‘गोदान’ में राय साहब का धनुष-यज्ञ: रविभूषण
हिंदी के वरिष्ठ आलोचक रविभूषण बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी समझते हैं. इसी शीर्षक से उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है जिसमें साहित्य और समाज के व्यापक सरोकारों से सम्बन्धित आलेख संकलित...
हिंदी के वरिष्ठ आलोचक रविभूषण बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी समझते हैं. इसी शीर्षक से उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है जिसमें साहित्य और समाज के व्यापक सरोकारों से सम्बन्धित आलेख संकलित...
2023 के संभावित नोबेल विजेताओं में चीन की लेखिका कैन जू (Can Xue), जापान के उपन्यासकार हारुकी मुराकामी, भारतीय मूल के सलमान रुश्दी और कीनिया के न्गुगी वा थ्योंगो आदि...
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व, संघर्ष और दर्शन के इतने आयाम हैं कि सम्यक रूप से अभी भी इन्हें समझा नहीं जा सका है. जटिल, बहुकोणीय समय में उनकी केन्द्रीय...
महानगरों से हटकर कस्बों और छोटे शहरों में भी स्थानीय लेखकों और नवांकुरों की साहित्यिक सरगर्मियों से आबाद साहित्य के स्वायत्त ठीहे होते थे. बचे होंगे कुछ अभी भी. यह...
अभियोग को सवाल की तरह पूछते रहना चाहिए. ख़ुद से भी. यह दुनिया असंख्य प्रश्न चिह्नों के सिवा है क्या? वरिष्ठ कवि अरुण कमल अपने शिल्प में सौम्य दिखते भले...
कुँवर नारायण प्रार्थना के कवि हैं. दैनंदिन के अवरोधों से मुठभेड़ के लिए आवश्यक जीवन-विवेक और साहस के कवि. ये मनुष्यता की अभ्यर्थना में लिखी गयीं कविताएँ हैं. इसमें नकार...
बीसवीं सदी को प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ‘अतियों का युग’ कहते हैं. एक भारतीय के लिए बीसवीं सदी के क्या मायने हैं? इसी सदी में हम उपनिवेश से मुक्त हुए....
हिंदी सिनेमा के गीतकार शैलेन्द्र (30 अगस्त, 1923–14 दिसम्बर, 1966) का यह जन्म शताब्दी वर्ष है. हिंदी का एक कवि कैसे फिल्म-जगत में जाता है और गीतों की दुनिया बदल...
तार्किक चेतना से हासिल की गयी विज्ञान की उपलब्धियों को उनके यहाँ पहले से होने जैसे किसी कथन से छोटा करने की प्रवृत्ति लगभग सभी धर्मों में देखी जा सकती...
‘कौन जात हो भाई’ कविता से चर्चित बच्चा लाल ‘उन्मेष’ के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. कुछ दिन पहले उनकी दस कविताएँ समालोचन पर प्रकाशित हुईं थीं. इन...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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