते चले जाना ही याद है. ❤️
आत्म वक्तव्य
अविनाश मिश्र मेरी मन: स्थिति को किस प्रकार जान पाये । बैंकों में कम्प्यूटरीकरण के बाद सोचा था कि कुछ नया करूँगा । जब मैन्युअल रूप से काम होता था तब का क़िस्सा लिख रहा हूँ । मैं अफ़सर के पद पर अ’फ़िशिएट करता रहता था । एक क्लर्क लेजर की शीट पर किसी खाता धारक की डीटेल को अगली शीट पर नहीं ले जाता था । चेक करते समय मैं डीटेल लिख दिया करता । संबंधित क्लर्क को कहा भी । परंतु वह नहीं मानता था । घरेलू हालात की वजह से मैंने पदोन्नति का त्याग कर दिया । वही क्लर्क अफ़सर बन गया । मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया ।
फिर कम्प्यूटर का युग आ गया । मेरे कुछ नया कर गुज़रने की चाह ने कई ख़ामियाँ निकाली । इन्फ़ोसिस बैंकिंग नहीं जानता था और बैंक के अफ़सर इन्फ़ोसिस की कार्य प्रणाली को ।
हमारे ज़िले में एक दिन की कार्यशाला का आयोजन किया गया था । शाखा प्रबंधक ने मुझे भेजा । मैंने ख़ाली वक़्त नहीं बिताया था । हमारे क्षेत्रीय प्रशिक्षण कॉलेज पंचकूला से फ़ैकल्टी मेम्बर मिस्टर आर के बहल सिखाने के लिये आये थे । उन्होंने आरंभिक वक्तव्य देकर प्रश्न पूछने के लिये कहा । मैं संकोची हूँ । जब किसी ने भी हाथ नहीं खड़ा किया तो मैं उठा । पाँच कमियाँ बचत खाते खोलने की और 15 मुश्किलें सावधि जमा योजना के सवाल कर दिये । बहल साहब स्तब्ध रह गये । तब उन्होंने उद्घाटन किया कि मैंने अपने हाथों से दो सौ शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण किया है । परंतु इन न्यूनताओं को किसी ने इंगित नहीं किया ।
बहरहाल, मुद्दे पर चर्चा कर रहा हूँ । नौकरी के आख़िरी 4 वर्ष मुश्किलों में गुज़ारे । काम करने का परहेज़ नहीं था । घमंडी मैनेजर से साबिक: पड़ गया । वह चाहता था कि आधी-अधूरी डीटेल डालकर खाते खोल दिये जायें । मैंने ज़िद की । मैनेजर ने बाहर का रास्ता दिखा दिया । उन दिनों राजकीय प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों के खातों में सरकार सीधे अनुदान की राशि जमा कर देती थी । अवयस्कों के खाते ग़लत तरीक़े से खोले जाते थे । मैं खाता खोलने का फ़ॉर्म अपने घर ले आया । ख़ुद के साथ लड़ा । रात जागते हुए बितायी और हल निकल आया । एक ज़िद्दी और साथ ही चापलूस वृत्ति का हेड क्लर्क खाते खुलवाने के लिये मेरे पास आया । पिछले चार वर्षों से विशेष सहायक के पद पर नियुक्त होने के बाद खातों के सत्यापन की शक्ति मुझे मिल चुकी थी ।
वह हेड क्लर्क ज़िद करने लगा । मैंने उसे एक खाता खोलने का फ़ॉर्म थमा दिया । समझा भी दिया कि इस प्रकार भरना है । उसने हामी भर दी कि मैंने समझ लिया है । अगले दिन एक बच्चे का फ़ॉर्म भरकर लाया । उसमें ग़लतियाँ थीं । वह मेरे पाँव पड़ गया । उसे अक़्ल लग गयी ।
मेरा मैनेजर समझता था कि हरिदेव ग़लत नहीं है । फिर भी उसके घमंड ने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया । मुझे खदेड़ा गया । मेरी रगों में मेरे खुद्दार पिता का लहू बहता है । मैनेजर चाहता था कि हरिदेव मेरे पैर पड़े । मैं उस मिट्टी का बना हुआ नहीं हूँ ।
अविनाश की बेहतरीन कविताएं।ऐसी ही कविताओं के कारण उनके लिखे का इंतजार रहता है।
अच्छी कविताएं अविनाश जी। ठीक कहा है कि संवाद और तूफान अलग अलग होते हैं लोगों के।
प्रस्तावना में इतनी महत्वपूर्ण बात कह दी गई है कि कविता पर अलग से बात करना बेमानी जान पड़ रहा है। कवि मित्र अविनाश मिश्र व समालोचन को हार्दिक बधाई.
