आलोचना

विनोद कुमार शुक्ल: गिरिराज किराड़ू

विनोद कुमार शुक्ल: गिरिराज किराड़ू

भाष्य के अंतर्गत समालोचन महत्वपूर्ण रचनाओं का पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है, जिसमें आपने अब तक-  निराला, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, आलोक धन्वा, नंद चतुर्वेदी, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल...

भक्ति-कविता, किसानी और किसान आंदोलन : बजरंग बिहारी तिवारी

भक्ति-कविता, किसानी और किसान आंदोलन : बजरंग बिहारी तिवारी

भक्तिकाल के कवियों का समूह विरक्त लोगों का नहीं था, धर्म के राजनीतिक आशय को वे लोग ख़ूब समझते थे. वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने सूरदास के काव्य में...

कामायनी और राम की शक्तिपूजा की मिथकीय पुनर्रचना : विनोद तिवारी

‘मैन अगेंस्ट मिथ’ के लेखक बैरो डनहैम का मानना है कि दर्शन को मानव-मुक्ति का साधन होना चाहिए. सामाजिक अर्थों  में मानव-मुक्ति के लिए वस्तुपरकता की जरूरत होती है. आध्यात्मिकता...

स्त्री-दर्पण: नवजागरण और स्त्री-पत्रकारिता: गरिमा श्रीवास्तव

‘स्त्री-दर्पण’ पत्रिका का प्रकाशन जून १९०९ में प्रयाग से शुरू था इसकी संपादिका रामेश्वरी देवी नेहरू और प्रबंधक कमला देवी नेहरू थीं. इसमें स्त्री मुद्दों पर सामाजिक राजनीतिक लेख छपते...

तुलसी का आत्मसंघर्ष और कवितावली: प्रेमकुमार मणि

तुलसी का आत्मसंघर्ष और कवितावली: प्रेमकुमार मणि

गोस्वामी तुलसीदास के इर्द-गिर्द भक्ति/धर्म/अस्मिता का ऐसा प्रभा मंडल तैयार किया गया है कि कवि तुलसी अलक्षित रह जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि उनका जीवन कवि का था...

शमशेर बहादुर सिंह का काव्य रहस्य और सौंदर्य के भयावह फूल: सविता सिंह

शमशेर बहादुर सिंह का काव्य रहस्य और सौंदर्य के भयावह फूल: सविता सिंह

आज प्रस्तुत है शमशेर बहादुर सिंह की हिंदी की ‘बड़ी’ प्रेम कविता ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ का स्त्रीवादी पाठ. सविता सिंह ख़ुद हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री हैं. शमशेर की ‘शमशेरियत’...

रेणु की राजनीति : प्रेमकुमार मणि

यह फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म शताब्दी वर्ष है, रेणु के लेखन के विविध आयामों को समझने के प्रयास हो रहें हैं. उनकी राजनीतिक चेतना क्या थी, किस तरह से इसने...

कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु : प्रेमकुमार मणि

फणीश्वरनाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष के सिलसिले में समालोचन प्रेमकुमार मणि का रेणु की कहानियों पर आधारित यह आलेख प्रस्तुत कर रहा है. रेणु की कहानियां ग्रामीण कामगार और...

क्या आचार्य रामचंद्र शुक्ल जातिवादी और साम्प्रदायिक हैं ? प्रेमकुमार मणि

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन  और आलोचना के क्षेत्र में अभी भी शीर्ष पर हैं. बिना उनसे वाद–विवाद के आप हिंदी साहित्य से संवाद नहीं कर सकते. उनपर...

मुस्लिम स्त्रियों की आत्मकथाएं : गरिमा श्रीवास्तव

प्रो. गरिमा श्रीवास्तव का शोध आलेख ‘चुप्पियाँ और दरारें’ मुस्लिम स्त्रियों की आत्मकथाओं का विस्तृत विश्लेषण विवेचन करता है, इनमें साहित्य, संस्कृति और राजनीति से जुड़ी प्रसिद्ध स्त्रियाँ भी शामिल...

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