आलोचना

निराला: चेतना का स्त्री-पक्ष: रजनी दिसोदिया

महाकवि निराला ने कविताओं के साथ-साथ कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे हैं,  उनके साहित्य को समग्रता में देखते हुए रजनी दिसोदिया ने निराला की स्त्री-चेतना की पड़ताल की हैदेखें आप.   ...

समय और साहित्य (विजयमोहन सिंह ): शीतांशु

विजयमोहन सिंह (1 जनवरी, 1936-25 मार्च, 2015) ने कहानियां लिखीं,उपन्यास लिखे, पत्रिकाओं का संपादन किया, उनका आलोचनात्मक लेखन भी विस्तृत है. उनकी पुस्तक ‘समय और साहित्य’ (२०१२) के माध्यम से...

अनामिका: कविता का मानवीय राग: रेखा सेठी

 हिन्दी में साहित्य अकादमी पुरस्कार अनामिका को उनके कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत- थेरी गाथा: 2014’ के लिए दिया गया है, निर्णायक समिति में थे- श्रीमती चित्रा मुद्गल, प्रो. के....

सूरदास के भ्रमरगीत प्रसंग का पाठ–पुनर्पाठ: माधव हाड़ा

कवि सूरदास के साहित्य में वात्सल्य और श्रृंगार के साथ-साथ सगुण और निर्गुण के द्वंद्व का तीखा बोध है, इसके साथ ही उनके काव्य-संसार में उनका समय भी बोलता है....

रामविलास शर्मा का अर्थशास्त्रीय चिंतन: रविभूषण

रामविलास शर्मा का अर्थशास्त्रीय चिंतन: रविभूषण

हिंदी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परम्परा क्षीण ही रही, इस दिशा में डॉ. रामविलास शर्मा ने महत्वपूर्ण कार्य किया हालाँकि उनकी इस विषय पर कोई स्वतंत्र किताब नहीं है लेकिन...

पंकज सिंह की कविता: राजाराम भादू

कवि पंकज सिंह की कविताओं पर लिखते हुए आलोचक राजाराम भादू उन प्रसंगों को भी याद करते हैं जिनमें ये कविताएँ आकार ले रहीं थीं, आठवें दशक की जयपुर की...

मैनेजर पाण्डेय: भक्तिकाल की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता: विनोद शाही

मैनेजर पाण्डेय: भक्तिकाल की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता: विनोद शाही

आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय की भक्तिकाल की आलोचना दृष्टि पर यह आलेख प्रसिद्ध आलोचक विनोद शाही का है. उन्होंने गम्भीर सवाल खड़े किये हैं जो कि बड़े बहस को आमंत्रित...

विनोद कुमार शुक्ल: गिरिराज किराड़ू

विनोद कुमार शुक्ल: गिरिराज किराड़ू

भाष्य के अंतर्गत समालोचन महत्वपूर्ण रचनाओं का पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है, जिसमें आपने अब तक-  निराला, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, आलोक धन्वा, नंद चतुर्वेदी, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल...

भक्ति-कविता, किसानी और किसान आंदोलन : बजरंग बिहारी तिवारी

भक्ति-कविता, किसानी और किसान आंदोलन : बजरंग बिहारी तिवारी

भक्तिकाल के कवियों का समूह विरक्त लोगों का नहीं था, धर्म के राजनीतिक आशय को वे लोग ख़ूब समझते थे. वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने सूरदास के काव्य में...

कामायनी और राम की शक्तिपूजा की मिथकीय पुनर्रचना : विनोद तिवारी

‘मैन अगेंस्ट मिथ’ के लेखक बैरो डनहैम का मानना है कि दर्शन को मानव-मुक्ति का साधन होना चाहिए. सामाजिक अर्थों  में मानव-मुक्ति के लिए वस्तुपरकता की जरूरत होती है. आध्यात्मिकता...

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