कविताओं में ताज़गी व नयापन है । ख़राब चीज़ें कविता मुझे बहुत अच्छी लगी ।
कविताओं में ताज़गी व नयापन है । ख़राब चीज़ें कविता बहुत अच्छी लगी ।
आम जीवन में भी जो बातें उपेक्षा और धूल की परतों में छिप जाती हैं, अविनाश उन्हें अच्छी कविताओं में ढालना जानते हैं। पहले की कविताओं की अपेक्षा ये कुछ सबड्यूड टोन की कविताएँ हैं। मुझे बार- बार अपने कथ्य और शिल्प को नये सिरे से खोजते कवि सुंदर लगते हैं। अपने समय के इन कुछ कवियों को हम ज़माने का हाल जानने के लिए भी पढ़ते हैं।
कविताएँ संख्या में कुछ अधिक हो सकती थीं।
बहुत बढ़िया।
भाषा का सरल होना हमेशा संप्रेषण को सशक्त करता है | अविनाश जी की कविताएँ , हमारा खुद से निरंतर संवाद है, मुठ्ठी में इकठ्ठी करके, हमारे भीतर की ही बातें अविनाश जी हमारे समक्ष रखते हैं, उलझे हुए धागों को सुलझा कर ऊन का गोला बनाते हैं और फिर बोलते हैं बुनो |
अभी बहुत सारे धागे सुलझाने हैं आपने अविनाश जी, कोशिश जारी रखिये | बेहतरीन कविताएँ | आपको बहुत बहुत शुभकामनायें 💐💐
ऋतु डिमरी नौटियाल
अविनाश मिश्र समकालीन हिंदी कविता के उस मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं जहाँ आत्मानुभव और सामाजिक विवेक एक-दूसरे से टकराते हुए नई भाषा रचते हैं। ये कविताएँ पाठक के भीतर धीरे-धीरे उतरती हैं। उनका स्वर ऊँचा नहीं, न बड़बोलेपन से व्यक्त होती है, पर भीतर तक सुनाई देती है। वे अपने समय को शोर के बजाय अर्थ की सूक्ष्म दरारों से पकड़ते हैं। इसी कारण उनकी कविता निजी जीवन और सामूहिक संकट, दोनों को एक साथ स्पर्श करती है।
‘एक सलाह का एकांगीपन’ आज की रचनाशील पीढ़ी के सामने मौलिकता का सीधा प्रश्न रखती है। कविता की शुरुआत ही पहचान और अनुकरण के द्वंद्व को खोल देती है—
“वह चीज़ जिससे आपको पहचान मिलती है
ज़िंदगी भर आपका पीछा नहीं छोड़ती
इसलिए बेहतर है जहाँ तक संभव हो
मौलिक होने की कोशिश की जाए।”
यहाँ अविनाश अनुभव की ज़मीन पर खड़े होकर रचनाकार को सावधान करते हैं। आगे वे कहते हैं—
“दूसरों के युद्ध तुम्हारे युद्ध नहीं हैं
तुमने अभी युद्ध देखा ही कहाँ है।”
इन पंक्तियों में समय और परिस्थिति की भिन्नता का गहरा बोध है। कविता यह बताती है कि उधार का अनुभव साहित्य को खोखला बना देता है। उल्लेखनीय है कि शिल्प सौंदर्य यहाँ कथन की सादगी में है। बिना किसी अलंकारिक आडंबर के, कविता सीधी पाठक की चेतना से संवाद करती है।
यह भी महसूस किया जा सकता है कि अविनाश की कविताएँ भावोच्छ्वास से अधिक बौद्धिक संवेदना पर टिकी रहती हैं। वे पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती हैं। ‘विवेक’ कविता में सुंदरता को संकट के बीच स्मरण में बने रहने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है—
“सुंदर की अगर समझ हो
