आउशवित्ज़ एक प्रेमकथा: गरिमा श्रीवास्तव
राजनीति जब नफ़रत में सन जाती है तब हिटलर पैदा होता है, आउशवित्ज़ घटित होते हैं जहाँ मनुष्यता अपने निम्न स्तर पर गिर जाती है. गरिमा श्रीवास्तव गम्भीर अध्येता हैं,...
राजनीति जब नफ़रत में सन जाती है तब हिटलर पैदा होता है, आउशवित्ज़ घटित होते हैं जहाँ मनुष्यता अपने निम्न स्तर पर गिर जाती है. गरिमा श्रीवास्तव गम्भीर अध्येता हैं,...
2021 में प्रकाशित अपने पहले कहानी संग्रह ‘दुखान्तिका’ से चर्चा में आये नवनीत नीरव शिल्प की सुगढ़ता के लिए प्रशंसित हैं. प्रस्तुत कहानी ‘भँवर’ भी कसी हुई है और अंत...
कृष्ण कल्पित इतिवृत्त को अपनी कविताओं में समकालीन अर्थ देते रहें हैं. इधर उपन्यास की ओर मुड़े हैं. ‘जाली किताब’ उनका आने वाला ‘प्रयोगात्मक’ उपन्यास है. किताबों में किरदार होते...
स्फटिक’ कुमार अम्बुज की कहानी है. जब आप किसी कथा को पढ़ते हैं तो उससे आप क्या उम्मीद रखते हैं? उसका यथार्थ आपको वशीभूत कर ले, जिस आवेग को कथाकार...
किंशुक गुप्ता चिकित्सक हैं. हिंदी और अंग्रेजी में लिखते हैं. उनकी कहानियां इधर हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा में रहीं हैं. उनकी नयी कहानी ‘जयप्रभुदेव’ बाबाओं द्वारा...
कथाकार राजेन्द्र दानी के दस कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं, वर्षों से वह हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘पहल’ से जुड़े रहे. उनकी प्रस्तुत नयी कहानी ‘अन्विति’ स्मृति और अकेलेपन के...
‘हठात् वृष्टि’ समालोचन पर अम्बर पाण्डेय की दसवीं कहानी है, केवल इन्हीं कहानियों के संकलन से उनका पहला कहानी-संग्रह तैयार हो सकता है. अम्बर पाण्डेय ने जहाँ हिंदी कहानी को...
बाल-अपराध बच्चों पर समाज की निष्ठुर हिंसा की बेबस प्रतिक्रिया है. ऐसा संवेदनशील समाज बनाने में हम असमर्थ रहें हैं जहाँ स्वस्थ ढंग से उनका विकास हो सके. युवा अमन...
हरदीप सबरवाल हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी में लिखते हैं. उनकी यह कहानी अच्छी है. पठनीय है.
अक्सर अकादमिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हिंदी कथा साहित्य के मनोविश्लेषण की कोशिशें होती रहती हैं, ये कोशिशें भी मनोवैज्ञानिकों द्वारा नहीं हुईं हैं. किसी मनोविश्लेषक को यह काम...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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