तब संकट में भी
सुंदर का स्मरण जाता नहीं है।”
यहाँ सुंदरता बाहरी सज्जा भर नहीं रह जाती, वह नैतिक दृष्टि बन जाती है। कविता यह संकेत देती है कि मनुष्य की संवेदना ही उसे कठिन समय में संभाले रखती है। उनके काव्य शिल्प की यह विशेषता है कि गहरे विचार को उन्होंने बहुत हल्की, लगभग बोलचाल की भाषा में रख दिया गया है।
‘व्यथा’ कविता में स्मृति और अभाव के द्वंद्व को अत्यंत संक्षिप्त भाषा में पकड़ा गया है—
“रहने पर नहीं
न रहने पर याद आता है
रहना
रहते चले जाना ही याद है।”
कुछ पंक्तियों में ही जीवन की पूरी त्रासदी उभर आती है। अविनाश का संयमित शिल्प ही उनकी कविताओं की खूबी है। वे शब्दों का बोझ नहीं बढ़ाते, अनुभव को स्वयं बोलने देते हैं।
‘ख़राब चीज़ें’ अविनाश की सबसे अर्थगर्भी कविताओं में है। यहाँ वे समय की मरम्मत-शक्ति पर भरोसा व्यक्त करते हैं—
“व्यक्तियों
संबंधों
स्थानों
और स्थितियों के साथ भी
यही हुआ।”
यह कविता किसी झूठे आशावाद में नहीं जाती। वह जीवन के अनुभव से उपजे धैर्य की बात करती है। रोज़मर्रा की दुनिया में जो टूटता-बिखरता दिखता है, उसके भीतर भी सुधार की संभावना बनी रहती है। यही जीवन की निरंतरता है, जिसे अविनाश बहुत सहज ढंग से पकड़ते हैं।
‘आत्म-वक्तव्य’ में अविनाश मिश्र रचनाकार होने की विडंबनाओं को सामने रखते हैं—
“नए को
सबसे ज़्यादा साफ़ अगर कुछ नज़र आता है—
वह बाहर का रास्ता है।”
यह पंक्ति आज के साहित्यिक परिदृश्य की कठोर सच्चाई खोल देती है। कविता आगे कहती है—
“मैं घुसा ही यह सोचकर था
कि कुछ नया करूँगा।”
यह आत्मालोचन का साहस है। अविनाश स्वयं को भी उसी कसौटी पर रखते हैं जिस पर समय को रखते हैं। यहाँ उनका शिल्प आत्मस्वीकृति का रूप ले लेता है।
अविनाश मिश्र की भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। वह बातचीत की लय में बहती है और अर्थ की गहराई बनाए रखती है। उनकी कविता हमारे भीतर के उलझे अनुभवों को खोलती है, उन्हें व्यवस्थित करती है। यही कारण है कि पाठक इन कविताओं में अपना जीवन देख पाते हैं। किसी पाठक का यह कहना कि इन कविताओं में वह अपना पुनर्जन्म देखता है, इस आत्मीयता का प्रमाण है।
इन कविताओं में समय का संकट जीवन के सूक्ष्म क्षणों के माध्यम से प्रकट होता है। संवाद, युद्ध, सुंदरता, स्मृति, मौलिकता—ये सब बड़े विमर्शों की ओर हमें खींचने के बजाय रोज़मर्रा की भाषा में ढलकर सामने आते हैं। अविनाश मिश्र अपने समय के उन कवियों में हैं जो भाषा की चमक से अधिक दृष्टि की ईमानदारी पर भरोसा करते हैं। उनकी कविताएँ विचार और संवेदना के संतुलन से रची गई हैं। इसी संतुलन के कारण वे पढ़ने के बाद मन में ठहरती हैं और धीरे-धीरे अपना अर्थ खोलती चलती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी काव्य-उपलब्धि है।